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10/14/2009

ज्ञानरंजन और विश्वरंजन के बीच



विश्वरंजन

इधर प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के द्वारा 10-11 जुलाई, 2009 को रायपुर में प्रमोद वर्मा के साहित्यिक अवदान तथा समकालीन आलोचना पर केंद्रित आयोजित 2 दिवसीय संगोष्ठी को लेकर कुछ विवाद उठ रहे हैं। इसकी सूचना तो मिल रही थी परन्तु उस विवाद में मेरी कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी। विवाद तो आयोजन के पहले भी उठ खड़ा हुआ था जब कुछ लोगों को इस बात से एतराज़ था कि एक डीजीपी कौन होता है प्रमोद वर्मा को हाईज़ैककरनेवाला? कुछ लोगों को मेरे और प्रमोद वर्मा के संबंध मालूम थे और इन लोगों को क़मोबेश मेरे बारे में तथा मेरे विचारों के बारे में भी पता है।

कुछ लेखक, जो माओवादी विचारधारा में आस्था रखते हैं या सलवा-जुडूम का विरोध कर रहे हैं, वे इसलिए शायद नहीं आना चाहते थे क्योंकि मैं सलवा जुडूम को समर्थन दे रहा था। मैं छत्तीसगढ़ 2007 में आया जबकि सलवा जुडूम 2005 से बस्तर में नक्सली आतंक का ख़िलाफ़त कर रहा है, फिर भी यह झूठ फैलाया जाता रहा कि मैं सलवा जुडूम का प्रणेता हूँ। हालाँकि मेरा यह भी मानना है कि हिंसा का सहारा लेकर नक्सली जिस तरह आदिवासियों को बस्तर में दबा रहे थे तो आदिवासी कभी न कभी विरोध तो करते ही।

1985 से 1990-91 तक बस्तर में आदिवासियों ने नक्सली आतंक और हिंसा के ख़िलाफ़ काफ़ी सारे छोटे-मोटे आंदोलन किये थे पर वे नक्सली हिंसा और दमन के सामने टिक नहीं पाये। 2005 में फ़र्क सिर्फ़ इतना हुआ कि जब नक्सलियों ने सलवा जुडूम के अनुयायियों की हत्या शुरू की तो वे शरणार्थी बनकर पुलिस थाने और कैंपों की ओर भाग आये और इस बार शासन ने उन्हें सुरक्षा देने का इंतेज़ाम किया। सीपीआई (माओवादियों) के पोलित ब्यूरो के 2005 से लेकर आज तक हुए निर्णयों से साफ़ ज़ाहिर हो जायेगा कि उन्होंने सिविल सोसायटीमें किस तरह सलवा-जुडूम के ख़िलाफ़ जहर बोये हैं ?

पर कुछ लेखकों ने कोशिश तो की ही कि साहित्यकारों को किसी तरह इस संगोष्ठी में आने सो रोका जा सके पर बहुतों को रोका नहीं जा सका। साहित्यकार बड़ी संख्या में आये। हर ख़ेमे से आये। शिवकुमार मिश्र आये। खगेन्द्र ठाकुर आये। कमला प्रसाद आये। चन्द्रकांत देवताले आये। अशोक बाजपेयी आये। नन्दकिशोर आचार्य आये। प्रभाकर श्रोत्रिय आये। अरविंदाक्षन आये प्रभात त्रिपाठी आये। रमाकांत श्रीवास्तव आयेपुरस्कृत रचनाकार द्वय श्रीभगवान सिंह और कृष्ण मोहन तो आये ही। साहित्यकार बिहार से आये, उत्तर प्रदेश से आये, गुजरात से आये, केरल से आये छत्तीसगढ़ से तो प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच, इप्टा सहित सभी संगठनों के रचनाकर्मियों ने अपनी संपूर्ण निष्ठा के साथ सहभागिता दर्ज़ की। कुछ अपनी विशुद्ध साहित्यिक निष्ठा के कारण आये। कुछ प्रमोद वर्मा के कारण आये। कुछ मेरे कारण आये। जो मेरे कारण आये वे मुझे अच्छी तरह जानते हैं।

एक खुले मंच पर सबने अपनी बातें कही। आलेख पढ़े। कोई किसी से न दबा, न ही यह कोशिश की गई कि कोई लेखक-आलोचक अपनी आस्थाओं को बदले। राज्य के मुख्यमंत्री, कुछ अन्य मंत्री एवं राज्यपाल को सिर्फ़ औपचारिकता और प्रोटोकॉल के तहत आरंभ और समापन में बुलाया गया था क्योंकि बहुत दिनों के बाद एक बड़ा साहित्यिक आयोजन छत्तीसगढ़ में हो रहा था।

इधर एक और विवाद ज्ञानरंजन जी ने उठाया है। उन्होंने कमला प्रसाद, खगेन्द्र ठाकुर तथा नामवर सिंह पर बहुत सारे आरोप लगाकर प्रलेससे इस्तीफ़ा दे दिया। उसमें एक आरोप कमला प्रसाद और खगेन्द्र ठाकुर द्वारा रायपुर के आयोजन में शिरक़त करना भी है। वैसे में प्रलेस का सदस्य नहीं हूँ और प्रलेस के अंदरुनी विवादों से मेरा कोई लेना देना नहीं होना चाहिए पर क्योंकि विवाद में मुझे और संस्थान को भी घसीटा जा रहा है और अछूत क़रार दिया जा रहा है तो न चाहते हुए भी मुझे यह हलफ़नामा दर्ज़ करना पड़ रहा है।

मैं नामवर सिंह, खगेन्द्र ठाकुर, देवताले, ज्ञानरंजन, मैनेजर पांडेय, अशोक बाजपेयी तथा नन्दकुमार आचार्य प्रभृति को महत्वपूर्ण साहित्यकार मानता आया हूँ और उन सबके प्रति मेरे मन-मनीषा में एक आदर भाव भी है। पर यह कतई ज़रूरी नहीं कि हर बार मैं उनसे सहमत ही होता रहा हूँ। आदर, सहमति-असहमति से ऊपर की चीज़ होती है। किसी का आंकलन सहमतियों-असहमतियों के सीमाओं में रहकर नहीं की जा सकती, न ही व्यक्तिगत पसंद-नापसंद की सीमाओं में रहकर। सुदीप बनर्जी से मेरी बहुत विषयों पर घोर असहमति थी पर हम अन्त तक बहुत अच्छे मित्र रहे। प्रमोद वर्मा के साथ भी मेरी तीव्र बहसें होती थी। परन्तु हमारी मित्रता में आँच नहीं आई और हम एक दूसरे की असहमतियों के बावजूद परस्पर आदर-भाव से जुड़े रहे। प्रमोदजी आज तक मेरे लिए साहित्यिक गुरू सदृश नज़र आते हैं। प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के आयोजन में जो निजी कारणों से अथवा किसी अन्य कारणों से नहीं आये मैं तो उनका भी आदर करता हूँ, ख़ासकर उनका जो अपनी सर्जनात्मक हस्तक्षेप को निरंतर बनाये हुए हैं।

व्यक्तिगत या आईडियोलॉजिकल मतभेदों के कारण यदि लोगों को अछूत बनाया जाये और यह कहा जाये कि तुम फ़लां मंच पर क्यों बैठे, फ़लां व्यक्ति के आयोजन में क्यों गये तो ऐसा करने वाला व्यक्ति एक नयी जातिप्रथा को जन्म दे रहा है, एक नये ब्राह्मणवाद को जन्म दे रहा है। (वैसे यदि हम सचमुच अपने-अपने गिरहबान में गहरी दृष्टि से झाँके तो शायद बहुत बार ख़ुद के साथ भी नहीं बैठ सके।) छूत-अछूत की बात कोई और करे तो भी बात कुछ समझ में आती है पर प्रगतिशील विचारधारा और उससे मिलते-जुलते विचारधारा को माननेवालों के बीच यह बात उठे तो अचंभित होना स्वाभाविक है।

छूत-अछूत की बात उठाना जैसे, किसे कहाँ जाना चाहिए, कहाँ नहीं जाना चाहिए, किसके साथ उठना-बैठना चाहिए और किसके साथ नहीं उठना-बैठना चाहिए, गणतांत्रिक मूल्यों के भी विपरीत है। इतिहास के पन्नों में तो जाइये ! स्टालिन ने क्यों हिटलर के साथ बैठ कर जर्मनी के साथ संधि-पत्र पर हस्ताक्षर किये ? बाद में हिटलर के ख़िलाफ़ लड़ाई में एक कैपिटलिस्ट आइजनहॉवर को ऐलाइड फ़ोर्सेसका कमांडर मान रूसी फ़ौजी को आइजेनहॉवर के अधीन किया। माओ ने क्यों कैपिटलिस्ट किसिन्जर के साथ बैठ दुनिया के हालातों पर चर्चा की और क्यों अमेरिका और चीन को नज़दीक लाने की कोशिश की ?

ऐसा करने से न स्टालिन और न ही माओ कैपिटलिस्ट हो गये थे। किसी के साथ बैठने से, या किसी खुले मंच में विरोधियों के साथ बैठकर अपनी बात कहने से कोई अपनी आईडियालॉजी नहीं खो देता। किसी अवार्डको लेकर भी विवाद उठाया जा रहा है। आख़िर नोबेल पुरस्कार या ज्ञानपीठ पुरस्कार में भी कैपिटलिस्टों का धन लगा हुआ है। प्रगतिशील विचारधारा के बहुसंख्य साहित्यकारों ने इन अवार्ड्स को स्वीकारा है। तो क्या इससे उनकी प्रगतिशीलता ख़त्म हो गई ? ज़ाहिर है ऐसा नहीं हुआ। तो फिर विवाद की जड़ शायद कहीं और ही है। शायद व्यक्तिगत लड़ाई-झगड़ों को आइडियोलॉजिकल ज़ामा पहनाया जा रहा हो। और यदि ऐसा है तो यह बहुत दुख की बात है।


ब्रिटिश इतिहासकार ए. जे. पी. टेलर और इतिहासकार ह्यूग ट्रेवर रोपर में टेलर की एक पुस्तक को लेकर ज़बर्दस्त विवाद हुआ था। टेलर और रोपर में गहरी मित्रता भी थी, जो इस विवाद के बाद भी क़ायम रही। टेलर ने बाद में एक साक्षात्कार में इस विवाद पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि यदि रोपर दोस्ती के कारण उनका विरोध करने से कतराते तो वे टेलर की नज़रों में गिर गये होते। पूरा का पूरा विवाद टेलर और रोपर ने बौद्धिक स्तर पर रखा था। उसे छुआछूत के स्तर पर नहीं उतारा। क्या हम ऐसा हिन्दी जगत में नहीं कर सकते ? किसी भी देश में विवाद इस स्तर पर नहीं उतारा जाता कि कोई फ़लां के साथ बैठ गया या फ़लां के मंच से बोल गया तो वह अछूत हो गया ?

प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान हर खेमे, हर गुट, हर आइडियालजी के साहित्यकारों को खुला मंच प्रदान करता रहेगा। हर किसी को अपनी बात कहने की छूट देगा। ऐसा इसलिए भी होगा क्योंकि प्रमोद वर्मा स्वयं प्रगतिशील थे और इसलिए न सिर्फ़ उदार थे पर गणतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी संपूर्ण आस्था थी। वे किसी भी मंच पर जाने से कतराते नहीं थे और अपनी बात ज़ोर देकर तीव्र बौद्धिकता के साथ रखने में सक्षम थे।

( लेखक छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक और प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के अध्यक्ष हैं)

9/25/2009

इस ख़तरनाक समय में...


ज्ञानरंजन के इस्तीफे और अन्य विवादों को लेकर प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव का प्रो. कमला प्रसाद का बयान


भोपाल 23 सितंबर, 2009 विगत कुछ दिनों प्रकाशित पत्रिकाओं-समाचार पत्रों के कुछ लेखों तथा हमारे सम्मानित लेखक ज्ञानरंजन की टिप्पणियों ने प्रलेस से संबंधित सांगठनिक स्तर पर कुछ सवाल पैदा किए हैं। प्रगतिशील लेखक संघ का महासचिव होने के नाते मेरी ज़िम्मेदारी बनती है कि उठाए गए सवालों के बारे में वस्तुस्थिति स्पष्ट करूं। सवाल हैं कि प्रमोद वर्मा संस्था्न द्वारा आयोजित ‘प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह’ में प्रलेस की भागीदारी क्यों हुई? प्रगतिशील वसुधा ने गोविंद वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान से फोर्ड फाउण्डे्शन की राशि से प्रदत्त कबीर चेतना पुरस्कार चुपके-चुपके क्यों ले लिया?

पहले प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह के बारे में बातें करें। इस आयोजन में जलेस-प्रलेस और जसम के अलावा अन्य महत्वपूर्ण लेखकों को आमंत्रित किया गया था। संस्थान की ओर से भेजे गए पहले निमंत्रण पत्र में वे नाम थे जिन्हें आमंत्रण भेजा गया था। दूसरे और आखिरी निमंत्रण पत्र में वे नाम थे जिन्होंने आने की स्वीकृति दी थी। पूछने पर ज्ञात हुआ कि जिनकी स्वीकृति नहीं मिली उन्हें छोड़ दिया गया। जहां तक प्रमोद वर्मा का सवाल है, वे मार्क्सवादी और मुक्तिबोध, परसाई के साथी थे। वे प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष मण्डल में रहे हैं। छत्तीसगढ़ उनकी कर्मभूमि रही, इसलिए बहुत से लेखकों से उनके वैचारिक पारिवारिक रिश्ते थे। विश्वरंजन तब उसी क्षेत्र में पदस्थ होने के कारण प्रमोद जी की मित्र मण्ड्ली में थे। प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान बना-तो उसमें रूचि से वे सहयोगी बने। छत्तीसगढ़ के अनेक लेखकों के साथ आजकल वे इसके अध्यक्ष हैं। निर्णय का अधिकार अकेले उन्हें ही नहीं है। पृष्ठभूमि के रूप में इसे जानना जरूरी है। इस कार्यक्रम की घोषणा हुई तो मैंने छत्तीसगढ़ प्रलेस के साथियों से पूछा कि क्या स्थिति है? छत्तीसगढ़ के साथियों ने सलाह दी कि प्रमोद वर्मा पर कार्यक्रम प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान की ओर से है। सरकारी अनुदान नहीं है, इसलिए आना चाहिए। स्वीकृति देने वाले लेखकों में मैंने अनेक वैचारिक साथियों और संगठनों में शामिल लेखकों के नाम देखे तो जाना तय किया। समारोह में आने वालों में छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण लेखकों के अलावा खगेंद्र ठाकुर, अशोक वाजपेयी, चंद्रकांत देवताले, शिवकुमार मिश्र, कृष्ण मोहन, प्रभाकर श्रोत्रिय जैसे नाम थे। कृष्ण मोहन और श्री भगवान सिंह को आलोचना पुरस्कार भी दिया गया था। अच्छी बात यह हुई कि प्रमोद वर्मा समग्र का प्रकाशन हुआ।

कार्यक्रम के उद्घाटन समारोह में मुख्यमंत्री और कुछ नेताओं के आने तथा विवादास्पद वक्तव्य देने पर वहां आए लेखकों में व्यापक प्रतिक्रिया हुई, और इनका आक्रामक उत्तर लोगों ने अपने-अपने वक्तव्यों में दिया। पूरे आयोजन में प्रमोद वर्मा की विचारधारा ‘मार्क्सवाद’ बहस का आधार बनी रही। इसी दौरान कहीं से चर्चा में सुनाई पड़ा कि एक मित्र लेखक ने ‘पब्लिक एजेण्डा' में विश्वरंजन अर्थात डी.जी.पी.छत्तीसगढ़ के सलवा जुडुम के समर्थन और नक्सलपंथियों के विरोध में छपे इंटरव्यू को मुद्दा बनाकर कार्यक्रम में शामिल होना स्थगित किया है। उस समय तक लोगों ने ‘पब्लिक एजेण्डा’ का इंटरव्यू नहीं देखा था। इसके अलावा, सीधे भाजपा शासित सरकारी कार्यक्रम न होने के कारण लोग इसमें आए थे। उन्हें पहले से पता था कि सलवा जुडुम भाजपा सरकार के एजेण्डे में है। आमंत्रित लेखकों ने प्रमोद वर्मा स्मृति के पूरे आयोजन को लेकर कुछ आपत्तियां दर्ज कराईं। संस्थान के साथियों को परामर्श दिया गया कि इसे हमेशा सत्ता के प्रमाण से अलग रखा जाए।

छत्तीसगढ़ के जलेस-प्रलेस के साथियों तथा वामपंथी राजनीतिक दलों ने लगातार सलवा जुडुम के मसले पर सरकार का विरोध किया है। डॉ. विनायक सेन की गिरफ्तारी के बाद उनकी रिहाई के लिए हुए आंदोलन में ये सभी लेखक शामिल रहे हैं। लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों में यह प्रमुख मुद्दा था। याद रखना होगा कि अपनी-अपनी तरह से हत्यारी नीतियां छत्तीसगढ की ही नहीं अन्य भाजपा शासित राज्यों की भी हैं। मध्य‍प्रदेश में पिछले छह वर्षों में अल्पसंख्यकों पर सैंकड़ों अत्याचार और हत्याएं हुईं हैं। प्रलेस के लेखकों ने यहां लगातार सरकारी कार्यक्रमों का समय-समय पर विरोध और यथासमय बहिष्कार किया है। एक सूची प्रकाशित की जानी चाहिए कि मध्यप्रदेश में और इन सारे प्रदेशों के सरकारी कार्यक्रमों में किनकी-किनकी कहां-कहां भागीदारी रही है। मैं नहीं मानता कि गैर सरकारी प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह में शामिल होने मात्र से लेखकों का हत्यारों के पक्ष में खड़ा होना कहा जाएगा।

साथियों की ओर से उठाया गया अन्य सवाल वसुधा के फोर्ड फाउण्डेशन की राशि से कबीर चेतना पुरस्कार लेने का है। मैं यह स्पष्ट कर दूं कि संस्था़न से स्पष्ट जानकारी के बाद कि यह पुरस्कांर राशि संस्थान की ओर से है फोर्ड फाउण्डेशन की ओर से नहीं, संपादकों ने चुपके-चुपके नहीं, एक समारोह में यह पुरस्कार प्राप्त किया है। लोग जानते हैं कि गोविंद वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान इलाहाबाद केंद्रीय विश्वंविद्यालय का एक प्रभाग है। दलित संसाधन केंद्र उसकी एक इकाई है। दलित संसाधन केंद्र की ओर से विगत कई वर्षों से दलितों की स्थितियों पर अध्ययन होता रहा है। संस्थान द्वारा दलितों के बारे में दस्तावेजीकरण के अलावा इलाहाबाद तथा भोपाल जैसे अन्य शहरों में केंद्र की संगोष्ठियां हुईं हैं। मुझे याद नहीं पड़ता कि हिंदी का कौन-सा महत्वपूर्ण लेखक है जो इन कार्यक्रमों में नहीं गया और मानदेय स्वीकार नहीं किया। जहां तक कबीर चेतना पुरस्कार की बात है, पहले हंस और तद्भव ने ये पुरस्कार लिए हैं। इनके संपादक भी संगठनों के हिस्से हैं। प्रगतिशील वसुधा लगातार दलित साहित्य प्रकाशित करती रही है। एक विशेषांक भी प्रकाशित हुआ था, इसलिए निर्णायकों ने इस पत्रिका की पात्रता तय की है। प्रलेस से सीधी जुड़ी होने के कारण प्रगतिशील वसुधा का ऑडिटेड आय-व्यय खुले पन्नों में है। कभी भी देखा जा सकता है।

दोनों सवालों का तथ्यात्मक ब्यौरा पेश करने के बाद मेरा कहना है कि आज की परिस्थितियों में जिस तरह सांप्रदायिक शक्तियों का जाल देश में फैल रहा है, समूची मानवीय संस्कृति का बाज़ारीकरण हो रहा है, मूल्यों को तहस-नहस करने की साजिश है, उस समय अपने-अपने संगठन को अधिक क्रांतिकारी अथवा व्यक्तिगत रूप से स्वयं को अति-शुद्ध सिद्ध करने की कोशिश सांस्कृतिक आंदोलन की एकजुटता खण्डित करेगी। मर्यादाएं टूटने के बाद आंदोलन छूट जाएगा और लोग व्यक्तिगत हमलों पर उतर आएंगे। माना कि अब लेखकों के संगठन प्रेमचंद कालीन नहीं हैं, हो भी नहीं सकते। पर आज की परिस्थितियों में जो संभव है, हो रहा है। जरूरत पड़ने पर इनका जुझारू रूप देखा जा सकता है। इनके बिना सामाजिक-सांस्कृतिक प्रश्नों पर आवश्‍यक सामूहिक पहल की कल्पना असंभव होगी। विरोधी शक्तियां इन्हें तोड़ना चाहती हैं। कदाचित इनके विघटन की प्रक्रिया शुरू हो गई तो वह दिन खतरनाक होगा।

8/12/2009

चरणदास चोर



यह अकल्पनीय था कि कीर्तिशेष रंगकर्मी हबीब तनवीर के विश्वप्रसिध्द नाटक ''चरणदास चोर'' पर उनके अपने प्रदेश याने छत्तीसगढ़ की सरकार ही प्रतिबंध लगा देगी। इसलिए जब कुछ अखबारों के माध्यम से यह जानकारी मिली तो विश्वास न करने का कोई कारण नहीं था तथा इस स्थिति में रोष, चिंता व आश्चर्य की मिलीजुली भावनाएं उमड़ना स्वाभाविक ही था। लेकिन इसके बाद खबर का जैसे-जैसे खुलासा हुआ यह समझ आया कि सरकार, मीडिया, प्रतिबंध की मांग करने वाले व इसका विरोध करने वाले सबने अपनी-अपनी तरफ से अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़े एक संवेदनशील मसले को उलझाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। जिस धैर्य व विवेक का परिचय दिया जाना चाहिए था वह इनमें से किसी ने नहीं दिखाया।


यह तथ्य सबसे पहले स्पष्ट कर लेना चाहिए कि छत्तीसगढ़ सरकार ने ''चरणदास चोर'' नाटक के मंचन पर या पुस्तक की बिक्री पर कोई रोक नहीं लगाई है। छत्तीसगढ़ सरकार ने, जहां तक हमारी जानकारी है, ऐसा कोई आदेश जारी नहीं किया है। इसके बाद इस तथ्य का उल्लेख करना लाजिमी है कि छत्तीगसढ़ शासन के स्कूली शिक्षा विभाग ने विभागीय मंत्री और सचिव के फोन पर दिए निर्देश के अनुरूप, 31 जुलाई की शाम वाणी प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित चरणदास चोर पुस्तक का पुस्तक वाचन अभियान के दौरान वाचन न करने का आदेश जारी किया। इस आदेश में प्रदेश के सभी जिला शिक्षा अधिकारियों को कहा गया कि वे इस 'प्रतिबंधित पुस्तक' की प्रति स्कूलों से बुलाकर अपने पास जमा कर लें। लेकिन उसमें मंचन पर रोक तथा पुस्तक वाचन सप्ताह के बाद रोक जारी रहने की बात नहीं थी। अब इस मामले को विस्तार में समझने की जरूरत है।


हबीब साहब का यह नाटक संभवत: 1987 मे पुस्तकायन नामक प्रकाशक ने छापा था। 2004 में वाणी प्रकाशन ने इसका नया संस्करण छापा। इसमें लेखक की जो प्रस्तावना थी वह पहले संस्करण की भूमिका से भिन्न थी। इसमें सतनामी समाज एवं सतनाम पंथ के प्रति हबीब तनवीर ने प्रशंसायुक्त विचार व्यक्त किए हैं, लेकिन ऐसी दो पंक्तियां हैं जो संभवत: किवदंती पर आधारित हैं अथवा असावधानी में लिखी गई हैं और जिन पर सतनामी समाज का रुष्ट होना सहज है। समाज के एक चर्चित नेता गुरु बालदास ने इसीलिए 2004 में नया संस्करण प्रकाशित होने के बाद मुख्यमंत्री डॉ। रमनसिंह से इसकी शिकायत की तथा आपत्तिजनक अंशों को विलोपित करने की मांग की। गुरु बालदास द्वारा आपत्ति दर्ज करना एक विधिसम्मत कदम था। यद्यपि यह शायद बेहतर होता कि वे हबीब तनवीर से सीधे संपर्क कर उनसे ही मांग करते कि वे उन दो वाक्यों को पुस्तक से हटा दें। फिर भी उन्होंने कोई उग्र कदम नहीं उठाया इसे नोट किया जाना चाहिए। 2004 में राज्य सरकार ने इस पर क्या कार्रवाई की यह पता नहीं चल पाया। संभवत: बात आई-गई कर दी गई। शिकायतकर्ता के पास स्वयं कोई रिकार्ड नहीं है। हमने उनसे पिछली शिकायत का ब्यौरा मांगा, लेकिन नहीं मिल पाया। अगर राज्य सरकार ने उस समय कोई आदेश किया होगा तो सामान्य प्रशासन विभाग, संस्कृति विभाग, शिक्षा विभाग अथवा वाणी प्रकाशन के पास उसकी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।


सन् 2008 में वाणी प्रकाशन ने ही इस पुस्तक का नया संस्करण छापा। पुस्तक में प्रथम पृष्ठ पर दी गई सूचना से पता चलता है कि छत्तीसगढ़ राज्य के स्कूली शिक्षा विभाग की पुस्तकालय विकास योजना के तहत यह पुस्तक छापी गई है। याने सरकार ने बड़ी संख्या में पुस्तक खरीदी और उसे स्कूलों में भेजा। यहां आकर सवाल उठता है कि क्या स्कूली शिक्षा विभाग को 2004 में दर्ज की गई आपत्ति के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। दूसरा प्रश्न उठता है कि पुस्तक खरीदने के पहले क्या उसका सावधानी से अध्ययन किया गया था। तीसरा प्रश्न भी है कि विभाग की पुस्तक खरीद की रीति-नीति क्या है। ये सारे सवाल उठाना लाजिमी है क्योंकि अगर स्कूली शिक्षा विभाग ने हर कदम पर आवश्यक सावधानी बरती होती तो इस तरह का विवाद खड़ा नहीं होता तथा राज्य सरकार को आलोचना का सामना न करना पड़ता।जब 2008 का संस्करण स्कूलों में पहुंचा तो एक बार फिर गुरु बालदास ने मुख्यमंत्री और स्कूली शिक्षामंत्री से मिलकर अपनी आपत्ति विधिसम्मत रूप से दर्ज की। इस बार सरकार हरकत में आई और 31 जुलाई को उपरोक्त आदेश जारी कर दिया। यहां रेखांकित करना चाहिए कि छत्तीसगढ़ राज्य की भाजपा सरकार ने हबीब तनवीर के प्रति कोई पूर्वाग्रह नहीं दिखाया अन्यथा उनकी किताब इतनी बड़ी संख्या में खरीदी ही क्यों जाती। लेकिन गुरु बालदास की आपत्ति मिलने के बाद जिस सुसंगत तरीके से कार्रवाई होना चाहिए थी वह नहीं हुई। ऐसा लगता है कि जबानी जमाखर्च ही चलता रहा। सरकार अगर ठीक से ध्यान देती तो पुस्तक की भूमिका में जो दो आपत्तिजनक वाक्य हैं उन्हें विलोपित करने का आदेश जारी होता और बात वहीं खत्म हो जाती। ऐसा न कर मानो हड़बड़ी में पुस्तक वाचन अभियान के दौरान पुस्तक न पढ़े जाने का आदेश जारी कर दिया गया जिसकी जरूरत नहीं थी। फिर आदेश में ''प्रतिबंधित पुस्तक'' संज्ञा का दो बार लापरवाही के साथ प्रयोग किया गया जिससे भ्रम फैल सकता है।


इस प्रकरण को बिना ठीक से समझे दो-तीन अखबारों ने जो रिपोर्टिंग की उससे भ्रम ज्यादा फैला, और देश भर में बुध्दिजीवियों के बीच तीखी प्रतिक्रिया हुई। एक समाचार में पुस्तक पर प्रतिबंध के साथ-साथ नाटय मंचन की प्रतिबंध की बात भी लिखी गई, जबकि आदेश में ऐसा नहीं कहा गया था। इसी समाचार में स्कूली शिक्षा मंत्री के हवाले से मंचन पर रोक लगाने की बात कही गई लेकिन उन्हें अधिकारिक रूप से उध्दृत नहीं किया गया। इस पत्र ने विभाग के सचिव से जरूर चर्चा की, जिन्होंने ''इस विवादित पुस्तक को प्रतिबंधित'' करने की बात कही। लेकिन आदेश जारी होने के बाद अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की। इसके बाद विरोध के स्वर उठना प्रारंभ हुए। सबसे पहले सीपीआईएम की प्रदेश इकाई ने निर्णय की आलोचना की, लेकिन उसने भी आदेश को देखना शायद जरूरी नहीं समझा। दिल्ली और भोपाल में भी छत्तीसगढ़ सरकार के निर्णय की घोर निंदा की गई। लेकिन यह सब एक अंग्रेजी अखबार में छपी रिपोर्ट के आधार पर ही हुआ तथा यह समझना कठिन नहीं है कि प्रकरण की पूरी जानकारी किसी के पास भी नहीं थी। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पुस्तकों और छुटपुट लेखों पर प्रतिबंध या अन्य सरकारी कार्रवाई करने का यह पहला मौका नहीं है। कांग्रेसी सरकार के समय में तो एक मंत्री के पिता और एक स्वतंत्र फीचर लेखिका को जेल की हवा भी खानी पड़ी थी। दरअसल इस नए प्रदेश की मुश्किल यही है कि साहित्य और संस्कृति के विविध आयामों के बारे में सरकार ने पिछले नौ साल में कभी भी सुचिंतित सोच का परिचय नहीं दिया है। चरणदास चोर पर प्रतिबंध इस आधी-अधूरी और चलताऊ मानसिकता का ही परिणाम है।''देशबन्धु'' सभी पक्षों से इस संवेदनशील प्रश्न पर समझदारी का परिचय देने का अपील करता है। हमारी मांग है कि छत्तीसगढ़ सरकार पुस्तक के वाचन पर लगा प्रतिबंध तुरंत हटाए। हमारी दूसरी मांग है कि पुस्तक की भूमिका से आपत्तिजनक पंक्तियां हटा दी जाए। हबीब तनवीर की एकमात्र वारिस सुश्री नगीन तनवीर को इसमें अपनी ओर से भी पहल करनी चाहिए। पुस्तक के विवादित अंश को विलोपित करने के साथ-साथ पुस्तक वापिस ग्रंथालयों में भेजी जाएं। फिर सरकार यह भी बताए कि उसकी पुस्तक खरीद नीति व प्रक्रिया क्या है तथा इसे सुचारू बनाने के लिए विशेषज्ञों की सलाह ली जाए। जिन अधिकारियों की लापरवाही से बिना सुधार के पुस्तक का नया संस्करण छप गया उनके बारे में भी सरकार विचार करे। हम अपने रचनाशील मित्रों व पत्रकारों को भी संयम बरतने की सलाह देंगे। अपनी निजी जानकारी की बिना पर यह जिक्र करना मुझे जरूरी लगता है कि मुख्यमंत्री डॉ। रमनसिंह ने हबीब तनवीर की बीमारी के समय एवं उनकी मृत्यु के बाद सरकारी स्तर पर आवश्यक वित्तीय प्रबंध करने के लिए भी स्वीकृति प्रदान की थी। इसलिए इस प्रकरण को सांप्रदायिक रंग देना उचित नहीं होगा। और अंत में सतनामी समाज को इस बात के लिए धन्यवाद देना चाहेंगे कि उन्होंने कानून अपने हाथ में लेने जैसा कोई अप्रिय कदम नहीं उठाया। अपनी धार्मिक, सामाजिक भावनाएं आहत होने पर आए दिन जो समूह हिंसक उपद्रवों पर उतर आते हैं उन्हें इससे सीख लेना चाहिए।(साभार)

ललित सुरजन

संपादक, देशबन्धु

रायपुर, छत्तीसगढ़

7/16/2009

कविता लिखनेवाला अधिक लड़ता है


डॉ. बलदेव
मुख्यमंत्री डॉ। रमन सिंह बहुत ठीक कहते हैं कि राज्य में कविता और लड़ाई साथ चलेगी। यह सिर्फ़ विश्वरंजन से मतलब नहीं सधनेवाले विरोधियों को दिया गया जबाव नहीं अपितु उन सारे बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, मीडियाकरों को भी चेतावनी है कि भाई, जिस तरह से आपने हिंसक और अराजक माओवादी और भ्रामक और पक्षपातपूर्ण तरीक़े से मानवाधिकार की वकालत की है उससे जुझ़ने के लिए केवल पुलिस को ही नहीं सभी को कविता और लड़ाई साथ-साथ करनी होगी । क्योंकि तिल को ताड़ बनाना सिर्फ़ आप ही नहीं जानते, हमारी जनता, सरकार और सारे सरकारी लोग भी उसका मुँहतोड़ जबाव देना जानते हैं।

साहित्य एक युद्ध ही तो है, जिसमें बाहर की लड़ाई भीतर लड़ी जाती है । लड़ाई के पीछे भी कहीं ना कहीं साहित्य क्रियाशील रहता है, जो उसके औचित्य-अनौचित्य को सिद्ध करता है । साहित्य मूलतः युद्ध की मनाही पर ज़ोर देता है, उसके स्थानापन्न विकल्पों की तलाश करता है और युद्ध अंततः साहित्य बनकर इतिहास के पन्नों में रेखांकित होकर सुनहरे भविष्य के विकल्पों का अभिज्ञान कराता रहता है । समय का मार्गदर्शन करता है । साहित्य और युद्ध दो पूरक क्रियायें हैं । आख़िर दोनों का लक्ष्य आत्मरक्षा होता है । साहित्यकार बाहर की लड़ाई को अधिनियमित करते हुए भीतर ही भीतर लड़ता है और योद्धा बाहर लड़ता है और भीतर की लड़ाई की दिशा तय करता है ।

चाहे वह कोई भी समय रहा हो, राज्य नामक व्यवस्था में दोनों ही सदैव प्रासंगिक और अपरिहार्य रहे हैं । राजशाही से लेकर वर्तमान गणतंत्र तक, हर व्यवस्था में साहित्यकार और योद्धा साथ-साथ सम्मान अर्जित करते रहे हैं । यदि छत्तीसगढ़ का पुलिस-मुखिया विश्वरंजन भीतर-बाहर दोनों लड़ाई में पारंगत हैं तो यह अयोग्यता नहीं अपितु सौभाग्य का विषय होना चाहिए । यह शुष्क पुलिस तंत्र की असंवेदनशीलता के विरूद्ध एक उत्तेजक और प्रेरक जन्मघूँटी भी है, जो लगातार असहिष्णुता की सीमा लांघते समय और परिस्थिति में अपरिहार्य है । जनता की भावनाओं, स्वप्नों और आकांक्षाओं को सिर्फ़ लाठी, बंदूक पकड़कर नहीं, शब्द और क़लम पर भी विश्वास रखकर अधिक सुगमता से फलीभूत किया जा सकता है । और यदि ऐसा विश्वरंजन करते हैं तो यह किस तरह आपत्तिजनक है, समझ से परे है ?

विगत 12 जुलाई को जब मदनवाड़ा में गणतंत्र के दुश्मनों के ख़िलाफ़ हमारे जांबाज और अदम्य पराक्रमी बी। के चौबे, गुप्ता और उनके साथी शौर्य का स्वर्णिम इतिहास रच रहे थे तब व्याकुलता और चिंता के साथ उनका पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन ही मार्गदर्शन कर रहे थे । जो यह कहते नहीं थक रहे कि वे उस समय साहित्य रस ले रहे थे, वे सिर्फ़ पूर्वाग्रही हैं, झूठे हैं । जो लोग 10-11 जुलाई को आयोजित साहित्य समारोह के बहाने डीजीपी विश्वरंजन की खामी निकाल रहे हैं यह न भूलें कि उनमें से ही कुछ अतिवादी किस्म के साहित्यकार और बुद्धिजीवी ठीक तब कविता पाठ के साथ-रसगुल्ला का स्वाद चख रहे थे जब हमारे राज्य के अनेकों बहादुर सिपाहियों के साथ छत्तीसगढ़ के माटी के सपूत और पुलिस अधीक्षक श्री चौबे के शहीद होने की ख़बर उनके टेबिल तक पहुँच चुकी थी ।

हम प्रमोद वर्मा पर केंद्रित आयोजन के परिप्रेक्ष्य में यह भी नहीं भूलें कि यह कार्य यहाँ के राजनेता, प्रबुद्ध वर्ग, साहित्यिक उत्थान का दंभ भरनेवाले तथाकथित जनतांत्रिक संगठनों और जनता का था जिसे उन्होंने एकसिरे से बिसार दिया था और जिसे एक पुलिस अधिकारी ने कर दिखाया। प्रमोद वर्मा मार्क्सवादी सौंदर्य चेतना में विश्वास करते हुए भी देशीय राग के हिमायती और हिंसात्मक विध्वंस के ख़िलाफ़ थे । वे समाजवादी प्रजातंत्र के हिमायती थे । उनके नज़रों में जनता से बड़ा कोई नहीं था । सत्ता भी नहीं । चाहे वह मार्क्सवादियों की हो या फिर माओवादियों की । जो लोग इस आयोजन से स्वयं को बौना पा रहे हैं वे इस समय अपनी लेखों और विज्ञप्तियों में अपनी भड़ास उतार रहे हैं । यह सभी जानते हैं कि ऐसे बुद्धिजीवियों या साहित्यिक संगठनों के अगुमा किस तक तक लिटरेरी डेमोक्रेसी और कितनी पवित्रता से क्या क्या करते रहे हैं ? उनके समझाइस या बडबोलेपन से लेकर इस राज्य का ना तो कभी सांस्कृतिक विकास हुआ है ना ही प्रजातांत्रिक ।

क्या इस सम्मेलन में राज्य के मुख्यमंत्री और महामहिम की भी भागीदारी नहीं थी ? ऐसे में क्या उन्हें भी मना कर दिया जाये कि वे ऐसे साहित्यिक आयोजनों से परहेज करें और ऐसा करना जनता और राज्य के हित में नहीं है । हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह आयोजन इसलिए भी महत्वपूर्ण साबित हुआ है, क्योंकि हमारे राज्य के मुखिया ने देश भर के बुद्धिजीवियों, आलोचकों, साहित्यकारों को छत्तीसगढ़ की महाविपदा माओवादी हिंसा को लेकर भी संबोधित किया और महामहिम राज्यपाल ने शासकीय अधिकारियों द्वारा अपने कर्तव्यों की औपचारिकता के बाद समाज के लिए किये जानेवाले कार्यों को समाज और देशसेवा करार दिया । और यह भी हमें नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी हर वक्त सिर्फ़ कर्तव्य पर ही नहीं जुटा होता । न मैं, न आप और न ही दुनिया का कोई। वह अपने जैविक, सांस्कृतिक, मौलिक और सामाजिक अधिकारों के प्रति भी सचेत रहता है और यही उसके कर्तव्यों को बल प्रदान करता है ।

जिन्होंने विश्वरंजन को 12-13 जुलाई को मानपुर-मदनवाड़ा के रास्ते में सैनिक वर्दी में देखा है वे बखूबी समझ सकते हैं कि उस समय एक कवि सेनापति किस तरह द्वंद्व और पीड़ा से गुज़र रहे थे। अपने बहादुर और शौर्यवान् नायकों को खोने का ग़म सिर्फ़ परिजन, नेता या जनता को नहीं उस सेनापति को भी होता है जिसके बल पर वह राज्य की शांति और सुरक्षा के लिए नेतृत्व भी करता है। स्वस्थ माँग, जायज आरोप और नैतिक टिप्पणी प्रजातंत्र को मज़बूत बनाती हैं किन्तु उसका भी समय होता है । असमय और आकारज टिप्पणी से तंत्र हतोत्साहित होता है । उसे अपनी उदात्त जनसेवा के उत्तर में मूर्खतापूर्ण आरोप से निराशा होती है । ऐसी घटनाओं का हल राजनीतिक चश्मे से कभी भी नहीं दिखा है। यह कितनी विडम्बना की बात है कि छत्तीसगढ़ में सक्रिय अनेक राजनीतिक घटक आज भी माओवादी हिंसा को प्रजातंत्र के विरूद्ध नहीं मानते हुए उसे मात्र सिर्फ़ सरकार की ग़रज बताते हैं । यह हमारे प्रदेश की अबौद्धिकता और निहायत अलाली नहीं तो और क्या है कि अब तक किसी भी तथाकथित सांस्कृतिक गरिमावाले लेखक, साहित्यकार, विचारक, शिक्षाविद की तरफ़ से मदनवाड़ा में हुए शहीद के प्रति न तो श्रद्धांजलि स्वरूप कोई टिप्पणी आयी है न ही कोई पहल । क्या हम अपने राज्य को ऐसी मौन अभिव्यक्ति का पाठ पढ़ाना चाहते हैं ? यदि हाँ, तो हमें उस मुक्तिबोध की दुहाई देने का कोई अधिकार नहीं बनता जिसके कहा था – तोड़ने ही होंगे मठ, उठाने ही होंगे अभिव्यक्ति के ख़तरे । मनुष्य नहीं कहेगा तो और कौन बोलेगा ।

किसी साहित्यकार को यह कहना कि वह साहित्य से सर्वथा दूर रहे ठीक उस तरह होगा कि वह साँस न ले । भोजन न करे । वह पुलिस की नौकरी करता है अतः वह सिर्फ़ लाठी चौबीसों घंटे पकड़कर गली-गली भटकता रहे और जनता चैन की नींद सोती रहे । यदि हम समाज को ऐसे ही देखना चाहते हैं भगवान बचाये ऐसे लोगों से । तब तो कोई यह भी कहेगा कि गुरूजी दिन के अलावा रात भर स्कूल खोलें रखे । न्यायाधीश चौबीसों घंटे कोर्ट में बैठें । सीमा के प्रहरी घर भी न लौंटे। पायलेट हवाई जहाज से उतरे हीं नहीं । नेता मंत्रालय में ही बैठे रहें । प्रतिपक्ष सिर्फ़ धरना, आंदोलन ही करते रहें । क्या छत्तीसगढ़ की जनता इतनी निंरकुश और इतनी पलायनवादी हो चुकी है ।

आप भी बोलिए कि यह मात्र राज्य सरकार की समस्या नहीं । यह केवल पुलिस की ड्यूटी नहीं कि वह आपके छत्तीसगढ़ को नक्सली विपदाओं से मुक्त बनाये रखे । यह वक्त निर्णय लेने की घड़ी है कि आप किसका वरण करना चाहते है ? माओवादी हिंसक तंत्र का या प्रजातंत्र का । अब पानी सिर से उतर चुका है । हर बच्चा बोले, हर युवक बोले, माँएं बोले, रिक्शावाला बोले, किसान बोले, मज़दूर बोले, अधिकार बोले । बोलें कि बस्स बहुत हो चुका, सिर्फ़ पुलिस ही नहीं लड़ेगी हम लडेंगे भी और नक्सलवादियों के ख़िलाफ़ बोलेंगे भी । (लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं )

3/27/2009

बड़े आये चुनाव आयोग को समझानेवाले

व्यंग्य
विश्वरंजन साहब ! नक्सलियों से दो-दो हाथ लेना, उन्हें इस हद तक दबाव में ले आना कि वह बातचीत करने की तैयारी करने लगें एक बात है और चुनाव आयोग से लोहा लेना दूसरी बात । आप इतने दिनों से शासन में अधिकारी रह चुके हैं । आई-बी में भी थे और चुनाव आयोग के अंहकारी स्वभाव के बारे में आपको खुफिया जानकारियाँ भी ज़रूर होंगी। आप को मालूम ही होना चाहिये था कि आयोग का चपरासी भी आपके बाप-तुल्य है। आयोग के छोटे और मध्यम स्तर के अधिकारी आपके पितामह-तुल्य हैं। उसके ऊपर तो सभी ईश्वर-तुल्य हैं। आप क्यों गये थे उन्हें समझाने ? कैसे भूल गये कि समझने-समझाने से ऊपर की स्थिति में होता है आयोग और उसके अधिकारी। आपको क्या नहीं मालूम था जिन पुलिस अधीक्षकों के अस्मिता के लिये आपने आवाज़ उठाई उसे आयोग, चाहे तो आयोग का चपरासी भी यह पाठ पढ़ा सकता है कि बस्तर में नक्सलियों से कैसे लड़ा जाये....

पर विश्वरंजन जी आप बहुत भोले हैं, बहुत सरल हैं। कवि जो ठहरे । चित्रकार जो ठहरे । अब कवि तो सच ही बोलेगा। पर आप सिर्फ कवि नहीं हैं विश्वरंजन साहब, आप एक पुलिस अधिकारी भी हैं। डीजीपी। हैं। इतना तो आप जानते ही होंगे कि प्रशासनिक अधिकारी को बहुत बार झूठ का सहारा लेना पड़ता है। सच पर हमेशा अड़ियेगा तो मरियेगा ही। और फिर सच के लिये या अपने अधीनस्थ अधिकारियों की मान-मर्यादा के लिये तो बेवकूफ ही लड़ते-भिड़ते हैं। अच्छा अधिकारी ऊपर वालों की चापलूसी करता है और अधीनस्थ अधिकारियों को लात मारता है। और आपने तो ‘साहबों’ के दोगले चरित्र को अपनी बहुत सारी कविताओं में रेखांकित भी किया है। फिर आप कैसे ग़लती कर बैठे, आयोग के वाले साहबों के मनोविज्ञान को समझने में ?

आप शायद यह भी भूल गये कि सबसे बड़ा आतंकी अधिकारी ही होता है। जिसके पास जितना अधिकार वह उतना बड़ा आतंकी ! और चुनाव आयोग के पास तो अधिकार ही अधिकार हैं। चुनाव के दौरान तो न्यायालयों का भी डर नहीं है उसे । कोई सुनवाई की गुंजाइश नहीं है। किसी राज्य में आयोग का जो कारिन्दा है या जो कारिन्दे चुनाव के दौरान कुछ दिन के लिये तैनात कर दिये जाते हैं वे कैसे भी हों आयोग की नज़रों में राजा हरिश्चद्र होते हैं ? हरिश्चन्द्र कौन ? अरे वही जो डोम राजा के कारिन्द्रे थे काशी में।

पर राजा हरिश्चन्द्र तो सच्चे इंसान थे। सच ही बोलते थे। आज के हरिश्चन्द्रों की जमात ही कुछ और किस्म की है। बाज़ार में गर्म चर्चाओं को माने तो उनमें से एक तो दहेज प्रताड़ना के लिये अन्दर होना चाहिये था। कहा जा रहा है उस वक्त पुलिस को उस पर तरस आ गई। यह आपके छत्तीसगढ़ आने के पूर्व की घटना है विश्वरंजन साहब, जरा पुराने रिकार्डों का मुआयना कीजिये। भ्रष्ट्राचार की जाँच भी शायद आर्थिक अपराध शाखा कर रही है। एक अन्य कारिन्दे आज नहीं तो कल एक अपराधिक प्रकरण में फँस सकते हैं। बशर्ते पुलिस को तरस न आ जाये।

विश्वरंजन साहब, आपने बड़ी गलती की छत्तीसगढ़ आकर। उठा पटक के खेल में माहिर नहीं थे, न आपने किलाबन्दी की । नहीं तो नक्सलियों से लड़ने के पहले अपने आस-पास घुमते अधिकारियों की फाईले बनवाते । उनके खिलाफ पुराने प्रकरणों को फिर से खुलवाते। पहले आप “ब्लैकमेलिंग” कला में खुद को निपुण करते । और यदि आप यह सब नहीं करना चाहते थे तो क्या ज़रूरत थी चुनाव आयोग के कारिन्दों को राय-मशविरा देनें की। क्या ज़रूरत थी यह कहने की कि नक्सली क्षेत्र में पुलिस इंतेज़ाम उस इलाके में काम करने वाला पुलिस अधिकारी ज्यादा सही तरीके से कर सकता है। आपको जानना चाहिये था कि आयोग के कारिन्दे ऐसा नहीं मानते । आप फिजूल ही अपने लेखों में जब-तब यह शेर उद्धित करते रहे हैं-
जब तक ऊँची न हो ज़मीर की लौ
आँख को रौशनी नहीं मिलती

अब आप रौशनी देने चले थे उन्हें जिनके ज़मीर में आग ही नदारत थी। तो आपको चारों खाने चित होना ही था। जो चाह कर भी नक्सली नहीं कर पाये चुनाव आयोग कर गया। पर एक बात माननी पड़ेगी। आप गिरे ज़रूर पर टकराने के बाद गिरे। गिरते हैं सर सवार ही मैदाने जंग में । आप घुटनों के बल रेंगते हुए नहीं गिरे। देखिये न आपके चारों ओर दूसरे राज्यों के डीजीपी तो बिना कारण ही हटाये जा रहे हैं। चुनाव आयोग अतुलित बलधामा है। वह हरि है। और हरि के विषम में ज्यादा नहीं लिखा जा सकता। पाप लगता है। क्योंकि हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता.......
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-डॉ राजेन्द्र
पहचान प्रकाशन, कुशालपुर, रायपुर

6/20/2008

छत्तीसगढ़ी : लोकभाषा से राजभाषा तक


-कनक तिवारी

छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण से कुछ मनोवैज्ञानिक परिस्थितियाँ और मुद्दे उभर कर आए हैं। भाषा को लेकर कुछ महत्वपूर्ण मांगे और स्थापनाएँ की जा रही हैं। मसलन छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी को तरजीह देनी होगी। इन स्थापनाओं की पड़ताल की ज़रूरत है। ये मोटे तौर पर इस तरह हैं:-
(1) छत्तीसगढ़ का प्रशासन छत्तीसगढ़ी में चलाया जाए।
(2) छत्तीसगढ़ी को छत्तीसगढ़ की भाषा घोषित किया जाए।
(3) छत्तीसगढ़ के मूर्धन्य साहित्यकार जिनकी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी रही छत्तीसगढ़ी में कुछ नहीं लिखने के कारण छत्तीसगढ़ी की उपेक्षा के लिए शासन और प्रशासन से अधिक दोषी हैं।
(4) छत्तीसगढ़ी लेखकों को विशेष सम्मान प्राप्त होना चाहिए।
(5) छत्तीसगढ़ी को मानक भाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए।

भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार छत्तीसगढ़ी हिन्दी का ही स्वरूप है। वह अवधी तथा बघेलखंडी से काफ़ी मिलती है। प्रसिध्द विद्वान डॉ. ग्रियर्सन ने कहा है 'यदि कोई छत्तीसगढ़ी अवध में जाकर रहे तो वह एक ही सप्ताह में वहाँ की बोली इस तरह बोलने लगेगा मानो वही उसकी मातृभाषा हो। इतिहासकारों के अनुसार इसका मुख्य कारण हैहयवंशियों का राज्य भी हो सकता है, क्योंकि वह अवधी के इलाके के ही रहने वाले थे। छत्तीसगढ़ी का व्याकरण डॉ. हीरालाल ने लिखा था, जिसका अनुवाद डॉ. ग्रियर्सन ने किया था। उसका संशोधित संस्करण वर्षों पूर्व लोचन प्रसाद पांडेय के संपादन में प्रकाशित हुआ है।

अनुच्छेद 351 ये बौध्दिक स्थापनाएँ करता है।
1. हिंदी का प्रसार और विकास संघ का कर्तव्य है।
2. हिंदी को भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाता है।
3. हिंदी की (मौजूदा) प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिन्दुस्तानी, अन्य भारतीय (प्रादेशिक) भाषाओं और मुख्यतया संस्कृत शब्द, रूप, शैली आदि ग्रहण करते हुए हिंदी को समृध्द करना है।

इस संवेदनशील बिन्दु पर आकर छत्तीसगढ़ी को राजभाषा बनाने के सवाल पर विचार हो सकता है। यह बेहद दुखद और आश्चर्यजनक है कि संविधान हिंदी की अभिवृध्दि के लिए हिंदी रूपों वाली लोकबोलियों जैसे बृज भाषा, अवधी, बैसवारी, मैथिल, भोजपुरी, मालवी, निमाड़ी, बुन्देलखंडी, बघेलखंडी, हरियाणवी आदि पर निर्भर नहीं रहना चाहता।

यदि छत्तीसगढ़ी को भी राजनीति के सहारे शासकीय कामकाज की भाषा बना दिया गया तो वह अपनी जनसंस्कृति की केंचुल छोड़ देगी। छत्तीसगढ़ी भाषा या बोली के इतिहास, भूगोल, ध्वनिशास्त्र और प्रेषणीयता को लेकर शोध प्रबंध लिखना संभव हो सकता है लेकिन इस भाषा या बोली को रोजमर्रे के कामकाज में गले उतारना सरल नहीं है। संविधान में ऐसे कई प्रावधान हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। मूलभूत अधिकारों का तीसरा परिच्छेद पेंचीदगियाँ पैदा करता है। अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समता उत्पन्न करने वाला द्विगु समास है। अनुच्छेद 16 भाषायी विषमता रहते हुए भी लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता देता है। युवा पीढ़ी का पूरा भविष्य इसी अनुच्छेद के विश्वविद्यालय में है। मंदिरों में इबादत करने के सेवानिवृत्त पीढ़ी के आग्रह की तरह छत्तीसगढ़ी का झंडा उन हाथों में ज़्यादा है जिनका कोई भविष्य नहीं है। भाषायी आंदोलन बेकारी भत्ता से लेकर पेंशन की अदायगी तक का अर्थशास्त्र भी होते हैं-यह बात हमने दक्षिण हिंदी विरोधी आंदोलनों के उत्तर में देखी है। अनुच्छेद 19 के वाक् स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य के छाते के नीचे खड़े होकर लोग अपनी रुचि की भाषा के अख़बार और किताबें पढ़ सकते हैं। बहरहाल जब तक छत्तीसगढ़ी आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं होती तब तक किसी न्यायालय को अधिकार नहीं है कि वह किसी गवाह तक का बयान छत्तीसगढ़ी में दर्ज करे। न्यायिक सेवा में गैर छत्तीसगढ़ी न्यायाधीश भी हैं। वे न्यायालय की भाषा अर्थात हिंदी और अँगरेज़ी में ही काम करने के लिए संविधान द्वारा संरक्षित हैं। यही स्थिति प्रशासनिक सेवा की है। वैसे भी केंद्रीय हिन्दुस्तान के विद्यार्थी सर्वोच्च नौकरशाही में ज़्यादा नहीं हैं। छत्तीसगढ़ के विश्वविद्यालय क्षेत्रीय भाषा में अध्यापन करने का मौलिक अधिकार नहीं रखते। उच्चतम न्यायालय ने 1963 में ही अपने फैसले में गुजरात विश्वविद्यालय में केवल गुजराती माध्यम में शिक्षा देने की कोशिश को नाकाम कर दिया है। शिक्षा पाने के अनुच्छेद 41 के नीति निदेशक को संविधान के हृदय स्थल अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन का अधिकार माना गया है। ऐसी स्थिति में सरकार को फिलहाल इस बात का अधिकार नहीं है कि वह छत्तीसगढ़ी को समग्र शिक्षा का माध्यम बनाए। यदि कुछ विद्यार्थी छत्तीसगढी भाषा और साहित्य पढ़ भी लेंगे तो हम उनकी सफलता की नदियों और झीलों के बदले तालाब रच देंगे। इसमें कोई शक नहीं कि विज्ञान, तकनीक, डॉक्टरी, समाजशास्त्र, गणित और कम्प्यूटर जैसे ढेरों ऐसे विषय हैं जिनमें सफलता के लिए छत्तीसगढ़ के विद्यार्थियों की मदद करनी होगी, उनकी दुनिया को संकुचित करने के लिए नहीं।

यह तथ्य है कि छत्तीसगढ़ी भाषा या बोली को लेकर जितने भी शोध विगत वर्षों में हुए हैं, उनमें पहल, परिणाम या पथ प्रदर्शन का बड़ा हिस्सा छत्तीसगढ़वासियों के खाते में नहीं है। यह मध्यप्रदेश का सौभाग्य रहा है कि यहाँ के विश्वविद्यालयों में बार-बार भाषा-विज्ञानी कुलपतियों की नियुक्तियाँ हुई है। डॉ. बाबूराम सक्सेना, डॉ. धीरेंद्र वर्मा और डॉ. उदयनारायण तिवारी जैसे भाषा विज्ञानियों ने मध्यप्रदेश की भाषायी स्थिति पर काम करने के लिए प्रेरणाएँ दी हैं। अकेले डॉ. रमेशचंद्र मेहरोत्रा सभी कट्टर तथा रूढ़ छत्तीसगढ़ी-समर्थक भाषा विद्वानों के बराबर होंगे, जिनकी निस्पृह, खामोश और अनवरत छत्तीसगढ़ सेवा का मूल्याँकन कहाँ किया गया है। छत्तीसगढ़ी बोली को हिंदी की जगह लेने के निजी आग्रह बौध्दिक-मुद्रा की ठसक लिए हुए हैं। छत्तीसगढ़ी की तुलना दक्षिण की भाषाओं या मराठी, बंगाली वगैरह से की जा रही है। समाचार पत्रों में जगह का आरक्षण माँगा जा रहा है।

डॉ. रमेशचंद्र मेहरोत्रा ने छत्तीसगढ़ को बीसियों छात्रों को डाक्टरेट की डिग्रियाँ दिलवाई हैं। एक वीतरागी की तरह जीवन जीने सेवानिवृत्ति के बाद वे छत्तीसगढ़ में ही बस गए हैं। कथित परदेश नहीं लौट गए हैं। वैसे मानक छत्तीसगढ़ी बोली का अब तक स्थिरीकरण कहाँ हुआ है। बस्तर, खैरागढ़ और सरगुजा की बोली पूरी तौर पर एक जैसी कहाँ है। बकौल भगवान सिंह वर्मा इसमें कोई शक नहीं कि छत्तीसगढ़ी बेहद सरस, प्रवाहमयी और लचीली होने के कारण ब्रज या बैसवारी की तरह मधुर है। यह तीन चौथाई छत्तीसगढ़ी आबादी द्वारा बोली भी जाती है। इन सभी विषयों और समस्याओं का विस्तार विद्वानों की पुस्तकों मे है, जिनमें भोलानाथ तिवारी, केएन तिवारी, हीरालाल शुक्ल, कांतिकुमार वगैरह का भी सरसरी तौर पर उल्लेख किया जा सकता है। छत्तीसगढ़ की विधानसभा ने प्रस्ताव पारित किया है कि उसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए। संविधान संशोधन के बगैर यह नहीं हो सकता। हिंदी की तमाम अन्य उपभाषाएँ या बोलियाँ प्रतीक्षा सूची में पचास वर्षों से लामबंद हैं। इक्कीसवीं सदी में छत्तीसगढ़ी भी पीछे आकर खड़ी हो गई है। छत्तीसगढ़ की सरकार ने पहली हिंदी से अँगरेज़ी की पढ़ाई को अनिवार्य कर दिया। एक तीन है तो दूसरी छह अर्थात् दोनों मिलाकर छत्तीस। संविधान में अनुच्छेद 350 एक और दिलचस्प तथा नामालूम-सा प्रावधान है। इसके अनुसार छत्तीसगढ़ की सरकार को प्रत्येक व्यक्ति को हिंदी में अभ्यावेदन देने का अधिकार है। छत्तीसगढ़ सरकार को चाहिए कि वह छत्तीसगढ़ी को हिंदी की उपभाषा करार देते हुए लोगों को यह छूट दे दे कि वे अपने अभ्यावेदन छत्तीसगढ़ी में करना शुरू कर दें। उन्हें उत्तर भी छत्तीसगढ़ी में ही देने शुरू किया जाना चाहिए। छत्तीसगढ़ी व्यथा, अन्याय, शोषण और हीनता के कोलाज की भाषा हैं। हिन्दी छत्तीसगढ़ी से सहानुभूति, सहकार और आश्वासन की। और अँगरेज़ी अन्तत: की जिसे शब्दकोश में अन्याय कहा जाता है। संविधान ने शिक्षा का मूलभूत अधिकार चौदह वर्ष तक प्रत्येक नागरिक को दिया है। भाषा का अलबत्ता वैकल्पिक अधिकार दिया है।

संविधान सभा में छत्तीसगढ़ से रविशंकर शुक्ल, घनश्याम सिंह गुप्त, बैरिस्टर छेदीलाल सिंह, किशोरीमोहन त्रिपाठी, गुरू आगमदास और रतनलाल मालवीय वगैरह सदस्य थे। इनमें से सबसे ज़्यादा घनश्याम सिंह गुप्त से यह उम्मीद की जा सकती थी कि वे संविधान सभा में छत्तीसगढ़ी के समर्थन में कुछ कहेंगे। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। अलबत्ता वे प्रबल हिंदी समर्थक के रूप में उभरे। छत्तीसगढ़ी के लेखक सभी श्रेष्ठ साहित्य का अनुवाद करने की पहल क्यों नहीं करते जिसमें न केवल ग्रामीण पाठक वर्ग परिचित हो बल्कि रचनाकर्मी भी छत्तीसगढ़ी अभिव्यक्तियों को समृध्द कर सकें। संविधान में उन प्रादेशिक भाषाओं का उल्लेख है जिनकी उपस्थिति लोक जीवन में इस तरह रही है कि उनके बिना संबंधित प्रदेशों में प्रशासन नहीं चलाया जा सकता। इनमें हिंदी की उपभाषाएँ शामिल नहीं हैं। इस भाषायी स्थिति को सामासिक आदतों के सहकार के साथ स्वीकार कर लिया गया है। संविधान के लागू होने के बाद सिंधी, कोकणी, और मैथिली, नेपाली वगैरह को संविधान के अंतर्गत मान्य भाषाओं का दर्जा दिया गया है। छत्तीसगढ़ी बोलने वालों की संख्या इनसे कम नहीं है। कार्यपालिका तथा न्यायिक प्रशासन जनता के सरोकार हैं, भाषा और बोली के जानकारों के नहीं।

संविधान में संशोधन किए बिना प्रशासन को भाषा से हटकर बोली में रूपांतरण करना संभव नहीं है। शीर्ष स्तर पर आज भी अँगरेज़ी न्यायिक और कार्यपालिका प्रशासन की भाषा है। छत्तीसगढ़ी में अँगरेज़ी में अनुवाद किए बिना सर्वोच्च स्तर पर इस क्षेत्र की निजी और सामूहिक समस्याएँ कैसे पहुँचेगी। छत्तीसगढ़ी की तरह हिंदी की उपरोक्त सहोदराएँ पचास साठ वर्षों से संविधान पुत्री घोषित होने के लिए प्रतीक्षारत हैं। इन सब संवैधानिक और अनुसंधानिक आवश्यकताओं को पूरा किए बिना छत्तीसगढ़ी को नए प्रदेश की राजभाषा घोषित करना कैसे मुमकिन किया जा सकता है?

(लेखक प्रख्यात अधिवक्ता एवं साहित्यकार हैं)

6/09/2008

संस्कृत की शक्ति को पहचानना होगा

छत्तीसगढ़ में भाषा विवाद
डॉ महेश चन्द्र शर्मा
छत्तीसगढ प्रदेश का यह महान सौभाग्य है कि यहां अनादिकाल से संस्कृत साधना होती रही है। श्रीराम, रामायण, माता कौशल्या और वाल्मीकि जी का इस पुण्य भूमि से संबंध रहा है। महर्षि वेदव्यास की पण्डवानी आज भी यहां गूंजती है। यहां के असंख्य संस्कृत कवियों और विद्वानों ने पूरे विश्व को अनेक संस्कृत महाकाव्यों के साथ विपुल संस्कृत साहित्य सौंपा। राष्ट्रभाषा हिन्दी के साथ राजभाषा छत्तीसगढ़ी का संस्कृत से बेहद अन्तरंग संबंध है। इसकी भाषा वैज्ञानिक एवं व्याकरणिक रचना संस्कृत के बहुत करीब है। स्वर्गीय हरि ठाकुर जी के साथ इस लेखक ने एक लेख लिखा था- 'संस्कृत और छत्तीसगढ़ी का अंतर्संबंध। काफी चर्चित और लोकप्रिय रहा था यह सांस्कृतिक आलेख। गोद के लिए संस्कृत में 'क्रोड है तो छत्तीसगढ़ी में 'कोरा है। संस्कृत का 'लांगल ही छत्तीसगढ़ में 'नागर (हल) है। वर्ष के लिए संस्कृत में 'वत्सर या 'संवत्सर है तो छत्तीसगढ़ी में 'बच्छर है। ऐसे असंख्य उदाहरण दिए जा सकते हैं। आशय यह है कि यदि छत्तीसगढ़ में प्राथमिक स्तर पर संस्कृत शिक्षा अनिवार्य की जाती है, तो यह स्वागतयोग्य कदम है। इससे छत्तीसगढ़ के स्वाभिमान, संस्कार और सुसंस्कृत शिक्षा में भी वृध्दि होगी। इससे छत्तीसगढ़ी को कोई क्षति नहीं होगी। अपितु छत्तीसगढ़ी हर तरह से समृध्द होगी। इस पृष्ठभूमि से छत्तीसगढ़ी नई ऊंचाइयां प्राप्त करेगी। संवेदनशील शासन के उक्त निर्णय का हरेक छत्तीसगढ़िया स्वागत करेगा। छत्तीसगढ़ में 30 से अधिक संस्कृत काव्य एवं सहस्त्राधिक अन्य ग्रन्थ लिखे गए हैं।

किन्तु 'छत्तीसगढ़ अस्मिता संस्थान के विद्वान संयोजक नन्द किशोर जी शुक्ल का लेख एक समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ। 'संस्कृत की बजाय शिक्षा छत्तीसगढ़ी में क्यों नहीं? इस शीर्षक से आए विचार अज्ञानतापूर्ण, भ्रामक, अप्रमाणिक, तथ्यों से परे एवं सौहार्द्र विरोधी हैं। जहां तक हमारी अल्प जानकारी है 'संस्कृत में नहीं अपितु 'संस्कृत की शिक्षा देने की योजना है। भ्रांतिमूलक आधार से शांतिमूलक विचार की आशा ही मृगतष्णा कहलाती है। सीखने का माध्यम संस्कृत को नहीं बनाया गया है। संस्कृत साहित्य को एक भाषा, साहित्य या विषय के रूप में पढ़ने-पढ़ाने की बात है। इसका हार्दिक स्वागत किया जाना चाहिए। बच्चों में भाषायी सद्भाव की नींव पड़ने के साथ-साथ राष्ट्रभाषा हिन्दी और राजभाषा छत्तीसगढ़ी की शब्दावली इससे समृध्दि होगी। उच्चारण की शुध्दता के साथ-साथ नैतिक संस्कार एवं जीवन मूल्यों से भी छत्तीसगढ़ का बालपन सुपरिचित होगा और सबसे सुखद बात यह है कि उनमें 'छत्तीसगढ़ी अस्मिता और स्वाभिमान भी संस्कृत शिक्षा से जागृत होगा।

संस्कृत के विश्वव्यापी, अंतरराष्ट्रीय और प्रांतीय महत्व की जानकारी में यदि लेखक को कुछ मार्गदर्शन लेना होता तो राष्ट्रीय संस्कृत और वेद सम्मेलनों के प्रखर वक्ता वेदों के प्रताप से तेजस्वी डॉ. वेद प्रताप वैदिक जी से ही ले लेते। लेखक ने जिस प्रगतिशील जापान का उल्लेख प्रमुखता से किया है वहीं यथाशीघ्र 'विश्व संस्कृत सम्मेलन होने जा रहा है। चीन बौध्द देश संस्कृत की महत्ता को स्वीकार कर चुका है। तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने इस लेख के लेखक की कृति 'सिध्दार्थचरित (संस्कृत-हिन्दी) का अवलोकन कर लिखित शुभकामनाएं दीं। जर्मनी में संस्कृत अध्ययन जगप्रसिध्द है। सत्यव्रत जी शास्त्री ने इसे 'शर्मण्य देश कह कर संस्कृत ग्रन्थ लिखे हैं। आशय यह कि छत्तीसगढ़ में ही नहीं पूरे विश्व में बड़ी संख्या के लोग संस्कृत के ज्ञाता हैं। वे 'मुट्ठी भर पण्डित-पुरोहित नहीं अपितु 'आमजन हैं। इंटरनेट-कम्प्यूटर पर अमरीका भी संस्कृत को प्रणाम कर रहा है। छत्तीसगढ़ में सुदूर वनांचल कैलाश नाथेश्वर और सांभरबार के श्री रामेश्वर गाहिरा गुरु संस्कृत आवासीय महाविद्यालय एवं अन्य संलग्न आश्रमों, पाठशालाओं में संस्कृत के छात्रों की संख्या कई हजार से अधिक है। इसी तरह छत्तीसगढ़ के दूसरे वनांचल बस्तर में स्वाध्यायी और नियमित संस्कृत छात्रों की संख्या 2000 से अधिक प्रत्यक्ष इस वर्ष भी इस लेखक (अर्थात मैंने) देखी है।

शालेय स्तर पर कक्षा 10 तक और कहीं-कहीं 11वीं-12वीं में भी हजारों बच्चो पढ़ रहे हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्र मेरिट के साथ संस्कृत में सर्वोच्च अंक ला रहे हैं। कई प्राध्यापक भी इन वर्गों को संस्कृत पढ़ा रहे हैं। विश्व संस्कृत प्रतिष्ठानम, संस्कृत भारती, लोक भाषा प्रचार समिति और राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान द्वारा संचालित संस्कृत शिक्षण प्रशिक्षण शिविरों में भी हजारों की संख्या में विविध आयु, धर्म जाति एवं वर्गों के लोगों को लगातार शिक्षित किया जाना किसी से छिपा नहीं है। साहित्य, संगीत, कला, राजनीति, शासन-प्रशासन एवं समाज सेवा के असंख्य जन संस्कृतज्ञ या संस्कृत प्रेमी हैं। फिर इसे चन्द लोगों की भाषा कहना दुर्भाग्यपूर्ण है। उधर पाठशालाओं में प्राच्य पध्दति से हजारों छात्र संस्कृत पढ़ कर धन्य हो रहे हैं। फिर भी संस्कृत 'मुट्ठी भर लोगों की भाषा कहना निराधार नहीं तो और क्या है? छात्र तो संस्कृत लेकर प्रशासन में उच्च पदों पर पहुंच चुके हैं। पर कोई जानना नहीं चाहे तो क्या किया जाए? वास्तव में संस्कृत की शक्ति को लेकर संजय द्विवेदी के लेख (देखें 'हरिभूमि 2 जून 2008 का संपादकीय पृष्ठ) से इस संदर्भ में राहत और प्रेरणा दोनों मिली। छत्तीसगढ़ के भाषायी सौहार्द्र-सद्भाव में संस्कृत सशक्त भूमिका निभाती आई है।

जहां तक मातृभाषा में शिक्षा की उपयोगिता का सवाल है, कोई अभागा ही इससे असहमत होगा। किन्तु हिन्दी और छत्तीसगढ़ी हमारी मातृभाषा है, तो संस्कृत इनकी भी मातृभाषा है। अर्थात् संस्कृत मातृभाषा की भी मातृभाषा है। एक दादी-नानी, पोती का अहित कैसे कर सकती है। लेकिन आज के बुरे समय में पोती-पोतों को दादा-दादी, नाना-नानी से अलग रखने का फैशन चल रहा पड़ा है। राष्ट्रभाषा और दिव्य गुणों से मानव को देव बनाने वाली देवभाषा संस्कृत को निंदा या उपेक्षा के गृह युध्द में अंग्रेजी जैसी बाहरी भाषाओं के आक्रमण से बचाना है तो हमें घरेलू भाषायी सौहार्द्र बढ़ाना होगा। छत्तीसगढ़ के गांधी, बल्कि गांधी जी ने जिन्हें गुरु माना ऐसे पं. सुन्दरलाल शर्मा तो राजिम में संस्कृत पाठशाला संचालित करते थे। पद्मश्री पं. मुकुटधर पाण्डेय ने 'मेघदूत का प्रथम छत्तीसगढ़ी में पद्यानुवाद किया। नन्दकिशोर जी, सैकड़ों उदाहरण हैं। छत्तीसगढ़ी की उन्नति न चाहने वाले कोई और होंगे। संस्कृत हितैषी कभी 'षडयंत्र नहीं करते। सब मिलकर बढ़ें। मैं प्रतीक्षा में हूं कि हम सब कहें कि संस्कृत अनिवार्यत: रोजगार से जुड़े। संघ में शक्ति है। असौहार्द्र में नहीं।
(लेखक संस्कृत भाषा के प्रख्यात विद्वान एवं शिक्षाविद् हैं।)

6/08/2008

गुर्जर आंदोलन: सुलगते सवाल


आरक्षण की मांग को लेकर भारतवर्ष में अनेकों बार छोटे, बड़े, हिंसक व अहिंसक आंदोलन होते रहे हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में आरक्षण मुद्दे को लेकर मंडल आयोग की सिफ़ारिशों के विरोध व समर्थन में छेड़ा गया आंदोलन संभवत: अब तक का देश का सबसे चर्चित व विवादित आंदोलन था। अल्पसंख्यकों, दलितों तथा पिछड़े वर्ग के लोगों को आरक्षण दिए जाने के मुद्दे को लेकर देश में प्राय: राजनीति होती रहती है। राजनीतिज्ञों का अथवा राजनैतिक दलों का एक वर्ग यदि आरक्षण के समर्थन में अपने वोट बैंक सुदृढ़ करना चाहता है तो दूसरा पक्ष इसी आरक्षण की मांग के विरोध में वोट बैंक की संभावनाएं तलाशने लग जाता है। परन्तु राजस्थान से शुरु हुए गुर्जर आंदोलन ने अपनी उग्रता तथा एकजुटता के चलते देश के समस्त राजनैतिक दलों के समक्ष एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है कि संभवत: अब कोई समझदार नेता अथवा उसका दल भूल से भी किसी भी समुदाय से उसे आरक्षण दिए जाने का वायदा नहीं कर सकेगा।

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि आरक्षण की व्यवस्था इस देश में दलित व दबे कुचले समाज को ऊंचा उठाने के उद्देश्य से की गई थी। परन्तु बड़े दु:ख की बात है कि आरक्षण संबंधी नियमों व क़ानूनों का प्रारम्भ से ही दुरुपयोग होता आ रहा है। जाति के नाम पर मिलने वाले आरक्षण का लाभ आमतौर पर आरक्षित जाति के पात्र व्यक्तियों को मिलने के बजाए उसी जाति के असरदार, सम्पन्न अथवा ऊंची पहुंच रखने वाले लोगों को मिल जाता है। आरक्षण का लाभ उठाने वाले आरक्षित जाति के इसी वर्ग को 'क्रीमी लेयर' कहकर संबोधित किया गया है। देखा जा रहा है कि आमतौर पर क्रीमी लेयर आरक्षण का लाभ उठा रही है जबकि आरक्षण का वास्तविक अधिकारी आज भी अपनी बारी आने की प्रतीक्षा में बैठे हैं।

राजनैतिक दलों द्वारा देश की विभिन्न जातियों को अपनी ओर आकर्षित करने की इस होड़ में आरक्षण का कोटा इस क़द्र बढ़ा दिया गया है कि सामान्य श्रेणी में आने वाली अनेकों जातियां अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित नंजर आने लगी हैं। यही चिंताएं मंडल आयोग की सिंफारिशें लागू करते समय भी सिर चढ़कर बोली थीं। जबकि कई छात्रों द्वारा आत्मदाह कर लिया गया अथवा ऐसा करने का प्रयास किया गया था। अत्याधिक आरक्षण होते जाने से प्रभावित ब्राह्मण, व राजपूत जैसे सामान्य श्रेणी में आने वाले समुदायों की ओर से भी अब कभी-कभी आरक्षण मांगे जाने की आवाज़ सुनाई देती है। परन्तु आरक्षण की मांग के समर्थन में आंदोलन किया जाना तथा किसी राजनैतिक दल द्वारा किसी समुदाय विशेष से इस वायदे के साथ समर्थन मांगना कि यदि उसका दल सत्ता में आया तो उसे आरक्षित जाति के अन्तर्गत शामिल कर लिया जाएगा, इन दोनों ही बातों में भेद किया जाना ज़रूरी है।

गुर्जर समाज देश के प्राचीन एवं प्रतिष्ठित समाज में से एक है। देश की कृषि व्यवस्था, पशुधन व्यवस्था तथा भारतीय सेना में इस समुदाय की अहम भूमिका है। परन्तु दुर्भाग्यवश गुर्जर समुदाय अन्य सामान्य श्रेणी वाली जातियों की तरह शिक्षा, आत्मनिर्भरता तथा आधुनिकता की दौड़ में ख़ुद को शामिल नहीं रख सका। फिर क्या था। गुर्जरों की इसी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाने की रणनीति भारतीय जनता पार्टी द्वारा तैयार की गई। इस प्रकार राजस्थान में गत् 2003 में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने गुर्जर समुदाय से उसे पिछड़ी जाति में शामिल किए जाने का वायदा कर डाला। इस वायदे से उत्साहित होकर गुर्जर समुदाय ने भारतीय जनता पार्टी को राजस्थान में अपना भरपूर समर्थन दिया। परिणामस्वरूप भाजपा राजस्थान में सत्ता में आ गई। राजस्थान में भाजपा की सरकार बनने के कुछ समय बाद तक तो गुर्जर समाज इस बात की प्रतीक्षा करता रहा कि प्रदेश की भाजपा सरकार की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया गुर्जर समाज से किए गए अपने वायदे को लेकर संभवत: ख़ुद ही कोई पहल करेंगी। परन्तु राजनीतिज्ञों से वादा वंफाई की उम्मीदें रखना ही बेमानी होता है। आख़िरकार वही हुआ जिसकी उम्मीद की जा रही थी। राज्य सरकार गुर्जर समुदाय से किया गया अपना वादा भूल गई तथा टालमटोल की राह पर चलने लगी। परन्तु इस बार वसुंधरा सरकार का पाला किस और से नहीं बल्कि उस गुर्जर समाज से पड़ा था जो भारतीय जनता पार्टी को उसका वादा याद दिलाने के लिए तथा उसे पूरा कराने के लिए किसी भी हद तक जा सकता था।

यह आंदोलन 6 माह पूर्व भी इसी प्रकार देखते ही देखते उग्र हो गया था। उस समय भी कई लोगों की जानें गई थीं तथा सरकारी व निजी सम्पत्तियों का काफ़ी नुक़सान हुआ था। परन्तु पिछली बार राज्य सरकार द्वारा किसी प्रकार गुर्जर समुदाय के नेताओं को समझा-बुझा कर तथा 6 माह का और समय लेकर इस आंदोलन को टाल दिया गया था। अब जबकि गुर्जर आंदोलन के प्रथम चरण को समाप्त हुए 6 माह बीत चुके हैं, यही गुर्जर समाज निर्धारित समयावधि पूरी होने के बाद पुन: आंदोलन की राह पर निकल पड़ा है तथा राज्य सरकार को बार-बार उसके द्वारा किए जाने वाले वादों की याद दिला रहा है। गुर्जर आंदोलन अपने इस दूसरे चरण में उस दुर्भाग्यपूर्ण दौर से गुज़र चुका है जिसने आरक्षण हेतु देश में होने वाले सभी आंदोलनों को पीछे छोड़ दिया है। लगभग 60 आंदोलनकारियों की जानों को न्यौछावर कर देने वाले इस आंदोलन ने देश की अर्थव्यवस्था की भी कमर तोड़ कर रख दी है। मुंबई व गुजरात जैसे औद्योगिक नगरियों का सम्पर्क शेष भारत से सप्ताह से अधिक समय तक कटा रहा। ज़ाहिर है देश की औद्योगिक व्यवस्था, यातायात प्रभावित होने के परिणामस्वरूप बुरी तरह प्रभावित हुई। रेल पटरियों, रेलगाड़ियों, सरकारी बसों को क्षतिग्रस्त किया गया है। ऐसा लग रहा था कि मानो गुर्जर आंदोलन ने देश के विकास के पहिए को ही जाम कर रखा हो।

प्रश्न यह है कि आख़िर इतने बड़े पैमाने पर जान व माल के होने वाले नुक़सान का ज़िम्मेदार है कौन? गुर्जर समाज, उसके नेता या फिर वे लोग जो इसी समाज विशेष से लोकलुभावने वादे करने से नहीं हिचकिचाते तथा परम्परा अनुसार सत्ता में आने के बाद अपने किए गए वादों की ओर मुड़ कर भी नहीं देखते। ऐसी परिस्थिति में यदि कोई समाज विशेष पूरी तरह से संगठित होकर वादे करने वाले सत्ताधारी राजनैतिक दल को उसका वादा याद दिलाने हेतु सड़कों पर उतर आए तथा उसका स्वरूप वर्तमान गुर्जर आंदोलन जैसा हो जाए तो आख़िर इसमें दोष किसका है? वादा करने वाले उस पक्ष का जो सत्ता में आकर, वादाख़िलाफ़ी कर रहा है या उस पक्ष का जो वादे के धोखे में आकर वोट दे बैठा तथा अब उसी राजनैतिक दल को उसका वादा याद दिलाने हेतु सड़कों पर उतर आया है? जनता को इन सभी पहलुओं पर नज़र डालनी चाहिए तथा समस्त राजनैतिक दलों को ऐसे आंदोलनों से सबक़ लेना चाहिए ताकि भविष्य में आरक्षण हेतु चलाए जाने वाले किसी भी आंदोलन में सरकारी सम्पत्तियों का इस हद तक नुक़सान न हो सके और यदि इसकी पुर्नावृत्ति हो भी तो इसके ज़िम्मेदार लोगों को पूरी तरह से बेनक़ाब किया जा सके ।


निर्मल रानी
163011, महावीर नगर,
अम्बाला शहर,हरियाणा।

6/06/2008

भाषाओं की हत्या की वैचारिकता सरासर तानाशाही

डॉ. राजेन्द्र सोनी
सीमा में मरने वाला वीर सिपाही जब शहीद होता है तो वह अपनी जन्म-भूमि, माँ को याद करता है और वह भी अपनी मातृभाषा में । कम से कम हमारी अपनी संस्कृति में जन्मदात्री, धरती और भाषा के साथ मनुष्य का संबंध माँ-बेटे का है । यानी इन तीनों को हम माँ कहते हैं । माँ के बाद हम मातृभाषा के माध्यम से हाड़-मांस के लोथड़े से मनुष्य होने का संस्कार पाते हैं । परिवार के बाद हम पड़ोस से भी कोई दूसरी अन्य भाषा सीखते हैं जैसे हिंदी, सिंधी, उड़िया, गुजराती आदि । बहुधा ये भाषायें मित्रता की भाषा सिद्ध होती हैं । उन्हें भी हम मातृभाषा से कमतर नहीं देखते । ये भाषायें एक तरह से घर से बाहर के बीच सेतु का काम करती हैं । स्कूल में हमारा परिचय हिंदी के साथ संस्कृत और अंग्रेजी आदि से होता है । इस आदि वाली सूची में हम ऊर्दू, काश्मीरी, तेलुगु, बंगला, मराठी आदि को देख सकते हैं । हमारे देश में यह सब भूगोल या प्रादेशिकता के आधार पर निर्धारित होता है । भारतीय परिवेश की बात करें तो जब मातृभाषा हमारे लिए कामकाज की भाषा सिद्ध नहीं होती तब हम या तो हिंदी सहित अन्य सांवैधानिक मान्यताप्राप्त भाषा के सहारे रोजगार के अवसर जुटाते हैं या फिर अंग्रेजी की भी शरण में जाकर दो पैसे कमाने का हुनर सीखते हैं । वैसे आज अंग्रेजी ज्ञान के लिए मजबूरी नहीं बल्कि रोजगार के लिए मजबूर बनाने वाली स्थिति में है ।

जब हम अपने राज्य की बात करते हैं तो सबसे पहले हमें अपनी मातृभाषा के रूप मे छत्तीसगढ़ी दिखाई देती है । क्योंकि प्रदेश की सर्वाधिक आबादी अपने घर-परिवार में हिंदी में नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ी में कार्य-व्यवहार संपादित करती है । यही भाषा मूल और आम छत्तीसगढ़िया के पास-पड़ोस और गाँव-शहर में संपर्क की भाषा भी है । एक तरह से यह राज्य के आम जीवन में हिंदी से भी ज़्यादा व्यहृत भाषा है । यहाँ हमें कदापि नहीं भूलना चाहिए कि जब हम छत्तीसगढ़ी कहते हैं तो उसमें छत्तीसगढ़ी के सभी उपप्रकार यानी सादरी, हल्बी, कुडुख, गोंड़ी आदि बोलियाँ भी स्वभाविक तौर पर समादृत हो जाती हैं। कहने का मतलब यही कि ये भाषायें कुछ व्याकरणिक अंतर से छत्तीसगढ़ी परिवार की सदस्या हैं ।

राज्य की बहुसंख्यक लोगों की मातृभाषा छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा दिया जाना सकारात्मक क़दम है । छत्तीसगढ़ी के उत्थान के लिए उसका अपना पृथक आयोग बनाना भी । और छत्तीसगढ़ी साहित्य अकादमी भी । छत्तीसगढ़ी के उत्थान के लिए हर संघर्ष वांछित है । क्योंकि यह छत्तीसगढ़ियों की अस्मिता की भाषा है । इसी में वह अपनी संपूर्ण और सर्वोच्च अभिव्यक्ति देता है । ठीक उसी तरह जिस तरह हरियाणा में हरियाणवी, महाराष्ट्र में मराठी, पंजाब में पंजाबी, उडिसा में उडिया, बिहार में बिहारी हिंदी या भोजपुरी आदि । ऐसे में छत्तीसगढियों को भी अपनी भाषा छत्तीसगढ़ी में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार क्यों न हो । कम से कम प्राथमिक स्तर पर । क्योंकि छत्तीसगढ़ी फिलहाल अभी सभी आधुनिक विषयों के पाठ्यक्रम की भाषा नहीं बन सकी है । हाँ उसमें हम विपुल साहित्य ज़रूर रच चुके हैं । किन्तु अन्य साहित्येत्तर विषयों की किताबें रचना अभी शेष है जो किसी भी भाषा मे उच्चतर पाठ्यक्रम के लिए अनिवार्य शर्त है । कदाचित भाषा अकादमी और साहित्य अकादमी के गठन के पीछे यही राज्य सरकार का उद्देश्य है और जनता का भी कि हम अपनी भाषा को भविष्य में इतना सक्षम बनायें कि वह उच्चतर कक्षाओं मे भी शिक्षा का माध्यम बन सके । राजकाज की भाषा बन सके । इस तरह वह कामकाज की भाषा भी बन सके ।

राज्य में जब हम राजकीय दृष्टि से छत्तीसगढ़ी की स्थिति का आंकलन करते हैं तो कह सकते हैं कि सरकारें अभी शिक्षाकर्मी, पटवारी, जैसी तृतीय श्रेणी और भृत्य और फर्राश जैसी चतुर्थ श्रेणी की नौकरी में छत्तीसगढ़ी भाषा की जानकारी की शर्त लागू की है । शिक्षा का माध्यम नहीं । वर्तमान में राज्य की सभी बड़ी नौकरियों जिसमें शासकीय और कंपनियों की नौकरियाँ सम्मिलित हैं में चयन की शर्त छत्तीसगढ़ी नहीं बन सकी है । इन नौकरियों में कभी भी छत्तीसगढ़ी भाषा के जानकारों को प्राथमिकता के स्पष्ट दर्शन नहीं हुए हैं । इसके पीछे का सच जो भी हो एक महत्वपूर्ण सच यह भी है कि ये कार्य छत्तीसगढ़ी में नहीं बल्कि हिंदी और अंग्रेजी में होते हैं चाहे वह केंद्र शासन का कार्यालय हो या राज्य सरकार का या फिर किसी कंपनी-फैक्टरी का । यदि कोई छत्तीसगढ़िया बच्चा किसी विदेशी कंपनी में रोजगार चाहता है तो उसकी अपनी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी वहाँ रोजगार नहीं दिला सकती । तब आप या हम उसे कैसे रोक सकते हैं कि वह उस भाषा मे अध्ययन-शिक्षण न करे जो उसके भविष्य की या विकास की भाषा होगी । क्योंकि हम इतने सक्षम तो हैं नहीं कि राज्य के सभी प्रतिभाओं को राज्य की भाषा में शिक्षित करके राज्य के भीतर ही रोजगार दिला सकें । और ऐसी मंशा भी हमारे नेताओं में फिलहाल नहीं दिखाई देती । ऐसी स्थिति में छत्तीसगढ़ी को राजभाषा बनाने के लक्ष्य पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए । ताकि वह ज्यादा से ज्यादा युवाओं के लिए आत्मसम्मान के साथ रोजगार की भाषा भी बन सके । उसकी संस्कृति की भी रक्षा होती रहे ।

हम सभी जानते हैं कि हिंदी के साथ छत्तीसगढ़ी का कोई विरोध नहीं है । उसका संस्कृत से विरोध का तो प्रश्न ही नहीं उठता । वर्तमान में संस्कृत शिक्षा को अनिवार्य करने से छत्तीसगढ़ी के पिछड़ जाने का प्रश्न ही नहीं उठता। संस्कृत का अनादर करना भाषाओं की जननी का भी अनादर जैसा है । ठीक इसी तरह राज्य के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों की लुप्त प्रायः भाषाओं को संरक्षण देने में भी कोई बुराई नहीं है । क्योंकि वे छत्तीसगढ़ी को ही पुष्ट करती हैं । सारांश यही कि हमारे लिए छत्तीसगढ़ी-प्रेम सर्वोचित है किन्तु अन्य भाषाओं की हत्या की वैचारिकता सरासर तानाशाही । और इस रूप में किसी को भी ऐसी छूट राज्य में मिलनी नहीं चाहिए, चाहे वह कितना बड़ा शक्तिशाली क्यों ना हो ।
(लेखक, छत्तीसगढ़ी के वरिष्ठ साहित्यकार हैं )

किसी भाषा को दरकिनार करने का मतलब

छत्तीसगढ़ में भाषा विवाद

डॉ. जे. आर. सोनी
प्रत्येक भाषा की एक गरिमा होती है । उसकी निजी सुंदरता उसी में खुलती है । उसके अनुयायी उसी भाषा में स्वयं को पूरी तरह अभिव्यक्त कर पाते हैं । मातृभाषा केवल अभिव्यक्ति ही नहीं वह उस उसके बोलने वालों की अस्मिता भी है जिसका संपूर्ण विश्वास सिर्फ़ उसी भाषा में संभव होता है । ऐसी स्थिति में किसी भाषा को दरकिनार करने का मतलब उस भाषा-भाषियों को भी दरकिनार करना है । शायद इसीलिए लुप्तप्रायः भाषाओं को भी बचाने पर सभी विचारधारा के बुद्धिजीवी और समाज सहमत हैं । छोटी-से-छोटी भाषाओं के प्रति लापरवाही बरतना एक तरह से सांस्कृतिक खजानों को लूटते देखना है

जब हम छत्तीसगढ़ की भाषाओं (बोलियों सहित) की बात करते हैं तो हमारे सम्मुख कई प्रकार की भाषायें उपस्थित होती हैं । छत्तीसगढी राज्य की प्रमुख भाषा है । राज्य की 82.56 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में तथा शहरी क्षेत्रों में केवल 17 प्रतिशत लोग रहते हैं । यह निर्विवाद सत्य है कि छत्तीसगढ का अधिकतर जीवन छत्तीसगढी के सहारे गतिमान है । यह अलग बात है कि गिने-चुने शहरों के कार्य-व्यापार राष्ट्रभाषा हिन्दी व उर्दू, पंजाबी, उडिया, मराठी, गुजराती, बाँग्ला, तेलुगु, सिन्धी आदि भाषा में होती हैं किन्तु इनमें से अधिकांश छत्तीसगढ़ी समझते भी हैं और कुछ-कुछ बोलते भी हैं । आदिवासी क्षेत्रों में हलबी, भतरी, मुरिया, माडिया, पहाडी कोरवा, उराँव, सरगुजिया आदि बोलियो के सहारे ही संपर्क होता है । इस सबके बावजूद छत्तीसगढी ही ऐसी भाषा है जो समूचे राज्य में बोली, व समझी जाती है । एक तरह से यह छत्तीसगढ राज्य की संपर्क भाषा है । वस्तुतः छत्तीसगढ राज्य के नामकरण के पीछे उसकी भाषिक विशेषता भी है । सभी तरफ से देखें तो वह छत्तीसगढ़िया होने का विशिष्ट प्रमाण भी है। कदाचित् इसीलिए छत्तीसगढ़ी को दलगत भावना से उठकर सभी ने श्रद्धा से देखा । जहाँ कांग्रेस ने उसे राजभाषा बनाने की पहल की तो भाजपा ने उस संकल्प को अमली जामा पहनाने की शुरूआत की है । जिसके परिणाम में छत्तीसगढ़ी भाषा आयोग का कागज़ी अवतरण हो चुका है और निकट भविष्य में वह हम सबको दिखने लगेगा ।

यदि यही कारण है कि इन दिनों राज्य में छत्तीसगढ़ी के सबसे बड़े ज्ञाता और भाग्यविधाता होने की होड़ मची हुई है । कोई अपने राजनीतिक प्रतिबद्धता का सहारा लेकर इस आयोग में प्रवेश करना चाहता है तो कोई मीडिया का । कल तक जो छत्तीसगढ़ी के सच्चे हितैषी थे वही आज एक दूसरे के ख़िलाफ कीचड़ उछालने की कवायद करते देखे जा सकते हैं । ऐसे समय यदि छत्तीसगढ़ी के संवर्धन के लिए संस्कृत और अन्य आदिवासी-भाषाओं के खिलाफ कोई कुछ भी कहता है तो जनमानस साफ-साफ समझ सकता है कि असली मुद्दा अन्य भाषाओं के खिलाफ नहीं बल्कि स्वार्थ जनित है । यह पदलोलुपता का कारण भी हो सकता है । यहाँ यह भी कहना अप्रांसगिक नहीं होगा कि इस आयोग में मात्र छत्तीसगढ़ी साहित्य लेखन के आधार पर नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ी भाषा-मर्मज्ञता, भाषा वैज्ञानिक दक्षता के आधार पर ही प्रतिभासंपन्न एवं प्रशासनिक उत्तरदायित्वों मे सक्षम आयुवाले व्यक्तित्वों पर विचार किया जाय । मात्र आयुगत वरिष्ठता एवं दलगत निष्ठा से किसी प्रशासनिक उद्देश्यों की औपचारिक पूर्ति तो हो सकती है पर भाषा जैसे संवेदन प्रकरण का उत्थान वास्तविक योग्यता से ही संभव है और इसमें सतर्कता अंत्यंत ज़रूरी है । हमें नहीं भूलना चाहिए यह साहित्य अकादमी नहीं भाषा अकादमी है ।


छत्तीसगढ़ी के हित में लड़ना हम सभी छत्तीसगढ़ियों के लिए लाजिमी है । और कोई भी ऐसा करता है तो उसमें कोई बुराई नहीं । बुराई की जड़ तो वहाँ है जब हम ऐसा किसी पद, भूमिका, या निजी महत्वाकांक्षा के लिए करते हैं । हम यह कैसे कह सकते हैं कि संस्कृत को पढ़ाई से हटा दें । उसमें हमारे भारतीय(छत्तीसगढ़िया भी पहले भारतीय है) होने का जीवंत दस्तावेज है । वह भारतीयता की भी निशानी है । उसमें हमारे जीवन-दर्शन, संस्कृति का मूल है । भले ही वह लुप्त प्रायः है पर वह आज भी हर संकट में हमारा सर्वोच्च विश्वसनीय संदर्भ भी है । आज उसे जनता की आंकाक्षानुरूप संरक्षण देने की सच्ची पहल की ज़रूरत है न कि उसे छत्तीसगढ़ी जैसी मयारुक भाषा की दीवानगी में आलोचना का शिकार बनाने की । पर हमें संस्कृत के पाठों को भी नये संदर्भों, परिप्रेक्ष्यों में समझना होगा क्योंकि वह समाज में वर्चस्व की शिक्षा न दे बल्कि दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों के प्रति भी समान स्नेह का वातावरण दे सके, राज्य सहित देश में भी जिसकी आज महती आवश्यकता है । तभी सर्वे भवन्तु सुखिनः का नारा फलित होगा । हम यह भी कैसे कह सकते हैं कि राज्य की अन्य भाषाओं को खतम कर दें या उनके लिए हो रहे कार्यों को बंद कर दें ? ऐसा कहना और करना दोनों तानाशाही होगा ।


उचित तो यही होगा कि अपने मित्र भाषाओं के प्रति भी सहिष्णुता का परिचय दें और यदि राज्य में हलबी, भथरी, सादरी आदि भाषाओं में प्राथमिक स्कूल के बच्चों की शिक्षा की पहल की जाती है तो उसे समर्थन दें क्योंकि वह छत्तीसगढ़ी से बाहर है ही नहीं । वैसे भी कक्षा पहली से लेकर पाँचवी तक व्यवहारिक तौर पर राज्य भर में स्थानीय भाषा में ही हमारे गुरूजन शिक्षा देते रहे हैं । पर छत्तीसगढ़ी में पढ़ाई-लिखाई के स्थायी मुद्दों को भी याद करना होगा । अंग्रेजी, आधुनिक विज्ञान, प्रौद्योगिकी की भाषा है, उसे हम मातृभाषा की तरह न अपनाये पर उसे कामकाज की भाषा बनाने मे हमें कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए क्योंकि संस्कृति के साथ साथ रोटी भी चाहिए मनुष्य को ।
(लेखक गुरुघासीदास साहित्य अकादमी के महासचिव हैं)

हमारी अस्मिता है बहुभाषिकता

छत्तीसगढ़ में भाषा-विवाद

जयप्रकाश मानस
छत्तीसगढ़ में भाषा को लेकर छिड़े बौद्धिक उन्माद को देखकर मुझे एक कहानी याद आ रही है - एक साधु किसी के साथ कहीं जा रहे थे । रास्ते में एक मरा हुआ क्ता मिला । वह पूरी तरह सड़ चुका था । उसे देखकर आदमी चीख पड़ा - महाराज, बचकर चलिए; देखिए इस ग़लीज़ कुत्ते से कैसी बदबू आ रही है । साधु बोले – आह, इस कुत्ते के दाँत तो देखो, कितने साफ़ और चमकीले हैं । हम कैसे बुद्धिजीवी हैं जो अपनी ही भाषाओं को साधु विरोधी दृष्टि से देख रहे हैं ।

बहुभाषिकता भारतीय भाषा-परिदृश्य का विशिष्ट लक्षण है । अपनी चारित्रक सात्विकता के साथ वह भारतीयता की पहचान भी है । भाषा स्वयं में अराजक या असामाजिक नहीं होती । फिर किसी एक बृहत भूगोल की भाषाओं में साम्यता, परस्पर विश्वास के बीज भी होते हैं । यही भाषा विज्ञान का अद्यतन सत्य है । भाषाओं या बहुभाषिकता को लेकर की जाने वाली दुर्भावनाओं और दुर्घटनाओं के मूल में राजनीतिक चश्मे से देखने की धूर्तता मात्र है । भाषायी आधार पर शत्रुता के पीछे न कोई वैज्ञानिकता होती है, न ही भाषायी आधार पर वांछित विकास हेतु कोई वैचारिक मापदंड । शायद यही दूरदृष्टिता उस मूल में है जिससे प्रेरित होकर हमने भारतोदय के समय भाषायी प्रजातंत्र को अंगीकार किया ।

भारत की भाषिक विविधता एक जटिल चुनौती पेश करती है तो दूसरी ओर वह हमारे लिए विविध अवसर भी बटोरकर देती है । भारत केवल इसलिए अनूठा नहीं है कि यहाँ अनेक प्रकार की भाषायें बोली जाती है, बल्कि उन भाषाओं में अनेक भाषा-परिवारों का प्रतिनिधित्व भी है । बहुभाषिकता भारत की थाती है, और इन मायनों में हम सर्वाधिक धनी ठहरते हैं । दुनिया के और किसी मुल्क में पाँच भाषा परिवारों की भाषायें नहीं पायी जाती । यह भाषायी विविधता में समृद्धि मात्र नहीं, ज्ञान सहित प्राचीन विज्ञान, दर्शन, चिंतन में भी भारतीय समृद्धि का परिचायक भी है ।

बहुभाषिकता बच्चे की अस्मिता का निर्माण करती है । निज भाषा का निष्कलुष उत्थान वरेण्य है किन्तु परभाषा की पतन-चेष्ठा सर्वथा बौद्धिक अतिवाद है । इसलिए उपेक्षणीय है । शिक्षा में बहुभाषिकता का समर्थन केवल देश में उपलब्ध संसाधन का बेहत्तर उपयोग नहीं अपितु वह हर बच्चे (हर भाषिक समुदाय)की स्वीकार्यता और संरक्षणत्व की भी गारंटी है । यह अर्थांतर से भाषिक पृष्ठभूमि के आधार पर किसी को पिछड़ने न देने का विश्वास भी है । जब हम पिछड़ों, दलितो, वनबंधुओं की उत्थान की बात करते हैं तो हमें कदापि यह नहीं भूलना चाहिए कि इस उन्नति में भाषा का उत्थान भी सम्मिलित है । हमें संविधान की धारा 350 –क का भी ऐसे समय स्मरण कर लेना चाहिए जिसमें कहा गया है कि राज्य के भीतर प्रत्येक स्थानीय प्राधिकारी भाषायी अल्पसंख्यक-वर्गों के बालकों को शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्था करने का प्रयास करेगा ।

यदि छत्तीसगढ़ में भी गोंड़ी, हलबी, भथरी, सरगुजिहा में पढ़ाई की व्यवस्थागत स्वीकृति मिलती है तो उसे इसलिए ख़ारिज़ नहीं किया जा सकता कि वे छत्तीसगढ़ी परिवार की भाषायें है और ऐसे में केवल छत्तीसगढ़ी में ही पढ़ाई होनी चाहिए । ऐसे तर्कों को भाषागत प्रेम नहीं अपितु कांइयापन और भाषायी उन्माद की श्रेणी मे रखा जाना चाहिए । क्योंकि ऐसी सभी अल्पसंख्यक भाषाओं या बोलियों का न तो कोई जनक है न ही उनका नियंता कि उसे नेस्तनाबूत करने का अधिकार सौंप दिया जाय । हमें अपने वरिष्ठ नंदकिशोर तिवारी जी जैसे पुरानी पीढ़ी को अपनी उदारता दिखाने की अपील करनी ही होगी कि वे अपनी भाषा के कल्याण के लिए संघर्ष ज़रूर करें किन्तु उन्हें परस्परविश्वासी किन्तु अल्पसंख्यक भाषाओं के सफाया करने का जहर वातावरण में न घोलें । यह एक तरह से छत्तीसगढ़ और खासकर वनांचलों में सक्रिय अतिवादियों को उकसाना भी हो सकता है, साथ भी आदिजनों के विश्वास पर कुठाराघात भी । आज समय की मांग है कि और संजय द्विवेदी जैसे युवा किन्तु समरस विचारों का अनुसमर्थन देना ही होगा । और ऐसा न करना भाषायी सांप्रदायिकता को भी प्रोत्साहित करना होगा ।

जब हम मातृभाषा और घर की भाषा की बात करते हैं तो उसमें घर, कुनबे, पास पड़ौस आदि की भाषा आ जाती है । जिसे हम घर और समाज से ग्रहण करते हैं । अधिकांशतः बच्चे जब स्कूल में प्रवेश के समय दो-तीन ऐसी भाषाओं को बोलने-समझने की क्षमता से लैश होते हैं । भिन्न प्रतिभा वाले बच्चे जो बोल नहीं पाते वे भी अपनी अभिव्यक्ति के लिए उतने ही जटिल वैकल्पिक संकेतों और प्रतीकों का विकास कर लेते हैं । ऐसे समय भाषायें स्मृतिकोश की तरह काम करती हैं जिसमें अपने सहवक्ताओं से विरासत में मिले संकेतों के साथ-साथ जीवन-काल में बनाये गये संकेत भी शामिल होते हैं । ये वे माध्यम भी हैं जिनसे अधिकतर ज्ञान का निर्माण होता है । इसलिए इनका मनुष्य के विचार और उसकी अस्मिता से गहरा संबंध होता है कि बच्चे की मातृभाषा या मातृभाषाओं को नकारना या उनके ध्वस्तीकरण का प्रयास उसे अपने व्यक्तित्व मे हस्तक्षेप की तरह लगते हैं । सच यह भी है कि प्रभावी समझ और भाषाओं के प्रयोगों के माध्यम से बच्चे विचारों, व्यक्तियों, वस्तुओं और आसपास के संसार से अपने को जोड़ पाते हैं ।

जहाँ तक प्राथमिक शिक्षा और भाषा का प्रश्न है वहाँ द्विभाषी क्षमता मनुष्य की संज्ञानात्मक वृद्धि, सामाजिक सहिष्णुता, विस्तृत चिंतन और बौद्धिक उपलब्धियों का खास औज़ार है । यह केवल सदभावी विचार जनित कल्पना नहीं, उच्च अध्ययनों और शोधों का निष्कर्ष भी है । उसमें द्वंद्व, अविश्वास, सामुदायिक विभाजन की संभावना तलाशना केवल मूढ़ता है । जहाँ तक अँगरेज़ी को तवज्जो देने का सवाल है वह मुद्दा जनता की आकांक्षाओं का राजनीतिक प्रत्युत्तर है, न कि इसके पीछे अकादमिक या साध्यता का मुद्दा है । वह अन्य पश्चिमी भाषा में विद्यमान सौदर्य के अलावा वर्तमान विश्व समाज जो तकनीकी ज्ञान की गारंटी माँगता है व्यावसायिक दक्षता और कौशल के लिए भी आवश्यकता है । प्रकारांतर से वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भविष्य की पीढ़ी के लिए रोजी-रोटी की भाषा है । यह अलग बात है कि वह शासक की भाषा है और उसे हमने ही अन्य भारतीय भाषाओं और लोकभाषाओं को सरंक्षण न देकर विकसित करते रहे हैं पर आज के संदर्भ में उसे एकबारगी नहीं नकारा जा सकता है । (लेखक, शिक्षाविद् एवं साहित्यकार हैं)