संस्कृति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
संस्कृति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

11/11/2011

साहित्यिक ब्लॉगर्स हेतु अ. भा. रचना शिविर के लिए प्रविष्टियाँ आमंत्रित


पद्मश्री मुकुटधर पांडेय स्मृति रचना शिविर रायगढ़ में

रायगढ़ । रचनाकारों की संस्था, प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, रायपुर, छत्तीसगढ़ द्वारा इंटरनेट पर सक्रिय तथा युवा ब्लॉगरों (कवियों/लेखकों/निबंधकारों/कथाकारों/लघुकथाकारों/गीतकारों/ग़ज़लकारों/ बाल साहित्यकारों) को देश के विशिष्ट और वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा साहित्य के मूलभूत सिद्धातों, विधागत विशेषताओं, परंपरा, विकास और समकालीन प्रवृत्तियों से परिचित कराने, उनमें संवेदना और अभिव्यक्ति कौशल को विकसित करने, प्रजातांत्रिक और शाश्वत जीवन मूल्यों के प्रति उन्मुखीकरण तथा स्थापित लेखक तथा उनके रचनाधर्मिता से तादात्मय स्थापित कराने के लिए तृतीय अ.भा.त्रिदिवसीय/रचना शिविर (7, 8, 9 जनवरी, 2012) सृजनात्मक लेखन कार्यशाला का आयोजन छायावाद के जनक कवि पद्मश्री मुकुटधर पांडेय और कत्थक सम्राट राजा चक्रधर की नगरी रायगढ़, (अग्रोहा भवन, गौरीशंकर मंदिर के पास), छत्तीसगढ़ में किया जा रहा है जिसमें देश के महत्वपूर्ण रचनाकार और विशेषज्ञ मार्गदर्शन हेतु उपस्थित रहेंगे । इसके पूर्व मुक्तिबोध स्मृति रचना शिविर और श्रीकांत वर्मा स्मृति रचना शिविर का सफल आयोजन क्रमशः राजनांदगांव और कोरबा में किया जा चुका है । इस तृतीय अखिल भारतीय स्तर के कार्यशाला में देश के 150 युवा रचनाकारों तथा उभरते हुए रचनाकारों को सम्मिलित किया जायेगा ।


संक्षिप्त ब्यौरा निम्नानुसार है-
1. प्रतिभागियों को 25 दिसंबर, 2011 तक अनिवार्यतः निःशुल्क पंजीयन कराना होगा ।
2.प्रतिभागियों का अंतिम चयन पंजीकरण में प्राप्त आवेदन पत्र के क्रम से होगा ।
पंजीकृत एवं कार्यशाला में सम्मिलित किये जाने वाले रचनाकारों का नाम ई-मेल से सूचित किया जायेगा ।
3. प्रतिभागियों की आयु 18 वर्ष से कम एवं 45 वर्ष से अधिक ना हो ।
4. प्रतिभागियों में 20 स्थान हिन्दी के स्तरीय ब्लॉगर के लिए सुरक्षित रखा गया है ।
5. प्रतिभागियों को संस्थान/कार्यशाला में एक स्वयंसेवी रचनाकार की भाँति, समय-सारिणी के अनुसार अनुशासनबद्ध होकर कार्यशाला में भाग लेना अनिवार्य होगा ।
6. प्रतिभागी रचनाकारों को प्रतिदिन दिये गये विषय पर लेखन-अभ्यास करना होगा जिसमें वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा मार्गदर्शन दिया जायेगा ।
7. कार्यशाला के सभी निर्धारित नियमों का आवश्यक रूप से पालन करना होगा ।
8. प्रतिभागियों को सैद्धांतिक विषयों के प्रत्येक सत्र में भाग लेना अनिवार्य होगा । अपनी वांछित विधा विशेष के सत्र में वे अपनी इच्छानुसार भाग ले सकते हैं । प्रतिभागियों के आवास, भोजन, स्वल्पाहार, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह, संदर्भ सामग्री की व्यवस्था संस्थान द्वारा की जायेगी ।
9.प्रतिभागियों को अपना यात्रा-व्यय स्वयं वहन करना होगा ।
10. प्रतिभागियों को 6 जनवरी, 2012 शाम 6 बजे के पूर्व कार्यशाला स्थल – अग्रोहा भवन, गौरी शंकर मंदिर के पास, रायगढ़, छत्तीसगढ़ में अनिवार्यतः उपस्थित होना होगा ।


पंजीयन हेतु आवेदन-पत्र नमूना
01.नाम -
02. जन्म तिथि व स्थान (हायर सेंकेंडरी सर्टिफिकेट के अनुसार) -
03. शैक्षणिक योग्यता –
04. वर्तमान व्यवसाय -
05. लेखन की केंद्रीय विधा -
05. प्रकाशन (पत्र-पत्रिकाओं के नाम) –
06. प्रकाशित कृति का नाम –
07. ब्लॉग्स का यूआरएल – (यदि हो तो)
08. अन्य विवरण ( संक्षिप्त में लिखें)
09. पत्र-व्यवहार का संपूर्ण पता -
10. मो. नं.
11. ई-मेल –
10. हस्ताक्षर

संपर्क सूत्र
जयप्रकाश मानस
कार्यकारी निदेशक
प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, छत्तीसगढ़
एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा, रायपुर, छत्तीसगढ – 492001
ई-मेल-pandulipipatrika@gmail.com
मो.-94241-82664

10/28/2010

साहित्यिक ब्लॉगरों के लिए रचना शिविर


रायपुर । रचनाकारों की संस्था, प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, रायपुर, छत्तीसगढ़ द्वारा देश के उभरते हुए कवियों/लेखकों/निबंधकारों/कथाकारों/लघुकथाकारों/ साहित्यिक ब्लॉगरों को देश के विशिष्ट और वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा साहित्य के मूलभूत सिद्धातों, विधागत विशेषताओं, परंपरा, विकास और समकालीन प्रवृत्तियों से परिचित कराने, उनमें संवेदना और अभिव्यक्ति कौशल को विकसित करने, प्रजातांत्रिक और शाश्वत जीवन मूल्यों के प्रति उन्मुखीकरण तथा स्थापित लेखक तथा उनके रचनाधर्मिता से तादात्मय स्थापित कराने के लिए अ.भा.त्रिदिवसीय/रचना शिविर (17 18, 19, 20 दिसंबर, 2010) सृजनात्मक लेखन कार्यशाला का आयोजन विश्वकवि गजानन माधव मुक्तिबोध की कार्यस्थली (त्रिवेणी परिसर), राजनांदगाँव में किया जा रहा है । इस अखिल भारतीय स्तर के कार्यशाला में देश के 75 नवोदित/युवा रचनाकारों को सम्मिलित किया जायेगा । कार्यशाला में रचनाकारों की रचनाओं का परीक्षण, मार्गदर्शन सहित उन्हें सैद्धांतिक जानकारी दी जायेगी । प्रतिभागी रचनाकार अपनी रचनाओं का पाठ भी देश के प्रख्यात रचनाकारों, आलोचकों, कहानीकारों, कवियों, शिक्षाविदों, संपादकों के मध्य करेंगे ।

कार्यशाला में व्याख्यान-विमर्श के मुख्य विषय

दिनाँक 17 अक्टूबर, 2010

उद्घाटन, विमोचन

दिनाँक 18 दिसंबर, 2010

रचना की दुनिया दुनिया की रचना

रचना में यथार्थ और कल्पना

रचना और प्रजातंत्र

रचना और भारतीयता
रचना : महिला, दलित और आदिवासी
रचना और मनुष्यता के नये संकट

दिनाँक 19 दिसंबर, 2010

रचना और संप्रेषण
शब्द, समय और संवेदना
कविता की अद्यतन यात्रा
कविता - छंद और लय

कैसा गीत कैसे पाठक ?
कहानी-विषयवस्तु, भाषा, शिल्प

दिनाँक 20 दिसंबर, 2010

कहानी की पहचान
लघुकथा क्या ? लघुकथा क्या नहीं ?
आलोचना क्यों, आलोचना कैसी?
ललित निबंध : कितना ललित-कितना निबंध)

संक्षिप्त ब्यौरा निम्नानुसार है-

01. प्रतिभागियों को 20 नवंबर, 2010 तक अनिवार्यतः निःशुल्क पंजीयन कराना होगा । पंजीयन फ़ार्म संलग्न है ।

02. प्रतिभागियों का अंतिम चयन पंजीकरण में प्राप्त आवेदन पत्र के क्रम से होगा ।
पंजीकृत एवं कार्यशाला में सम्मिलित किये जाने वाले रचनाकारों का नाम ई-मेल से सूचित किया जायेगा ।

03. प्रतिभागियों की आयु 18 वर्ष से कम एवं 45 वर्ष से अधिक ना हो ।

04. प्रतिभागियों में 5 स्थान हिन्दी के स्तरीय ब्लॉगर के लिए सुरक्षित रखा गया है ।

05. प्रतिभागियों को संस्थान/कार्यशाला में एक स्वयंसेवी रचनाकार की भाँति, समय-सारिणी के अनुसार अनुशासनबद्ध होकर कार्यशाला में भाग लेना अनिवार्य होगा ।

06. प्रतिभागी रचनाकारों को प्रतिदिन दिये गये विषय पर लेखन-अभ्यास करना होगा जिसमें देश के वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा मार्गदर्शन दिया जायेगा ।

07. कार्यशाला के सभी निर्धारित नियमों का आवश्यक रूप से पालन करना होगा ।

08. प्रतिभागियों को सैद्धांतिक विषयों के प्रत्येक सत्र में भाग लेना अनिवार्य होगा । अपनी वांछित विधा विशेष के सत्र में वे अपनी इच्छानुसार भाग ले सकते हैं । प्रतिभागियों के आवास, भोजन, स्वल्पाहार, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह की व्यवस्था संस्थान द्वारा किया जायेगा ।

09. प्रतिभागियों को कार्यशाला में संदर्भ सामग्री दी जायेगी ।

10. प्रतिभागियों को अपना यात्रा-व्यय स्वयं वहन करना होगा ।

11. प्रतिभागियों को 17 दिसंबर, 2010 दोपहर 3 बजे के पूर्व कार्यशाला स्थल त्रिवेणी परिसर/सिंधु सदन, जीई रोड, राजनांदगाँव, छत्तीसगढ़ में अनिवार्यतः उपस्थित होना होगा । पंजीकृत/चयनित प्रतिभागी लेखकों को कार्यशाला स्थल (होटल) की जानकारी, संपर्क सूत्र आदि की सम्यक जानकारी पंजीयन पश्चात दी जायेगी ।



संपर्क सूत्र
जयप्रकाश मानस
कार्यकारी निदेशक
प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, छत्तीसगढ़
एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा, रायपुर, छत्तीसगढ – 492001
ई-मेल-pandulipipatrika@gmail.com
मो.-94241-82664


पंजीयन हेतु आवेदनपत्र नमूना

01. नाम -
02.
जन्म तिथि व स्थान (हायर सेंकेंडरी सर्टिफिकेट के अनुसार) -
03.
शैक्षणिक योग्यता
04.
वर्तमान व्यवसाय -
05.
प्रकाशन (पत्र-पत्रिकाओं के नाम)
06.
प्रकाशित कृति का नाम
07.
ब्लॉग्स का यूआरएल – (यदि हो तो)
08.
अन्य विवरण ( संक्षिप्त में लिखें)
09.
पत्र-व्यवहार का संपूर्ण पता (ई-मेल सहित)

हस्ताक्षर

7/06/2010

आज ब्लॉगर सहित मीडियाकर्मियों का सम्मान

सृजनागाथा डॉट कॉम के चार साल पूर्ण

रायपुर । राज्य की पहली वेब पत्रिका तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित, साहित्य, संस्कृति, विचार और भाषा की मासिक पोर्टल सृजनगाथा डॉट कॉम चार वर्ष पूर्ण होने पर चौंथे सृजनगाथा व्याख्यानमाला का आयोजन आज 6 जुलाई, 2010 दिन मंगलवार को स्थानीय प्रेस क्लब, रायपुर में दोपहर 3 बजे किया गया है । जिसमें हिन्दी के चर्चित आलोचक, समीक्षक और संपादक,उन्नयन, इलाहाबाद श्रीप्रकाश मिश्र, “कविता क्या, कविता क्यों ?” विषय पर व्याख्यान देंगे । विशिष्ट अतिथि होंगे छत्तीसगढ़ हिन्दी ग्रंथ अकादमी के अध्यक्ष श्री रमेश नैयर, दैनिक अमृत संदेश के प्रधान संपादक श्री गोविंद लाल वोरा, जनसत्ता के स्थानीय संपादक श्री अनिल विभाकर, वरिष्ठ लेखक श्री सुशील त्रिवेदी, नई दुनिया के संपादक श्री रवि भोई व प्रेस क्लब के अध्यक्ष श्री अनिल पुसदकर ।

इस अवसर पर चौंथे सृजनगाथा डॉट कॉम सम्मान से श्री सनत चतुर्वेदी (पत्रकारिता), श्री नरेन्द्र बंगाले (फोटो पत्रकारिता), श्री संतोष जैन (इलेक्ट्रानिक मीडिया), श्री संदीप अखिल (रेडियो पत्रकारिता), श्री अशोक शर्मा (वेब-विशेषज्ञ), श्री संजीत त्रिपाठी (हिन्दी ब्लॉगिंग), श्री त्र्यम्बक शर्मा (कार्टून) और श्री कैलाश वनवासी, दुर्ग (कथा लेखन) श्री देवांशु पाल, बिलासपुर (लघुपत्रिका) को सम्मानित किया जायेगा। छत्तीसगढ़ के साहित्यकार, पत्रकार, रंगकर्मी, बुद्धिजीवी, ब्लागर्स, शिक्षाविद आदि को विशेष तौर पर आमंत्रित किया गया है ।

1/22/2010

हिंदी आशुलिपि एक धरोहर है - राजकुमार नरूला


राजभाषा विभाग भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा संयंत्र कार्मिकों के लिए प्रथम बार हिंदी आशुलिपि प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारम्भ दिनांक 4-11-2009 को मानव संसाधन विकास केन्द्र के कक्ष 125 में श्री राजकुमार नरूला महाप्रबंधक (कार्मिक) के मुख्य आतिथ्य एवं श्री दिलीप नंनौरे उप महाप्रबंधक (संपर्क व प्रशासन) की अध्यक्षता तथा श्री अशोक सिंघई सहायक महाप्रबंधक (राजभाषा) की विशिष्ट आतिथ्य में सम्पन्न हुआ। सर्वप्रथम अतिथियों द्वारा मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण पश्चात् मंगलदीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। उल्लेखनीय है कि इस सत्र में संयंत्र के 17 कार्मिक हिंदी आशुलिपि प्रशिक्षण हेतु पंजीकृत हैं।
मुख्य अतिथि श्री आर.के. नरूला ने अपने सारगर्भित सम्बोधन में कहा कि हिंदी आशुलिपि एक महान कला है जिसको सीखने के लिए आप लोगों को चयनित किया गया है यह गर्व की बात है। राजभाषा आज देश की भाषा बन चुकी है जिसके माध्यम से कार्यालयीन कार्य सम्पादित किये जाते हैं। सर्वप्रथम अपने स्वागत सम्बोधन में श्री अशोक सिंघई सहायक महाप्रबंधक (राजभाषा) ने कहा कि प्रबंध निदेशक महोदय की अध्यक्षता में कार्यरत राजभाषा कार्यान्वयन समिति में लिए गए निर्णयों के तहत हिंदी आशुलिपि का प्रथम बार भारत सरकार गृह मंत्रालय राजभाषा विभाग हिंदी शिक्षण योजना द्वारा संचालित प्रशिक्षण के तहत हिंदी टंकण में उत्तीर्ण मिनिस्टिरियल स्टाॅफ के लिए शुरूआत की गई है। भिलाई बिरादरी जो सोचती है वह करके रहती है हम सभी क्षेत्र में अग्रणीय की भूमिका निभाते हैं। उन्होंने आव्हान किया कि हिंदी आशुलिपि एक कला है संकोच को दूर करते हुए उत्साह व गर्व से इस विधा को सीखें निरंतर अभ्यास करें और कार्यालयीन कामकाज में अवश्य ही इसका प्रयोग करें।

7/22/2009

दिल्ली दर्प दमन


एक सहचर की याद
अशोक वाजपेयी

वे गजानन माधव मुक्तिबोध और हरिशंकर परसाई के सहचर थे । किसी हद तक श्रीकांत वर्मा के भी । मुक्तिबोध को उनके जीवनकाल में यह जताने वाले कि वे एक बड़े लेखक हैं। जो छह सात लोग थे उनमें से वे एक थे । परसाईजी के भी अभिन्न थे और उनकी कई बार सक्त आलोचना की परसाई जी इज्जत करते थे- सारी दुनिया को खरी-खोटी सुनाने वाले केा ख़ुद को खरी खोटी सुनाने वाला भी आख़िर चाहिए ही था । यह दावा करना अनुचित न होगा कि प्रमोद वर्मा की इन दोनों लेखकों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका रही है । लगभग 9 वर्ष पहले वे देहावसन के बाद उन्हें याद करते हुए एक बड़ा मानवीय गरमाहट और बौद्धिक ऊर्जा भरा आयोजन रायपुर में पिछले सप्ताह हुआ । अनेक दृष्टियों के लेखक आदि एकत्र हुए प्रमोद वर्मा के अवदान पर और उस बहाने आज की आलोचना पर व्यापक और खुला विचार हुआ । इस अवसर पर राधाकृष्ण प्रकाशन ने चार खंडों में उनका समग्र भी विश्वरंजन के स्नेह और आदरयुक्त संपादन में प्रकाशित किया । सामग्री जुटाने और व्यवस्थित कर छपाई के लिए देने के बाद पता चला कि लगभग पाँच सौ पृष्ठों की सामग्री और है जिसे बाद में शामिल किया जा सकेगा।
प्रमोद वर्मा की आस्था सामान्य तौर पर वामपंथी थी । लेकिन किसी तरह की कट्टरता से वे मुक्त थे । उन दिनों यानी सत्तर अस्सी के दशक में वे अज्ञेय और मुक्तिबोध के समान रूप से प्रशंसक थे । यह एक बड़ा कारण है कि प्रगतिशील आलोचकों की सूची में उनका नामोल्लेख नहीं होता है । इसे रेखांकित करते हुए नंदकिशोर आचार्य ने यह भी कहा कि प्रमोद जी के लिए स्वतंत्रता परम मूल्य थी और वे उसे किसी प्रतिबद्धता के दबाव में तजने के तैयार नहीं थे ।

इस अवसर पर प्रमोदजी पर निबंधों का एक संचयन न होना प्रमोद वर्मा का यश पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित किया गया है और एक स्मारिका भी निकाली है । उसमें प्रमोजी के इन कथनों की ओर ध्यान जाता हैः-


‘‘जब संसार की कागद की पुड़िया है तो उस पर लिखे शब्द तैरकर पार उतर जायेंगे ऐसा मैं अपने सबसे कमज़ोर और आत्ममुग्ध क्षणों में भी नहीं सोचता । मुझे ये सिर्फ़ इतना जताती है कि इन्हें रचते हुए मैंने अपने आप को किस तरह नष्ट या हासिल किया है ।


‘‘कवि शब्द की दुनिया में स्वयं को खोजा करता है । कवि अपने देश और काल को नहीं लिखता। वस्तुतः वह अपने अनुभवों और सपनों को शब्द देता है । पाब्लो नेरूदा की प्रेम कविताएँ मुझे अच्छी लगतीं हैं उन्हें पढ़ते हुए मुझे रसखान की याद आती है ।


‘‘जन साधारण की बात चित्रपट के माध्यम से लोकरंजन करने वालों पर छोड़ देनी चाहिए । साहित्य सहृदय और गुणी जनों की रूचि का विषय है ।


‘‘प्रगतिशील लेखक मछली पकड़ने के लिए तो जाल का उपयोग कर सकता है लेकिन कलावादियों की तरह कुहरा पकड़ने के लिए नहीं।


सच में सबसे बड़े कवि हर भाषा में अज्ञात नाम-कुल-शील असंख्य कवि जन ही हुआ करते हैं । जैसे क्रांति के वास्तविक नायक असंख्य इत्यादि जन हैं ।


सत्य का संधान होता है और सौंदर्य का सृजन । ख़तरा तब होता है जब हम सत्य का सृजन करते हैं और और सौंदर्य का संधान । प्रेम करना गैरकानूनी नहीं है। हिंसा बेहक गैरकानूनी है ।

छत्तीसगढ़ ने अपने एक लेखक को ऐसे उत्साह समझ और जतन से याद किया यह बड़ी बात है । ख़ासकर आज के स्मृति और कृतज्ञता वंचित परिवेश में । इस अवसर पर श्री भगवान सिंह और कृष्णमोहन को प्रमोद वर्मा पुरस्कार भी प्रदान किए गए । महानगरों से दूर जो सृजन और आलोचना सशक्त रूप से सक्रिय है उसका यह उचित ही स्वीकार है । किसी हद तक दिल्ली दर्प दमन भी । पता चला है कि कुछ लेखक स्वीकृति देकर इसलिए नहीं आये कि छत्त्तीसगढ़ में नक्सलियों का राज्य सत्ता जनसंहार कर रही है । दुर्योगवश समारोह समापन के अगले दिन नक्सलियों ने एक पुलिस अधीक्षक और लगभग चालीस पुलिस कर्मियों की हत्या कर दी । इस समय नक्सलियों द्वारा कई राज्यों में लगातार जो हिंसा हो रही है। उसके बारे में तमाम क्रांति धर्मी लेखक चुप्पी क्यों साधे हुए हैं यह समझ में आना कठिन है । वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति की परंपरा में ही यह चुप्पी है । 20वीं शताब्दी में हम देख आये हैं कि हिंसा और हत्या से सच्ची क्रांती नहीं होती और अगर उसके होने का कुछ देर के लिए भ्रम हो भी जाये तो उसकी परिणति भी देर सवेर हिंसा और हत्या में हीं होती है ।

प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान भी स्थापित किया गया है उसकी एक महत्वाकांक्षी योजना है । छत्तीसगढ़ में दुर्भाग्य से राज्य शासन ने संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक संस्थागत उपाय नहीं किए हैं । साहित्य, संगीत नाटक और ललित कला की राज्य अकादमियाँ अब तक गठित नहीं हुईं हैं । जिस अंचल में हाल ही में मुक्तिबोध, श्रीकांत वर्मा, प्रमोद वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल, प्रभात त्रिपाठी आदि लेखक हुए हैं वहाँ ऐसी उदासीनता और निष्क्रियता संवेदनशीलता और जिम्मेदारी से बचने के बराबर है । स्वयं इस आयोजन में यह प्रकट हुआ कि बख्शी पीठ पर रहकर प्रमोद जी के छत्तीसगढ़ की युवा पीढ़ी को रूपायित करने में कितनी बड़ी भूमिका निभाई । यह पीठ पहले की राज्य सरकार द्वारा स्थापित है । नया संस्थान कवि विश्वरंजन के नेतृत्व में इस शून्य को भर सकता है । ऐसे कम लोग बचे हैं (और प्रशासन में प्रायः बिल्कुल नहीं) जो साहित्य से ऐसा अनुराग रखे और जो अपने पूर्वज लेखकों के प्रति सामाजिक कृतज्ञता ज्ञापन के लिए ऐसे प्रयत्न करे जैसे कि विश्वरंजन और उनके सहयोगी कर रहे हैं ।
(कभी-कभार, जनसत्ता, १९ जुलाई, २००९ दिल्ली)

7/03/2009

राष्ट्रीय ब्लॉग संगोष्ठी रायपुर में

राष्ट्रीय ब्लॉग संगोष्ठी : छपास पीड़ा का इलाज मात्र हैं ब्लॉग?
रायपुर, छत्तीसगढ़
दिनांक 10 जुलाई, २००९

मित्रों,
पिछले दिनों हिन्दी के एक ब्लॉग में पुष्पा भारती के कथन पर गंभीर चर्चा चली थी। पुष्पा भारती ने हिन्दी ब्लॉगों को यह कह कर खारिज कर दिया था कि यहाँ तो भाषाएँ भी बड़ी अजीब है - ब्लॉगर ‘टेंशनात्मक’ लिख रहे हैं – तो ये टेंशनात्मक क्या है? इससे पहले नामवर सिंह जैसे दिग्गज इसे खारिज कर चुके हैं। अलबत्ता राजेंद्र यादव सरीखे कुछ विशिष्ट भविष्यदृष्टा की नजरों में ब्लॉगों के जरिए सृजनात्मकता की असीम संभावनाएँ भी झलकती हैं।

पांच साल के हिन्दी ब्लॉग इतिहास में सृजनात्मकता के लिहाज से क्या कुछ हासिल हुआ और भविष्य का पट क्या कहता है?

क्या ब्लॉग सिर्फ और सिर्फ छपास पीड़ा को जड़ से मारने का इलाज मात्र है या फिर इंटरनेट का यह मल्टीमीडिया युक्त सुगम सरल प्रकाशन सुविधा भविष्य में प्रेमचंद या देवकीनंदन खत्री जैसे लेखकों को पैदा करने की ताक़त रखता है? क्या यहाँ सिर्फ अनर्गल और पानठेलों-पर-की-जाने-वाली-बहस नुमा चीजें छापी जाती हैं या फिर इसमें स्तरीय सामग्री भी आती हैं?

इन तमाम मुद्दों पर गर्मागर्म बहस के लिए एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन दिनांक 10 जुलाई, 2009 को 2 बजे से 3 बजे तक रायपुर, निंरजन धर्मशाला में सुनिश्चित किया गया है। यह संगोष्ठी प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह के आयोजन के तहत आयोजित किया जा रहा है। इस संगोष्ठी के मुख्य अतिथि रहेंगे देश के महत्वपूर्ण आलोचक एवं भारतीय ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक डॉ। प्रभाकर तथा विशिष्ट अतिथि होंगे – वरिष्ठ कवि एवं आलोचक श्री प्रभात त्रिपाठी, रायगढ़ एवं ए. अरविंदाक्षन, कालीकट तथा इसकी अध्यक्षता करेंगे - प्रसिद्ध ब्लॉगर रविशंकर श्रीवास्तव (रविरतलामी) ।

भागीदारी हेतु आप भी सादर आमंत्रित हैं। प्रतिभागी ब्लॉगर्स के भोजन, आवास की व्यवस्था संस्थान द्वारी की गई है तथा इसके अलावा राष्ट्रीय आलोचना संगोष्ठी में भी भाग ले सकते हैं जिसमें देश के 50 से अधिक वरिष्ठ आलोचक उपस्थित हो रहे हैं ।

संगोष्ठी संयोजक
जयप्रकाश मानस
मोबाइल – 94241-82664
ई-मेल – srijangatha@gmail.com

6/16/2009

श्रीभगवान सिंह और कृष्ण मोहन को राष्ट्रीय सम्मान

-प्रमोद वर्मा स्मृति आलोचना सम्मान की घोषणा-
रायपुर । प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा स्थापित प्रथम आलोचना सम्मान भागलपुर के डॉ श्री भगवान सिंह को दिया जायेगा । इसी तरह युवा आलोचना सम्मान बनारस के युवा आलोचक श्री कृष्ण मोहन को दिया जायेगा । श्री सिंह हमारे समय के उन सुप्रतिष्ठित और चर्चित आलोचकों में से है जिन्होंने अपने आलोचनात्मक लेखन से समकालीन साहित्यिक आलोचना और परिदृश्य पर एक अलग लक़ीर खींची है । लगभग सांप्रदायिक और विचाररूढ़ हो उठी आलोचना के बरक्स श्री भगवान सिंह एक स्वतंत्र वैचारिक आधार और जातीय दृष्टि लेकर आये हैं। ख़ास तौर से गतिशील राष्ट्रीय जीवन-प्रवाह और गांधी युग के मूल्यों को केंद्र में रखकर उन्होंने जो एक स्वाधीन आलोचनात्मक तेवर प्रदर्शित और रेखांकित किया है ।

डॉ. कृष्ण मोहन की आलोचना में पिछली आलोचना की मध्यमवर्गीय चेतना की तुलना में एक उदग्र लोकतांत्रिकता और वैचारिक ऊष्मा है । वे हमारे समय के एक संभावनाशील आलोचक हैं ।

वर्तमान में श्री भगवान सिंह तिलका माँझी, भागलपुर, बिहार में हिन्दी विभागाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं एवं श्री मोहन विश्वविद्यालय बीएचयू, वाराणसी में रीडर, हिन्दी के पद पर कार्यरत हैं ।

ज्ञातव्य हो कि इस चयन समिति में कवि केदारनाथ सिंह, दिल्ली, डॉ. धनंजय वर्मा, भोपाल, डॉ. विजय बहादुर सिंह, कोलकाता, डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, गोरखपुर, विश्वरंजन एवं जयप्रकाश मानस थे ।

यह सम्मान उन्हें 10-11 जुलाई को रायपुर में आयोजित दो दिवसीय प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह में प्रदान किया जायेगा । सम्मान स्वरूप आलोचक द्वयों को क्रमशः 21 एवं 11 हजार रुपयों सहित प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह, शाल एवं श्रीफल से विभूषित किया जायेगा ।

5/12/2009

भारत भवन में विश्वरंजन का कविता पाठ


भोपालभारत भवन में शुक्रवार को छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक और जाने-माने कवि विश्वरंजन का कविता पाठ हुआ। यह कार्यक्रम भारत भवन के वागर्थ की पाठ श्रंखला के अंतर्गत आयोजित किया गया था।


उन्होंने कविता पाठ कि शुरुआत ‘यह कविता मेरी नहीं सबकी है, मंत्र की भांति उठती है जमीन, समुद्र से आज भी, साथ लिए आदिम ध्वनियों की कंपन और एक जबदस्त कोशिश’ से की। अपनी अगली रचना पढ़ते हुए उन्होंने कहा, ‘शब्द बोलते-बोलते मौन होंगे सहसा॥, ऐसे लिखते-लिखते रोशनाई सूख जाती है, एक अर्से तक होता रहा तूलिका व रंग का खेल.. पर सहसा एक दिन रंग बिखरते-बिखरते गिरने लगा परत दर परत’।


इसके बाद श्रोताओं के अनुरोध पर ‘अंधेरे से लड़ने के लिए एक स्वप्न का होना बेहद जरूरी हैं, अध खुली खिड़की से झांकता अंधेरा॥खुली किताब फड़फड़ाते पन्ने, कोई नहीं है यहां..टेबल पर बिछ जाएगी लैंप की रोशनी.. यह सब जानते है हुए भी नहीं मानूंगा हार.. स्वप्न पैदा करूंगा उनकी आंखों में’का पाठ किया। इसके पहले विश्वरंजन ने कहा कि भारत भवन को बहुत अर्से पहले बनते और बढ़ते देखा है। यहां आकर सभी से मुखातिब होना अपने आप में एक अलग अनुभूति है। इस अवसर पर डीआईजी (इंटेलिजेंस) अनुराधा शंकर सिंह, आईजी (कानून व्यवस्था) संजीव सिंह, संस्कृति सचिव मनोज श्रीवास्तव, मदन सोनी, नवल शुक्ल आदि उपस्थित थे।

7/12/2008

समकालीन साहित्य सम्मेलन का 30 वाँ अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन दुबई में

मुंबई । समकालीन साहित्य सम्मेलन का 30 वाँ अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन संयुक्त राज्य अमीरात के दुबई में होने जा रहा है । मुख्य सम्मेलन 29 जुलाई से 3 अगस्त 2008 तक होगा । ज्ञातव्य हो कि इस संगठन का गठनम धर्मयुग के पूर्व उप संपादक और वरिष्ठ रचनाकार श्री महेन्द्र कार्तिकेय ने किया था । विगत सम्मेलन ब्रिटेन में किया गया था जिसमें अनेक देशों के शताधिक रचनाकारों ने अपना हस्तेक्षेप किया था ।

इस सम्मेलन में विश्व भर के 200 से अधिक अधिक साहित्यकार, हिंदी सेवी, प्रचारक और शिक्षाविद् सम्मिलित हो रहे हैं । सम्मेलन में कई विषयों पर संगोष्ठी होगी जिसमें 1. हिंदी भाषा का साहित्य का अतंरराष्ट्रीय परिदृश्य 2. हिंदी काव्य एवं साहित्य में नारीवाद (उपन्यास एवं कहानी के संदर्भ में) 3. हिंदी उपन्यास में यथार्थ प्रमुख सत्र हैं । इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय काव्यपाठ का आयोजन भी इस दरमियान किया जा रहा है।

समकालीन साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद श्री रत्नाकर पांडेय तथा सचिव श्री वैभव कार्तिकेय ने अपनी विज्ञप्ति में बताया है कि इस आयोजन में विश्व भर के हिंदी रचनाकारों को एक दूसरे की रचनाशीलता को समझने और परखने का भी मौक़ा मिलेगा । यह सम्मेलन दुबई में होगा । इसके अलावा हिंदी संस्कृति से जुड़े रचनाकार सद्भाव यात्रा में शरजाह, आबुधाबी, रसलखेमा और रेगिस्तान इलाकों में अपनी दस्तक देंगे । इसमें अभी तक 20 से अधिक देशों के साहित्यकारों ने अपनी सहभागिता सुनिश्चित की है ।

इस सम्मेलन में भारत के 16 राज्यों के साहित्यकारों के साथ छत्तीसगढ़ से जयप्रकाश मानस, डॉ. सुधीर शर्मा, डॉ. जे.आर.सोनी, डॉ. राजेन्द्र सोनी, एच.एस. ठाकुर, सुरेश तिवारी, संजीव ठाकुर, सत्यदेव शर्मा, आर. साहू, रामशरण टंडन, टामन लाल सोनवानी आदि साहित्यकार भाग ले रहे हैं ।

संगोष्ठी में प्रतिभागिता व विस्तृत जानकारी के लिए जयप्रकाश मानस संपादक, सृजन गाथा, एफ-3, माध्यमिक शिक्षा मंडल, पेंशनवाडा, विवेकानंद नगर, रायपुर, छत्तीसगढ़ से संपर्क कर सकते हैं ।

(वैभव कार्तिकेय, मुंबई की रपट)

5/23/2008

लोककला से छेड़छाड़ घातक – दीपक चंद्राकर



कलाएं अपने स्वाभाविक क्रम से हर युग में अपना स्वरुप बदलती हैं और क्रमशः विकसित होती जाती है। इसलिए लोककला के विकास के लिए हमें अपने प्रयास लादने से बचना चाहिए- इन खुले विचारों के साथ लोककला की सेवा में निष्ठा से जुड़े एक मौलिक कलाकार हैं. दीपक चन्द्राकर जो लगभग बचपन से ही लोकनाट्य से जुड़े हैं। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वे कहते हैं- लोककला के मूलरूप से छेड़छाड़ घातक है। उसे जमाने के प्रवाह के साथ अपने-आप बदलने या विकसित होने देना चाहिए क्योंकि लोक कलाएं इसी तरह से विकसित हुई हैं। दुर्ग जिले के ग्राम अर्जुन्दा में जन्मे दीपक चन्द्राकर ने अपने पिता उजियारिसंह चंद्राकर की छत्रछाया में बढ़ते हुए कला एव सामाजिक के संस्कार ग्रहण किए और लोककला अभिनय की बारीकियों को अपने गुरु की देन रामहृदय तिवारी के सानिध्य में रहकर सीखा। वे कहते हैं- यह पिता एवं गुरु की देन है, आज उनमें मंचीय अनुशासन एवं समर्पण भरा है जिससे मुझमें आत्मविश्वास एवं मंचीय जिम्मेदारी का पूरा-पूरा अहसास है।

यूं तो ग्राम अरजुन्दा इन्हीं चंद्राकर परिवार के कारण सास्कृतिक संस्कारों से ओत-प्रोत है। उस पर दीपक चंद्राकर ने छत्तीसगढ़ी लोक सांस्कृतिक कला मंच ‘लोकरंग’ की स्थापना कर उसे पूरा संरक्षण भी दे रहे हैं और इसके निर्देशन पक्ष में वे सशक्त हस्ताक्षर के रुप में उभर रहे हैं। लोककला की जीवंतता विशेषकर समग्र प्रबंधन देखना हो तो ग्राम अर्जुन्दा आकर लोककला तीर्थ का पुण्य कमाया जा सकता है। दीपक चंद्राकर ने लोकरंग के कलाकारों के लिए आवास, रिहर्सल, प्रदर्शन के लिए यहाँ लगभग एक ग्रामीण अकादमी की संरचना की । वे बताते हैं- छत्तीसगढ़ी लोक सांस्कृतिक कला मंच ‘लोकरंग’ के माध्यम से छत्तीसगढ़ भर में तथा छत्तीसगढ़ से बाहर भी छत्तीसगढी संस्कृति, अस्मिता, स्वाभिमान, पर्व, परंपराएं, तीज-त्यौहार, नृत्यु, गीत-संगीत से परिपूर्ण अभिव्यक्ति देने के लिए प्रयासरत हैं। वे बताते हैं- सन 1992 से लेकर अब तक लोकरंग (अर्जुन्दा) के माध्यम से अब तक सौ से भी अधिक प्रदर्शन छत्तीसगढ़ तथा महाराष्ट्र, भोपाल अमेठी, दिल्ली में कर चुके हैं। लोकरंग के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत सोनहा बिहान, लोकरंजनी, लोरिक चंदा तथा हरेली ने काफी प्रसिद्धि पाई है। छत्तीसगढ़ में लोक कलाकार के रुप में सुस्थापित दीपक चन्द्रकार ने सन 1977 से 1982 तक प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी लोक सांस्कृतिक संस्था सोनहा बिहान में लोक कलाकार के रुप में सक्रिय भागीदारी निभाते हुए सन 1973 से अब तक लगभग 6 सौ प्रतिभाओं को लोक कलाकार एवं लोक नर्तक के रूप में प्रशिक्षित किया है और यह स्वयं में एक रिकॉर्ड है। लोककला के क्षेत्र में इतनी लंबी एवं सशक्त यात्रा के चलते दीपक चन्द्राकर ने सन 1984-85 में राष्ट्रीय विज्ञान मंड़ई (अंजोरा) में सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी निभाई है। यही वजह है कि सन 1996 में छत्तीसगढी लोककला महोत्सव भिलाई में दीपक चंद्राकर को लोककला के अभिनेता, नर्तक एवं निर्देशन तथा लोकरंग संस्था के सर्जक के रुप में सम्मानित होने का गौरव प्राप्त है। जो बिरले लोक कलाकारों को मिल पाता है। लोकनाट्य संस्था लोकरंग के माध्यम से दीपक चन्द्राकर ने छत्तीसगढ़ी गीतों के आडियो कैसेट भी तैयार किया है जो पर्रा भर लाई, लोकरंग के संग, रिमझिम, चिरइया तथा तेल हरदी शीर्षक से कैसेट समूचे छत्तीसगढ़ में धूम मचा रहे हैं।

दीपक चन्द्राकर ने लोकरंग के मंच से छत्तीसगढ़ के महिमा गीत, खड़े साज के गीत, सुवा, ददरिया, सोहर गीत, सावनाही गीत, श्रम गीत, आदि छत्तीसगढी गीतों को भी संयोजित किया है, जिन्हें पर्याप्त प्रसिद्धि मिली है। वे बताते हैं- लोकरंग में चालीस लोक कलाकारों का जत्था है, जिन्होंने नए छत्तीसगढ राज्य के अभ्युदय के समय पहली नवंबर 2000 को सराहनीय प्रदर्शन रायपुर दूरदर्शन के माध्यम से किया था। दीपक चंद्राकर छत्तीसगढ़ी फिल्मों का सैलाब आने के बावजूद किंचित भी चिंतित नहीं है, वे मानते है- छत्तीसगढ़ी लोककला का भविष्य बहुत ही उज्जवल है। शर्त केवल यही है फिल्में अपनी मिट्टी, अपनी जड़ों से पूरी आत्मीयता से जुड़ी रहें और अपनी ग्रामीण माटी की आकुल पुकार अनसुनी न करें।

दीपक चंद्राकर इन दिनों चर्चित लोक अमर प्रेमकथा- लोरिकचंदा पर फिल्म निर्माण की परियोजना पर काम कर रहे हैं। वे इसके निर्माता होंगे लक्ष्मण चंद्राकर के साथ, जबकि प्रेम साइमन की कहानी को बड़े परदे पर निर्देशित करने की जिम्मेदारी रामहृदय तिवारी पर है।
0आसिफ़ इकबाल
वरिष्ठ पत्रकार, रायपुर