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2/23/2010

पंजाबी साहित्यिक जगत की अपूरणीय क्षति

गुलजार सिंह संधू
कई प्रसिद्ध पंजाबी साहित्यकारों का एक महीने के अंतराल में निधन बेहद दुखद है। जोगिन्द्र सिंह राही की साहित्यिक आलोचना बेजोड़ थी। हरभजन सिंह को ज्ञानपीठ पुरस्कार देने वाली कमेटी को उनकी रचना ‘रुख व ऋषि’ की चार लाइनों ने ही मंत्रमुग्ध कर दिया था।

टीआर विनोद की साहित्यिक मूल्यांकन लोगों के दिलों पर स्थायी प्रभाव डालने वाली थी तो संतोख सिंह धीर ने भी साहित्यिक जगत को कई अनमोल रचनाएं प्रदान कीं। हरिन्द्र महबूब ने अपनी लेखनी से खालसा की आन-बान-शान को आगे बढ़ाया और राम स्वरूप अणखी ने पूरे पंजाबी सभ्याचार को मालवा से परिचित करवाया।

भविष्य की युवा पीढ़ी इन लेखकों द्वारा साहित्यिक जगत में दिए गए अनमोल उपहारों की सदा ऋणी रहेगी। इस दुखद सफर का एक यात्री मैं भी हूं। कुछ साहित्यिक संस्थाओं का बुजुर्ग प्रतिनिधि होने के नाते इन प्रोग्रामों पर जाने की जिम्मेदारी भी मुझ पर आन पड़ती है जिन्हें श्रद्धांजलि समारोह कहा जाता है। अचानक ऐसी परिस्थितियां जब सामने आती हैं तो बहुत दुख होता है। ऐसे समय में मेरा ध्यान परम सत्ता के उस द्वार की ओर चला जाता है जो हंसते-खेलते परिवारों और भाईचारे का सुख-चैन छीनने के लिए वक्त-बेवक्त खुलता है। कई बार इस पर गुस्सा भी आता है पर उसकी इच्छा के आगे किसका जोर चलता है। महबूब के स्वर्गवास की खबर मुझे दिल्ली यात्रा के दौरान मिली। इससे तीन दिन पहले ही मैं चंडीगढ़ में धीर की शोकसभा में शामिल होकर आया था। पहला शोक समाचार ही दिल को बेचैन कर रहा था कि मोबाइल पर अणखी के स्वर्गवास की भी सूचना मिल गई।

दिल्ली पहुंचकर पंजाबी साहित्यिक सभा की बैठक में पांचों महारथियों को श्रद्धांजलि देने हेतु दो मिनट का मौन रखा गया। अगले दिन साहित्य अकादमी की जनरल कौंसिल की रवीन्द्र भवन में मीटिंग हुई। उन्होंने 24 भाषाओं के दिवंगत साहित्यकारों के नाम प्रकाशित किए थे। कुछेक के जीवन का संक्षिप्त विवरण भी साथ में दिया गया था। सूची को पूर्णता प्रदान करने के लिए इसमें 38 नाम और शामिल किए गए जिनमें से चार पंजाबी साहित्यकार थे, आठ उर्दू साहित्यकार और 11 हिंदी के। प्रबंधकों ने खड़े होकर दिवंगतों के लिए दो मिनट का मौन धारण करने के लिए कहा और फिर बैठक में लिए जाने वाले निर्णयों पर बहस शुरू हो गई। संस्कृत के समर्थक साहित्य अकादमी से संस्कृत के लिए विशेष स्थान का आग्रह करने लगे। एक सदस्य ने इसका विरोध करते हुए कहा कि अगर संस्कृत इतनी ही बेहतर है तो इसे हर साल पुरस्कार क्यों नहीं मिलता? जब इस दलील का कोई असर नहीं पड़ा तो एक सदस्य ने इस वर्ष स्वर्गवास हुए साहित्यकारों की सूची में भी संस्कृत के साहित्यकारों की गैरमौजूदगी पर इशारा किया।

मैंने जब इस सूची पर नजर डाली तो सच में इसमें पंजाबी, हिंदी और उर्दू के साहित्यकारों के काफी नाम थे पर संस्कृत के किसी साहित्यकार का नाम नहीं था। मनचले सदस्य की दलील हास्यास्पद थी लेकिन एक क्षण के लिए मुझे लगा जैसे धर्मराज की जल्दबाजी से हमारी भाषा का सम्मान ही नहीं बढ़ा बल्कि जाने वालों को शहीद का भी रुतबा मिल गया। भगवान में आस्था रखने वाले लोग पंजाबी साहित्यकारों के निधन को अपने ढंग से ले सकते हैं पर पंजाबी साहित्यिक जगत को जो नुकसान हुआ है, उसकी क्षतिपूर्ति के लिए हमें मिलकर प्रयास करने होंगे।(दैनिक भास्कर में छपा)

2/20/2010

सूत्र सम्मान कल

ठा।पुरन सिंह स्मृति सूत्र सम्मान समारोह २१ फरवरी को जगदलपुर के गोयल धर्मशाला में संपन्न होगा। सूत्र जगदलपुर द्वारा आयोजित इस साहित्यिक समारोह में देशभर के रचनाकारों की उपस्थिति में युवा कवि केशव तिवारी को सूत्र सम्मान से सम्मानित किया जाएगा। गोयल धर्मशाला में आयोजित होने वाले इस विशिष्ट साहित्यिक समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में रचनाकार श्री वाचस्पति, वाराणासी उपस्थित रहेंगे एवं कार्यक्रम की अध्यक्षता चर्चित आलोचक जीवनसिंह, जोधपुर करेंगे। साथ ही विशिष्ट अतिथि के रूप में युवा कवि त्रिलोक महावर, जांजगीर एवं ठा रामसिंह नारायणपुर उपस्थित रहेंगे।प्रातः ११.३० बजे से आयोजित होने वाले इस साहित्यिक आयोजन के प्रथम सत्र में सूत्र सम्मान कार्यक्रम में युवा कवि केशव तिवारी की कविताओं पर बसंत त्रिपाठी, शाकीर अली एवं रजत कृष्ण अपना आलेख प्रस्तुत करेंगे, तत्पश्चात दूसरे सत्र में दोपहर के २.३० बजे कविता पाठ का कार्यक्रम संपन्न होगा जिसमें नगर एवं बाहर से आए कवियों का कविता पाठ होगा। इस सत्र में युवा कवि केशव तिवारी, महेश चंद्र पुनेठा एवं संतोष अलेक्स के कविता संग्रह आसान नहीं विदा कहना, भय अतल में एवं कविता के पक्ष में नहीं, अंग्रेजी कवि जयंत महापात्र का हिन्दी अनुवाद व साहित्यिक पत्रिका सर्वनाम का लोकार्पण कार्यक्रम भी संपन्न होगा। इन दोनों सत्रों का संचालन जीएस मनमोहन एवं भास्कर चौधरी करेंगे। सूत्र सम्मान के महत्वपूर्ण आयोजन में रचनाकार शिरकत कर रहे हैं। जिसमें महत्वपूर्ण है बसंत त्रिपाठी नागपुर, संतोष एलेक्स विशाखापटनम, नासिर अहमद सिकन्दर, कमलेश्वर साहू भिलाई, शाकिर अली रायगढ़, संजय शाम, नंद कसारी रायपुर, रजत कृष्ण, शैलेष साहू बागबहारा, विजय राठौर, नरेन्द्र श्रीवास्तव,सतीश सिंह, नागवंशी जाजंगिरी, त्रिजुगी कौशिक, देवांशु पाल बिलासपुर, पाथिक तारक नांदगांव, मांझी अनंत, युगल गजेन्द्र, कमेश्वर कुमार, सुबोध देवांगन धमतरी, निर्मल आनंद कोमा, भास्कर चौधरी, सूरज प्रकाश राठौर कोरबा सहित नगर के समस्त रचनाकार उपस्थित रहेंगे।
बंटवारा का मंचन
अंचल की नाट्य, लोकनृत्य, रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा बाल नाट्य शिविर आयोजित करने वाली संस्था प्रतिबिम्ब कला परिषद २० फरवरी को राष्ट्रीय विद्यालय मंच में संध्या ७.३० बजे से लेखक वीरेन्द्र कुमार भारद्वाज की कृति नाटक बंटवारा का मंचन करेगी।

2/06/2010

छत्तीसगढ़ी साहित्य में समकालीन चेतना -

अशोक सिंघई
विकास के नैरंतर्य में मनुष्य ने समूहों, समाजों और संगठनों में रहने की कला का निरन्तर विकास किया। सफलता, उपलब्धि और अस्तित्व की सुरक्षा की जिजीविषा से आतप्त मनुष्य ने सहेजने, सँवारने और बाँटने की क्रियाओं की अनिवार्यता को अपनी प्राकृतिक शक्तियों में समाहित किया। दुनिया को और उसके अनंत सांसारिक व्यापार और व्यवहार से अपना रिश्ता ढूँढती, समाज व समूहों से तादात्म्य स्थापित रखती मनुष्य की अपनी एकाकी काया अपनी अस्मिता की भी तलाश करती है। आकाश के अबूझ सितारों से लेकर भूगोल की घाटियों में भटकती, इतिहास की परतों और भविष्य की धुँध को टटोलती उसकी जिज्ञासा की अँगुलियाँ, सह-अनुभूतियों एवं सह-अनुभवों के शीतोष्म को जब महसूसती हैं तो वह उसे संचित ज्ञान के कोष अर्थात् साहित्य-रूप में अपनी नस्ल को विरासत के तौर पर सौंपने के सत्कर्म को स्वीकारती है।इस आदिम सोच ने साझे के सिद्धांत को अपनाते हुए मनुष्य को अपनी अदृश्य और अनूठी शक्तियों- शक्ति, स्मृति और फिर कल्पना का आभास हुआ होगा। हर मनुष्य के लिए मानवता की यह सतत-यात्रा प्रारंभ और अंत के वलय से गुज़रती है। यह उसके लिए अंतिम, पर मानव की नस्ल के लिए अनन्तिम और अनन्त होती है। हर मनुष्य अपने जीवन में पूर्वातीत की सारी यात्राओं को एक बार फिर जीता है। हर मनुष्य मानवता की चिर और निरन्तर यात्रा का अपने तईं संवाहक होता है।मनुष्य ने स्वप्न बुने। प्रस्तर-युग से चिप-युग तक की यात्रा में मनन-चिन्तन, विचार, व्यवस्था, सत्ता, संगठन जैसे दुधारी हथियार उसके हाथ लगे। हमारी सोच, हमारे विचार, संजोया ज्ञान और अनुभव, समय की समझ और समय की माँग, हमारे स्वप्न, हमारे आदर्श, हमारे लक्ष्य साझे होने चाहिए, सबके होने चाहिए, सबके लिए होने चाहिए। जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे यह बोध भी बढ़ता है कि अभी भी कितना कुछ अज्ञात है। हमारी सारी संगठनात्मकता, हमारा सारा ज्ञान ऐसा हो जो मनुष्य और अंततः मानवता के पक्ष में खड़ा नज़र आये। इन्द्रियों की शक्ति, ज्ञान और चेतना के नैरंतर्य ने हमारी निर्भीकता बढ़ाई, हममें सौन्दर्यबोध विकसित किया, हमारे सपनों को रंग दिये। मुद्रा के आविर्भाव के पूर्व लेन-देन की आविष्कृत संक्रिया से व्यवसाय की समझ विकसित हुई। यात्राओं ने दूरियाँ घटाईं। उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम, यात्राओं के आध्यात्मिक और व्यावसायिक दौर का सदियों का इतिहास है। पूरा विश्व पहुँच के भीतर समाने लगा। अर्थ की अद्भुत विनिमयता से बाज़ार बना और यह वामनावतार सिद्ध हुआ। सौन्दर्य-बोध ने सर्वश्रेष्ठता की परिकल्पना को साकार किया और फिर शुरू हुई प्रतिस्पर्धा। क्षमतायें समृद्ध होतीं हैं, प्रतिस्पर्धा सेे। प्रतिस्पर्धा के लिये किसी भी समूह अथवा संगठन का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण हथियार होता है मनुष्य। आज का युग तकनीक का युग है। तकनीक से मनुष्य जुड़ा है और मनुष्य से मनुष्य। मनुष्य की दक्षता और क्षमता की कोई अंतिम सीमारेखा नहीं है। इकाई में व्यक्ति अपनी एक विशिष्ट और वैयक्तिक सत्ता रखता है। व्यक्ति और व्यक्ति मिलकर समूह बनाते हैं। समूहों और समाजों के समुच्चय से राष्ट्र बनता है। प्रकृति प्रदत्त सारे संसाधनों के मूल्य सम्वर्धन (वेल्यु एडीशन) में मानव संसाधन ही एकमात्र ऐसा संसाधन है जिसका कि प्रबंधन देश को सर्वोच्च बनाता हुआ प्रगति के शिख तक ले जाता है। ज्ञान मनुष्य की मूल शक्ति है, सम्वेदना नहीं। ज्ञान से शक्ति का और सम्वेदना से प्रेम और करुणा का सीधा संबंध होता है। ज्ञान से सम्वेदना की उत्पत्ति होती है अथवा सम्वेदना से ज्ञान की। मुक्तिबोध जैसे मूल वैज्ञानिक चिंतक और प्रखर समाजशास्त्री साहित्यकार इस गुत्थी को सुलझाने में ताउम्र लगे रहे। उन्होंने यूँ ही ज्ञानात्मक सम्वेदना और सम्वेदनात्मक ज्ञान की बात नहीं की थी। जरा विचार करें, सम्वेदना शून्य ज्ञान विष और ज्ञान शून्य सम्वेदना बाँझ होती है। वस्तुतः ज्ञान और सम्वेदना की सहक्रिया से ही विकास का भु्रूण पनपता है। किसी भी प्रदेश और देश को मानव के संबंध में उसकी सम्वेदना एवं प्रवृत्ति को हमेशा ध्यान में रखना होता है। हमारी इक्कीसवीं सदी में यह अनहोनी हो रही है कि बाज़ारवाद की अन्तर्वृत्ति से विकसित हो रही औद्योगिक संस्कृति में ज्ञान को सूचना से और सम्वेदना की नैसर्गिक प्रवृत्तियों को लाभ-हानि की त्वरित गणना से विस्थापित किया जा रहा है। पत्थरों के ईश्वरों को पूजते-पूजते हम ईश्वर बनने की राह में पत्थर होते जा रहें हैं। मिथेले फूको ने कहा है कि - विचारों के इतिहास को टटोलते हुए परंपराओं की निरंतरतायें नहीं, विच्छिनतायें और क्रम-भंगतायें अधिक महत्वपूर्ण हैं। ये अवरोध ज्ञान के संग्रहण में दख़ल देते हैं तथा ज्ञान की तानाशाही को रोकते हुए, ज्ञान के आधिपत्य को भंग कर एक नए समय को दर्ज़ कराने का दबाव बनाते हैं।विज्ञान और संस्कृति की उपलब्धियाँ अब कमोबेश सार्वभौम हैं। अगर पश्चिम का अंधानुकरण या तीब्र आधुनिकीकरण सामाजिक परिवर्तन का विवेकपूर्ण रास्ता नहीं है, तो भारतीय रूढ़िवाद इसका विकल्प भी तो नहीं है। हमारा अतीत हमारी रक्षा करने में समर्थ नहीं है। हमारा वर्तमान भविष्य के आकर्षण में तेजी से अतीत से पल्ला छुड़ाता नज़र आता है। अतीत में झाँकने पर भविष्य नज़र आता है वैसे ही जैसे झील में चाँद का अक्स। यह तो सिद्ध हो गया है कि भाषा, शिक्षा, आवागमन और संचार परिवर्तन के प्रमुख कारक है। मानव समूह की भाषा और शिक्षा इस अमूल्य और असीम संसाधन की उत्पादकता सुनिश्चित करते हैं। दिक़्कत यह है कि हम स्कूलों में तो अँग्रेज़ियत चाहते हैं और घरों में पौराणिक कथाओं के सीरियल्स् अथवा आस्था व संस्कार के चेैनल्स्। आधुनिकता और परंपरा के संबंध द्वन्द्वात्मक रहे हैं। उसी तरह अतीत और भविष्य के संबंध द्वन्द्वात्मक हैं।व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के दर्शन पर टिका है हमारा वर्तमान। प्रतिस्पर्धा का अस्तित्व ही ’श्रेष्ठता-भाव’ के बचे रहने का बोध है। प्रतिस्पर्धा का अस्तित्व तभी तक है, जब तक सर्वोत्कृष्ट होने की शेष अभिलाषा है। प्रतिस्पर्धा का कोई एक रूप नहीं होता। यह बहुरूपिया है। सफल होने और शीर्ष पर बने रहने के लिए इसे पहचानना हर युग की अनिवार्यता है। सर्वोत्कृष्ट होने की दुर्धर्ष जिजीविषा से प्रतिस्पर्धा प्रारंभ होती है और इस जिजीविषा के क्षरण से संगठन विनष्ट हो जाते हैं। बाज़ार में टिके रहने के लिए, बने रहने के लिए दिलो-दिमाग, दोनों की ज़रूरत है। प्रश्न यह है कि अपनी स्थायी इकाई मानव यात्रा में हम क्या कर रहे हैं? छत्तीसगढ़ प्रदेश के हर एक नागरिक को अपनी भूमिका के प्रति संवेदनशील, सक्रिय और जागरूक होना होगा। हम सामुहिक रूप से अधिक परिणाम दे सकते हैं। क्या खूब कहा गया है, ‘‘है ज़रूरी दूरियों पर सोचना, अपनी भी रफ्तार देखा कीजिये; हाँथ दिखते हैं सभी के एक से, हाँथ के हथियार देखा कीजिये।’’इक्क्ीसवी सदी का पहला दशक अपने अंतिम चरण में एक विश्वव्यापी मंदी का एक वैसा ही दौर लेकर आ रहा है जैसा कि विश्वयुद्धों के उपरान्त अनुभव में आया था। आधुनिकता, उच्च जीवन-स्तर और विज्ञान तथा तकनीकी के सारे लाभों का आस्वाद खारा होने लगा है। जब भी समुद्र-मंथन करना होता है, तब मानव और दानव, दोनों ही शक्तियों को एक धरातल पर खड़ा होना पड़ता है। विश्व-बाज़ार समुद्र है, आपूर्ति और माँग वासुकि के दो छोर हैं। उत्पादक शक्तियों से बनता है पर्वत मेरू। प्रश्न यह है कि हमारेे पास क्या शिव हैं? हलाहल का क्या होगा? मंथन के बाद वैसे भी अमृत उन्हीं में बँट जाता है जिन्हें कभी विष नहीं पीना होता। किसी भी संगठन में, किसी भी मनुष्य में देव और दानव, दोनों ही प्रवृत्तियाँ कमोबेश उपस्थित रहती हैं। अगर निरापद अमृत लक्ष्य है तो दानवत्व को देवत्व में बदलते रहने के उपक्रम गंभीरता से जारी रखने होंगे और इन सबमें साहित्य की भूमिका के महत्व से भला कौन इंकार कर सकता है। मनुष्य ईश्वर की सर्वोत्तम कृति है उसके मानवीय सदगुणों, क्षमा, परोपकार, परदुखकातरता, कार्य के लिए समर्पण, परिश्रम एवं लगन से कार्य करने पर वह आदर्श मनुष्य कहलाता है। सम्प्रेषण अनिवार्य है। सटीक सम्प्रेषण के लिये भाषा भी सटीक होनी चाहिये। उल्लेखनीय है कि काम को सहजता से करने की दृष्टि एवं समस्त मानवीय संसाधन को एकजुट करने में जमीनी भाषा की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निश्चित है। हमारे प्रदेश में जनता की भाषा छत्तीसगढ़ी है। विकास के लिये हिमालयीन प्रयासों में जनता को दिल से जोड़ना होगा और इस भगीरथ प्रयास में जनता की भाषा अनिवार्य होगी। जहाँ चाह है, वहाँ राह है। एक अच्छा और जिम्मेदार साहित्यकर्मी भाषा के भावुक प्रवाह में नहीं बह सकता। भाषायी सौहार्द्र के मूलमंत्र को छोड़कर यदि कुछ सुगबुगाहटें होती भी हैं तो बे निर्वंश ही रह जायेंगी। भाषा को लागू करने के संदर्भ में व्यवस्थित कार्यशैली को आत्मसात् कर इसे अपने यहाँ भी वैसे ही अमल में लाने की जरूरत है जैसे कि देश में हिंदी को लाने के लिये अपनाई गई है। भाषा का काम जोड़ना है, तोड़ना नहीं। देश के दूरदर्शी नेतृत्व ने जो दीर्घकालीन योजनायें बनाईं थीं, उनके मूल में इसी सोच की ही ताकत है। कहा जाता है कि दीर्घावधि तक चले देवासुर संग्राम में अन्ततः विजयी होने के लिये देवों ने अनेक प्रयास, अनुष्ठान आदि किये। सुफल के रूप में आनंद का घट देवताओं के हाथ लग गया। आनंद शक्ति और पराक्रम का अविरल स्रोत होता है। आनंद का यह घट असुरों के हाथ न लग जाये, यह चिन्ता उन्हें सताने लगी। वे सब भारी सोच में पड़ गये कि असुरों से इसे बचाकर रखना है तो आखिर कहाँ रखें? बहुत सोचने-विचारने के बाद आखिरकार देवताओं ने एक अति-सुरक्षित स्थान खोज ही लिया और वह था हृदय। सर्वद्रष्टा सहित सभी, सब कुछ देखते हैं, पर हृदय में कोई नहीं झाँकता या यूँ कहें कि झाँक नहीं पाता। इसके लिये विशेष सामथ्र्य चाहिये। इस सबसे निरापद जगह पर देवताओं ने आनंद का घट छिपाकर रख दिया है। हम सब कुछ ढूँढते हैं, सब जगह खोजते हैं, परन्तु हृदय नहीं टटोलते। आनंद का घट वहीं सुरक्षित पड़ा रहता है। सच्चा साहित्यकार अपने मानव समाज के हृदयों को टटोलना जानता है। भाषा को कारग़र हथियार में बदलने की पहली ्यर्त है आपसी विश्वास। यह संस्कृति, भाईचारे और सम्वेदना के वेग से परिचालित अन्तःसलिला है। यह खूबी छत्तीसगढ़ी साहित्यकार अपनी रचनाओं में कैसे लायेगा है, यह उसकी अपनी रचनात्मकता होगी।

1/31/2010

शब्दों की सत्ता का क्षरण रोकें - पंत



माखनलाल जी पुण्यतिथि पर पत्रकारिता विश्वविद्यालय में व्याख्यान


भोपाल, 30 जनवरी। शब्द की सत्ता से उठता भरोसा सबसे बड़ा खतरा है। इसे बचाने की जरूरत है। ये विचार माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में पं. माखनलाल चतुर्वेदी की पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित स्मृति व्याख्यान में अध्यक्षीय भाषण देते हुए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के मंत्री-संचालक कैलाशचंद्र पंत ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि माखनलाल जी एक साथ प्रखर वक्ता, कवि, पत्रकार और सेनानी रूपों में नजर आते हैं। उनका हर रूप आज भी प्रेरित करता है। वे सही मायनों में भारतीयता का जीवंत प्रतीक हैं और मानवीय दृष्टि से पूरी मानवता को संदेश देते हैं।
कार्यक्रम के मुख्यवक्ता कवि-कथाकार ध्रुव शुक्ल ने कहा कि हमारा समय अभिव्यक्ति की मुश्किलों का समय है। आज के समय में किस बात से कौन मर्माहत हो जाए कहा नहीं जा सकता। देश में अजीब से हालात हैं। उन्होंने कहा कि वे बौद्धिक नहीं अंर्तमन की भाषा लिखते थे। वे सही मायनों में एक भारतीय आत्मा थे। उनकी हिंदी चेतना और भारतीय मन आज के समय की चुनौतियों का सामना करने में समर्थ है।


मुख्यअतिथि वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि माखनलाल जी मूल्यों की परंपरा स्थापित की और उसपर चलकर दिखाया। हिंदी के लिए उनका संघर्ष हमें प्रेरित करता है। वे समय के पार देखने वाले चिंतक और विचारक थे। भारतीय पत्रकारिता के सामने जो चुनौतियों हैं उसका भान उन्हें बहुत पहले हो गया था। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो। बृजकिशोर कुठियाला ने कहा कि आज का दिन संत रविदास, महात्मा गांधी और माखनलाल जी से जुड़ा है तीनों बहुत बड़े संचारक के रूप में सामने आते हैं। अपनी संचार प्रक्रिया से इन तीनों महापुरूषों ने समाज में चेतना पैदा की। मानवता की सेवा के लिए तीनों ने अपनी जिंदगी लगाई। उन्होंने कहा कि मीडिया को जनधर्मी बने बिना सार्थकता नहीं मिल सकती। पश्चिम का मीडिया आतंकी हमलों के बाद अपने को सुधारता दिखा है हमें भी उसे उदाहरण की तरह लेते हुए बदलाव लाने की जरूरत है।

कार्यक्रम का संचालन जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी और आभार प्रर्दशन कुलसचिव प्रकाश साकल्ले ने किया। इस अवसर पर सर्वश्री विजयदत्त श्रीधर, रेक्टर जेआर झणाणे, डा।श्रीकांत सिंह, चैतन्य पुरूषोत्तम अग्रवाल, पुष्पेंद्रपाल सिंह, डा. पवित्र श्रीवास्तव, पत्रकार मधुकर द्विवेदी, रामभुवन सिंह कुशवाह, सरमन नगेले, युगेश शर्मा, सुरेश शर्मा, अनिल सौमित्र सहित अनेक साहित्यकार, पत्रकार एवं विद्यार्थी मौजूद थे।


( संजय द्विवेदी)

1/17/2010

भारत को पहचानने की जरूरत- श्रीभगवान सिंह


आधुनिक व दार्शनिक दृष्टि से हिन्द स्वराज अधिक प्रासंगिक- आचार्य नंदकिशोर
हिन्द स्वराज की प्रासंगिकता पर व्याख्यान सम्पन्न


रायपुर, 16जनवरी । ख्यातिनाम गांधीवादी, चिंतक और लेखक जयपुर के नंदकिशोर आचार्य ने कहा है गांधी जी की किताब हिन्द स्वराज्य आधुनिक एवं दार्शनिक दृष्टि से आज अधिक प्रासंगिक है। उन्होंने हिन्द स्वराज्य का विश्लेषण करते हुए कहा कि स्वदेशी, स्थानीय जरूरतों के, लिए स्थानीय संस्थानों से स्थानीय लोगों के लिए विकसित टेक्नालाजी है। यह विचार आचार्य ने महात्मा गांधी द्वारा रचित विश्व प्रसिद्ध कृति हिन्द स्वराज की 100 वीं वर्षगांठ के अवसर पर रायपुर प्रेस क्लब के सभागार में हिन्द स्वराज्य की प्रासंगिकता विषय पर आयोजित व्याख्यान के दौरान व्यक्त किए। कार्यक्रम का आयोजन प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा किया गया। उक्त अवसर पर प्रख्यात आलोचक श्रीभगवान सिंह की नाट्यकृति बिन पानी बिन सुन का विमोचन भी श्री नंदकिशोर आचार्य के हाथों संपन्न हुआ ।


नंदकिशोर आचार्य ने हिन्द स्वराज्य की प्रासंगिकता पर कहा कि इस पर देश में गंभीर, चिन्तन नहीं हुआ। यह अपने आप में एक सनातन प्रासंगिकता है। प्राणियों में मनुष्य में चेतना का विकास हुआ और बाद में उसमें हस्तक्षेप करने की क्षमता विकसित हुई। वर्तमान मनुष्य पर निर्भर करता है कि वह उसका उपयोग विकास के लिए करें या विनाश के लिए। उन्होंने तीन महान विचारकों की पुस्तकों का जिक्र करते हुए कहा कि एडम स्मिथ ने उत्पादन पर जोर दिया उससे बाजार की समस्या उत्पन्न हो गई परिणाम स्वरूप यह सिद्धांत समस्या सुलझाने में असमर्थ हो गया। इसी तरह कार्ल माक्र्स ने उत्पादन पर समाज के अधिकार का सिद्धांत दिया जिससे कार्पोरेट सेक्टर के पास स्वामित्व चला गया और नतीजा यह हुआ कि रूस में एकाएक आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया। जबकि गांधी जी के हिन्द स्वराज में ऐसी टेक्नालाजी पर बल दिया गया है जो समतामूलक एवं अहिंसात्मक हो। उन्होंने कहा कि प्रकृति और मनुष्य के बीच का संबंध ही आपसी रिश्तों को बढ़ाएगा। उन्होंने कहा कि हिन्द स्वराज्य सनातन सिद्धांतों पर आधारित है और आज के इस वैज्ञानिक युग में यह हम सब पर निर्भर करता है कि विकास अथवा विनाश में से कौन सी स्वतंत्रता चाहते हैं।


इसके पूर्व व्याख्यान कार्यक्रम के आरंभ में भागलपुर से आए चर्चित आलोचक श्रीभगवान ने कहा कि गांधी जी उपनिवेशवाद के विरोधी थे और सर्व समाज एवं सभी देशों के आगे बढऩे की बात करते थे। उन्होंने कहा कि विज्ञान का मतलब ज्ञान का सोच समझकर उपयोग करना है। गांधी जी भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल आचरण, नीतियों और श्रुतियों के अनुसार विकास की बात करते थे। गांधी जी स्वावलंबन और स्वायतता की बात करते थे क्योंकि उससे ही देश में सबको रोजगार मिलने के साथ ही आत्मनिर्भर बढ़ सकती थी। कालान्तर से देश में ही उनके हिन्द स्वराज की कल्पना की उपेक्षा कर दी गई मगर आज उसकी प्रासंगिकता और बढ़ गई है। श्री भगवान ने कहा कि गांधी जी के सिद्धांतों में ग्रामीण स्वावलंबन की भावना छुपी हुई है। पश्चिमी दौड़ के कारण अपव्यय तथा धन का दुरूपयोग बढ़ा है जिस पर किसी का ध्यान नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि गांधी जी के सिद्धांतों को याद नहीं किया गया तो हम सब पर भारी संकट आने वाला है।


व्याख्यान के अध्यक्षीय उद्बोधन में कवि विश्वरंजन ने कहा कि एडम स्मिथ कार्ल मार्क्स एवं समतावादी समाज की संरचना से ज्यादा वैज्ञानिक व्यवहारिक, सोच गांधी जी की थी। गांधी जी नए युग के मनुष्य के लिए सबसे बड़े प्रकाशपुंज की तरह हैं। आज हम उनकी बुनियाद को अपने अंदर कितना गहरे में उतार पाते हैं यह आज की सबसे बड़ी प्रासंगिकता है। उन्होंने कहा कि बस्तर में पहले सामंतवादी माहौल था उसके बाद वन संरक्षण अधिनियम, पर्यावरण अधिनियम के कारण आदिवासियों को काफी दिक्कतें आई। इन्हीं सबके चलते नक्सलवादी जैसी ताकतों को पैर पसारने के लिए अवसर मिल गया। उन्होंने कहा कि नक्सली सिद्धांत हिंसा पर केन्द्रित है और आखिर में वह टूटेगी पर बहुत नुकसान के बाद। उन्होंने कहा कि बस्तर की परिस्थिति अलग है कितने भी तथाकथित गांधीवादी हों वे नक्सली सुरंग के बीच जाकर बताएं। विश्वरंजन ने कहा कि सोच वाला व्यक्ति निडर होता है। गांधी जी बड़े सत्यान्वेषी थे। उनकी सोच समतावादी थी। जो लोक के लिए सुविधाजनक है वह प्रासंगिक है।


कार्यक्रम के अंत में प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान की ओर से संस्थान के अध्यक्ष विश्वरंजन ने नंदकिशोर आचार्य और श्रीभगवान को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया। आरंभ में अतिथियों का पुष्पहार से स्वागत किया गया। इस अवसर पर श्रीमती इंदिरा मिश्र, विनोद कुमार शुक्ल, नंदकिशोर तिवारी, राजेन्द्र मिश्र, बसंत तिवारी, संस्कृति आयुक्त राजीव श्रीवास्तव, प्रभाकर चौबे, रवि भोई, अशोक सिंघई, केयूर भूषण, गुलाब सिंह, प्रभाकर चौबे, विनोद शंकर शुक्ल, सुभाष मिश्र, जयप्रकाश मानस डी.एस.अहलुवालिया, डॉ. प्रेम दुबे, डॉ. वंदना केंगरानी, एच.एस.ठाकुर, एस. अहमद, संजीव ठाकुर, डॉ,सुधीर शर्मा, राम पटवा, हसन खान, अलीम रजा, नईम रजा, विनोद मिश्र, रवि श्रीवास्तव, विनोद साव, कमलेश्वर, बी. एल. पॉल, चित्रकार सुश्री सुधा वर्मा, एवं बड़ी संख्या में दुर्ग, भिलाई, बिलासपुर और रायपुर के लेखक, पत्रकार, एवं प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित थे।

(राम पटवा की रपट)

12/08/2009

मीडिया विमर्श का वार्षिकांक समर्पित है मीडिया और महिलाएं विषय पर


भोपाल। महिलाएं आज मीडिया के केंद्र में हैं। मीडिया उन्हें एक औजार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। मीडिया ने स्त्री को बिकने वाली वस्तु बना दिया है। मीडिया और स्त्री के बीच बनते नए संबंधों को उजागर करती है मीडिया विमर्श का नया अंक। जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित देश की अग्रणी त्रैमासिक पत्रिका ने अपने वार्षिकांक को मीडिया और महिलाएं विषय पर समर्पित किया है।

यह पत्रिका अनेक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। इस विशेष अंक में आज के समय में मीडिया और स्त्री के विभिन्न आयामों को उजागर किया गया है। 88 पृष्ठों की इस पत्रिका में विषय पर केंद्रित 33 लेखों का संकलन है। इन विषय पर कलम चलाई है देश के ख्यातिलब्ध पत्रकारों, साहित्यकारों और विश्लेषकों ने। इस अंक में कमल कुमार, उर्मिला शिरीष, डा. विजय बहादुर सिंह, अल्पना मिश्र, जया दाजवानी, सच्चिदानंद जोशी, इरा झा, रूपचंद गौतम, मंगला अनुजा, गोपा बागची, डा. सुभद्रा राठौर, संजय कुमार, हिमाशु शेखर, रूमी नारायण, जाहिद खान, अमित त्यागी, स्मृति जोशी, कीर्ति सिंह, मधु चौरसिया, लीना, संदीप भट्ट, सोमप्रभ सिंह, निशांत कौशिक, पंकज झा, सुशांत झा, माधवीश्री, अनिका ओरोड़ा, इफत अली, फरीन इरशाद हसन, मधुमिता पाल, उमाशंकर मिश्र, डा. महावीर सिंह और रानू तोमर के आलखों का संग्रह है।

पत्रिका के संपादकीय में प्रख्यात कवि अष्टभुजा शुक्ल ने स्त्री और मीडिया पर लिखा है, ...मीडिया हमारे समय का बहुत प्रबल कारक है और स्त्री हमारे समय में अपनी पहचान और छाप पूरी शिद्दत के साथ अपने बूते पर दर्ज कराने के लिए जद्दोजहद कर रही है। स्त्री मीडिया की ओर आशा भरी निगाहों से देख रही है, जबकि मीडिया स्त्री को लोलुप दृष्टि से...। मीडिया अपनी चमक को और चमकीला बनाने के लिए स्त्री का उपयोग करने के लिए आतुर है। यह अंक पत्रकारों, मीडिया विश्लेषकों, शोधछात्रों, मीडिया विद्यार्थियों तथा महिला विशेषज्ञों के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण है। पत्रिका ने कालजयी पत्रकार प्रभाष जोशी को श्रद्धांजलि देते हुए लिखा है..मुश्किल है उन्हें अलविदा कहना..। प्रो. कमल दीक्षित ने प्रभाष जोशी के विचारों को नए समाज के साथ जोड़ते हुए समाज को दिए गए उनके योगदान का स्मरण किया है।

10/14/2009

ज्ञानरंजन और विश्वरंजन के बीच



विश्वरंजन

इधर प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के द्वारा 10-11 जुलाई, 2009 को रायपुर में प्रमोद वर्मा के साहित्यिक अवदान तथा समकालीन आलोचना पर केंद्रित आयोजित 2 दिवसीय संगोष्ठी को लेकर कुछ विवाद उठ रहे हैं। इसकी सूचना तो मिल रही थी परन्तु उस विवाद में मेरी कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी। विवाद तो आयोजन के पहले भी उठ खड़ा हुआ था जब कुछ लोगों को इस बात से एतराज़ था कि एक डीजीपी कौन होता है प्रमोद वर्मा को हाईज़ैककरनेवाला? कुछ लोगों को मेरे और प्रमोद वर्मा के संबंध मालूम थे और इन लोगों को क़मोबेश मेरे बारे में तथा मेरे विचारों के बारे में भी पता है।

कुछ लेखक, जो माओवादी विचारधारा में आस्था रखते हैं या सलवा-जुडूम का विरोध कर रहे हैं, वे इसलिए शायद नहीं आना चाहते थे क्योंकि मैं सलवा जुडूम को समर्थन दे रहा था। मैं छत्तीसगढ़ 2007 में आया जबकि सलवा जुडूम 2005 से बस्तर में नक्सली आतंक का ख़िलाफ़त कर रहा है, फिर भी यह झूठ फैलाया जाता रहा कि मैं सलवा जुडूम का प्रणेता हूँ। हालाँकि मेरा यह भी मानना है कि हिंसा का सहारा लेकर नक्सली जिस तरह आदिवासियों को बस्तर में दबा रहे थे तो आदिवासी कभी न कभी विरोध तो करते ही।

1985 से 1990-91 तक बस्तर में आदिवासियों ने नक्सली आतंक और हिंसा के ख़िलाफ़ काफ़ी सारे छोटे-मोटे आंदोलन किये थे पर वे नक्सली हिंसा और दमन के सामने टिक नहीं पाये। 2005 में फ़र्क सिर्फ़ इतना हुआ कि जब नक्सलियों ने सलवा जुडूम के अनुयायियों की हत्या शुरू की तो वे शरणार्थी बनकर पुलिस थाने और कैंपों की ओर भाग आये और इस बार शासन ने उन्हें सुरक्षा देने का इंतेज़ाम किया। सीपीआई (माओवादियों) के पोलित ब्यूरो के 2005 से लेकर आज तक हुए निर्णयों से साफ़ ज़ाहिर हो जायेगा कि उन्होंने सिविल सोसायटीमें किस तरह सलवा-जुडूम के ख़िलाफ़ जहर बोये हैं ?

पर कुछ लेखकों ने कोशिश तो की ही कि साहित्यकारों को किसी तरह इस संगोष्ठी में आने सो रोका जा सके पर बहुतों को रोका नहीं जा सका। साहित्यकार बड़ी संख्या में आये। हर ख़ेमे से आये। शिवकुमार मिश्र आये। खगेन्द्र ठाकुर आये। कमला प्रसाद आये। चन्द्रकांत देवताले आये। अशोक बाजपेयी आये। नन्दकिशोर आचार्य आये। प्रभाकर श्रोत्रिय आये। अरविंदाक्षन आये प्रभात त्रिपाठी आये। रमाकांत श्रीवास्तव आयेपुरस्कृत रचनाकार द्वय श्रीभगवान सिंह और कृष्ण मोहन तो आये ही। साहित्यकार बिहार से आये, उत्तर प्रदेश से आये, गुजरात से आये, केरल से आये छत्तीसगढ़ से तो प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच, इप्टा सहित सभी संगठनों के रचनाकर्मियों ने अपनी संपूर्ण निष्ठा के साथ सहभागिता दर्ज़ की। कुछ अपनी विशुद्ध साहित्यिक निष्ठा के कारण आये। कुछ प्रमोद वर्मा के कारण आये। कुछ मेरे कारण आये। जो मेरे कारण आये वे मुझे अच्छी तरह जानते हैं।

एक खुले मंच पर सबने अपनी बातें कही। आलेख पढ़े। कोई किसी से न दबा, न ही यह कोशिश की गई कि कोई लेखक-आलोचक अपनी आस्थाओं को बदले। राज्य के मुख्यमंत्री, कुछ अन्य मंत्री एवं राज्यपाल को सिर्फ़ औपचारिकता और प्रोटोकॉल के तहत आरंभ और समापन में बुलाया गया था क्योंकि बहुत दिनों के बाद एक बड़ा साहित्यिक आयोजन छत्तीसगढ़ में हो रहा था।

इधर एक और विवाद ज्ञानरंजन जी ने उठाया है। उन्होंने कमला प्रसाद, खगेन्द्र ठाकुर तथा नामवर सिंह पर बहुत सारे आरोप लगाकर प्रलेससे इस्तीफ़ा दे दिया। उसमें एक आरोप कमला प्रसाद और खगेन्द्र ठाकुर द्वारा रायपुर के आयोजन में शिरक़त करना भी है। वैसे में प्रलेस का सदस्य नहीं हूँ और प्रलेस के अंदरुनी विवादों से मेरा कोई लेना देना नहीं होना चाहिए पर क्योंकि विवाद में मुझे और संस्थान को भी घसीटा जा रहा है और अछूत क़रार दिया जा रहा है तो न चाहते हुए भी मुझे यह हलफ़नामा दर्ज़ करना पड़ रहा है।

मैं नामवर सिंह, खगेन्द्र ठाकुर, देवताले, ज्ञानरंजन, मैनेजर पांडेय, अशोक बाजपेयी तथा नन्दकुमार आचार्य प्रभृति को महत्वपूर्ण साहित्यकार मानता आया हूँ और उन सबके प्रति मेरे मन-मनीषा में एक आदर भाव भी है। पर यह कतई ज़रूरी नहीं कि हर बार मैं उनसे सहमत ही होता रहा हूँ। आदर, सहमति-असहमति से ऊपर की चीज़ होती है। किसी का आंकलन सहमतियों-असहमतियों के सीमाओं में रहकर नहीं की जा सकती, न ही व्यक्तिगत पसंद-नापसंद की सीमाओं में रहकर। सुदीप बनर्जी से मेरी बहुत विषयों पर घोर असहमति थी पर हम अन्त तक बहुत अच्छे मित्र रहे। प्रमोद वर्मा के साथ भी मेरी तीव्र बहसें होती थी। परन्तु हमारी मित्रता में आँच नहीं आई और हम एक दूसरे की असहमतियों के बावजूद परस्पर आदर-भाव से जुड़े रहे। प्रमोदजी आज तक मेरे लिए साहित्यिक गुरू सदृश नज़र आते हैं। प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के आयोजन में जो निजी कारणों से अथवा किसी अन्य कारणों से नहीं आये मैं तो उनका भी आदर करता हूँ, ख़ासकर उनका जो अपनी सर्जनात्मक हस्तक्षेप को निरंतर बनाये हुए हैं।

व्यक्तिगत या आईडियोलॉजिकल मतभेदों के कारण यदि लोगों को अछूत बनाया जाये और यह कहा जाये कि तुम फ़लां मंच पर क्यों बैठे, फ़लां व्यक्ति के आयोजन में क्यों गये तो ऐसा करने वाला व्यक्ति एक नयी जातिप्रथा को जन्म दे रहा है, एक नये ब्राह्मणवाद को जन्म दे रहा है। (वैसे यदि हम सचमुच अपने-अपने गिरहबान में गहरी दृष्टि से झाँके तो शायद बहुत बार ख़ुद के साथ भी नहीं बैठ सके।) छूत-अछूत की बात कोई और करे तो भी बात कुछ समझ में आती है पर प्रगतिशील विचारधारा और उससे मिलते-जुलते विचारधारा को माननेवालों के बीच यह बात उठे तो अचंभित होना स्वाभाविक है।

छूत-अछूत की बात उठाना जैसे, किसे कहाँ जाना चाहिए, कहाँ नहीं जाना चाहिए, किसके साथ उठना-बैठना चाहिए और किसके साथ नहीं उठना-बैठना चाहिए, गणतांत्रिक मूल्यों के भी विपरीत है। इतिहास के पन्नों में तो जाइये ! स्टालिन ने क्यों हिटलर के साथ बैठ कर जर्मनी के साथ संधि-पत्र पर हस्ताक्षर किये ? बाद में हिटलर के ख़िलाफ़ लड़ाई में एक कैपिटलिस्ट आइजनहॉवर को ऐलाइड फ़ोर्सेसका कमांडर मान रूसी फ़ौजी को आइजेनहॉवर के अधीन किया। माओ ने क्यों कैपिटलिस्ट किसिन्जर के साथ बैठ दुनिया के हालातों पर चर्चा की और क्यों अमेरिका और चीन को नज़दीक लाने की कोशिश की ?

ऐसा करने से न स्टालिन और न ही माओ कैपिटलिस्ट हो गये थे। किसी के साथ बैठने से, या किसी खुले मंच में विरोधियों के साथ बैठकर अपनी बात कहने से कोई अपनी आईडियालॉजी नहीं खो देता। किसी अवार्डको लेकर भी विवाद उठाया जा रहा है। आख़िर नोबेल पुरस्कार या ज्ञानपीठ पुरस्कार में भी कैपिटलिस्टों का धन लगा हुआ है। प्रगतिशील विचारधारा के बहुसंख्य साहित्यकारों ने इन अवार्ड्स को स्वीकारा है। तो क्या इससे उनकी प्रगतिशीलता ख़त्म हो गई ? ज़ाहिर है ऐसा नहीं हुआ। तो फिर विवाद की जड़ शायद कहीं और ही है। शायद व्यक्तिगत लड़ाई-झगड़ों को आइडियोलॉजिकल ज़ामा पहनाया जा रहा हो। और यदि ऐसा है तो यह बहुत दुख की बात है।


ब्रिटिश इतिहासकार ए. जे. पी. टेलर और इतिहासकार ह्यूग ट्रेवर रोपर में टेलर की एक पुस्तक को लेकर ज़बर्दस्त विवाद हुआ था। टेलर और रोपर में गहरी मित्रता भी थी, जो इस विवाद के बाद भी क़ायम रही। टेलर ने बाद में एक साक्षात्कार में इस विवाद पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि यदि रोपर दोस्ती के कारण उनका विरोध करने से कतराते तो वे टेलर की नज़रों में गिर गये होते। पूरा का पूरा विवाद टेलर और रोपर ने बौद्धिक स्तर पर रखा था। उसे छुआछूत के स्तर पर नहीं उतारा। क्या हम ऐसा हिन्दी जगत में नहीं कर सकते ? किसी भी देश में विवाद इस स्तर पर नहीं उतारा जाता कि कोई फ़लां के साथ बैठ गया या फ़लां के मंच से बोल गया तो वह अछूत हो गया ?

प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान हर खेमे, हर गुट, हर आइडियालजी के साहित्यकारों को खुला मंच प्रदान करता रहेगा। हर किसी को अपनी बात कहने की छूट देगा। ऐसा इसलिए भी होगा क्योंकि प्रमोद वर्मा स्वयं प्रगतिशील थे और इसलिए न सिर्फ़ उदार थे पर गणतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी संपूर्ण आस्था थी। वे किसी भी मंच पर जाने से कतराते नहीं थे और अपनी बात ज़ोर देकर तीव्र बौद्धिकता के साथ रखने में सक्षम थे।

( लेखक छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक और प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के अध्यक्ष हैं)

9/28/2009

ब्लॉग पर साहित्य विशेषांक - आमंत्रण

मित्रों,

सृजनगाथा का अगला अंक "ब्लॉग पर साहित्य" विशेषांक है ।

पत्रिका के इस अंक में ब्लॉग में रचे गये या उपलब्ध कराया गई साहित्यिक विधाओं (कविता, कथा, उपन्यास अंश, ललित निबंध, वैचारिक निबंध, पत्र, संस्मरण, आलोचना, समीक्षा, किताब समीक्षा, पत्रिका समीक्षा निबंध, बायोग्राफ़ी, संपूर्ण किताब, छंद गीत, ग़ज़ल, दोहे, हाइकु, मुक्तक आदि सभी विधाओं ) की सामग्री प्रकाशित की जायेगी ।

एक प्रकार से यह हिन्दी ब्लॉग में उपलब्ध साहित्य का मूल्याँकन भी होगा । ब्लॉग पर हिन्दी, भाषा, साहित्य, व्याकरण पर केंद्रित मूल्याँकनपरक लेखों के लिंक भी हमें भेजा सकता है ।

यूँ तो हम आपके ब्लॉग पर अब तक प्रकाशित साहि्त्यिक सामग्रियों का अवलोकन करते रहे हैं और उनमें से भी कुछ चयन कर रहे हैं फिर भी आप से आग्रह है कि आप हमारा ध्यान बँटा सकते हैं क्योंकि सारे ब्लॉगरों पर नज़र डाल पाना कठिन है ।

आप चाहें रचना का लिंक 29 सितंबर, 2009 तक srijangatha@gmail.com पर हमें सुझा सकते हैं ।

विजय दशमी पर्व की शुभकामनाओं सहित

8/12/2009

चरणदास चोर



यह अकल्पनीय था कि कीर्तिशेष रंगकर्मी हबीब तनवीर के विश्वप्रसिध्द नाटक ''चरणदास चोर'' पर उनके अपने प्रदेश याने छत्तीसगढ़ की सरकार ही प्रतिबंध लगा देगी। इसलिए जब कुछ अखबारों के माध्यम से यह जानकारी मिली तो विश्वास न करने का कोई कारण नहीं था तथा इस स्थिति में रोष, चिंता व आश्चर्य की मिलीजुली भावनाएं उमड़ना स्वाभाविक ही था। लेकिन इसके बाद खबर का जैसे-जैसे खुलासा हुआ यह समझ आया कि सरकार, मीडिया, प्रतिबंध की मांग करने वाले व इसका विरोध करने वाले सबने अपनी-अपनी तरफ से अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़े एक संवेदनशील मसले को उलझाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। जिस धैर्य व विवेक का परिचय दिया जाना चाहिए था वह इनमें से किसी ने नहीं दिखाया।


यह तथ्य सबसे पहले स्पष्ट कर लेना चाहिए कि छत्तीसगढ़ सरकार ने ''चरणदास चोर'' नाटक के मंचन पर या पुस्तक की बिक्री पर कोई रोक नहीं लगाई है। छत्तीसगढ़ सरकार ने, जहां तक हमारी जानकारी है, ऐसा कोई आदेश जारी नहीं किया है। इसके बाद इस तथ्य का उल्लेख करना लाजिमी है कि छत्तीगसढ़ शासन के स्कूली शिक्षा विभाग ने विभागीय मंत्री और सचिव के फोन पर दिए निर्देश के अनुरूप, 31 जुलाई की शाम वाणी प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित चरणदास चोर पुस्तक का पुस्तक वाचन अभियान के दौरान वाचन न करने का आदेश जारी किया। इस आदेश में प्रदेश के सभी जिला शिक्षा अधिकारियों को कहा गया कि वे इस 'प्रतिबंधित पुस्तक' की प्रति स्कूलों से बुलाकर अपने पास जमा कर लें। लेकिन उसमें मंचन पर रोक तथा पुस्तक वाचन सप्ताह के बाद रोक जारी रहने की बात नहीं थी। अब इस मामले को विस्तार में समझने की जरूरत है।


हबीब साहब का यह नाटक संभवत: 1987 मे पुस्तकायन नामक प्रकाशक ने छापा था। 2004 में वाणी प्रकाशन ने इसका नया संस्करण छापा। इसमें लेखक की जो प्रस्तावना थी वह पहले संस्करण की भूमिका से भिन्न थी। इसमें सतनामी समाज एवं सतनाम पंथ के प्रति हबीब तनवीर ने प्रशंसायुक्त विचार व्यक्त किए हैं, लेकिन ऐसी दो पंक्तियां हैं जो संभवत: किवदंती पर आधारित हैं अथवा असावधानी में लिखी गई हैं और जिन पर सतनामी समाज का रुष्ट होना सहज है। समाज के एक चर्चित नेता गुरु बालदास ने इसीलिए 2004 में नया संस्करण प्रकाशित होने के बाद मुख्यमंत्री डॉ। रमनसिंह से इसकी शिकायत की तथा आपत्तिजनक अंशों को विलोपित करने की मांग की। गुरु बालदास द्वारा आपत्ति दर्ज करना एक विधिसम्मत कदम था। यद्यपि यह शायद बेहतर होता कि वे हबीब तनवीर से सीधे संपर्क कर उनसे ही मांग करते कि वे उन दो वाक्यों को पुस्तक से हटा दें। फिर भी उन्होंने कोई उग्र कदम नहीं उठाया इसे नोट किया जाना चाहिए। 2004 में राज्य सरकार ने इस पर क्या कार्रवाई की यह पता नहीं चल पाया। संभवत: बात आई-गई कर दी गई। शिकायतकर्ता के पास स्वयं कोई रिकार्ड नहीं है। हमने उनसे पिछली शिकायत का ब्यौरा मांगा, लेकिन नहीं मिल पाया। अगर राज्य सरकार ने उस समय कोई आदेश किया होगा तो सामान्य प्रशासन विभाग, संस्कृति विभाग, शिक्षा विभाग अथवा वाणी प्रकाशन के पास उसकी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।


सन् 2008 में वाणी प्रकाशन ने ही इस पुस्तक का नया संस्करण छापा। पुस्तक में प्रथम पृष्ठ पर दी गई सूचना से पता चलता है कि छत्तीसगढ़ राज्य के स्कूली शिक्षा विभाग की पुस्तकालय विकास योजना के तहत यह पुस्तक छापी गई है। याने सरकार ने बड़ी संख्या में पुस्तक खरीदी और उसे स्कूलों में भेजा। यहां आकर सवाल उठता है कि क्या स्कूली शिक्षा विभाग को 2004 में दर्ज की गई आपत्ति के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। दूसरा प्रश्न उठता है कि पुस्तक खरीदने के पहले क्या उसका सावधानी से अध्ययन किया गया था। तीसरा प्रश्न भी है कि विभाग की पुस्तक खरीद की रीति-नीति क्या है। ये सारे सवाल उठाना लाजिमी है क्योंकि अगर स्कूली शिक्षा विभाग ने हर कदम पर आवश्यक सावधानी बरती होती तो इस तरह का विवाद खड़ा नहीं होता तथा राज्य सरकार को आलोचना का सामना न करना पड़ता।जब 2008 का संस्करण स्कूलों में पहुंचा तो एक बार फिर गुरु बालदास ने मुख्यमंत्री और स्कूली शिक्षामंत्री से मिलकर अपनी आपत्ति विधिसम्मत रूप से दर्ज की। इस बार सरकार हरकत में आई और 31 जुलाई को उपरोक्त आदेश जारी कर दिया। यहां रेखांकित करना चाहिए कि छत्तीसगढ़ राज्य की भाजपा सरकार ने हबीब तनवीर के प्रति कोई पूर्वाग्रह नहीं दिखाया अन्यथा उनकी किताब इतनी बड़ी संख्या में खरीदी ही क्यों जाती। लेकिन गुरु बालदास की आपत्ति मिलने के बाद जिस सुसंगत तरीके से कार्रवाई होना चाहिए थी वह नहीं हुई। ऐसा लगता है कि जबानी जमाखर्च ही चलता रहा। सरकार अगर ठीक से ध्यान देती तो पुस्तक की भूमिका में जो दो आपत्तिजनक वाक्य हैं उन्हें विलोपित करने का आदेश जारी होता और बात वहीं खत्म हो जाती। ऐसा न कर मानो हड़बड़ी में पुस्तक वाचन अभियान के दौरान पुस्तक न पढ़े जाने का आदेश जारी कर दिया गया जिसकी जरूरत नहीं थी। फिर आदेश में ''प्रतिबंधित पुस्तक'' संज्ञा का दो बार लापरवाही के साथ प्रयोग किया गया जिससे भ्रम फैल सकता है।


इस प्रकरण को बिना ठीक से समझे दो-तीन अखबारों ने जो रिपोर्टिंग की उससे भ्रम ज्यादा फैला, और देश भर में बुध्दिजीवियों के बीच तीखी प्रतिक्रिया हुई। एक समाचार में पुस्तक पर प्रतिबंध के साथ-साथ नाटय मंचन की प्रतिबंध की बात भी लिखी गई, जबकि आदेश में ऐसा नहीं कहा गया था। इसी समाचार में स्कूली शिक्षा मंत्री के हवाले से मंचन पर रोक लगाने की बात कही गई लेकिन उन्हें अधिकारिक रूप से उध्दृत नहीं किया गया। इस पत्र ने विभाग के सचिव से जरूर चर्चा की, जिन्होंने ''इस विवादित पुस्तक को प्रतिबंधित'' करने की बात कही। लेकिन आदेश जारी होने के बाद अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की। इसके बाद विरोध के स्वर उठना प्रारंभ हुए। सबसे पहले सीपीआईएम की प्रदेश इकाई ने निर्णय की आलोचना की, लेकिन उसने भी आदेश को देखना शायद जरूरी नहीं समझा। दिल्ली और भोपाल में भी छत्तीसगढ़ सरकार के निर्णय की घोर निंदा की गई। लेकिन यह सब एक अंग्रेजी अखबार में छपी रिपोर्ट के आधार पर ही हुआ तथा यह समझना कठिन नहीं है कि प्रकरण की पूरी जानकारी किसी के पास भी नहीं थी। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पुस्तकों और छुटपुट लेखों पर प्रतिबंध या अन्य सरकारी कार्रवाई करने का यह पहला मौका नहीं है। कांग्रेसी सरकार के समय में तो एक मंत्री के पिता और एक स्वतंत्र फीचर लेखिका को जेल की हवा भी खानी पड़ी थी। दरअसल इस नए प्रदेश की मुश्किल यही है कि साहित्य और संस्कृति के विविध आयामों के बारे में सरकार ने पिछले नौ साल में कभी भी सुचिंतित सोच का परिचय नहीं दिया है। चरणदास चोर पर प्रतिबंध इस आधी-अधूरी और चलताऊ मानसिकता का ही परिणाम है।''देशबन्धु'' सभी पक्षों से इस संवेदनशील प्रश्न पर समझदारी का परिचय देने का अपील करता है। हमारी मांग है कि छत्तीसगढ़ सरकार पुस्तक के वाचन पर लगा प्रतिबंध तुरंत हटाए। हमारी दूसरी मांग है कि पुस्तक की भूमिका से आपत्तिजनक पंक्तियां हटा दी जाए। हबीब तनवीर की एकमात्र वारिस सुश्री नगीन तनवीर को इसमें अपनी ओर से भी पहल करनी चाहिए। पुस्तक के विवादित अंश को विलोपित करने के साथ-साथ पुस्तक वापिस ग्रंथालयों में भेजी जाएं। फिर सरकार यह भी बताए कि उसकी पुस्तक खरीद नीति व प्रक्रिया क्या है तथा इसे सुचारू बनाने के लिए विशेषज्ञों की सलाह ली जाए। जिन अधिकारियों की लापरवाही से बिना सुधार के पुस्तक का नया संस्करण छप गया उनके बारे में भी सरकार विचार करे। हम अपने रचनाशील मित्रों व पत्रकारों को भी संयम बरतने की सलाह देंगे। अपनी निजी जानकारी की बिना पर यह जिक्र करना मुझे जरूरी लगता है कि मुख्यमंत्री डॉ। रमनसिंह ने हबीब तनवीर की बीमारी के समय एवं उनकी मृत्यु के बाद सरकारी स्तर पर आवश्यक वित्तीय प्रबंध करने के लिए भी स्वीकृति प्रदान की थी। इसलिए इस प्रकरण को सांप्रदायिक रंग देना उचित नहीं होगा। और अंत में सतनामी समाज को इस बात के लिए धन्यवाद देना चाहेंगे कि उन्होंने कानून अपने हाथ में लेने जैसा कोई अप्रिय कदम नहीं उठाया। अपनी धार्मिक, सामाजिक भावनाएं आहत होने पर आए दिन जो समूह हिंसक उपद्रवों पर उतर आते हैं उन्हें इससे सीख लेना चाहिए।(साभार)

ललित सुरजन

संपादक, देशबन्धु

रायपुर, छत्तीसगढ़

7/22/2009

दिल्ली दर्प दमन


एक सहचर की याद
अशोक वाजपेयी

वे गजानन माधव मुक्तिबोध और हरिशंकर परसाई के सहचर थे । किसी हद तक श्रीकांत वर्मा के भी । मुक्तिबोध को उनके जीवनकाल में यह जताने वाले कि वे एक बड़े लेखक हैं। जो छह सात लोग थे उनमें से वे एक थे । परसाईजी के भी अभिन्न थे और उनकी कई बार सक्त आलोचना की परसाई जी इज्जत करते थे- सारी दुनिया को खरी-खोटी सुनाने वाले केा ख़ुद को खरी खोटी सुनाने वाला भी आख़िर चाहिए ही था । यह दावा करना अनुचित न होगा कि प्रमोद वर्मा की इन दोनों लेखकों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका रही है । लगभग 9 वर्ष पहले वे देहावसन के बाद उन्हें याद करते हुए एक बड़ा मानवीय गरमाहट और बौद्धिक ऊर्जा भरा आयोजन रायपुर में पिछले सप्ताह हुआ । अनेक दृष्टियों के लेखक आदि एकत्र हुए प्रमोद वर्मा के अवदान पर और उस बहाने आज की आलोचना पर व्यापक और खुला विचार हुआ । इस अवसर पर राधाकृष्ण प्रकाशन ने चार खंडों में उनका समग्र भी विश्वरंजन के स्नेह और आदरयुक्त संपादन में प्रकाशित किया । सामग्री जुटाने और व्यवस्थित कर छपाई के लिए देने के बाद पता चला कि लगभग पाँच सौ पृष्ठों की सामग्री और है जिसे बाद में शामिल किया जा सकेगा।
प्रमोद वर्मा की आस्था सामान्य तौर पर वामपंथी थी । लेकिन किसी तरह की कट्टरता से वे मुक्त थे । उन दिनों यानी सत्तर अस्सी के दशक में वे अज्ञेय और मुक्तिबोध के समान रूप से प्रशंसक थे । यह एक बड़ा कारण है कि प्रगतिशील आलोचकों की सूची में उनका नामोल्लेख नहीं होता है । इसे रेखांकित करते हुए नंदकिशोर आचार्य ने यह भी कहा कि प्रमोद जी के लिए स्वतंत्रता परम मूल्य थी और वे उसे किसी प्रतिबद्धता के दबाव में तजने के तैयार नहीं थे ।

इस अवसर पर प्रमोदजी पर निबंधों का एक संचयन न होना प्रमोद वर्मा का यश पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित किया गया है और एक स्मारिका भी निकाली है । उसमें प्रमोजी के इन कथनों की ओर ध्यान जाता हैः-


‘‘जब संसार की कागद की पुड़िया है तो उस पर लिखे शब्द तैरकर पार उतर जायेंगे ऐसा मैं अपने सबसे कमज़ोर और आत्ममुग्ध क्षणों में भी नहीं सोचता । मुझे ये सिर्फ़ इतना जताती है कि इन्हें रचते हुए मैंने अपने आप को किस तरह नष्ट या हासिल किया है ।


‘‘कवि शब्द की दुनिया में स्वयं को खोजा करता है । कवि अपने देश और काल को नहीं लिखता। वस्तुतः वह अपने अनुभवों और सपनों को शब्द देता है । पाब्लो नेरूदा की प्रेम कविताएँ मुझे अच्छी लगतीं हैं उन्हें पढ़ते हुए मुझे रसखान की याद आती है ।


‘‘जन साधारण की बात चित्रपट के माध्यम से लोकरंजन करने वालों पर छोड़ देनी चाहिए । साहित्य सहृदय और गुणी जनों की रूचि का विषय है ।


‘‘प्रगतिशील लेखक मछली पकड़ने के लिए तो जाल का उपयोग कर सकता है लेकिन कलावादियों की तरह कुहरा पकड़ने के लिए नहीं।


सच में सबसे बड़े कवि हर भाषा में अज्ञात नाम-कुल-शील असंख्य कवि जन ही हुआ करते हैं । जैसे क्रांति के वास्तविक नायक असंख्य इत्यादि जन हैं ।


सत्य का संधान होता है और सौंदर्य का सृजन । ख़तरा तब होता है जब हम सत्य का सृजन करते हैं और और सौंदर्य का संधान । प्रेम करना गैरकानूनी नहीं है। हिंसा बेहक गैरकानूनी है ।

छत्तीसगढ़ ने अपने एक लेखक को ऐसे उत्साह समझ और जतन से याद किया यह बड़ी बात है । ख़ासकर आज के स्मृति और कृतज्ञता वंचित परिवेश में । इस अवसर पर श्री भगवान सिंह और कृष्णमोहन को प्रमोद वर्मा पुरस्कार भी प्रदान किए गए । महानगरों से दूर जो सृजन और आलोचना सशक्त रूप से सक्रिय है उसका यह उचित ही स्वीकार है । किसी हद तक दिल्ली दर्प दमन भी । पता चला है कि कुछ लेखक स्वीकृति देकर इसलिए नहीं आये कि छत्त्तीसगढ़ में नक्सलियों का राज्य सत्ता जनसंहार कर रही है । दुर्योगवश समारोह समापन के अगले दिन नक्सलियों ने एक पुलिस अधीक्षक और लगभग चालीस पुलिस कर्मियों की हत्या कर दी । इस समय नक्सलियों द्वारा कई राज्यों में लगातार जो हिंसा हो रही है। उसके बारे में तमाम क्रांति धर्मी लेखक चुप्पी क्यों साधे हुए हैं यह समझ में आना कठिन है । वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति की परंपरा में ही यह चुप्पी है । 20वीं शताब्दी में हम देख आये हैं कि हिंसा और हत्या से सच्ची क्रांती नहीं होती और अगर उसके होने का कुछ देर के लिए भ्रम हो भी जाये तो उसकी परिणति भी देर सवेर हिंसा और हत्या में हीं होती है ।

प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान भी स्थापित किया गया है उसकी एक महत्वाकांक्षी योजना है । छत्तीसगढ़ में दुर्भाग्य से राज्य शासन ने संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक संस्थागत उपाय नहीं किए हैं । साहित्य, संगीत नाटक और ललित कला की राज्य अकादमियाँ अब तक गठित नहीं हुईं हैं । जिस अंचल में हाल ही में मुक्तिबोध, श्रीकांत वर्मा, प्रमोद वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल, प्रभात त्रिपाठी आदि लेखक हुए हैं वहाँ ऐसी उदासीनता और निष्क्रियता संवेदनशीलता और जिम्मेदारी से बचने के बराबर है । स्वयं इस आयोजन में यह प्रकट हुआ कि बख्शी पीठ पर रहकर प्रमोद जी के छत्तीसगढ़ की युवा पीढ़ी को रूपायित करने में कितनी बड़ी भूमिका निभाई । यह पीठ पहले की राज्य सरकार द्वारा स्थापित है । नया संस्थान कवि विश्वरंजन के नेतृत्व में इस शून्य को भर सकता है । ऐसे कम लोग बचे हैं (और प्रशासन में प्रायः बिल्कुल नहीं) जो साहित्य से ऐसा अनुराग रखे और जो अपने पूर्वज लेखकों के प्रति सामाजिक कृतज्ञता ज्ञापन के लिए ऐसे प्रयत्न करे जैसे कि विश्वरंजन और उनके सहयोगी कर रहे हैं ।
(कभी-कभार, जनसत्ता, १९ जुलाई, २००९ दिल्ली)

7/03/2009

राष्ट्रीय ब्लॉग संगोष्ठी रायपुर में

राष्ट्रीय ब्लॉग संगोष्ठी : छपास पीड़ा का इलाज मात्र हैं ब्लॉग?
रायपुर, छत्तीसगढ़
दिनांक 10 जुलाई, २००९

मित्रों,
पिछले दिनों हिन्दी के एक ब्लॉग में पुष्पा भारती के कथन पर गंभीर चर्चा चली थी। पुष्पा भारती ने हिन्दी ब्लॉगों को यह कह कर खारिज कर दिया था कि यहाँ तो भाषाएँ भी बड़ी अजीब है - ब्लॉगर ‘टेंशनात्मक’ लिख रहे हैं – तो ये टेंशनात्मक क्या है? इससे पहले नामवर सिंह जैसे दिग्गज इसे खारिज कर चुके हैं। अलबत्ता राजेंद्र यादव सरीखे कुछ विशिष्ट भविष्यदृष्टा की नजरों में ब्लॉगों के जरिए सृजनात्मकता की असीम संभावनाएँ भी झलकती हैं।

पांच साल के हिन्दी ब्लॉग इतिहास में सृजनात्मकता के लिहाज से क्या कुछ हासिल हुआ और भविष्य का पट क्या कहता है?

क्या ब्लॉग सिर्फ और सिर्फ छपास पीड़ा को जड़ से मारने का इलाज मात्र है या फिर इंटरनेट का यह मल्टीमीडिया युक्त सुगम सरल प्रकाशन सुविधा भविष्य में प्रेमचंद या देवकीनंदन खत्री जैसे लेखकों को पैदा करने की ताक़त रखता है? क्या यहाँ सिर्फ अनर्गल और पानठेलों-पर-की-जाने-वाली-बहस नुमा चीजें छापी जाती हैं या फिर इसमें स्तरीय सामग्री भी आती हैं?

इन तमाम मुद्दों पर गर्मागर्म बहस के लिए एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन दिनांक 10 जुलाई, 2009 को 2 बजे से 3 बजे तक रायपुर, निंरजन धर्मशाला में सुनिश्चित किया गया है। यह संगोष्ठी प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह के आयोजन के तहत आयोजित किया जा रहा है। इस संगोष्ठी के मुख्य अतिथि रहेंगे देश के महत्वपूर्ण आलोचक एवं भारतीय ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक डॉ। प्रभाकर तथा विशिष्ट अतिथि होंगे – वरिष्ठ कवि एवं आलोचक श्री प्रभात त्रिपाठी, रायगढ़ एवं ए. अरविंदाक्षन, कालीकट तथा इसकी अध्यक्षता करेंगे - प्रसिद्ध ब्लॉगर रविशंकर श्रीवास्तव (रविरतलामी) ।

भागीदारी हेतु आप भी सादर आमंत्रित हैं। प्रतिभागी ब्लॉगर्स के भोजन, आवास की व्यवस्था संस्थान द्वारी की गई है तथा इसके अलावा राष्ट्रीय आलोचना संगोष्ठी में भी भाग ले सकते हैं जिसमें देश के 50 से अधिक वरिष्ठ आलोचक उपस्थित हो रहे हैं ।

संगोष्ठी संयोजक
जयप्रकाश मानस
मोबाइल – 94241-82664
ई-मेल – srijangatha@gmail.com

5/04/2009

6 मीडियाकर्मी को ‘सृजनगाथा’ सम्मान

रायपुर में 6-7 जून को जुटेंगे देश के वरिष्ठ साहित्यकार

रायपुर। छत्तीसगढ़ की साहित्य, संस्कृति एवं भाषा की अंतर्राष्ट्रीय मासिक वेब पत्रिका सृजनगाथा डॉट कॉम के तृतीय सृजनगाथा सम्मान की घोषणा कर दी गई है । मीडिया की विभिन्न विधाओं में प्रतिवर्ष दिये जाने वाला यह सम्मान इस वर्ष रवि भोई, रायपुर (पत्रकारिता), महावीर अग्रवाल, दुर्ग (लघुपत्रिका), शिवशरण पांडेय, रायगढ़ (फ़ोटोग्राफ़ी), रणवीर सिंह चौहान, दंतेवाड़ा (वेब-पत्रकारिता), मिर्जा मसूद, रायपुर (रेडियो), राजेश मिश्रा, रायपुर (इलेक्ट्रानिक पत्रकारिता), अशोक सिंघई, कमलेश्वर साहू भिलाई, एवं बीएलपॉल, कोरिया (साहित्य) को दिया जा रहा है। सृजनगाथा के संपादक जयप्रकाश मानस ने बताया है कि यह सम्मान सृजनगाथा डॉट कॉम के तीन वर्ष पूर्ण होने पर 7 जून को एक समारोह में प्रदान किया जायेगा ।
इस अवसर पर ‘नयी प्रौद्योगिकी और साहित्य की चुनौतिया’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी भी होगी जिसमें देश के नामचीन आलोचक, कवि, संपादक केदार नाथ सिंह (दिल्ली), नंदकिशोर आचार्य (जयपुर), विश्वनाथ प्रसाद तिवारी (गोरखपुर), विजय बहादुर सिंह (कोलकाता), मैनेजर पांडेय (दिल्ली), प्रो। धनंजय वर्मा (भोपाल), अरुण कमल (पटना), कर्मेन्दु शिशिर (पटना), राजेश जोशी (भोपाल), लीलाधर मंडलोई (दिल्ली), विश्वजीत सेन (पटना), प्रभात त्रिपाठी (रायगढ़, डॉ. बलदेव (रायगढ़), हेमंत शेष (जयपुर), विश्वरंजन, व अनिल विभाकर (रायपुर) आदि शिरकत करेंगे ।

लघु पत्रिका ‘नई दिशाए’ के प्रधान संपादक एस. अहमद ने बताया कि पत्रिका के दो वर्ष पूर्ण होने पर इसी तारतम्य में समकालीन कविता के वरिष्ठ हस्ताक्षर विश्वरंजन की कविताओं पर केंद्रित संगोष्ठी 6 जून को होगी जिसमें ये सभी वरिष्ठ रचनाकार भाग लेंगे । संगोष्ठी का विषय ‘’विश्वरंजन की कविता में राजनीतिक परिप्रेक्ष्य’’ रखा गया है । इसके अलावा देश के ये वरिष्ठ कवि अपनी कविताओं का भी पाठ करेंगे । इस अवसर पर विश्वरंजन की कृति के तीसरे संस्करण का विमोचन भी किया जायेगा।

दो आलोचकों को प्रतिवर्ष प्रमोद वर्मा सम्मान

प्रमोद वर्मा की स्मृति में संस्थान का गठन

रायपुर । मुक्तिबोध, परसाई और श्रीकांत वर्मा के समकालीन तथा हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक प्रमोद वर्मा की स्मृति को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान का विधिवत पंजीयन किया गया है, जिसका विस्तार किया जायेगा । संस्थान द्वारा प्रत्येक वर्ष राष्ट्रीय आलोचना, साहित्य एवं शिक्षा पर केंद्रित संगोष्ठियों का आयोजन विभिन्न शहरों में किया जायेगा । हर साल किसी युवा और प्रतिभावान आलोचक को शोधवृत्ति भी प्रदान की जायेगी । इस अनुक्रम में इस वर्ष 10-11 जुलाई को रायपुर में आलोचना और प्रमोद वर्मा पर राष्ट्रीय विमर्श का आयोजन किया जा रहा है । संस्थान द्वारा प्रमोद वर्मा के लिखित साहित्य का समग्र पाँच खंडों में प्रकाशन भी किया जा रहा है, जिसका संपादन श्री वर्मा के आत्मीय मित्र और कवि विश्वरंजन कर रहे हैं । यह कृति राजकमल प्रकाशन द्वारा छापी जा रही है । इसके अलावा श्री वर्मा की स्मृति में दो राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार प्रारंभ किये जा रहे हैं । इसका उद्देश्य हिंदी में उस स्वस्थ आलोचना कर्म का सम्मान है जिनसे अपने समय के साहित्य, साहित्यकार और पाठक यानी मनीषा को नयी संचेतना और नयी दिशा से जुड़ने का द्वार खुलता हो । इस पुरस्कार के अंतर्गत दो आलोचकों को उनकी आलोचनात्क कृति या कर्म के लिए सम्मानित किया जायेगा। पुरस्कार के अंतर्गत दो चयनित आलोचकों को 10-11 जुलाई, 2009 को रायपुर में आयोजित दो दिवसीय साहित्य समारोह में 11,000 एवं 7,000 हज़ार नगद सहित प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह एवं प्रमोद वर्मा समग्र की एक-एक प्रति प्रदान किया जायेगा । पुरस्कारों का चयन निर्णायक मंडल द्वारा किया जायेगा जिसमें श्री केदार नाथ सिंह, दिल्ली, डॉ. विजय बहादुर सिंह, कोलकाता, डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, गोरखपुर, प्रो. धनंजय वर्मा, भोपाल एवं श्री विश्वरंजन तथा संयोजक जयप्रकाश मानस, रायपुर हैं । संस्थान के संयोजक ने बताया है कि इसके लिए प्रविष्टि बुलायी गई है । प्रथम वर्ग के अंतर्गत आलोचक को अपनी प्रकाशित कृति (साहित्य-आलोचना) की दो प्रतियाँ भेजना होगा जो किसी भी अवधि में प्रकाशित हों । द्वितीय वर्ग के अंतर्गत युवा आलोचक को अपनी प्रकाशित कृति (साहित्य-आलोचना) की दो प्रतियाँ भेजना होगा जो 2000 से 2009 की अवधि में प्रकाशित हों । ऐसी कृतियों के प्रकाशक, पाठक, संस्थायें भी उक्तानुसार प्रविष्टि भेज सकते हैं । प्रविष्टि के साथ आलोचक का बायोडेटा एवं छायाचित्र आवश्यक होगा । प्रविष्टि प्राप्ति की अंतिम तिथि – 30 मई, 2009 रखी गयी है । प्रविष्टि प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, सी-2/15, न्यू शांति नगर, रायपुर, छत्तीसगढ़ के पते पर भिजवायी जा सकती है ।

3/27/2009

बड़े आये चुनाव आयोग को समझानेवाले

व्यंग्य
विश्वरंजन साहब ! नक्सलियों से दो-दो हाथ लेना, उन्हें इस हद तक दबाव में ले आना कि वह बातचीत करने की तैयारी करने लगें एक बात है और चुनाव आयोग से लोहा लेना दूसरी बात । आप इतने दिनों से शासन में अधिकारी रह चुके हैं । आई-बी में भी थे और चुनाव आयोग के अंहकारी स्वभाव के बारे में आपको खुफिया जानकारियाँ भी ज़रूर होंगी। आप को मालूम ही होना चाहिये था कि आयोग का चपरासी भी आपके बाप-तुल्य है। आयोग के छोटे और मध्यम स्तर के अधिकारी आपके पितामह-तुल्य हैं। उसके ऊपर तो सभी ईश्वर-तुल्य हैं। आप क्यों गये थे उन्हें समझाने ? कैसे भूल गये कि समझने-समझाने से ऊपर की स्थिति में होता है आयोग और उसके अधिकारी। आपको क्या नहीं मालूम था जिन पुलिस अधीक्षकों के अस्मिता के लिये आपने आवाज़ उठाई उसे आयोग, चाहे तो आयोग का चपरासी भी यह पाठ पढ़ा सकता है कि बस्तर में नक्सलियों से कैसे लड़ा जाये....

पर विश्वरंजन जी आप बहुत भोले हैं, बहुत सरल हैं। कवि जो ठहरे । चित्रकार जो ठहरे । अब कवि तो सच ही बोलेगा। पर आप सिर्फ कवि नहीं हैं विश्वरंजन साहब, आप एक पुलिस अधिकारी भी हैं। डीजीपी। हैं। इतना तो आप जानते ही होंगे कि प्रशासनिक अधिकारी को बहुत बार झूठ का सहारा लेना पड़ता है। सच पर हमेशा अड़ियेगा तो मरियेगा ही। और फिर सच के लिये या अपने अधीनस्थ अधिकारियों की मान-मर्यादा के लिये तो बेवकूफ ही लड़ते-भिड़ते हैं। अच्छा अधिकारी ऊपर वालों की चापलूसी करता है और अधीनस्थ अधिकारियों को लात मारता है। और आपने तो ‘साहबों’ के दोगले चरित्र को अपनी बहुत सारी कविताओं में रेखांकित भी किया है। फिर आप कैसे ग़लती कर बैठे, आयोग के वाले साहबों के मनोविज्ञान को समझने में ?

आप शायद यह भी भूल गये कि सबसे बड़ा आतंकी अधिकारी ही होता है। जिसके पास जितना अधिकार वह उतना बड़ा आतंकी ! और चुनाव आयोग के पास तो अधिकार ही अधिकार हैं। चुनाव के दौरान तो न्यायालयों का भी डर नहीं है उसे । कोई सुनवाई की गुंजाइश नहीं है। किसी राज्य में आयोग का जो कारिन्दा है या जो कारिन्दे चुनाव के दौरान कुछ दिन के लिये तैनात कर दिये जाते हैं वे कैसे भी हों आयोग की नज़रों में राजा हरिश्चद्र होते हैं ? हरिश्चन्द्र कौन ? अरे वही जो डोम राजा के कारिन्द्रे थे काशी में।

पर राजा हरिश्चन्द्र तो सच्चे इंसान थे। सच ही बोलते थे। आज के हरिश्चन्द्रों की जमात ही कुछ और किस्म की है। बाज़ार में गर्म चर्चाओं को माने तो उनमें से एक तो दहेज प्रताड़ना के लिये अन्दर होना चाहिये था। कहा जा रहा है उस वक्त पुलिस को उस पर तरस आ गई। यह आपके छत्तीसगढ़ आने के पूर्व की घटना है विश्वरंजन साहब, जरा पुराने रिकार्डों का मुआयना कीजिये। भ्रष्ट्राचार की जाँच भी शायद आर्थिक अपराध शाखा कर रही है। एक अन्य कारिन्दे आज नहीं तो कल एक अपराधिक प्रकरण में फँस सकते हैं। बशर्ते पुलिस को तरस न आ जाये।

विश्वरंजन साहब, आपने बड़ी गलती की छत्तीसगढ़ आकर। उठा पटक के खेल में माहिर नहीं थे, न आपने किलाबन्दी की । नहीं तो नक्सलियों से लड़ने के पहले अपने आस-पास घुमते अधिकारियों की फाईले बनवाते । उनके खिलाफ पुराने प्रकरणों को फिर से खुलवाते। पहले आप “ब्लैकमेलिंग” कला में खुद को निपुण करते । और यदि आप यह सब नहीं करना चाहते थे तो क्या ज़रूरत थी चुनाव आयोग के कारिन्दों को राय-मशविरा देनें की। क्या ज़रूरत थी यह कहने की कि नक्सली क्षेत्र में पुलिस इंतेज़ाम उस इलाके में काम करने वाला पुलिस अधिकारी ज्यादा सही तरीके से कर सकता है। आपको जानना चाहिये था कि आयोग के कारिन्दे ऐसा नहीं मानते । आप फिजूल ही अपने लेखों में जब-तब यह शेर उद्धित करते रहे हैं-
जब तक ऊँची न हो ज़मीर की लौ
आँख को रौशनी नहीं मिलती

अब आप रौशनी देने चले थे उन्हें जिनके ज़मीर में आग ही नदारत थी। तो आपको चारों खाने चित होना ही था। जो चाह कर भी नक्सली नहीं कर पाये चुनाव आयोग कर गया। पर एक बात माननी पड़ेगी। आप गिरे ज़रूर पर टकराने के बाद गिरे। गिरते हैं सर सवार ही मैदाने जंग में । आप घुटनों के बल रेंगते हुए नहीं गिरे। देखिये न आपके चारों ओर दूसरे राज्यों के डीजीपी तो बिना कारण ही हटाये जा रहे हैं। चुनाव आयोग अतुलित बलधामा है। वह हरि है। और हरि के विषम में ज्यादा नहीं लिखा जा सकता। पाप लगता है। क्योंकि हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता.......
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-डॉ राजेन्द्र
पहचान प्रकाशन, कुशालपुर, रायपुर

3/24/2009

विश्वरंजन की कविता स्वप्न देखने को प्रेरित करती है


भिलाई नगर। कल्याण महाविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा कवि, एवं छग के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन के सद्य:प्रकाशित एकाग्र संग्रह, 'एक नई पूरी सुबह' (जयप्रकाश मानस द्वारा संपादित)पर एक समीक्षा गोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कवि, कथाकार एवं आलोचक डॉ। प्रभात त्रिपाठी थे। विशेष अतिथि के रुप में डॉ. बलदेव, डॉ. एचएन दुबे, डॉ. सरोज प्रकाश एवं दुर्ग जिला के पुलिस अधीक्षक दीपांशु काबरा उपस्थित थे। अध्यक्षता ललित निबंधकार श्रीराम परिहार ने की है।
स्वागत भाषण देते हुए हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ। सरोज प्रकाश ने श्री विश्वरंजन की कविताओं पर आहूत समीक्षा गोष्ठी के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। डॉ. बलदेव ने कवि विश्वरंजन के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। कविता पाठ के लिए विश्वरंजन को आमंत्रित किया गया तो उन्होंने सहर्ष ही मंच पर खड़े होकर अपनी सात कविताओं का पाठ किया। कविता पाठ करने की उनकी अपनी मौलिक शैली है। कुछ कविताओं के शीर्षक इस तरह से है-तुम गलत कहती हो मैं तुम्हारा वही मुन्ना नहीं हूं मां, रात की बात, मैं फिर से नया लोहाबान जलाता हूं, साहब कोलाज और साधों। प्रेम में सब कुछ संभव है। कवि द्वारा अपनी ही कविता का सस्वर पाठ उपस्थित दर्शकों। श्रोताओं के लिए यादगार क्षण में तब्दील हो गया। विश्वरंजन के काव्य संग्रह पर तीन आलेख पढ़े गए जिसमें प्रथम दो आलेख डॉ. के.एस. प्रकाश, कमलेश्वर साहू द्वारा कविता के संदर्भ में पढ़े गए। तथा अंतिम आलेख शरद कोकास द्वारा विश्वरंजन के गद्य लेखन के संदर्भ में पढे ग़ये।विशेष आमंत्रित वक्ताओं ने भी विश्वरंजन की कविताओं के संदर्भ में अपने-अपने विचार व्यक्त किए। इनमें डॉ. अनिता करडेकर, विनोद साव, अशोक सिंघई, सियाराम शर्मा और रवि श्रीवास्तव ने काफी विस्तार से कविता के अर्थ को खोलने का प्रयास किया।
मुख्य अतिथि डॉ। प्रभात त्रिपाठी ने कहा कि विश्वरंजन ब्रह्माण्डीय चेतना के कवि हैं। उनका अनुराग जगत बहुस्तरीय है। जीवन और मनुष्यता के प्रति उत्कट लगाव ने उसके कविपन को संजोया, संवारा है। उनकी प्रेम कविता एक एैवीम नहीं है। उन्होंने अपने प्रेमानुभव को मूल्यदृष्टि में तब्दील किया है। डॉ। त्रिपाठी ने हिन्दी कविता पर हो रहे लोक लुभावन वासी बहस पर चिन्ता चाहिर की। उन्होंने उपस्थित पाठकों के समक्ष यह प्रश् उठाया कि कविता में समय किस तरह से रुपांतरित होता है? कवि का समय और दूसरे अनुशासनों में व्यक्त समय का अर्थ समान है अथवा भिन्न? यद्यपि उन्होंने गोष्ठी की बहस को काफी जीवंत माना। अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए राम परिहार ने कहा कि पिछले पचास वर्षों से हिन्दी में छोटा-बड़ा कवि बनाने का खेल चल रहा है। विश्वरंजन की कविता विकल्प प्रस्तुत करती है। विश्वरंजन ने एक संवेदनशील आम भारतीय नागरिक की हैसियत से कविता लिखी है। उन्होंने नये सिरे से शब्द सत्ता की प्रतिष्ठा की है। कार्यक्रम के अंत में आभार प्रदर्शन वरिष्ठ कवि एवं गीतकार मुकुंद कौशल ने किया। कार्यक्रम संचालन वरिष्ठ कवि नासिर अहमद सिकंदर और रजनीश उमरे ने किया।
उक्त अवसर पर किताब के संपादक जयप्रकाश मानस, एच एस ठाकुर, तपेश जैन, रामशरण टंडन आदि कई साहित्यकार एवं पत्रकार उपस्थित थे ।
प्रस्तुत: भागवत प्रसाद

2/07/2009

सृजनगाथा का नया अंक

सृजनगाथा के नये अंक में पढ़िये

कविता
◙ स्मरणीय - मुकुटधर पांडेय, डॉ. केदारनाथ सिंह
◙ कवि - मुमताज, स्व. विनय दुबे, विश्वरंजन, लाल्टू, नरेश अग्रवाल, कृष्णकान्त निलोसे, प्रभा मुजुमदार
प्रवासी कवि - अंजना संधीर
माह का कवि - संजीव बख्शी

भाषांतर
जापानी हाइकू का भावानुवाद - नलिनीकांत
रेत - हरजीत अटवाल -पंजाबी उपन्यास (भाग 15)

छंद
◙ माह के छंदकार - रंजीत भट्टाचार्य
◙ गीत - सुरेश कुमार पंडा, मदन मोहन शर्मा, अशोक शर्मा,
कुँअर बेचैन, शारदा कृष्ण
◙ ग़ज़ल - सजीवन मयंक, राम मेश्राम, चन्द्रसेन विराट, विज्ञान व्रत
◙ दोहे - रामानुज त्रिपाठी
◙ अजयगाथा - दंतेवाड़ा

हस्ताक्षर
डॉ. उदय तिवारी : भाषा वैज्ञानिक - प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन
जब मैं इलाहाबाद में शोध कार्य कर रहा था, उसी अवधि में दिसम्बर 1961 में तिवारी जी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जबलपुर वहाँ के विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष के पद पर हिन्दी विभाग स्थापित करने हेतु चले गए थे। आगरा में नियुक्त होने के बाद वहाँ के कार्यभार के कारण मैं इतना व्यस्त हो गया कि डॉ. तिवारी जी को पत्र न लिख सका। जब मुझे डॉ. तिवारी जी का पत्र मिला जिसमें उन्होंने लिखा कि ``आगरे से तुमने कोई पत्र नहीं भेजा और न ही अपना समाचार ही लिखा तो इसे पढ़कर अपनी गलती का अहसास हुआ।
फक्कड़ कवि थे निराला - कृष्ण कुमार यादव

व्याकरण
◙ एक शब्द - आग - गंगाप्रसाद बरसैंया

विचार-वीथी
लोकतंत्र में राजनेता होना चाहिये - प्रो. महावीर सरन जैन
जनतांत्रिक चेतना : परिवर्तन का द्योतक - नन्दलाल भारती

हिन्दी विश्व
हिंदी पर हमला - रघु ठाकुर

प्रसंग-वश
आतंकवाद और महिलाएँ - डॉ. सुनीता ठाकुर
दूसरों पर आसानी से यकीन न करना, अपनी इज़्ज़त के लिए मर मिटना, परपुरुष की सहायता तो क्या उससे बात तक न करना जैसी बहुत से हिदायतें हम औरतों ने अपने पुरखों से सीखी होती हैं। ये हिदायतें हमें सिर्फ़ अपने परिवार के सदस्यों तक ही सीमित रहकर जीना सिखाती है। इससे अलग तौर तरीक़े अपनाने वाली महिलाओं को क्या-क्या सुनना और झेलना पड़ता है यह हम सभी औरतें, औरत होने के नाते अच्छी तरह से जानती हैं। यही कारण था कि बहुत-सी औरतें अपनी सरज़मीं पर ही मौजूद सहायताओं को नकार कर एक अनजान शहर में भटकने को तैयार हो जाती हैं। एक ज़मीन से उखड़ती हैं और दूसरी पर उपज नहीं पातीं।

मूल्याँकन
नाटककार और रंगमंच - मोहन राकेश
रंगमंच की पूरी प्रयोग-प्रक्रिया में नाटककार केवल एक अभ्यागत, सम्मानित दर्शक या बाहर की इकाई बना रहे, यह स्थिति मुझे स्वीकार्य नहीं लगती। न ही यह कि नाटककार की प्रयोगशीलता उसकी अपनी अलग चारदीवारी तक सीमित रहे और क्रियात्सक रंगमंच की प्रयोगशीलता उससे दूर अपनी अलग चारदीवारी तक । इन दोनों को एक धरातल पर लाने के लिए अपेक्षित है कि नाटककार पूरी रंग-प्रक्रिया का एक अनिवार्य अंग बन सके।
हिंदी साहित्य-पत्र-पत्रिका की प्रांसगिकता - डॉ. वीरेन्द्र यादव

शेष-विशेष
राजनीति....
ओबामा : आशाएँ व चुनौतियाँ - तनवीर जाफ़री
ओबामा के शांति प्रयासों के बावजूद अफ़ग़ान-पाक सीमा पर निरंतर बगड़ते हालात तथा पूरे पाकिस्तान में चरमपंथियों के फैलते प्रभाव ने अमेरिका की चिंताएँ काफ़ी बढ़ा दी हैं। कई प्रमुख अमेरिकी कूटनीतिज्ञों को इस बात का संदेह है कि बावजूद इसके कि 9/11 के बाद अब तक अमेरिका पर कोई चरमपंथी हमला नहीं हुआ है। परन्तु इस बात की प्रबल संभावना है कि चरमपंथियों द्वारा अगले हमले की योजना पाकिस्तान में बनाई जा सकती है।
रिपोर्ताज....
यहाँ होती है सृष्टिकारों की सृष्टि - उमाशंकर मिश्र
शोध....
हिंदी लघुकथा का विकास - डॉ. अंजलि शर्मा
इन दिनों....
वैश्विक प्रयासों से संभव, आतंकवाद से छुटकारा - तनवीर जाफ़री

कहानी
मैंगोलाइट - तरुण भटनागर
ठीक है, ग्लोब में नहीं है । मास्टर कहता कि, एटलस में नहीं है, नहीं है, दुनिया जहान के नक्शों में । नहीं है देश-दुनिया में । चर्चा में भी नहीं है । पेपरों में, रोज़ के रेडियो के समाचार में भी नहीं है । संयुक्त राष्ट्र संघ की सूची में नहीं है, नहीं है, ओलंपिक के झण्डाबरदार खिलाडियों की परेड में । नहीं है, डाक टिकटों में । कि तिब्बत की कोई मुद्रा नहीं, नहीं उसका कोई झण्डा । कहीं नहीं, किसी देश में नहीं तिब्बत का कोई राजदूत, कोई एम्बेसेडर । संसार में कहीं नहीं तिब्बत का कोई दफ्तर.......... ।
हार ले आना ! - योगन्द्र सिंह राठौर
गुजराती कहानी - जूही - लता हिराणी

संस्मरण
परचून की दुकान से - सुरेश पंडा
एक बार ऐसा हुआ कि शुक्ल जी ने सूचना भिजवायी कि बाबा नागार्जुन आये हैं । जूटमिल धर्मशाला में ठहरे हैं। ज़ल्द पहुँचो । हम राधेश्याम गोयल़, श्रीधर आचार्य शील़, मुस्तफा आदि तीन चार लोग पहुँच गये । वहाँ पर शुक्ल जी शर्मा जी आदि बरिष्ठ लोग बाबा नागार्जुन के साथ बैठे चर्चा में मशगुल थे । देश के इतने बरिष्ठ साहित्यकार को सशरीर समक्ष देखकर हम सभी को संकोच हो रहा था । हम सब भी किनारे एक तरफ़ बैठ गये ।

लघुकथा
दूरअंदेश - मोहम्मद कय्युम
मजबूरी - राजमल डांगी
पागल प्रेमी - श्याम कुमार पोकरा


लोक-आलोक
मोहरी - छत्तीसगढ़ की अनमोल धरोहर - आसिफ़ इकबाल
आदि से आधुनिक होने के सफर में मनुष्य के संग-संग वाद्यों में भी अनगिनत परिवर्तन हुए हैं, किन्तु आज भी ऐसे अनेक श्रेष्ठ वाद्य बचे हैं, जिन्हें परिवर्तन का तीव्र प्रवाह भी परिवर्तित नहीं कर पाया है। ऐसे ही वाद्यों को लोकवाद्य की संज्ञा दी जाती है। इनमें छत्तीसगढ़ का दुर्लभ लोकवाद्य ‘मोहरी’ है, जो मांगलिक प्रसंगों पर बजाया जाने वाला पारम्परिक वाद्य है। इस लोकवाद्य को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने में राजनांदगांव जिले के पंचराम देवदास का स्थान अग्रक्रम में बना हुआ है।

व्यंग्य
स्वागतम् ! सुस्वागतम् !! - अशोक गौतम

पुस्तकायन
जाग एक बार - श्री बबन प्रसाद मिश्र
घर-बेघर - कमल कुमार
स्त्री संशब्द : विवेक और विभ्रम-कमल कुमार व मुक्ता

ग्रंथालय में (ऑनलाइन किताबें)
लौटते हुए परिंदे(कहानी संग्रह) - सुरेश तिवारी
इंद्रधनुष (कविता संग्रह) - डॉ. महेन्द्र भटनागर
प्रिय कविताएँ (कविता संग्रह) - भगत सिंह सोनी

हलचल
(देश विदेश की सांस्कृतिक खबरें)
'लेखक और प्रतिबध्दता' और 'मॉस्को की डायरी' का विमोचन
पुस्तक संकट में नहीं है
साहित्यकार संदर्भ कोश का प्रकाशन
महेन्द्र कपूर को गान सम्राज्ञी लता मंगेशकर पुरस्कार
जनवादी नाटककार राजेश कुमार को मोहन राकेश सम्मान
प्रख्यात कवि डा. केदारनाथ सिंह को भारत-भारती
हिन्दी के प्रचार-प्रसार में मीडिया की भूमिका पर संगोष्ठी

12/12/2008

अ.भा. पुरस्कारों हेतु रचनाकारों की प्रविष्टियाँ आमंत्रित

छत्तीसगढ राज्य की बहुआयामी सांस्कृतिक संस्था “सृजन-सम्मान ” की प्रादेशिक कार्यालय द्वारा साहित्य, संस्कृति, भाषा एवं शिक्षा की विभिन्न 28 विधाओं में प्रतिष्ठित रचनाकारों को पिछले 7 वर्षों से प्रतिवर्ष दिये जाने वाले सम्मान हेतु प्रविष्टियाँ आमंत्रित की गई हैं । प्रविष्टि भेजने की अंतिम तिथि 15 फरवरी 2008 है।

छत्तीसगढ राज्य के गौरव पुरुषों की स्मृति में दिये जाने वाले यह सम्मान प्रतिवर्ष आयोजित 2 दिवसीय अखिल भारतीय साहित्य महोत्सव में प्रदान किये जाते हैं । संस्था द्वारा सम्मान स्वरुप रचनाकारों को 21, 11, 5, हजार नगद, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह, शॉल, श्रीफल एवं 500 रुपयों की कृतियाँ प्रदान की जाती हैं ।

पुरस्कारों का विवरण निम्नानुसार है –
01. हिंदी गौरव सम्मान – हिंदी वेबसाइट संपादक/ब्लॉगर
02. पद्मश्री मुकुटधर पांडेय सम्मान – लघुपत्रिका संपादक
03. पद्मभूषण झावरमल्ल शर्मा सम्मान – पत्रकारिता हेतु समर्पित
04. महाराज चक्रधर सम्मान – ललित निबंध
05. मंहत बिसाहू दास सम्मान – कबीर साहित्य
06. पं. गोपाल मिश्र सम्मान- कविता
07. नारायण लाल परमार सम्मान - नवगीत/ गीत/ बालसाहित्य
08. डॉ.बल्देव प्रसाद मिश्र सम्मान - कहानी
09. माधव राव सप्रे सम्मान – लघुकथा
10. दादा अवधूत सम्मान – शैक्षिक लेखन
11. प्रमोद वर्मा सम्मान - हिंदी आलोचना
12. रामचंद्र देशमुख सम्मान – लोक लेखन/ प्रस्तुति
13. प्रवासी सम्मान - विदेश में रहकर हिन्दी सेवा
14. समरथ गंवईहा सम्मान – व्यंग्य लेखन
15. विश्वम्भर नाथ सम्मान – छांदस विधा
16. मावजी चावडा सम्मान – बाल साहित्य/समीक्षा/ शोध/पत्रकारिता
17. मुस्तफा हुसैन सम्मान – ग़ज़ल लेखन
18. राजकुमारी पटनायक सम्मान - भाषा एवं लोकभाषा के विशेषज्ञ
19. हरि ठाकुर सम्मान- समग्र व्यक्तित्व एवं कृतित्व
20. अनुवाद सम्मान- अनुवाद के क्षेत्र में विशेष - कार्य
21. अहिन्दीभाषी सम्मान – ग़ैरहिंदी भाषी द्वारा हिंदी सेवा
22. प्रथम कृति सम्मान – पहली प्रकाशित कृति
23. कृति सम्मान - प्रकाशित पांडुलिपि
24. महेश तिवारी सम्मान – वैचारिक लेखन
25. सृजनश्री – प्रकाशित कृति

नियमः-
१.प्रथम कृति सम्मान के अंतर्गत चयनित अप्रकाशित पांडुलिपि को प्रकाशित कर 100 प्रतियाँ रचनाकार को प्रदान की जायेगी । इसमें इस वर्ष आलोचना/समीक्षा विधा पर ही विचार किया जायेगा ।

२-कृति सम्मान हेतु किसी वरिष्ठ रचनाकार की प्रकाशित या अप्रकाशित किन्तु अत्यंत महत्वपूर्ण पांडुलिपि को चयनोपरांत प्रकाशित की जायेगी, जिसकी 100 प्रतियाँ रचनाकार को प्रदान की जायेगी। इसमें इस वर्ष आलोचना विधा पर ही विचार किया जायेगा ।

३-हिन्दी गौरव सम्मान हेतु अपने बेबसाईट या ब्लाग का विस्तृत विवरण, तकनीकी पक्ष, प्रबंधन, पता, ई-मेल आदि हमारे पते पर भेजना होगा ।

४- प्रविष्टि में रचनाकार स्वयं या अनुशंसा करने वाले को रचनाकार का बायोडाटा, 1 छायाचित्र, कृति की दो प्रतियाँ अनिवार्यतः भेजनी होगी ।

5-प्रविष्टि वाले डाक में सम्मान का नाम एवं वर्ष – 2008 लिखा होना अपेक्षित रहेगा ।
६- उच्च स्तरीय चयन मंडल का निर्णय सर्वमान्य होगा ।

प्रविष्टि हेतु संपर्कः-
जयप्रकाश मानस
संयोजक, चयन समिति,
सृजन – सम्मान,
छत्तीसगढ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय परिसर,
पेंशनवाडा, रायपुर, छत्तीसगढ, पिन-492001,
मोबाइल नं. 94241-82664
ई-मेल – srijan2samman@gmail.com

11/29/2008

इधर देश है

इधर
दहशतगर्दी थे ही नहीं
फिर भी उभर रहे थे जगह-जगह खूनी पंजे
इधर
न गोली चल रही थी न ग्रेनेड
फिर भी हताहत हो रहे थे लोग
इधर
ख़ौफ़ का कोई भी संकेत नहीं था
फिर भी सारे लोग सकते में थे

इधर
सबकुछ था शांत निःस्तब्ध
फिर भी सभी तैयार हो रहे थे युद्ध के लिए

उधर मुंबई है
इधर देश है