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11/11/2011

साहित्यिक ब्लॉगर्स हेतु अ. भा. रचना शिविर के लिए प्रविष्टियाँ आमंत्रित


पद्मश्री मुकुटधर पांडेय स्मृति रचना शिविर रायगढ़ में

रायगढ़ । रचनाकारों की संस्था, प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, रायपुर, छत्तीसगढ़ द्वारा इंटरनेट पर सक्रिय तथा युवा ब्लॉगरों (कवियों/लेखकों/निबंधकारों/कथाकारों/लघुकथाकारों/गीतकारों/ग़ज़लकारों/ बाल साहित्यकारों) को देश के विशिष्ट और वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा साहित्य के मूलभूत सिद्धातों, विधागत विशेषताओं, परंपरा, विकास और समकालीन प्रवृत्तियों से परिचित कराने, उनमें संवेदना और अभिव्यक्ति कौशल को विकसित करने, प्रजातांत्रिक और शाश्वत जीवन मूल्यों के प्रति उन्मुखीकरण तथा स्थापित लेखक तथा उनके रचनाधर्मिता से तादात्मय स्थापित कराने के लिए तृतीय अ.भा.त्रिदिवसीय/रचना शिविर (7, 8, 9 जनवरी, 2012) सृजनात्मक लेखन कार्यशाला का आयोजन छायावाद के जनक कवि पद्मश्री मुकुटधर पांडेय और कत्थक सम्राट राजा चक्रधर की नगरी रायगढ़, (अग्रोहा भवन, गौरीशंकर मंदिर के पास), छत्तीसगढ़ में किया जा रहा है जिसमें देश के महत्वपूर्ण रचनाकार और विशेषज्ञ मार्गदर्शन हेतु उपस्थित रहेंगे । इसके पूर्व मुक्तिबोध स्मृति रचना शिविर और श्रीकांत वर्मा स्मृति रचना शिविर का सफल आयोजन क्रमशः राजनांदगांव और कोरबा में किया जा चुका है । इस तृतीय अखिल भारतीय स्तर के कार्यशाला में देश के 150 युवा रचनाकारों तथा उभरते हुए रचनाकारों को सम्मिलित किया जायेगा ।


संक्षिप्त ब्यौरा निम्नानुसार है-
1. प्रतिभागियों को 25 दिसंबर, 2011 तक अनिवार्यतः निःशुल्क पंजीयन कराना होगा ।
2.प्रतिभागियों का अंतिम चयन पंजीकरण में प्राप्त आवेदन पत्र के क्रम से होगा ।
पंजीकृत एवं कार्यशाला में सम्मिलित किये जाने वाले रचनाकारों का नाम ई-मेल से सूचित किया जायेगा ।
3. प्रतिभागियों की आयु 18 वर्ष से कम एवं 45 वर्ष से अधिक ना हो ।
4. प्रतिभागियों में 20 स्थान हिन्दी के स्तरीय ब्लॉगर के लिए सुरक्षित रखा गया है ।
5. प्रतिभागियों को संस्थान/कार्यशाला में एक स्वयंसेवी रचनाकार की भाँति, समय-सारिणी के अनुसार अनुशासनबद्ध होकर कार्यशाला में भाग लेना अनिवार्य होगा ।
6. प्रतिभागी रचनाकारों को प्रतिदिन दिये गये विषय पर लेखन-अभ्यास करना होगा जिसमें वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा मार्गदर्शन दिया जायेगा ।
7. कार्यशाला के सभी निर्धारित नियमों का आवश्यक रूप से पालन करना होगा ।
8. प्रतिभागियों को सैद्धांतिक विषयों के प्रत्येक सत्र में भाग लेना अनिवार्य होगा । अपनी वांछित विधा विशेष के सत्र में वे अपनी इच्छानुसार भाग ले सकते हैं । प्रतिभागियों के आवास, भोजन, स्वल्पाहार, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह, संदर्भ सामग्री की व्यवस्था संस्थान द्वारा की जायेगी ।
9.प्रतिभागियों को अपना यात्रा-व्यय स्वयं वहन करना होगा ।
10. प्रतिभागियों को 6 जनवरी, 2012 शाम 6 बजे के पूर्व कार्यशाला स्थल – अग्रोहा भवन, गौरी शंकर मंदिर के पास, रायगढ़, छत्तीसगढ़ में अनिवार्यतः उपस्थित होना होगा ।


पंजीयन हेतु आवेदन-पत्र नमूना
01.नाम -
02. जन्म तिथि व स्थान (हायर सेंकेंडरी सर्टिफिकेट के अनुसार) -
03. शैक्षणिक योग्यता –
04. वर्तमान व्यवसाय -
05. लेखन की केंद्रीय विधा -
05. प्रकाशन (पत्र-पत्रिकाओं के नाम) –
06. प्रकाशित कृति का नाम –
07. ब्लॉग्स का यूआरएल – (यदि हो तो)
08. अन्य विवरण ( संक्षिप्त में लिखें)
09. पत्र-व्यवहार का संपूर्ण पता -
10. मो. नं.
11. ई-मेल –
10. हस्ताक्षर

संपर्क सूत्र
जयप्रकाश मानस
कार्यकारी निदेशक
प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, छत्तीसगढ़
एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा, रायपुर, छत्तीसगढ – 492001
ई-मेल-pandulipipatrika@gmail.com
मो.-94241-82664

10/28/2010

साहित्यिक ब्लॉगरों के लिए रचना शिविर


रायपुर । रचनाकारों की संस्था, प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, रायपुर, छत्तीसगढ़ द्वारा देश के उभरते हुए कवियों/लेखकों/निबंधकारों/कथाकारों/लघुकथाकारों/ साहित्यिक ब्लॉगरों को देश के विशिष्ट और वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा साहित्य के मूलभूत सिद्धातों, विधागत विशेषताओं, परंपरा, विकास और समकालीन प्रवृत्तियों से परिचित कराने, उनमें संवेदना और अभिव्यक्ति कौशल को विकसित करने, प्रजातांत्रिक और शाश्वत जीवन मूल्यों के प्रति उन्मुखीकरण तथा स्थापित लेखक तथा उनके रचनाधर्मिता से तादात्मय स्थापित कराने के लिए अ.भा.त्रिदिवसीय/रचना शिविर (17 18, 19, 20 दिसंबर, 2010) सृजनात्मक लेखन कार्यशाला का आयोजन विश्वकवि गजानन माधव मुक्तिबोध की कार्यस्थली (त्रिवेणी परिसर), राजनांदगाँव में किया जा रहा है । इस अखिल भारतीय स्तर के कार्यशाला में देश के 75 नवोदित/युवा रचनाकारों को सम्मिलित किया जायेगा । कार्यशाला में रचनाकारों की रचनाओं का परीक्षण, मार्गदर्शन सहित उन्हें सैद्धांतिक जानकारी दी जायेगी । प्रतिभागी रचनाकार अपनी रचनाओं का पाठ भी देश के प्रख्यात रचनाकारों, आलोचकों, कहानीकारों, कवियों, शिक्षाविदों, संपादकों के मध्य करेंगे ।

कार्यशाला में व्याख्यान-विमर्श के मुख्य विषय

दिनाँक 17 अक्टूबर, 2010

उद्घाटन, विमोचन

दिनाँक 18 दिसंबर, 2010

रचना की दुनिया – दुनिया की रचना

रचना में यथार्थ और कल्पना

रचना और प्रजातंत्र

रचना और भारतीयता
रचना : महिला, दलित और आदिवासी
रचना और मनुष्यता के नये संकट

दिनाँक 19 दिसंबर, 2010

रचना और संप्रेषण
शब्द, समय और संवेदना
कविता की अद्यतन यात्रा
कविता - छंद और लय

कैसा गीत कैसे पाठक ?
कहानी-विषयवस्तु, भाषा, शिल्प

दिनाँक 20 दिसंबर, 2010

कहानी की पहचान
लघुकथा क्या ? लघुकथा क्या नहीं ?
आलोचना क्यों, आलोचना कैसी?
ललित निबंध : कितना ललित-कितना निबंध)

संक्षिप्त ब्यौरा निम्नानुसार है-

01. प्रतिभागियों को 20 नवंबर, 2010 तक अनिवार्यतः निःशुल्क पंजीयन कराना होगा । पंजीयन फ़ार्म संलग्न है ।

02. प्रतिभागियों का अंतिम चयन पंजीकरण में प्राप्त आवेदन पत्र के क्रम से होगा ।
पंजीकृत एवं कार्यशाला में सम्मिलित किये जाने वाले रचनाकारों का नाम ई-मेल से सूचित किया जायेगा ।

03. प्रतिभागियों की आयु 18 वर्ष से कम एवं 45 वर्ष से अधिक ना हो ।

04. प्रतिभागियों में 5 स्थान हिन्दी के स्तरीय ब्लॉगर के लिए सुरक्षित रखा गया है ।

05. प्रतिभागियों को संस्थान/कार्यशाला में एक स्वयंसेवी रचनाकार की भाँति, समय-सारिणी के अनुसार अनुशासनबद्ध होकर कार्यशाला में भाग लेना अनिवार्य होगा ।

06. प्रतिभागी रचनाकारों को प्रतिदिन दिये गये विषय पर लेखन-अभ्यास करना होगा जिसमें देश के वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा मार्गदर्शन दिया जायेगा ।

07. कार्यशाला के सभी निर्धारित नियमों का आवश्यक रूप से पालन करना होगा ।

08. प्रतिभागियों को सैद्धांतिक विषयों के प्रत्येक सत्र में भाग लेना अनिवार्य होगा । अपनी वांछित विधा विशेष के सत्र में वे अपनी इच्छानुसार भाग ले सकते हैं । प्रतिभागियों के आवास, भोजन, स्वल्पाहार, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह की व्यवस्था संस्थान द्वारा किया जायेगा ।

09. प्रतिभागियों को कार्यशाला में संदर्भ सामग्री दी जायेगी ।

10. प्रतिभागियों को अपना यात्रा-व्यय स्वयं वहन करना होगा ।

11. प्रतिभागियों को 17 दिसंबर, 2010 दोपहर 3 बजे के पूर्व कार्यशाला स्थल –त्रिवेणी परिसर/सिंधु सदन, जीई रोड, राजनांदगाँव, छत्तीसगढ़ में अनिवार्यतः उपस्थित होना होगा । पंजीकृत/चयनित प्रतिभागी लेखकों को कार्यशाला स्थल (होटल) की जानकारी, संपर्क सूत्र आदि की सम्यक जानकारी पंजीयन पश्चात दी जायेगी ।



संपर्क सूत्र
जयप्रकाश मानस
कार्यकारी निदेशक
प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, छत्तीसगढ़
एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा, रायपुर, छत्तीसगढ – 492001
ई-मेल-pandulipipatrika@gmail.com
मो.-94241-82664


पंजीयन हेतु आवेदनपत्र नमूना

01. नाम -
02.
जन्म तिथि व स्थान (हायर सेंकेंडरी सर्टिफिकेट के अनुसार) -
03.
शैक्षणिक योग्यता –
04.
वर्तमान व्यवसाय -
05.
प्रकाशन (पत्र-पत्रिकाओं के नाम) –
06.
प्रकाशित कृति का नाम –
07.
ब्लॉग्स का यूआरएल – (यदि हो तो)
08.
अन्य विवरण ( संक्षिप्त में लिखें)
09.
पत्र-व्यवहार का संपूर्ण पता (ई-मेल सहित) –

हस्ताक्षर

7/18/2010

प्रमोद वर्मा सम्मान, मधुरेश, ज्योतिष जोशी और डॉ. शोभाकांत झा को

रायपुर । द्वितीय प्रमोद वर्मा स्मृति आलोचना सम्मान से प्रतिष्ठित कथाआलोचक मधुरेश और युवा आलोचक ज्योतिष जोशी को सम्मानित किया जायेगा । इसी तरह राज्य स्तरीय प्रमोद वर्मा रचना सम्मान से वरिष्ठ ललित निबंधकार और लेखक डॉ. शोभाकांत झा को अलंकृत किया जायेगा । यह सम्मान उन्हें 31 जुलाई, प्रेमचंद जयंती के दिन रायपुर, छत्तीसगढ़ में आयोजित द्वितीय अखिल भारतीय प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह में प्रदान किया जायेगा । उक्त अवसर पर शताब्दी पुरुष द्वय अज्ञेय और शमशेर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का भी आयोजन किया गया है । यह सम्मान हिन्दी आलोचना की परंपरा में मौलिक और प्रभावशाली आलोचना दृष्टि को प्रोत्साहित करने के लिए 2 आलोचकों को दिया जाता है। संस्थान द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर देश के दो आलोचकों को सम्मान स्वरूप क्रमश- 21 एवं 11 हज़ार रुपये नगद, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह एवं प्रमोद वर्मा के समग्र प्रदान कर सम्मानित किया जाता है । इसमें एक सम्मान युवा आलोचक के लिए निर्धारित है ।

चयसमिति के संयोजक जयप्रकाश मानस ने अपनी विज्ञप्ति में बताया है कि इस उच्च स्तरीय निर्णायक मंडल के श्री केदार नाथ सिंह, डॉ. धनंजय वर्मा, डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, विजय बहादुर सिंह और विश्वरंजन ने एकमत से वर्ष 2010 के लिए दोनों आलोचकों का चयन किया है । राज्य स्तरीय रचना सम्मान के निर्णायकों में डॉ. सुशील त्रिवेदी, गिरीश पंकज, डॉ. बलदेव, विश्वरंजन और जयप्रकाश मानस (संयोजक) ज्ञातव्य हो कि मुक्तिबोध, हरिशंकर परसाई और श्रीकांत वर्मा के समकालीन आलोचक, कवि, नाटककार और शिक्षाविद् प्रमोद वर्मा की स्मृति में गठित संस्थान द्वारा स्थापित प्रथम आलोचना सम्मान से गत वर्ष श्रीभगवान सिंह और कृष्ण मोहन को नवाज़ा गया था।

बरेली निवासी मधुरेश वरिष्ठ और पूर्णकालिक कथाआलोचक हैं जिन्होंने पिछले 35 वर्षों से हिन्दी कहानी और उपन्यासों पर उल्लेखनीय कार्य किया है । उनकी प्रमुख चर्चित-प्रशंसित कृतियाँ है - आज की कहानी : विचार और प्रतिक्रिया, सिलसिला : समकालीन कहानी की पहचान', हिन्दी आलोचना का विकास, हिन्दी कहानी का विकास, हिन्दी उपन्यास का विकास, मैला आँचल का महत्व, नयी कहानी : पुनर्विचार, नयी कहानी : पुनर्विचार में आंदोलन और पृष्ठभूमि, कहानीकार जैनेन्द्र कुमार : पुनर्विचार, उपन्यास का विकास और हिन्दी उपन्यास : सार्थक की पहचान, देवकीनंदन खत्री (मोनोग्राफ), रांगेय राघव (मोनोग्राफ), यशपाल (मोनोग्राफ), यशपाल : रचनात्मक पुनर्वास की एक कोशिश , अश्क के पत्र, फणीश्वरनाथ रेणु और मार्क्सवादी आलोचना आद

डॉ. ज्योतिष जोषी युवा पीढ़ी में पिछले डेढ़ दशक से अपनी मौलिक साहित्य, कला और संस्कृति आलोचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करते हुए अपनी प्रखर उपस्थिति से सबका ध्यान आकृष्ट किया है । मूलतः गोपालगंज बिहार निवासी श्री जोशी की प्रमुख कृतियाँ हैं – आलोचना की छवियाँ, विमर्श और विवेचना, जैनेन्द्र और नैतिकता, साहित्यिक पत्रकारिता, पुरखों का पक्ष, उपन्यास की समकालीनता, नैमिचंद जैन, कृति आकृति, रूपंकर, भारतीय कला के हस्ताक्षर, सोनबरसा, संस्कृति विचार, सम्यक, जैनेन्द्र संचयिता, विधा की उपलब्धिःत्यागपत्र व भारतीय कला चिंतन (संपादन)।

1/31/2010

शब्दों की सत्ता का क्षरण रोकें - पंत



माखनलाल जी पुण्यतिथि पर पत्रकारिता विश्वविद्यालय में व्याख्यान


भोपाल, 30 जनवरी। शब्द की सत्ता से उठता भरोसा सबसे बड़ा खतरा है। इसे बचाने की जरूरत है। ये विचार माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में पं. माखनलाल चतुर्वेदी की पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित स्मृति व्याख्यान में अध्यक्षीय भाषण देते हुए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के मंत्री-संचालक कैलाशचंद्र पंत ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि माखनलाल जी एक साथ प्रखर वक्ता, कवि, पत्रकार और सेनानी रूपों में नजर आते हैं। उनका हर रूप आज भी प्रेरित करता है। वे सही मायनों में भारतीयता का जीवंत प्रतीक हैं और मानवीय दृष्टि से पूरी मानवता को संदेश देते हैं।
कार्यक्रम के मुख्यवक्ता कवि-कथाकार ध्रुव शुक्ल ने कहा कि हमारा समय अभिव्यक्ति की मुश्किलों का समय है। आज के समय में किस बात से कौन मर्माहत हो जाए कहा नहीं जा सकता। देश में अजीब से हालात हैं। उन्होंने कहा कि वे बौद्धिक नहीं अंर्तमन की भाषा लिखते थे। वे सही मायनों में एक भारतीय आत्मा थे। उनकी हिंदी चेतना और भारतीय मन आज के समय की चुनौतियों का सामना करने में समर्थ है।


मुख्यअतिथि वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि माखनलाल जी मूल्यों की परंपरा स्थापित की और उसपर चलकर दिखाया। हिंदी के लिए उनका संघर्ष हमें प्रेरित करता है। वे समय के पार देखने वाले चिंतक और विचारक थे। भारतीय पत्रकारिता के सामने जो चुनौतियों हैं उसका भान उन्हें बहुत पहले हो गया था। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो। बृजकिशोर कुठियाला ने कहा कि आज का दिन संत रविदास, महात्मा गांधी और माखनलाल जी से जुड़ा है तीनों बहुत बड़े संचारक के रूप में सामने आते हैं। अपनी संचार प्रक्रिया से इन तीनों महापुरूषों ने समाज में चेतना पैदा की। मानवता की सेवा के लिए तीनों ने अपनी जिंदगी लगाई। उन्होंने कहा कि मीडिया को जनधर्मी बने बिना सार्थकता नहीं मिल सकती। पश्चिम का मीडिया आतंकी हमलों के बाद अपने को सुधारता दिखा है हमें भी उसे उदाहरण की तरह लेते हुए बदलाव लाने की जरूरत है।

कार्यक्रम का संचालन जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी और आभार प्रर्दशन कुलसचिव प्रकाश साकल्ले ने किया। इस अवसर पर सर्वश्री विजयदत्त श्रीधर, रेक्टर जेआर झणाणे, डा।श्रीकांत सिंह, चैतन्य पुरूषोत्तम अग्रवाल, पुष्पेंद्रपाल सिंह, डा. पवित्र श्रीवास्तव, पत्रकार मधुकर द्विवेदी, रामभुवन सिंह कुशवाह, सरमन नगेले, युगेश शर्मा, सुरेश शर्मा, अनिल सौमित्र सहित अनेक साहित्यकार, पत्रकार एवं विद्यार्थी मौजूद थे।


( संजय द्विवेदी)

1/22/2010

डॉ.अभिज्ञात को अम्बडेकर उत्कृष्ट पत्रकारिता सम्मान

कोलकाताः रविवार की देर रात तक आयोजित एक भव्य समारोह में विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान के लिए अम्बेडकर सम्मान प्रदान किये गये। डॉ.अभिज्ञात को उत्कृष्ट पत्रकारिता सम्मान आरके एचआईवी एड्स रिसर्च एंड केयर सेंटर के चेयरमैन डॉ.धर्मेन्द्र कुमार ने प्रदान किया। दो दशकों से पत्रकारिता कर रहे डॉ.अभिज्ञात सम्प्रति सन्मार्ग में वरिष्ठ उप-सम्पादक हैं। वे साहित्य में भी सक्रिय हैं और छह कविता संग्रह तथा दो उपन्यास प्रकाशित हुए हैं। साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें पांच पुरस्कार-सम्मान मिले हैं। यह समारोह उपनगर टीटागढ़ में आयोजित था।

महिलाओं के विकास में योगदान के लिए डॉ.सुरंजना चौधरी, ग्लोबल पर्सनालिटी आफ द ईयर रमेश प्रसाद हेला, औद्योगिक उपलब्धि सम्मान लोकनाथ गुप्ता, अम्बेडकर गुरुद्रोण सम्मान नृत्यानंद जी महाराज, सामाजिक जागरुकता सम्मान डॉ.संतोष गिरि, मैन आफ द ईयर सम्मान आत्माराम अग्रवाल, उभरता मीडिया उद्योग सम्मान विजन खबरा खबर (चैनल विजन) और यूथ आइको आफ द ईयर अवार्ड शिव प्रसाद गोसार्इं को प्रदान किया गया।

कार्यक्रम डॉ.भीमराव अम्बेडकर शिक्षा निकेतन और आरके एचआईवी एड्स रिसर्च एंड केयर सेंटर की ओर से आयोजित था। इस अवसर पर टीटागढ़ डॉ.भीमराव अम्बेडकर शिक्षा निकेतन संस्था का उद्घाटन, डॉ.अम्बेडकर और संस्था के संस्थापक स्व.मक्खनलाल की मूर्ति का अनावरण उद्योगपति आत्माराम अग्रवाल ने किया। सांस्कृतिक कार्यक्रमों का लुत्फ उपस्थित श्रोताओं ने उठाया। आराधना सिंह ने भोजपुरी गीत पेश किये।

हिंदी आशुलिपि एक धरोहर है - राजकुमार नरूला


राजभाषा विभाग भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा संयंत्र कार्मिकों के लिए प्रथम बार हिंदी आशुलिपि प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारम्भ दिनांक 4-11-2009 को मानव संसाधन विकास केन्द्र के कक्ष 125 में श्री राजकुमार नरूला महाप्रबंधक (कार्मिक) के मुख्य आतिथ्य एवं श्री दिलीप नंनौरे उप महाप्रबंधक (संपर्क व प्रशासन) की अध्यक्षता तथा श्री अशोक सिंघई सहायक महाप्रबंधक (राजभाषा) की विशिष्ट आतिथ्य में सम्पन्न हुआ। सर्वप्रथम अतिथियों द्वारा मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण पश्चात् मंगलदीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। उल्लेखनीय है कि इस सत्र में संयंत्र के 17 कार्मिक हिंदी आशुलिपि प्रशिक्षण हेतु पंजीकृत हैं।
मुख्य अतिथि श्री आर.के. नरूला ने अपने सारगर्भित सम्बोधन में कहा कि हिंदी आशुलिपि एक महान कला है जिसको सीखने के लिए आप लोगों को चयनित किया गया है यह गर्व की बात है। राजभाषा आज देश की भाषा बन चुकी है जिसके माध्यम से कार्यालयीन कार्य सम्पादित किये जाते हैं। सर्वप्रथम अपने स्वागत सम्बोधन में श्री अशोक सिंघई सहायक महाप्रबंधक (राजभाषा) ने कहा कि प्रबंध निदेशक महोदय की अध्यक्षता में कार्यरत राजभाषा कार्यान्वयन समिति में लिए गए निर्णयों के तहत हिंदी आशुलिपि का प्रथम बार भारत सरकार गृह मंत्रालय राजभाषा विभाग हिंदी शिक्षण योजना द्वारा संचालित प्रशिक्षण के तहत हिंदी टंकण में उत्तीर्ण मिनिस्टिरियल स्टाॅफ के लिए शुरूआत की गई है। भिलाई बिरादरी जो सोचती है वह करके रहती है हम सभी क्षेत्र में अग्रणीय की भूमिका निभाते हैं। उन्होंने आव्हान किया कि हिंदी आशुलिपि एक कला है संकोच को दूर करते हुए उत्साह व गर्व से इस विधा को सीखें निरंतर अभ्यास करें और कार्यालयीन कामकाज में अवश्य ही इसका प्रयोग करें।

10/01/2009

हरिनारायण को बृजलाल द्विवेदी साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान




भोपाल। दिल्ली से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका कथादेश के संपादक हरिनारायण को पं. बृजलाल द्विवेदी अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान दिये जाने की घोषणा की गई है। वर्ष 2008 के सम्मान के लिए श्री हरिनारायण के नाम का चयन पांच सदस्यीय निर्णायक मंडल ने किया जिसमें नवनीत के संपादक विश्वनाथ सचदेव( मुंबई), सप्रे संग्रहालय, भोपाल के संस्थापक विजयदत्त श्रीधर( भोपाल ), छत्तीसगढ़ हिन्दी ग्रंथ अकादमी के संचालक रमेश नैयर,कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर के कुलपति सच्चिदानंद जोशी, साहित्य अकादमी के सदस्य गिरीश पंकज (रायपुर) शामिल थे। पूर्व में यह सम्मान वीणा(इंदौर) के यशस्वी संपादक डा.श्यामसुंदर व्यास और दस्तावेज (गोरखपुर) के संपादक डा. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को दिया जा चुका है।

सम्मान समिति के सदस्य संजय द्विवेदी ने बताया कि हिन्दी की स्वस्थ साहित्यिक पत्रकारिता को सम्मानित एवं रेखांकित करने के उद्देश्य से इस सम्मान की शुरूआत की गई है। इस सम्मान के तहत किसी साहित्यिक पत्रिका का श्रेष्ठ संपादन करने वाले संपादक को 11 हजार रूपये, शाल, श्रीफल, प्रतीक चिन्ह एवं सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया जाता है। मार्च 1948 में जन्में श्री हरिनारायण 1980 से कथादेश का संपादन कर रहे हैं। वे हंस, विकासशील भारत, रूप कंचन के संपादन से भी जुड़े रहे हैं। उनके संपादन में कथादेश ने देश की चर्चित साहित्यिक पत्रिकाओं में अपनी जगह बना ली है।
-- जयप्रकाश मानस

9/25/2009

इस ख़तरनाक समय में...


ज्ञानरंजन के इस्तीफे और अन्य विवादों को लेकर प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव का प्रो. कमला प्रसाद का बयान


भोपाल 23 सितंबर, 2009 विगत कुछ दिनों प्रकाशित पत्रिकाओं-समाचार पत्रों के कुछ लेखों तथा हमारे सम्मानित लेखक ज्ञानरंजन की टिप्पणियों ने प्रलेस से संबंधित सांगठनिक स्तर पर कुछ सवाल पैदा किए हैं। प्रगतिशील लेखक संघ का महासचिव होने के नाते मेरी ज़िम्मेदारी बनती है कि उठाए गए सवालों के बारे में वस्तुस्थिति स्पष्ट करूं। सवाल हैं कि प्रमोद वर्मा संस्था्न द्वारा आयोजित ‘प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह’ में प्रलेस की भागीदारी क्यों हुई? प्रगतिशील वसुधा ने गोविंद वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान से फोर्ड फाउण्डे्शन की राशि से प्रदत्त कबीर चेतना पुरस्कार चुपके-चुपके क्यों ले लिया?

पहले प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह के बारे में बातें करें। इस आयोजन में जलेस-प्रलेस और जसम के अलावा अन्य महत्वपूर्ण लेखकों को आमंत्रित किया गया था। संस्थान की ओर से भेजे गए पहले निमंत्रण पत्र में वे नाम थे जिन्हें आमंत्रण भेजा गया था। दूसरे और आखिरी निमंत्रण पत्र में वे नाम थे जिन्होंने आने की स्वीकृति दी थी। पूछने पर ज्ञात हुआ कि जिनकी स्वीकृति नहीं मिली उन्हें छोड़ दिया गया। जहां तक प्रमोद वर्मा का सवाल है, वे मार्क्सवादी और मुक्तिबोध, परसाई के साथी थे। वे प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष मण्डल में रहे हैं। छत्तीसगढ़ उनकी कर्मभूमि रही, इसलिए बहुत से लेखकों से उनके वैचारिक पारिवारिक रिश्ते थे। विश्वरंजन तब उसी क्षेत्र में पदस्थ होने के कारण प्रमोद जी की मित्र मण्ड्ली में थे। प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान बना-तो उसमें रूचि से वे सहयोगी बने। छत्तीसगढ़ के अनेक लेखकों के साथ आजकल वे इसके अध्यक्ष हैं। निर्णय का अधिकार अकेले उन्हें ही नहीं है। पृष्ठभूमि के रूप में इसे जानना जरूरी है। इस कार्यक्रम की घोषणा हुई तो मैंने छत्तीसगढ़ प्रलेस के साथियों से पूछा कि क्या स्थिति है? छत्तीसगढ़ के साथियों ने सलाह दी कि प्रमोद वर्मा पर कार्यक्रम प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान की ओर से है। सरकारी अनुदान नहीं है, इसलिए आना चाहिए। स्वीकृति देने वाले लेखकों में मैंने अनेक वैचारिक साथियों और संगठनों में शामिल लेखकों के नाम देखे तो जाना तय किया। समारोह में आने वालों में छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण लेखकों के अलावा खगेंद्र ठाकुर, अशोक वाजपेयी, चंद्रकांत देवताले, शिवकुमार मिश्र, कृष्ण मोहन, प्रभाकर श्रोत्रिय जैसे नाम थे। कृष्ण मोहन और श्री भगवान सिंह को आलोचना पुरस्कार भी दिया गया था। अच्छी बात यह हुई कि प्रमोद वर्मा समग्र का प्रकाशन हुआ।

कार्यक्रम के उद्घाटन समारोह में मुख्यमंत्री और कुछ नेताओं के आने तथा विवादास्पद वक्तव्य देने पर वहां आए लेखकों में व्यापक प्रतिक्रिया हुई, और इनका आक्रामक उत्तर लोगों ने अपने-अपने वक्तव्यों में दिया। पूरे आयोजन में प्रमोद वर्मा की विचारधारा ‘मार्क्सवाद’ बहस का आधार बनी रही। इसी दौरान कहीं से चर्चा में सुनाई पड़ा कि एक मित्र लेखक ने ‘पब्लिक एजेण्डा' में विश्वरंजन अर्थात डी.जी.पी.छत्तीसगढ़ के सलवा जुडुम के समर्थन और नक्सलपंथियों के विरोध में छपे इंटरव्यू को मुद्दा बनाकर कार्यक्रम में शामिल होना स्थगित किया है। उस समय तक लोगों ने ‘पब्लिक एजेण्डा’ का इंटरव्यू नहीं देखा था। इसके अलावा, सीधे भाजपा शासित सरकारी कार्यक्रम न होने के कारण लोग इसमें आए थे। उन्हें पहले से पता था कि सलवा जुडुम भाजपा सरकार के एजेण्डे में है। आमंत्रित लेखकों ने प्रमोद वर्मा स्मृति के पूरे आयोजन को लेकर कुछ आपत्तियां दर्ज कराईं। संस्थान के साथियों को परामर्श दिया गया कि इसे हमेशा सत्ता के प्रमाण से अलग रखा जाए।

छत्तीसगढ़ के जलेस-प्रलेस के साथियों तथा वामपंथी राजनीतिक दलों ने लगातार सलवा जुडुम के मसले पर सरकार का विरोध किया है। डॉ. विनायक सेन की गिरफ्तारी के बाद उनकी रिहाई के लिए हुए आंदोलन में ये सभी लेखक शामिल रहे हैं। लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों में यह प्रमुख मुद्दा था। याद रखना होगा कि अपनी-अपनी तरह से हत्यारी नीतियां छत्तीसगढ की ही नहीं अन्य भाजपा शासित राज्यों की भी हैं। मध्य‍प्रदेश में पिछले छह वर्षों में अल्पसंख्यकों पर सैंकड़ों अत्याचार और हत्याएं हुईं हैं। प्रलेस के लेखकों ने यहां लगातार सरकारी कार्यक्रमों का समय-समय पर विरोध और यथासमय बहिष्कार किया है। एक सूची प्रकाशित की जानी चाहिए कि मध्यप्रदेश में और इन सारे प्रदेशों के सरकारी कार्यक्रमों में किनकी-किनकी कहां-कहां भागीदारी रही है। मैं नहीं मानता कि गैर सरकारी प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह में शामिल होने मात्र से लेखकों का हत्यारों के पक्ष में खड़ा होना कहा जाएगा।

साथियों की ओर से उठाया गया अन्य सवाल वसुधा के फोर्ड फाउण्डेशन की राशि से कबीर चेतना पुरस्कार लेने का है। मैं यह स्पष्ट कर दूं कि संस्था़न से स्पष्ट जानकारी के बाद कि यह पुरस्कांर राशि संस्थान की ओर से है फोर्ड फाउण्डेशन की ओर से नहीं, संपादकों ने चुपके-चुपके नहीं, एक समारोह में यह पुरस्कार प्राप्त किया है। लोग जानते हैं कि गोविंद वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान इलाहाबाद केंद्रीय विश्वंविद्यालय का एक प्रभाग है। दलित संसाधन केंद्र उसकी एक इकाई है। दलित संसाधन केंद्र की ओर से विगत कई वर्षों से दलितों की स्थितियों पर अध्ययन होता रहा है। संस्थान द्वारा दलितों के बारे में दस्तावेजीकरण के अलावा इलाहाबाद तथा भोपाल जैसे अन्य शहरों में केंद्र की संगोष्ठियां हुईं हैं। मुझे याद नहीं पड़ता कि हिंदी का कौन-सा महत्वपूर्ण लेखक है जो इन कार्यक्रमों में नहीं गया और मानदेय स्वीकार नहीं किया। जहां तक कबीर चेतना पुरस्कार की बात है, पहले हंस और तद्भव ने ये पुरस्कार लिए हैं। इनके संपादक भी संगठनों के हिस्से हैं। प्रगतिशील वसुधा लगातार दलित साहित्य प्रकाशित करती रही है। एक विशेषांक भी प्रकाशित हुआ था, इसलिए निर्णायकों ने इस पत्रिका की पात्रता तय की है। प्रलेस से सीधी जुड़ी होने के कारण प्रगतिशील वसुधा का ऑडिटेड आय-व्यय खुले पन्नों में है। कभी भी देखा जा सकता है।

दोनों सवालों का तथ्यात्मक ब्यौरा पेश करने के बाद मेरा कहना है कि आज की परिस्थितियों में जिस तरह सांप्रदायिक शक्तियों का जाल देश में फैल रहा है, समूची मानवीय संस्कृति का बाज़ारीकरण हो रहा है, मूल्यों को तहस-नहस करने की साजिश है, उस समय अपने-अपने संगठन को अधिक क्रांतिकारी अथवा व्यक्तिगत रूप से स्वयं को अति-शुद्ध सिद्ध करने की कोशिश सांस्कृतिक आंदोलन की एकजुटता खण्डित करेगी। मर्यादाएं टूटने के बाद आंदोलन छूट जाएगा और लोग व्यक्तिगत हमलों पर उतर आएंगे। माना कि अब लेखकों के संगठन प्रेमचंद कालीन नहीं हैं, हो भी नहीं सकते। पर आज की परिस्थितियों में जो संभव है, हो रहा है। जरूरत पड़ने पर इनका जुझारू रूप देखा जा सकता है। इनके बिना सामाजिक-सांस्कृतिक प्रश्नों पर आवश्‍यक सामूहिक पहल की कल्पना असंभव होगी। विरोधी शक्तियां इन्हें तोड़ना चाहती हैं। कदाचित इनके विघटन की प्रक्रिया शुरू हो गई तो वह दिन खतरनाक होगा।

7/03/2009

राष्ट्रीय ब्लॉग संगोष्ठी रायपुर में

राष्ट्रीय ब्लॉग संगोष्ठी : छपास पीड़ा का इलाज मात्र हैं ब्लॉग?
रायपुर, छत्तीसगढ़
दिनांक 10 जुलाई, २००९

मित्रों,
पिछले दिनों हिन्दी के एक ब्लॉग में पुष्पा भारती के कथन पर गंभीर चर्चा चली थी। पुष्पा भारती ने हिन्दी ब्लॉगों को यह कह कर खारिज कर दिया था कि यहाँ तो भाषाएँ भी बड़ी अजीब है - ब्लॉगर ‘टेंशनात्मक’ लिख रहे हैं – तो ये टेंशनात्मक क्या है? इससे पहले नामवर सिंह जैसे दिग्गज इसे खारिज कर चुके हैं। अलबत्ता राजेंद्र यादव सरीखे कुछ विशिष्ट भविष्यदृष्टा की नजरों में ब्लॉगों के जरिए सृजनात्मकता की असीम संभावनाएँ भी झलकती हैं।

पांच साल के हिन्दी ब्लॉग इतिहास में सृजनात्मकता के लिहाज से क्या कुछ हासिल हुआ और भविष्य का पट क्या कहता है?

क्या ब्लॉग सिर्फ और सिर्फ छपास पीड़ा को जड़ से मारने का इलाज मात्र है या फिर इंटरनेट का यह मल्टीमीडिया युक्त सुगम सरल प्रकाशन सुविधा भविष्य में प्रेमचंद या देवकीनंदन खत्री जैसे लेखकों को पैदा करने की ताक़त रखता है? क्या यहाँ सिर्फ अनर्गल और पानठेलों-पर-की-जाने-वाली-बहस नुमा चीजें छापी जाती हैं या फिर इसमें स्तरीय सामग्री भी आती हैं?

इन तमाम मुद्दों पर गर्मागर्म बहस के लिए एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन दिनांक 10 जुलाई, 2009 को 2 बजे से 3 बजे तक रायपुर, निंरजन धर्मशाला में सुनिश्चित किया गया है। यह संगोष्ठी प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह के आयोजन के तहत आयोजित किया जा रहा है। इस संगोष्ठी के मुख्य अतिथि रहेंगे देश के महत्वपूर्ण आलोचक एवं भारतीय ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक डॉ। प्रभाकर तथा विशिष्ट अतिथि होंगे – वरिष्ठ कवि एवं आलोचक श्री प्रभात त्रिपाठी, रायगढ़ एवं ए. अरविंदाक्षन, कालीकट तथा इसकी अध्यक्षता करेंगे - प्रसिद्ध ब्लॉगर रविशंकर श्रीवास्तव (रविरतलामी) ।

भागीदारी हेतु आप भी सादर आमंत्रित हैं। प्रतिभागी ब्लॉगर्स के भोजन, आवास की व्यवस्था संस्थान द्वारी की गई है तथा इसके अलावा राष्ट्रीय आलोचना संगोष्ठी में भी भाग ले सकते हैं जिसमें देश के 50 से अधिक वरिष्ठ आलोचक उपस्थित हो रहे हैं ।

संगोष्ठी संयोजक
जयप्रकाश मानस
मोबाइल – 94241-82664
ई-मेल – srijangatha@gmail.com

6/25/2009

फ़िराक़ की शायरी पर व्याख्यान आज


रायपुर । प्रदेश की बहुयायामी सांस्कृतिक संस्था सृजन-सम्मान द्वारा देश की विभूतियों का स्मरण के अनुक्रम में दिनांक 25 जून, 2005 को ठीक 4 बजे दोपहर स्थानीय प्रेस क्लब, मोतीबाग़ में “फ़िराक़ की शायरी” विषय पर एक आत्मीय एवं सरल व्याख्यान का आयोजन किया गया है । व्याख्यान देंगे – देश के प्रख्यात आलोचक एवं सागर विश्वविद्यालय, मध्यप्रदेश के पूर्व कुलपति डॉ। धनंजय वर्मा। कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे – श्री नंदकिशोर तिवारी, संपादक, लोकाक्षर, बिलासपुर ।

विशिष्ट अतिथि के तौर पर उपस्थित रहेंगे – कवि एवं पुलिस महानिदेशक, फ़िराक गोरखपुरी उर्फ़ रघुपति सहाय के नाती श्री विश्वरंजन, आलोचक, पूर्व केंद्र निदेशक आकाशवाणी श्री हसन खान, शायर एवं कवि श्री मुमताज़/श्री अशोक सिंघई भिलाई, प्रेस क्लब के अध्यक्ष श्री अनिल पुसदकर व पत्रकार श्री राजकुमार सोनी। परिचयात्मक वक्तव्य देंगे – श्लोक के संपादक श्री रज़ा हैदरी ।

5/17/2009

भास्कऱ डाँट काम की सेक्स पत्रकारिता

जब पत्रकारिता के मानदण्ड टूट जाते हैं तथा जब पत्रकारिता जन विरोधी तथा अपनी अस्मिता को बेंच चुकी होती है तो उसके पास अतार्किक तथा अप्रसंगिक चीजों का प्रचार प्रसार करने के इतर कोई अन्य चारा नहीं रह जाता। दैनिक भाष्कर वैसे तो काफी नामी हिन्दी न्यूज पेपर हैं लेकिन इसकी वेबसाईट देखने पर यह पता चलता हैं के यह पेपर मानसिक रूप से बिमार है और नव युवको को भी मानसिक रूप से बीमार करना चाहता है इसलिये दुनिया की वे खबरे जो बीमार लोगों और बीमार समाजों से आती है वह भाष्कर पर हेड लाईन बन जाती है। खोज खोज कर अश्लील खबरे तथा चित्र छापे जाते हैं जिससे साईट की रेटिंग बढ जाये।

इस वेबसाईट पर कोई विशेष खबर नहीं रहती न ही कोई राजनैतिक सामाजिक लेख जिससे पाठक जागरूक हो सके। इस वेबसाईट की तुलना तमाम ब्लागों से की जा सकती है जो इस तरह की चीजें अपने ब्लाग पर छापते हैं। रोग तथा वायर्ड न्यूज जिस तरह से इस न्यूज पेपर मे प्रमुख रूप से छप रहा है वह निश्चय ही पत्रकारिता के बदतर होते हालात को सामने रखता है।

इस वेबसाईट में कोई नई खबर नहीं होती, जितना बडा यह पेपर बताया जाता है उस हिसाब से इसके पास खबरे नहीं। गूगल हिन्दी पर प्रकट हो रही हिन्दी न्यूज वेबसाईट में बहुत सी जो अभी कम्पनी भी नहीं हैं तथा दो चार लोगों द्वारा चलाई जाती हैं उनकी खबरे नई होती हैं तथा जनता से जुडी होती हैं। यहाँ तक कि कुछ ब्लाँग भी इससे अच्छे हैं इसलिये नहीं कि वे बडे हैं बल्कि इसलिये कि वे अच्छी खबरें देते हैं जो इसन पेपरों में नहीं छपती तथा जो जनता की खबरे होती हैं तथा सच्ची होती हैं
न्यूज को ये खबरे बुरी तरह से दबाती हैं। न्यूज पेपर के ऐडीटर को नंगी तस्वीरें बडी प्रिय हैं इसलिये वे हर सेक्स की वायर्ड न्यूज पर इन कमोवेश पार्न तस्वीरों को चस्पा करवाते हैं जिससे नवयुवक आकर्षित हो तथा रेटिंग बढे। हिन्दी पत्रकारिता में इस तरह का क्रान्तिकारी बदलाव ऐतिहासिक है तथा जिसके सिर पर देश को मुद्दावीहीन करने का ठीकरा फोडा जाना चाहिये।

जनसत्ता के व्यंगकार अजदक ने जो प्रतिक्रिया इस रविवार को “सबसे उम्दा दिमाग” काँलम में लिखी है वह बहुत सटीकता के साथ तथा कथित मीडीया बुद्धिजीवीयों के खोखलेपन को सामने नंगा करता है। गलत तथा जनविरोधी परिघटनाओं को तरलीकृत कर ये लोग जनता को वायर्ड खबरों के चटखारे में लगाये रखते हैं। इसकी प्रतिक्रिया आज नहीं तो कल होनी ही हैंक्योंकि जब जनता के मुद्दों की अनदेखी की जाती है तो विस्फोट होता है, आतंकवाद पैर फैलाता है, माओवाद को ताकत मिलती है।

मिडीया का इस तरह वेष्यावृत्ति चरित्र में बदल जाना इस देश के लिये चिन्ता जनक है। बुद्धिजीवीयों को एक मंच पर आना चाहिये तथा एक नई मिडीया का निर्माण करना चाहिये जो सम्भव है।
प्रवीन उपाध्याय

5/12/2009

भारत भवन में विश्वरंजन का कविता पाठ


भोपालभारत भवन में शुक्रवार को छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक और जाने-माने कवि विश्वरंजन का कविता पाठ हुआ। यह कार्यक्रम भारत भवन के वागर्थ की पाठ श्रंखला के अंतर्गत आयोजित किया गया था।


उन्होंने कविता पाठ कि शुरुआत ‘यह कविता मेरी नहीं सबकी है, मंत्र की भांति उठती है जमीन, समुद्र से आज भी, साथ लिए आदिम ध्वनियों की कंपन और एक जबदस्त कोशिश’ से की। अपनी अगली रचना पढ़ते हुए उन्होंने कहा, ‘शब्द बोलते-बोलते मौन होंगे सहसा॥, ऐसे लिखते-लिखते रोशनाई सूख जाती है, एक अर्से तक होता रहा तूलिका व रंग का खेल.. पर सहसा एक दिन रंग बिखरते-बिखरते गिरने लगा परत दर परत’।


इसके बाद श्रोताओं के अनुरोध पर ‘अंधेरे से लड़ने के लिए एक स्वप्न का होना बेहद जरूरी हैं, अध खुली खिड़की से झांकता अंधेरा॥खुली किताब फड़फड़ाते पन्ने, कोई नहीं है यहां..टेबल पर बिछ जाएगी लैंप की रोशनी.. यह सब जानते है हुए भी नहीं मानूंगा हार.. स्वप्न पैदा करूंगा उनकी आंखों में’का पाठ किया। इसके पहले विश्वरंजन ने कहा कि भारत भवन को बहुत अर्से पहले बनते और बढ़ते देखा है। यहां आकर सभी से मुखातिब होना अपने आप में एक अलग अनुभूति है। इस अवसर पर डीआईजी (इंटेलिजेंस) अनुराधा शंकर सिंह, आईजी (कानून व्यवस्था) संजीव सिंह, संस्कृति सचिव मनोज श्रीवास्तव, मदन सोनी, नवल शुक्ल आदि उपस्थित थे।

3/24/2009

विश्वरंजन की कविता स्वप्न देखने को प्रेरित करती है


भिलाई नगर। कल्याण महाविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा कवि, एवं छग के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन के सद्य:प्रकाशित एकाग्र संग्रह, 'एक नई पूरी सुबह' (जयप्रकाश मानस द्वारा संपादित)पर एक समीक्षा गोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कवि, कथाकार एवं आलोचक डॉ। प्रभात त्रिपाठी थे। विशेष अतिथि के रुप में डॉ. बलदेव, डॉ. एचएन दुबे, डॉ. सरोज प्रकाश एवं दुर्ग जिला के पुलिस अधीक्षक दीपांशु काबरा उपस्थित थे। अध्यक्षता ललित निबंधकार श्रीराम परिहार ने की है।
स्वागत भाषण देते हुए हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ। सरोज प्रकाश ने श्री विश्वरंजन की कविताओं पर आहूत समीक्षा गोष्ठी के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। डॉ. बलदेव ने कवि विश्वरंजन के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। कविता पाठ के लिए विश्वरंजन को आमंत्रित किया गया तो उन्होंने सहर्ष ही मंच पर खड़े होकर अपनी सात कविताओं का पाठ किया। कविता पाठ करने की उनकी अपनी मौलिक शैली है। कुछ कविताओं के शीर्षक इस तरह से है-तुम गलत कहती हो मैं तुम्हारा वही मुन्ना नहीं हूं मां, रात की बात, मैं फिर से नया लोहाबान जलाता हूं, साहब कोलाज और साधों। प्रेम में सब कुछ संभव है। कवि द्वारा अपनी ही कविता का सस्वर पाठ उपस्थित दर्शकों। श्रोताओं के लिए यादगार क्षण में तब्दील हो गया। विश्वरंजन के काव्य संग्रह पर तीन आलेख पढ़े गए जिसमें प्रथम दो आलेख डॉ. के.एस. प्रकाश, कमलेश्वर साहू द्वारा कविता के संदर्भ में पढ़े गए। तथा अंतिम आलेख शरद कोकास द्वारा विश्वरंजन के गद्य लेखन के संदर्भ में पढे ग़ये।विशेष आमंत्रित वक्ताओं ने भी विश्वरंजन की कविताओं के संदर्भ में अपने-अपने विचार व्यक्त किए। इनमें डॉ. अनिता करडेकर, विनोद साव, अशोक सिंघई, सियाराम शर्मा और रवि श्रीवास्तव ने काफी विस्तार से कविता के अर्थ को खोलने का प्रयास किया।
मुख्य अतिथि डॉ। प्रभात त्रिपाठी ने कहा कि विश्वरंजन ब्रह्माण्डीय चेतना के कवि हैं। उनका अनुराग जगत बहुस्तरीय है। जीवन और मनुष्यता के प्रति उत्कट लगाव ने उसके कविपन को संजोया, संवारा है। उनकी प्रेम कविता एक एैवीम नहीं है। उन्होंने अपने प्रेमानुभव को मूल्यदृष्टि में तब्दील किया है। डॉ। त्रिपाठी ने हिन्दी कविता पर हो रहे लोक लुभावन वासी बहस पर चिन्ता चाहिर की। उन्होंने उपस्थित पाठकों के समक्ष यह प्रश् उठाया कि कविता में समय किस तरह से रुपांतरित होता है? कवि का समय और दूसरे अनुशासनों में व्यक्त समय का अर्थ समान है अथवा भिन्न? यद्यपि उन्होंने गोष्ठी की बहस को काफी जीवंत माना। अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए राम परिहार ने कहा कि पिछले पचास वर्षों से हिन्दी में छोटा-बड़ा कवि बनाने का खेल चल रहा है। विश्वरंजन की कविता विकल्प प्रस्तुत करती है। विश्वरंजन ने एक संवेदनशील आम भारतीय नागरिक की हैसियत से कविता लिखी है। उन्होंने नये सिरे से शब्द सत्ता की प्रतिष्ठा की है। कार्यक्रम के अंत में आभार प्रदर्शन वरिष्ठ कवि एवं गीतकार मुकुंद कौशल ने किया। कार्यक्रम संचालन वरिष्ठ कवि नासिर अहमद सिकंदर और रजनीश उमरे ने किया।
उक्त अवसर पर किताब के संपादक जयप्रकाश मानस, एच एस ठाकुर, तपेश जैन, रामशरण टंडन आदि कई साहित्यकार एवं पत्रकार उपस्थित थे ।
प्रस्तुत: भागवत प्रसाद

2/07/2009

सृजनगाथा का नया अंक

सृजनगाथा के नये अंक में पढ़िये

कविता
◙ स्मरणीय - मुकुटधर पांडेय, डॉ. केदारनाथ सिंह
◙ कवि - मुमताज, स्व. विनय दुबे, विश्वरंजन, लाल्टू, नरेश अग्रवाल, कृष्णकान्त निलोसे, प्रभा मुजुमदार
◙ प्रवासी कवि - अंजना संधीर
◙ माह का कवि - संजीव बख्शी

भाषांतर
◙ जापानी हाइकू का भावानुवाद - नलिनीकांत
◙ रेत - हरजीत अटवाल -पंजाबी उपन्यास (भाग 15)

छंद
◙ माह के छंदकार - रंजीत भट्टाचार्य
◙ गीत - सुरेश कुमार पंडा, मदन मोहन शर्मा, अशोक शर्मा,
कुँअर बेचैन, शारदा कृष्ण
◙ ग़ज़ल - सजीवन मयंक, राम मेश्राम, चन्द्रसेन विराट, विज्ञान व्रत
◙ दोहे - रामानुज त्रिपाठी
◙ अजयगाथा - दंतेवाड़ा

हस्ताक्षर
◙ डॉ. उदय तिवारी : भाषा वैज्ञानिक - प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन
जब मैं इलाहाबाद में शोध कार्य कर रहा था, उसी अवधि में दिसम्बर 1961 में तिवारी जी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जबलपुर वहाँ के विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष के पद पर हिन्दी विभाग स्थापित करने हेतु चले गए थे। आगरा में नियुक्त होने के बाद वहाँ के कार्यभार के कारण मैं इतना व्यस्त हो गया कि डॉ. तिवारी जी को पत्र न लिख सका। जब मुझे डॉ. तिवारी जी का पत्र मिला जिसमें उन्होंने लिखा कि ``आगरे से तुमने कोई पत्र नहीं भेजा और न ही अपना समाचार ही लिखा तो इसे पढ़कर अपनी गलती का अहसास हुआ।
◙ फक्कड़ कवि थे निराला - कृष्ण कुमार यादव

व्याकरण
◙ एक शब्द - आग - गंगाप्रसाद बरसैंया

विचार-वीथी
◙ लोकतंत्र में राजनेता होना चाहिये - प्रो. महावीर सरन जैन
◙ जनतांत्रिक चेतना : परिवर्तन का द्योतक - नन्दलाल भारती

हिन्दी विश्व
◙ हिंदी पर हमला - रघु ठाकुर

प्रसंग-वश
◙ आतंकवाद और महिलाएँ - डॉ. सुनीता ठाकुर
दूसरों पर आसानी से यकीन न करना, अपनी इज़्ज़त के लिए मर मिटना, परपुरुष की सहायता तो क्या उससे बात तक न करना जैसी बहुत से हिदायतें हम औरतों ने अपने पुरखों से सीखी होती हैं। ये हिदायतें हमें सिर्फ़ अपने परिवार के सदस्यों तक ही सीमित रहकर जीना सिखाती है। इससे अलग तौर तरीक़े अपनाने वाली महिलाओं को क्या-क्या सुनना और झेलना पड़ता है यह हम सभी औरतें, औरत होने के नाते अच्छी तरह से जानती हैं। यही कारण था कि बहुत-सी औरतें अपनी सरज़मीं पर ही मौजूद सहायताओं को नकार कर एक अनजान शहर में भटकने को तैयार हो जाती हैं। एक ज़मीन से उखड़ती हैं और दूसरी पर उपज नहीं पातीं।

मूल्याँकन
◙ नाटककार और रंगमंच - मोहन राकेश
रंगमंच की पूरी प्रयोग-प्रक्रिया में नाटककार केवल एक अभ्यागत, सम्मानित दर्शक या बाहर की इकाई बना रहे, यह स्थिति मुझे स्वीकार्य नहीं लगती। न ही यह कि नाटककार की प्रयोगशीलता उसकी अपनी अलग चारदीवारी तक सीमित रहे और क्रियात्सक रंगमंच की प्रयोगशीलता उससे दूर अपनी अलग चारदीवारी तक । इन दोनों को एक धरातल पर लाने के लिए अपेक्षित है कि नाटककार पूरी रंग-प्रक्रिया का एक अनिवार्य अंग बन सके।
◙ हिंदी साहित्य-पत्र-पत्रिका की प्रांसगिकता - डॉ. वीरेन्द्र यादव

शेष-विशेष
राजनीति....
◙ ओबामा : आशाएँ व चुनौतियाँ - तनवीर जाफ़री
ओबामा के शांति प्रयासों के बावजूद अफ़ग़ान-पाक सीमा पर निरंतर बगड़ते हालात तथा पूरे पाकिस्तान में चरमपंथियों के फैलते प्रभाव ने अमेरिका की चिंताएँ काफ़ी बढ़ा दी हैं। कई प्रमुख अमेरिकी कूटनीतिज्ञों को इस बात का संदेह है कि बावजूद इसके कि 9/11 के बाद अब तक अमेरिका पर कोई चरमपंथी हमला नहीं हुआ है। परन्तु इस बात की प्रबल संभावना है कि चरमपंथियों द्वारा अगले हमले की योजना पाकिस्तान में बनाई जा सकती है।
रिपोर्ताज....
◙ यहाँ होती है सृष्टिकारों की सृष्टि - उमाशंकर मिश्र
शोध....
◙ हिंदी लघुकथा का विकास - डॉ. अंजलि शर्मा
इन दिनों....
◙ वैश्विक प्रयासों से संभव, आतंकवाद से छुटकारा - तनवीर जाफ़री

कहानी
◙ मैंगोलाइट - तरुण भटनागर
ठीक है, ग्लोब में नहीं है । मास्टर कहता कि, एटलस में नहीं है, नहीं है, दुनिया जहान के नक्शों में । नहीं है देश-दुनिया में । चर्चा में भी नहीं है । पेपरों में, रोज़ के रेडियो के समाचार में भी नहीं है । संयुक्त राष्ट्र संघ की सूची में नहीं है, नहीं है, ओलंपिक के झण्डाबरदार खिलाडियों की परेड में । नहीं है, डाक टिकटों में । कि तिब्बत की कोई मुद्रा नहीं, नहीं उसका कोई झण्डा । कहीं नहीं, किसी देश में नहीं तिब्बत का कोई राजदूत, कोई एम्बेसेडर । संसार में कहीं नहीं तिब्बत का कोई दफ्तर.......... ।
◙ हार ले आना ! - योगन्द्र सिंह राठौर
◙ गुजराती कहानी - जूही - लता हिराणी

संस्मरण
◙ परचून की दुकान से - सुरेश पंडा
एक बार ऐसा हुआ कि शुक्ल जी ने सूचना भिजवायी कि बाबा नागार्जुन आये हैं । जूटमिल धर्मशाला में ठहरे हैं। ज़ल्द पहुँचो । हम राधेश्याम गोयल़, श्रीधर आचार्य शील़, मुस्तफा आदि तीन चार लोग पहुँच गये । वहाँ पर शुक्ल जी शर्मा जी आदि बरिष्ठ लोग बाबा नागार्जुन के साथ बैठे चर्चा में मशगुल थे । देश के इतने बरिष्ठ साहित्यकार को सशरीर समक्ष देखकर हम सभी को संकोच हो रहा था । हम सब भी किनारे एक तरफ़ बैठ गये ।

लघुकथा
◙ दूरअंदेश - मोहम्मद कय्युम
◙ मजबूरी - राजमल डांगी
◙ पागल प्रेमी - श्याम कुमार पोकरा


लोक-आलोक
◙ मोहरी - छत्तीसगढ़ की अनमोल धरोहर - आसिफ़ इकबाल
आदि से आधुनिक होने के सफर में मनुष्य के संग-संग वाद्यों में भी अनगिनत परिवर्तन हुए हैं, किन्तु आज भी ऐसे अनेक श्रेष्ठ वाद्य बचे हैं, जिन्हें परिवर्तन का तीव्र प्रवाह भी परिवर्तित नहीं कर पाया है। ऐसे ही वाद्यों को लोकवाद्य की संज्ञा दी जाती है। इनमें छत्तीसगढ़ का दुर्लभ लोकवाद्य ‘मोहरी’ है, जो मांगलिक प्रसंगों पर बजाया जाने वाला पारम्परिक वाद्य है। इस लोकवाद्य को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने में राजनांदगांव जिले के पंचराम देवदास का स्थान अग्रक्रम में बना हुआ है।

व्यंग्य
◙ स्वागतम् ! सुस्वागतम् !! - अशोक गौतम

पुस्तकायन
◙ जाग एक बार - श्री बबन प्रसाद मिश्र
◙ घर-बेघर - कमल कुमार
◙ स्त्री संशब्द : विवेक और विभ्रम-कमल कुमार व मुक्ता

ग्रंथालय में (ऑनलाइन किताबें)
◙ लौटते हुए परिंदे(कहानी संग्रह) - सुरेश तिवारी
◙ इंद्रधनुष (कविता संग्रह) - डॉ. महेन्द्र भटनागर
◙ प्रिय कविताएँ (कविता संग्रह) - भगत सिंह सोनी

हलचल
(देश विदेश की सांस्कृतिक खबरें)
◙ 'लेखक और प्रतिबध्दता' और 'मॉस्को की डायरी' का विमोचन
◙ पुस्तक संकट में नहीं है
◙ साहित्यकार संदर्भ कोश का प्रकाशन
◙ महेन्द्र कपूर को गान सम्राज्ञी लता मंगेशकर पुरस्कार
◙ जनवादी नाटककार राजेश कुमार को मोहन राकेश सम्मान
◙ प्रख्यात कवि डा. केदारनाथ सिंह को भारत-भारती
◙ हिन्दी के प्रचार-प्रसार में मीडिया की भूमिका पर संगोष्ठी

11/26/2008

दिनकर की उपेक्षा देशहित में नहीं



अभी-अभी समाचार मिला है कि हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जन्मशती मनाने के लिए राष्ट्रीय समिति गठित करने की माँग ठुकरा दी है। बाकायदा प्रधानमंत्री कार्यालय ने संस्कृति मंत्रालय को इसकी लिखित जानकारी भी भिजवा दी है । जबकि इसके पहले प्रधानमंत्री ने संस्कृति मंत्री अंबिका सोनी से व्यक्तिगत तौर पर दिनकर की जन्मशती मनाने के प्रसंग में विचार-विमर्श भी किया था। अब प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने दिनकर के लिए राष्ट्रीय समिति गठित करने का प्रस्ताव मंजूर नहीं किया।



उल्लेखनीय है कि कई साहित्यिक और सामाजिक संस्थाओं सहित सांसदों ने भी राष्ट्रकवि की जन्मशती राष्ट्रीय स्तर पर मनाने के लिए प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय समिति गठित करने का मुद्दा उठाया था । इस क्रम में पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में सांसदों को भी गिनाया जा सकता है जिन्होंने प्रतिनिधिमंडल के रूप में प्रधानमंत्री से मुलाकात कर यह मांग की थी। सूचना के अनुसार इसी विषय पर जद-यू के पूर्व सांसद वशिष्ठ नारायण सिंह के आवास पर एक बैठक भी हुई थी । संस्कृति मंत्रालय किसी महापुरुष की जन्मशती उनकी सौवीं जयंती के बाद ही मनाता है। ज्ञातव्य हो कि दिनकर की सौवीं जयंती गत 23 सितंबर को थी।
रामधारी सिंह दिनकर हिन्दी के एक प्रमुख लेखक थे। राष्ट्र कवि दिनकर आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं। बिहार प्रांत के बेगुसराय का सिमरिया घाट कवि दिनकर की जन्मस्थली है। इन्होंने इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई पटना विश्वविद्यालय से की। साहित्य के रूप में इन्होंने संस्कृत, बंग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था।

रामधारी सिंह दिनकर स्वतंत्रता पूर्व के विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रकवि के नाम से जाने जाते रहे। वे छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे। एक ओर उनकी कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रांति की पुकार है, तो दूसरी ओर कोमल श्रृँगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है। इन्हीं दो प्रवृत्तियों का चरम उत्कर्ष हमें कुरूक्षेत्र और उवर्शी में मिलता है।

दिनकर 1952 में राज्यसभा के मनोनीत सदस्य थे और 1959 में उन्हें पद्मभूषण मिला था। उन्हें संस्कृति के चार अध्याय पुस्तक पर साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला था, जिसकी भूमिका पंडित जवाहर लाल नेहरू ने लिखी थी। उन्हें ऊर्वशी पर ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला था।



पटना विश्वविद्यालय से बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे एक विद्यालय में अध्यापक हो गए। १९३४ से १९४७ तक बिहार सरकार की सेवा में सब-रजिस्टार और प्रचार विभाग के उपिनदेशक पदों पर कार्य किया। १९५० से 1९५२ तक मुजफ्फरपुर कालेज में हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे, भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति के पद पर कार्य किया और इसके बाद भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार बने। उन्हें पदमविभूषण की से भी अलंकृत किया गया। पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय के लिये आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा उर्वशी के लिये भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कर प्रदान किये गए। अपनी लेखनी के माध्यम से वह सदा अमर रहेंगे।



उनकी प्रमुख कृतियाँ है - गद्य रचनाएं - मिट्टी की ओर, रेती के फूल, वेणुवन, साहित्यमुखी, काव्य की भूमिका, प्रसाद पंत और मैथिलीशरणगुप्त, संस्कृति के चार अध्याय। पद्य रचनाओं में रेणुका, हुंकार, रसवंती, कुरूक्षेत्र, रश्मिरथी , परशुराम की प्रतिज्ञा, उर्वशी, हारे को हरिनाम आदि महत्वपूर्ण कृतियों के रूप में समादृत होती रही हैं ।

प्रमुख आलोचक एवं साहित्य अकादमी के वरिष्ट सदस्य श्री विश्वनाथ प्रसाद तिवारी एवं गिरीश पंकज ने बताते है कि साहित्य अकादमी ने अगले वर्ष फरवरी के प्रथम सप्ताह में दिनकर पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी करने का निर्णय लिया है। साहित्य अकादमी दिनकर के जीवन एवं कृतित्व पर एक वृत्तचित्र का निर्माण भी कर रही है। पिछले दिनों उसने दिनकर संचयन प्रकाशित किया है। यह अलग बात है । किसी राष्ट्रकवि की जन्मशती वर्ष नहीं मनाना समझ से परे है । वह भी ऐसी परिस्थितियों में जब चारों और आंतकवाद पाँव पसार रहा है । राष्ट्रीयता की भावना लगातार कम होती जा रही है । साहित्य और संस्कृति को तिलाजंलि देकर आम भारतीय स्वार्थ के अंधकूप में स्वयं को डालता जा रहा है । राष्ट्र, राष्ट्रीयता और देशप्रेम को स्वार्थ के आगे नतमस्तक होना पड़ रहा है एक यही तो क्षेत्र बचता है कि पुरखों की याद कर फिर से देशवासी को स्मरण कराया जाय कि यह दिनकर का देश है, भूषण का देश है, सेनापति का देश है, अब्दूल रहीम खानखाना का देश है जो युद्ध क्षेत्र में भी जाते थे और अपनी ओजस्वी कविता से मन प्राण को भी जीवंत बनाये रखते थे । यदि ऐसे कवियों को किसी दल या किसी राजनीति के कारण उपेक्षित किया जाय तो यह गंभीर दिशा का परिचायक ही है । राजनीति कम से कम साहित्यकारों, कलाकारों के नाम पर नहीं होना चाहिए । राष्ट्रभक्ति सिर्फ़ भाजपा का विषय नहीं । वह केवल कांग्रेस का विषय नहीं । न ही मार्क्सवादियों का । उसे सभी का विषय बनाया जाना चाहिए । उसे समस्त जनता और उसकी मनीषा के अनुरूप विचार किया जाना चाहिए । यह दीगर बात है कि ऐसी जयंतियों, समारोहों के पीछे सिर्फ़ दिल्ली या बड़ी राजधानियों के दलाल किस्म के साहित्यकार या उनके गुर्गे ही अधिक सक्रिय रहते रहे हों, पर उसे वास्तविक रूप से गाँव गलियों के जनता तक पहुँचाने केलिए ऐसे आयोजनों पर ज़रूर विचार किया जाना चाहिए । एक प्रधानमंत्री से वह भी अधिक ईमानदार और तटस्थ व्यक्ति से ऐसी आशा तो की ही जा सकती है ।

बहरहाल हम अपने प्रधानमंत्री से सिर्फ़ गुजारिश ही तो कर सकते हैं । मानना न मानना तो उनके वश की बात है । उनकी इच्छा वे ही जाने । पर एक साहित्यकार के नाते तो हम ऐसी हरकतों का विरोध करना चाहते हैं दिनकर की पंक्तियों को ही याद करते हुए –
सच है सत्ता सिमट-सिमटजिनके हाथों में आयी,


शान्तिभक्त वे साधु पुरुषक्यों चाहें कभी लड़ाई ?
सुख का सम्यक-रूप विभाजन
जहाँ नीति से, नय से
संभव नहीं; अशान्ति दबी हो
जहाँ खड्ग के भय से,
जहाँ पालते हों अनीति-पद्धतिको सत्ताधारी,


जहाँ सूत्रधर हों समाज केअन्यायी, अविचारी;
नीतियुक्त प्रस्ताव सन्धि के
जहाँ न आदर पायें;
जहाँ सत्य कहने वालों के
सीस उतारे जायें;
जहाँ खड्ग-बल एकमात्रआधार बने शासन का;


दबे क्रोध से भभक रहा हो


हृदय जहाँ जन-जन का;
सहते-सहते अनय जहाँ
मर रहा मनुज का मन हो;
समझ कापुरुष अपने को
धिक्कार रहा जन-जन हो;
जयप्रकाश मानस

10/14/2008

प्रमोद वर्मा पर केंद्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय आयोजन

1800 पृष्ठीय प्रमोद वर्मा समग्र का प्रकाशन
श्रेष्ठ आलोचक को प्रतिवर्ष सम्मान

रायपुर । हिंदी के प्रखर आलोचक और कवि प्रमोद वर्मा पर अभिकेंद्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय आयोजन आगामी फरवरी-मार्च माह में किया जायेगा, जिसमें देश के प्रमुख आलोचकों, संपादकों, साहित्यकारों के अलावा विदेश के साहित्यकारों को आमंत्रित किया जा रहा है । यह महती आयोजन छत्तीसगढ़ के बहुमुखी प्रतिभा के धनी एवं राष्ट्रीय स्तर पर राज्य का नाम उजागर करने वाले विभूतियों की स्मृति को चिरस्थायी बनाने की दिशा में सतत् क्रियाशील एवं राज्य की बहुआयामी सांस्कृतिक संस्था सृजन-सम्मान की राज्य इकाई और नव गठित प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के बैनर तले किया जायेगा । उक्त अवसर पर प्रमोद वर्मा समग्र साहित्य एवं उन पर केंद्रित ग्रंथ का विमोचन भी किया जायेगा। इसके अलावा उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए देश के एक वरिष्ठ कवि आलोचक को प्रतिवर्ष दिये जाने वाला प्रमोद वर्मा स्मृति राष्ट्रीय सम्मान भी प्रारंभ किया जा रहा है ।

प्रमोद वर्मा समग्र का संपादन उनके मित्र और वरिष्ठ कवि श्री विश्वरंजन कर रहे हैं । इस संकलन में श्री प्रमोद वर्मा द्वारा लिखित सभी 17 काव्य संग्रह, निबंध, आलोचना, मोनोग्राफ, यात्रा-संस्मरण, डायरी, नाटक सहित अप्रकाशित कृतियों का प्रकाशन भी किया जा रहा है । इसमें साहित्य रूप और सृजन-प्रक्रिया के संदर्भ, अँगरेज़ी की स्वच्छंद कविता, रोमान की वापसी, हलफ़नामा, कविता दोस्तों में बुलाने से नहीं आती नदी, मुक्तिबोध पर मोनोग्राफ़, कल और आज के बीच, लंबा मारग दूरी घर, कदाचित् संदर्शन प्रकाशित संग्रह हैं और यूरोप प्रवास पर एक डायरी, सामारुमा एवं अन्य कविता, समालोचना तथा नाटक की एक-एक अप्रकाशित कृतियाँ समादृत की जा रही हैं । यह समग्र कुल 1800 पृष्ठों का होगा जिसमें 2 खंड होंगे। इसमें उनकी 4 अप्रकाशित पांडुलिपियाँ भी सम्मिलित हैं जिसे उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कल्याणी वर्मा सौजन्यवश उपलब्ध करा रही हैं । इसके अलावा स्व। प्रमोद वर्मा पर केंद्रित एक किताब भी 'न होना प्रमोद वर्मा का' के नाम से से प्रकाशित की जा रही है । इसका संपादन युवा साहित्यकार जयप्रकाश मानस एवं सुरेन्द्र वर्मा कर रहे हैं । इस कृति में श्री वर्मा जी के समकालीन रचनाकारों के मध्य हुए पत्राचारों, उन्हें लेकर रचनाकारों के संस्मरणों, आलोचनात्मक लेखों, फ़ोटोग्राफ आदि समादृत की जा रही है ।

सृजन-सम्मान के महासचिव राम पटवा द्वारा जारी विज्ञप्ति में रचनाकारों से आग्रह किया गया है कि श्री प्रमोद वर्मा से जुड़े संस्मरण, तस्वीरें, आलोचनात्मक लेख आदि जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान, एफ-3, छग माध्यमिक शिक्षा आवासीय कॉलोनी, पेंशनवाड़ा, रायपुर के पते पर भेज सकते हैं ।

6/26/2008

अब जी न्यूज छत्तीसगढ़ से

संजय द्विवेदी 'जी न्यूज छत्तीसगढ़ में



15 अगस्त से शुरू होगा प्रसारण


रायपुर। छत्तीसगढ़ के प्रमुख हिंदी दैनिक हरिभूमि के स्थानीय संपादक संजय द्विवेदी ने रायपुर से 15 अगस्त से शुरू होने जा रहे टीवी चैनल 'जी न्यूज 24 घंटे छत्तीसगढ़ के डिप्टी एक्जीक्युटिव प्रोडयूसर (एडिटर इनपुट) के तौर पर पदभार ग्रहण कर लिया है। चौदह साल से सक्रिय पत्रकारिता कर रहे श्री द्विवेदी अब तक दैनिक भास्कर, नवभारत, स्वदेश, इन्फोइंडिया डाटकाम जैसे संस्थानों में महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं। वे रायपुर स्थित कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में रीडर भी रह चुके हैं। उनकी अब तक मीडिया की विविध विधाओं पर 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। दैनिक भास्कर, छत्तीसगढ़ के स्टेट हेड केके नायक पहले ही जी न्यूज छत्तीसगढ़ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के तौर पर ज्वाइन कर चुके हैं। इस नए चैनल की लांचिंग का कमान जीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रविकांत मित्तल को सौंपी गई है।


पिछले दिनों रायपुर में हुई एक पत्रकार वार्ता में जी न्यूज, नई दिल्ली के सीईओ बारून दास और छत्तीसगढ़ में गोयल गु्रप के चेयरमेन सुरेश गोयल ने बताया कि 'जी न्यूज 24 घंटे छत्तीसगढ़ का प्रसारण 15 अगस्त से किया जाएगा। जिसके लिए लोधीपारा रेलवे क्रासिंग, रायपुर के पास अंतर्राष्ट्रीय स्तर का क्षेत्रीय कार्यालय बनाया जा रहा है। छत्तीसगढ़ में जीटीवी के इस नए क्षेत्रीय चैनल का फ्रेंचाइजी एसबी मल्टीमीडिया प्राइवेट लिमिटेड होगी। इस कंपनी के सीईओ केके नायक ने बताया कि दुर्ग, जगदलपुर, बिलासपुर, रायगढ़, अंबिकापुर व कोरबा में चैनल का जिला कार्यालय स्थापित किया जाएगा। जो लाइव सेटेलाइट लिंक से जुड़ा होगा। साथ ही इनसेट 4-ए सेटेलाइट से इस चैनल को राष्ट्रीय स्तर के अलावा 17 देशों में देखा जा सकता है। प्रदेश में सीधा प्रसारण के लिए दो बोबी वैन का उपयोग भी किया जाएगा। 'जी न्यूज 24 घंटे छत्तीसगढ़ युवा प्रतिभाओं को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराया जाएगा।