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7/25/2009

नक्सली घटना पर देश भर के लेखक एकमत हुए

देश भर के लेखकों ने की तीव्र भर्त्सना
रायपुर । छत्तीसगढ़ में बढ़ते हुए नक्सली घटना की भर्त्सना करते हुए देश भर के लेखकों ने मदनवाड़ा के नक्सली एंबुश में मारे गये शहीदों के प्रति श्रद्धांजलि दी है ।

प्रख्यात कवि और आलोचक अशोक बाजपेयी ने कहा है कि इस समय नक्सलियों द्वारा कई राज्यों में लगातार जो हिंसा हो रही है उसके बारे में तमाम क्रांति धर्मी लेखक चुप्पी क्यों साधे हुए हैं यह समझ में आना कठिन है । वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति की परंपरा में ही यह चुप्पी है । 20वीं शताब्दी में हम देख आये हैं कि हिंसा और हत्या से सच्ची क्रांती नहीं होती और अगर उसके होने का कुछ देर के लिए भ्रम हो भी जाये तो उसकी परिणति भी देर सवेर हिंसा और हत्या में हीं होती है ।

प्रख्यात कवि चंदकांत देवताले, उज्जैन हिंसा के सभी आयामों पर प्रतिबंध लगाने की अपील करते हुए कहा है कि मौत से प्राप्त की जानेवाले सत्ता का अंत अततः मौत में होती है, वहाँ विकास मायने नहीं रखता । नक्सलवाद की जड़ों में जाकर ही इसका हल निकाला जा सकता है । केवल हिंसक वारदातों से नहीं ।

कोच्चि, केरल के प्रख्यात लेखक ए. अरविंदाक्षन ने मदनवाड़ा की घटना को विकास विरोधी लोगों और संगठित अपराधियों की करतूत निरूपित करते हुए कहा कि सत्ता के लिए जब भी कोई वाद या दल हिंसा का सहारा लेने लगता है वह उसी समय से लक्ष्यच्यूत हो जाता है । लोगों का विश्वास उससे किंचित भी नहीं रह जाता है । आदिवासियों के विकास के बहाने से हिंसा को कभी भी और किसी भी दृष्टि से तवज्जो नहीं दी जानी चाहिए ।

जयपुर के गांधीवादी लेखक नंदकिशोर आचार्य ने नक्सलियों के करतूत को अहिंसा के ख़िलाफ़ और लक्ष्य से भटके हुए ऐसा हितैषी निरूपित किया है जिसे अपने लक्ष्य के अलावा अन्य सभी गतिविधियों पर ही रूचि रह गई है ।

मध्यप्रदेश साहित्य परिषद के प्रमुख और साक्षात्कार के संपादक डॉ. देवेन्द्र दीपक ने नक्सवाद को प्रजा विरोधी अवधारणा बताते हुए विश्व आंतकवाद का एक पहलू बताया है । उन्होंने कहा है कि ऐसे हिंसक तत्वों को अस्त्र शस्त्र पहुंचाने में जिनका हाथ है उनकी भी ख़बर ली जानी चाहिए । ऐसी समस्यायें केवल राज्य, व्यवस्था के लिए ही नहीं समूची मानव जाति के लिए भी अहितकर हैं । विडम्बना कि ऐसे विचारों के प्रति भी कुछ विघ्नसंतोषी मीडियाबाज सहानुभूति रख रहे हैं, अब समय आ गया है कि ऐसे तत्वों की पहचान भी राज्य सरकारें करें ।

धर्मयुग के पूर्व उप संपादक मनमोहन सरल, मुंबई ने कहा है कि छत्तीसगढ़ और साथ ही लालगढ़ की नक्सली हिंसा इस स्वरूप की भर्त्सना करते हुए मैं यह सोचता हूँ कि हमें इस समय की गहराई तक जाना चाहिए । असंतोष के कारणों की मीमांसा करनी चाहिए । केवल दमन से ही समस्या का फौरी हल भले ही हो जाये पर बिना इसके मूल तक जाये इसका स्थायी समाधान नहीं हो सकता । प्रयास इसी दिशा में करने होंगे ।

चर्चित आलोचक द्वय श्री भगवान सिंह,भागलपुर और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राध्यापक कृष्ण मोहन ने नक्सलियों द्वारा मदनवाड़ा में किये हिंसा को मनुष्य समाज के खिलाफ़ एक जघन्य षडयंत्र निरूपित करते हुए उन पर तत्काल कड़ाई से राज्य और केंद्र सरकार को निपटने का आग्रह किया है । ऐसी घटनाओं को हर विचार, हर कोण, हर दृष्टि से निंदनीय ही माना जाना चाहिए । यदि ऐसी घटनाओं को किन्ही उथले विचार के सहारे समर्थन मिलता है तो वह देश, समाज और समय के खिलाफ ही जायेगा ।

प्रख्यात आलोचक और कवि प्रभात त्रिपाठी, रायगढ़ ने अपने विचार रखते हुए कहा है कि प्रजातंत्र का विकल्प कोई भी हिंसक तंत्र नहीं हो सकता अतः नक्सलवाद मूलतः अपने लक्ष्य के साधनों की विश्वसनीयता खो चुका है । ऐसी घटनाओं को अराजक आक्रोश और मानवविरोधी माना जाकर उनका पूर्ण मनोयोग से जनता को जबाव देना ही होगा ।

शिरीष कुमार मौर्य, कवि, नैनीताल ने लिखा है कि मैं ऐसी किसी भी घटना का पुरजोर विरोध करता हूँ। विचार कहीं पीछे छूट रहा है और उसके नाम पर इस तरह का जो कुछ भी घट रहा है वह खेदजनक है। मृतकों को मेरी श्रद्धांजलि ।

प्रख्यात लेखक डॉ। हरि जोशी, इंदौर ने कहा है कि मदनवाड़ा की घटना को मुंबई में हुए आतंकी हमला से कम नहीं समझा जाना चाहिए । राजनांदगाँव के अपराधियों को कठोरता से जल्द से जल्द दंडित किया जाना चाहिए।

रायगढ़ के कवि और आलोचक डॉ. बलदेव ने कहा है कि यह मात्र राज्य सरकार की समस्या नहीं । यह केवल पुलिस की ड्यूटी नहीं कि वह आपके छत्तीसगढ़ को नक्सली विपदाओं से मुक्त बनाये रखे । यह वक्त निर्णय लेने की घड़ी है कि आप किसका वरण करना चाहते है ? माओवादी हिंसक तंत्र का या प्रजातंत्र का । अब पानी सिर से उतर चुका है । हर बच्चा बोले, हर युवक बोले, माँएं बोले, रिक्शावाला बोले, किसान बोले, मज़दूर बोले, अधिकार बोले। बोलें कि बस्स बहुत हो चुका, सिर्फ़ पुलिस ही नहीं लड़ेगी हम लडेंगे भी और नक्सलवादियों के ख़िलाफ़ बोलेंगे भी

सुशील कुमार, साहित्यकार, दुमका, झारखंड का मानना है कि नक्सली अब आंतकी का रूप ले रहे हैं। ये समाज और राष्ट्र के उसी तरह दुश्मन भी बन गये हैं। इनकी न सिर्फ़ भर्त्सना, बल्कि खात्मा के लिये सरकार और जनता, दोनों को आगे आना होगा। नक्सली अब उसी ऐशोआराम में जी रहे हैं जिस प्रकार शोषक वर्ग रहा करते हैं/थे। इनके भी बच्चे अब बड़े स्कूलों में पढ़ते हैं। इनका भी काफ़ी बैंक-बैलेन्स होता है। अत: नक्सलवाद अब जनांदोलन नहीं, पेट पालने का धंधा भी है।अब हमें ये उल्लू नहीं बना सकते।

आचार्य संजीव सलील, संपादक, नर्मदा, जबलपुर का विचार है कि नक्सलवाद वैचारिक रूप से पथ से भटके हिंसावादी हैं, जो किसी नीति-न्याय में विश्वास नहीं करते। शासन और प्रशासन को योजना बनाकर इन्हें समूल नष्ट कर देना चाहिए। ये न तो उत्पीडित हैं, न किन्ही सामाजिक अंतर्विरोधों का प्रतिफल। कुछ बुद्धिजीवी अपनी सहानुभूति देकर इन्हें पनपाते हैं । ये पौराणिक राक्षसों के आधुनिक रूप हैं जो अन्यों के मानवाधिकारों की रोज हत्या करते हैं और जब मरने लगते हैं तो खुद के मानवाधिकार की दुहाई देते हैं। आपनी साथी महिलाओं से बलात्कार करने में इन्हें संकोच नहीं होता। हिंसा पंथी कहीं भी, किसी भी रूप में हों, समूल नष्ट किये जाएँ। इनकी हर गोले का उत्तर सिर्फ और सिर्फ गोली से दिया जाना ज़ुरूरी है। सामान्य न्याय व्यवस्था नियम-कानून का सम्मान करनेवाले भद्रजनों के लिए है। आतंकवादियों को सामान्य कानून का लाभ नहीं देकर तत्काल ही गोले से मार दिया जाना चाहिए ।

देश के प्रख्यात गीतकार स्व. पं. नरेन्द्र शर्मा की बेटी लावण्या शाह, अमेरिका ने कहा है कि जब आदीवासी प्रजा पर अत्याचार होते हैँ तब वहाँ की दूसरी कौम चुप रहती है ? बस्तर के आदिवासियोँ की कोई मदद नहीँ करता ? ऐसा क्यूँ ?

ग़ज़लकार और रचनाकार के संपादक रवि रतलामी ने मदनवाड़ा में हुए नक्सली वारदात को देश का घृणित दुष्कर्म बताया । यह माओवादियों की हताशा से उपजी हिंसा है । राज्य की पुलिस प्रमुख के नेतृत्व में जिस तरह पुलिस प्रशासन इससे जान गँवाकर भी जूझ रही है वह वंदनीय है । माओवादियों के लिए अब माओ माओ नहीं रह गये, वे खाओ, पीओ और जीओ के प्रणेता की तरह लिये जाने लगे हैं । यह प्रजातंत्र के लिए ही नहीं स्वयं नक्सलियों के लिए घातक होगा । जनता को बंदूक से नहीं प्रेम का संदूक सौंपकर ही रिझाया जा सकता है । बस्तर और छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के तथाकथित पक्षधरों का पर्दाफ़ाश हो चुका है अब इनका नाश कऱीब है ।
सभी शहीदों को शत-शत नमन करते हुए अशोक सिंघई, भिलाई ने कहा है कि राज व्यवस्था और नक्सलवादी हिंसक आन्दोलनों के मध्य एक अनंतिम महासमर है जो कि समाप्त होता नहीं दिखता है। छापामार तरीकों से यृद्ध जब भी होता है सदैव चिन्हित व बड़े पक्ष को ही हानि होती है। नक्सली पक्ष जंगों में छिपा और अचिन्हित है अतः कार्यवाही के परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं। जन-संसाधनों का संहार राष्ट्रीयय क्षति व अपराध है। इसका हल प्रशासन के पास नहीं वरन राजनीति के पास ही मिल सकता है। यह राजनीति की दुरभिसंधियाँ ही हैं जो इस समस्या को जीवित रखे हुए हैं क्योंकि राजनीति को इन्हीं सबसे प्राणवायु मिलती है। राजनीति और मीडिया में कुछ प्रश्न पुलिस विभाग की भूमिका को लेकर उछाले जा रहे हैं। माननीय मुख्य मंत्री डा. रमन सिंह के वचन, धैर्य और प्रशासनिक चतुरता के बल पर बहुत कुछ बिखरने और बिगड़ने से अभी भी बचा हुआ है। अभी वक्त पुलिस प्रषासन को नसीहतें देने का नहीं वरन सद्भावनायें, सहानुभूतियाँ और शुभकामनायें देने का है।

डैलास, अमेरिका के रेडियो उद्घोषक और लेखक आदित्य प्रकाश सिंह ने अपनी श्रद्धांजलि मे कहा है कि नक्सलवाद केवल छत्तीसगढ़ की विपदा नहीं है । यह केवल विकास के अभाव से उपजा नहीं है । इसके मूल में है चीन के माओवादी ताकतों का विस्तार । भारत इसके लिए न कभी तैयार हुआ है, न कभी भविष्य में वह प्रजातंत्र के विकल्प में उसे स्वीकार करेगा । देश के गृहमंत्री ठीक ही कहते हैं कि अब तक चूक ही हुई है । अब वक्त आ गया है कि उन्हें जड़ से उख़ाड़ फेंका जाये ।

हिन्दी के चर्चित ब्लॉग लेखक जीत भार्गव ने माना है कि वामपंथियों ने हिन्दी, और हिन्दुस्तान का कबाडा किया है। वास्तविकता यह है कि भारत की अधोगति में इन प्रगतिशीलों को सुकून मिलता है। जनता के नरसंहार को यह जनवादी सही ठहराते हैं ।

कवि और साहित्य-शिल्पी के युवा संपादक राजीव रंजन प्रसाद ने लिखा है कि बस्तर और आदिवासी की समझ नहीं रखने वाले अपनी लफ्फाजियों से ही बाज आ जायें तो बडा परिवर्तन हो जायेगा। माओवादियों के समर्थक साहित्यकारों का बहिष्कार आवश्यक है।

दैनिक हरिभूमि, दैनिक भास्कर और वर्तमान में पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग प्रमुख संजय द्विवेदी ने मदनवाड़ा की जघन्य हत्या को जाबांज पुलिस कर्मियों का विजय बताया है कि उन्होंने उस युद्ध की शुरुआत कर दी है – जान गँवाकर भी कि अब हिंसक तत्वों को किसी भी कीमत में राज्य में पनपने नहीं दिया जायेगा । यह घटना उन्हें श्रद्धांजलि देने के अलावा स्वयं को ऐसी राष्ट्रद्रोही गतिविधियों के प्रति सतर्क रहने की भी सबक है । नक्सलवाद आंतकवाद का घरेलू संस्करण है जिसे बिना आंतकवाद माने निजात नहीं पाया जा सकता है । अब केंद सरकार को भी ऐसी समस्याओं पर बिना राजनीति किये जूझने के लिए तैयार होना होगा । प्रतिपक्ष में खड़े राजनीतिक दल अब तय करें कि माओवादी हिंसक नक्सली उनके भी खिलाफ़ है। हर उस व्यक्ति के खिलाफ हैं जो प्रजातंत्र की वकालत करता है, उस पर श्रद्धा करता है ।

स्वीड़न निवासी रेडियो संचालक और कवि चांद शुक्ला ने माओवादी हिंसा की कटू आलोचना करते हुए इसे प्रजातंत्र के लिए ख़तरा बताया है । उन्होंने कहा है कि नक्सलवाद की समस्या मात्र छत्तीसगढ़ की समस्या नहीं अपितु समूचे भारत की समस्या है, जिससे निपटने के लिए सारे देशवासी को आगे आना पड़ेगा ।

कार्टूनिस्ट अजय सक्सेना, अजय श्रीवास्तव ने कहा है कि हिंसा पर उतारू नक्सलियों को सबक सिखाने का अंतिम समय आ चुका है, उनसे अब किसी प्रकार की बातचीत की संभावना क्षीण हो चुकी है ।

मदनवाड़ा नक्सली हिंसा की निंदा करने वालों में अन्य प्रमुख लेखक हैं – शिवकुमार मिश्र, खगेन्द्र ठाकुर, प्रभाकर श्रोत्रिय, गंगाप्रसाद बरसैंया, रमेश दवे, अशोक माहेश्वरी, ओम भारती, एकांत श्रीवास्तव, मुक्ता, रंजना अरगड़े, अरूण शीतांश, डॉ. बृजबाला सिंह, नंदकिशोर तिवारी, राजेन्द्र परदेसी, डॉ. नैना डेलीवाला, राजुरकर राज, नवल जायसवाल, सुशील त्रिवेदी, आनंद कृष्ण, संतोष रंजन, राम पटवा, जयप्रकाश मानस, अशोक सिंघई, मुमताज, रवि श्रीवास्तव, बी. एल. पॉल, कमलेश्वर, सुरेश तिवारी, तपेश जैन, कुमेश जैन, हीरामन सिंह ठाकुर, संजीव ठाकुर, डॉ. राजेन्द्र सोनी, डॉ. चित्तरंजन कर, श्रीमती माधुरी कर, गौतम पटेल, डॉ. जे. आर. सोनी, राम शरण टंडन, डॉ. अजय पाठक, एस. अहमद, वंदना केंगरानी, चेतन भारती, भारती बंधु ।

11/29/2008

इधर देश है

इधर
दहशतगर्दी थे ही नहीं
फिर भी उभर रहे थे जगह-जगह खूनी पंजे
इधर
न गोली चल रही थी न ग्रेनेड
फिर भी हताहत हो रहे थे लोग
इधर
ख़ौफ़ का कोई भी संकेत नहीं था
फिर भी सारे लोग सकते में थे

इधर
सबकुछ था शांत निःस्तब्ध
फिर भी सभी तैयार हो रहे थे युद्ध के लिए

उधर मुंबई है
इधर देश है

11/28/2008

मुंबई : दो कविताएँ

देखते ही देखते

पानी के रास्ते से छिपते-छिपाते आया हुआ आंतक
मिट जायेगा बुलबुले की तरह
बारुदी गंध की बंधक हवा को
चीरते हुए लौट आयेंगे पंछी ठीहे में
खैनी की तरह दबा देगा सारे ख़ौफ़
वह पानपुरी वाला
गलियों में बेहिचक गेंद उछालेंगे छोटे-छोटे सचिन
ख़ुशनुमा तासीर वाली मुंबई
भूला जायेगी सबकुछ एक दुःस्वप्न की तरह
सब कुछ अपने होने के अंदाज़ में
होंगे सही सलामत फिर से
देखते-ही-देखते
पहले की तरह

पहले की तरह
कुछ नहीं होंगे तो सिर्फ वे ही
जो सबको बचाते हुए चले गये थे
हर बार की तरह
देखते-ही-देखते
0000


देवता


जिन्हें बेमौत मारा गया
सारे-के-सारे इंसान थे

जो बेमुरव्वत मार रहे थे
वे भी इंसान हो सकते थे

सिर्फ़ मरने-मारने की नहीं
बात उसकी हो रही है
जोमरने-मारने वालों को बचाने के लिए मर रहा था
बात उसकी नहीं हो रही
कि मरने-मारने वालों से कौन जन्नत पायेगा
बात सिर्फ उसकी ही हो रही है
जो बचे हुए लोगों को जन्नत सौंपकर
रूख़सत हुए हैं
बिलकुल अभी-अभी


बात देवता की हो रही है ।

5/22/2008

भारतवासियों ने दिया आतंकवाद का मुँहतोड़ जवाब



13 मई 2008, एक बार फिर भारत के सुप्रसिद्ध पर्यटक स्थल गुलाबी नगरी, जयपुर आतंकवादियों के कहर का पर्याय साबित हुई जबकि मानवता विरोधी आतंकियों ने साम्प्रदायिक सौहार्द्र का प्रतीक समझे जाने वाले जयपुर शहर को सिलसिलेवार बम धमाकों से हिलाकर रख दिया। आतंकवादियों द्वारा 8 अलग-अलग स्थानों पर मात्र 15 मिनट की समय सीमा के भीतर तथा केवल डेढ़ किलोमीटर की परिधि में यह सभी धमाके किए गए। इन धमाकों में साईकिलों का प्रयोग किया गया। कुल 10 साईकिलें विस्फोट हेतु प्रयोग में लाई गई थीं जिनमें से एक साईकिल में विस्फोट नहीं हो पाया। बताया जा रहा है कि गत् वर्ष मालेगाँव तथा उत्तर प्रदेश के लखनऊ, फ़ैजाबाद व बनारस के अदालत परिसरों में हुए धमाकों में भी विस्फोट हेतु इसी प्रकार साईकिलों का ही प्रयोग किया गया था। विस्फोटक को साईकिल पर किसी थैले अथवा टिफिन में रखकर आतंकवादी इन साईकिलों को विस्फोट स्थल तक एक साईकिल सवार के रूप में आसानी से पहुंचा देते हैं। इसके पश्चात इनमें रखी विस्फोटक सामग्री को टाइमर अथवा रिमोट द्वारा विस्फोट कर दिया जाता है। जयपुर में भी ऐसा ही किया गया। परिणामस्वरूप विभिन्न सम्प्रदायों से संबंध रखने वाले 63 बेगुनाह व्यक्ति अपनी जानों से हाथ धो बैठे तथा 150 से अधिक लोग घायल हो गए।

भारत में आतंकवादी घटनाओं का सिलसिला कोई नया नहीं है। कश्मीर के नाम पर चलने वाला आतंकवाद गत् तीन दशकों से तमाम उतार-चढ़ाव व दाँव-पेच के बीच सक्रिय है। पंजाब भी इस भयानक आतंकित त्रासदी की चपेट में रह चुका है। यहां तक कि अब भी पंजाब आतंकवाद से संबंधित कुछ अलगाववादी संगठनों की सक्रियता के समाचार आते रहते हैं। बोडो, उल्फ़ा, पी डब्ल्यू जी, टी एन एल एफ़, एल टी टी ई तथा नक्सलवाद जैसी कितनी ही हिंसक चुनौतियाँ देने वाले संगठनों का सामना भी हमारा देश गत् कई दशकों से करता चला आ रहा है। परन्तु इन सबके बावजूद इस विशाल भारत में सहिष्णुता, सहनशीलता व सहस्तित्व का परचम हमेशा इतना बुलंद रहा है कि आतंकवाद की घटनाएं हमारे देश की सहिष्णुता जैसी महान विरासत को कभी डगमगा नहीं पाईं। आतंकवादियों द्वारा जान बूझकर बार-बार ऐसे घृणित प्रयोग किए जाते हैं ताकि पूरे देश में साम्प्रदायिक उन्माद की आंधी चले तथा उनके नापाक इरादे कामयाब हों।परन्तु देशवासियों के अपसी सौहार्द्र के परिणामस्वरूप उनकी मंशा कभी पूरी नहीं हो पाती।

जयपुर में हुए सिलसिलेवार विस्फोट भी हालाँकि आतंकवादियों की ऐसी ही नापाक कोशिश का एक नतीजा थे। इन विस्फोटों की तफ़तीश के बाद जो तथ्य सामने आ रहे हैं, वे अत्यन्त गम्भीर व चिंतनीय हैं। इस्लाम के नाम पर फैलने वाला आतंकवाद नि:सन्देह इस समय विश्वव्यापी स्तर पर नज़र आ रहा है। भले ही इस आतंकवाद के अलग-अलग स्थानों पर अपने अलग-अलग कारण क्यों न हों तथा भले ही इनका एक दूसरे से कोई संबंध हो या न हो परन्तु दूर से देखने में दुनिया को यह सभी 'इस्लामिक आतंकवाद' का ही एक चेहरा प्रतीत होता है। विश्वस्तर पर होने वाली इन आतंकवादी घटनाओं में भारत अब तक बड़े गर्व से यह कहता रहा है कि वैश्विक स्तर पर फैले इस आतंकवाद में किसी भारतीय आतंकी संगठन अथवा व्यक्ति का कोई योगदान नहीं रहता। परन्तु जयपुर के हादसे के पश्चात जो ई-मेल जाँच एजेंसियों को मीडिया के माध्यम से प्राप्त हुआ है, उसने तो न सिर्फ़ भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को चिंता में डाल दिया है बल्कि भारतीय मुसलमानों के समक्ष भी एक बड़ी समस्या खड़ी कर दी है।

अभी तक तो भारत में मात्र सिमी (स्टूडेंटस ऑंफ इस्लामिक मूवमेंट इन इंडिया) नामक संगठन को ही लेकर यह बहस छिड़ी रहती थी कि इसके सदस्य आतंकवादी हैं या नहीं। सिमी अपने आप में एक आतंकवादी संगठन है अथवा नहीं तथा सिमी के रिश्ते अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों से जुड़े भी हैं या नहीं। परन्तु जयपुर विस्फोट की ज़िम्मेदारी लेने वाले कथित आतंकवादी संगठन 'इंडियन मुजाहिद्दीन' के नाम से जो मेल कथित रूप से गुरु-अल हिंदी की ओर से भेजा गया है, उसने पूरे देश को चिंता में डालकर रख दिया है।

यदि यह ई मेल सही है तो इसमें प्रयोग की गई भाषा व चेतावनी इतनी ख़तरनाक है जिससे कि आतंकवादियों की एक बड़ी व गहरी साज़िश का पर्दाफ़ाश होता है। इस मेल में जहाँ भारत सरकार को यह चेतावनी दी गई है कि वह अमेरिका के साथ अपने मधुर रिश्ते क़ायम रखने से परहेज़ करे, वहीं मेल भेजने वालों ने भारत के मुसलमानों विशेषकर उन मौलवियों की उस तांजातरीन मुहिम को भी ललकारा है, जिसके तहत अब राष्ट्रीय स्तर पर मौलवियों द्वारा संगठित रूप से आतंकवाद की निंदा करने, इसका विरोध करने तथा इसका डटकर मुंकाबला करने का आह्वान किया गया है। इस आतंकी संगठन द्वारा आतंकवाद को ग़ैर इस्लामी गतिविधि क़रार देने वाले इन मौलवियों (इस्लामी धर्मगुरुओं) को ही इस्लाम विरोधी बताया गया है।

यदि यह ई मेल किसी दूसरी बड़ी साज़िश का नतीजा होने के बजाए सच्चाई पर आधारित ई मेल है, फिर तो निश्चित रूप से भारत को इंडियन मुजाहिद्दीन नामक संगठन को लेकर दुनिया में भी शर्मसार होना पड़ सकता है। दरअसल अब तक पाकिस्तान, बंगलादेश, अफ़गानिस्तान, सूडान, चेचेन्या आदि देशों को ही इस्लामिक संगठनों की पनाहगाह के रूप में जाना जाता था। परन्तु जयपुर बम धमाकों के बाद पहली बार सुनाई देने वाले इंडियन मुजाहिद्दीन नामक संगठन ने तो भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के समक्ष एक चुनौती ही पेश कर दी है। इसमें कोई शक नहीं कि आतंकवादियों का मक़सद हमेशा से ही भारत में साम्प्रदायिक सौहार्द्र को चोट पहुँचाना रहा है। परन्तु आतंकवादियों ने चाहे मन्दिर में विस्फोट कर उसे अपवित्र करने का प्रयास किया हो तथा हिन्दू मानस को झकझोरने की कोशिश की हो अथवा मस्जिद, दरगाह या क़ब्रिस्तान में बेगुनाहों की लाशें बिछाकर मुसलमानों की साम्प्रदायिक भावनाओं को झकझोरने का काम क्यों न किया हो परन्तु आतंकवादियों के प्रत्येक ऐसे नापाक इरादों का भारतीय जनमानस ने हमेशा ही मुँहतोड़ जवाब दिया है।

कहा जा सकता है कि जैसे-जैसे आतंकवादियों के हौसले व उनकी घिनौनी हरकतों के स्तर में वृद्धि होती जा रही है, ठीक उसी प्रकार भारतवासियों की सहनशीलता में भी इज़ाफ़ा होता जा रहा है। दरअसल पूरा भारत अब आतंकवादियों के प्रत्येक मंसूबे को बख़ूबी भाँप चुका है तथा इनके प्रत्येक प्रहार का जवाब साम्प्रदायिक सौहार्द्र व सहिष्णुता से ही देता आ रहा है जैसा कि जयपूर में गत् दिनों देखने को भी मिला।

इन सबके बावजूद सामूहिक व संगठित रूप से भारतीय मुसलमानों को भी आतंकवादियों के इरादों को समझने तथा उनके विरुद्ध भारत सरकार, राज्य सरकारों तथा सुरक्षा एजेंसियों को पूरा सहयोग देने की ज़रूरत है। भारतीय मुसलमानों को अपने ऊपर इस कलंक को क़तई नहीं लगने देना चाहिए कि कोई भाड़े का टट्टू, आतंकवादी अथवा अनजान व्यक्ति किसी भारतीय मुसलमान के यहाँ पनाह पा रहा है। अथवा उसके घर को मानवता विरोधी सांजिशों व गतिविधियों का केंद्र बनाया जा रहा है।

सच्चा मुसलमान हरगिज़ वह नहीं है जो आतंकवाद जैसी इस्लाम विरोधी गतिविधियों में शामिल किसी गुमराह मुसलमान को पनाह दे बल्कि सच्चा मुसलमान वह है जो बेगुनाह लोगों की हत्या होने से लोगों को बचाए तथा ऐसे मानवता विरोधी व इस्लाम विरोधी लोगों की साज़िशों को बेनक़ाब करने में अपनी सहयोगपूर्ण भूमिका अदा करे।



0तनवीर जाफ़री
(सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी, शासी परिषद)
22402, नाहन हाऊस
अम्बाला शहर। हरियाणा