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1/29/2010

पद्मश्री देकर महाकवि को अपमानित करने की भर्त्सना




देश के प्रख्यात कवि एवं मूर्धन्य साहित्यकार डॉ बुद्धिनाथ मिश्र ने महाकवि जानकी वल्लभ शास्त्री को ‘पद्मश्री’ अंलकरण देने के लिए भारत सरकार की तीव्र भर्त्सना की है और कहा है कि जिस सरकार को साहित्य के क्षेत्र में एक महाकवि और एक चुटकुलेबाज़ के बीच कोई अंतर नहीं दिखाई देता हो, उस सरकार के हाथों यह अंलकरण लेना किसी भी साहित्यकार के लिए अशोभनीय और निंदनीय है । (ज्ञातव्य हो कि छत्तीसगढ़ के एक मंचीय कवि डॉ. सुरेन्द्र दुबे को पद्मश्री अंलकरण मिला है । )


डॉ। मिश्र ने देश के सभी वरेण्य साहित्यकारों से अपील की है कि वे अपने नाम के आगे ‘पद्मश्री रहित’ लिखें, जो उनके चरित्र की शुचिता का प्रमाण होगा । उन्होंने कहा कि पद्म अलंकरण ऐसे अयोग्य व्यक्तियों को दिये जाते हैं जो इनका दुरुपयोग उपाधि के रूप में करते हैं । वे दिन लद गए जब शासन की बागडोर नेहरू और इंदिरा गांधी जैसे संस्कारवान राजनेताओं के हाथ में था, और दिनकर और बच्चन जैसे अग्रणी साहित्यकारों को अंलकरण दिये जाते थे । अब पद्मश्री अंलकरण पाना किसी साहित्यकार के चापलूस, जुगाड़ी और घटिया होने का सबूत है । इसलिए जो भी साहित्यकार समाज के समक्ष अपने आदर्श चरित्र का उदाहरण रखना चाहते हैं, वे इसे स्वीकार न करें ।


आथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के वरिष्ठ सदस्य डॉ। मिश्र ने दावा किया है कि उनके आव्हान पर बनारस, प्रयाग, रावर्टगंज, लखनऊ, पटना, रायपुर, कोलकाता, मुजफ्फरपुर, दिल्ली, भोपाल, मुरादाबाद, मुंबई, देहरादून, काशीपुर चैन्ने आदि शहरों के साहित्यिकारों ने अपने नाम के सात ‘पद्म्श्री रहित’ लिखने का संकल्प किया है । डॉ. मिश्र ने कहा कि देश के साहित्यकारों का यह अभियान तब तक जारी रहेगा, जब तक भारत सरकार की ओर से अधम साहित्यकारों को पद्म अलंकरण देने पर खेद न व्यक्त किया जाये ।



बुद्धिनाथ मिश्र
देवधा हाऊस, गली – 5, बसंत विहार एन्क्लेव
देहरादून, उत्तराखंड – 248006
मोबाईल – 09412992244
ई-मेल - buddhinathji@yahoo.co.in

1/22/2010

भिलाई इस्पात संयंत्र कम्प्यूटर पर हिंदी प्रयोग में अग्रणी


मुम्बई स्थित संस्थान राजभाषा किरण के तत्वावधान में भुवनेश्वर में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में 8 जनवरी 2010 को मुख्य अतिथि डॉ. प्रसन्न पाटसाणि सांसद् भुवनेश्वर एवं माननीय सदस्य संसदीय राजभाषा समिति ने अखिल भारतीय स्तर कम्प्यूटर व आॅन-लाइन पर सर्वाधिक हिंदी प्रयोग के लिये भिलाई इस्पात संयंत्र को सर्वोत्कृष्ट निरूपित करते हुये सम्मानित किया। भिलाई इस्पात बिरादरी की ओर से संयंत्र के राजभाषा प्रमुख श्री अशोक सिंघई ने यह सम्मान ग्रहण किया। इस अवसर पर राष्ट्रीय हिंदी अकादमी के निदेशक डॉ. शंकर लाल पुरोहित उत्कल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 बिनायक रथ तथा भुवनेश्वर दूरदर्शन केन्द्र के निदेशक श्री विमल चन्द्र गुप्ता मंचस्थ थे।


भिलाई को देश का नवरत्न निरूपित करते हुये सांसद् डॉ. पाटसाणि ने कहा कि भिलाई देश का ऐसा आधुनिक तीर्थ है जहाँ समस्त भारतीय भाषाओं का संगम विद्यमान है। ऐसे जटिल तकनीकी से युक्त संयंत्र में आधुनिक कार्यप्रणालियों में हिंदी के प्रयोग की सोच एक अग्रगामी और अनुकरणीय पहल है। हिंदी कार्य में लगातार विकास भिलाई जनशक्ति के राष्ट्रप्रेम तथा कर्तव्य परायणता का द्योतक है और यह संयंत्र के नेतृत्वकर्ता के सकारात्मक सोच का सुफल है।


संयंत्र को कम्प्यूटर व हिंदी के सम्मिलन के सराहनीय कार्य के लिए प्राप्त शील्ड को श्री पवन कुमार अग्रवाल कार्यपालक निदेशक (कार्मिक व प्रशासन) ने राजभाषा विभाग के कर्मियों की उपस्थिति में श्री रा. रामराजु प्रबंध निदेशक महोदय को सौंपा। श्री रामराजु ने राजभाषा के क्षेत्र में किये जा रहे कार्य की सराहना करते हुए विभागीय टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि भिलाई इस्पात बिरादरी आने वाले कल में विज्ञान और तकनीकी में भी हिंदी की उपयोगिता सिद्ध करने में अपनी पहल की संस्कृति क़ायम रखेगी।
(अशोक सिंघई की रपट)

8/28/2009

देश की दयनीय राजनीति एवं नेताओं की कमज़ोर नर्सरी


राजनीति शब्द से ही जैसा कि स्पष्ट हो जाता है कि राज करने अथवा राज चलाने सम्बन्धी नीति को ही राजनीति कहा जाता है। यहाँ यह समझ पाने में अधिक परेशानी नहीं होनी चाहिए कि राज करने या चलाने जैसी अति संवेदनशील एवं गम्भीर ज़िम्मेदारी को अंजाम देने के लिए इस पेशे में शामिल व्यक्ति को अत्याधिक योग्य, दक्ष, ईमानदार, समाज में स्वीकार्य तथा कुशल नेतृत्व प्रदान कर पाने की क्षमता रखने वाला व्यक्ति होना चाहिए। अशोक सम्राट, चन्द्रगुप्त, चाणक्य जैसे राजनीति के सिद्ध पुरूषों से लेकर सुभाष चन्द्र बोस, महात्मा गांधी, पंडित जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लालबहादुर शास्त्री तथा इंदिरा गांधी सरीखे देश के सुप्रसिद्ध राजनैतिक महापंडितों तक भारतीय राजनीति का इतिहास ऐसे तमाम राजनैतिक दिग्गजों के नामों से भरा पड़ा है जिन पर न सिर्फ़ भारत की जनता बल्कि स्वयं देश की राजनीति भी गर्व महसूस करती है।

वास्तव में यह हमारे देश का सौभाग्य है कि प्राचीनकाल से ही हमारे देश को राजनीति के क्षेत्र में ऐसी विलक्षण प्रतिभाएं मिलीं जिन्होंने अपने तमाम राजनीतिक फैसलों के द्वारा देश को आगे ले जाने, देशवासियों को न्याय देने, तथा देश की प्रगति और विकास में अपनी योग्यताओं एवं प्रतिभाओं का भरपूर इस्तेमाल किया। यदि हम आज के समय में पश्चिमी देशों की साम्राज्यवादी नीतियों के कारण विश्व के बिगड़ते हुए हालात पर नज़र डालें तथा प्रभावित देशों में मच रही तबाही व बर्बादी एवं आए दिन होने वाले कत्ले आम पर गौर करें तो हमें अपने देश के कुशल राजनीतिज्ञों की योग्यता पर यह सोचकर और भी गर्व होता है कि 200 वर्षों की गुलामी के बाद भी किस प्रकार उनके द्वारा बिना किसी भीषण संघर्ष किए देश को अंग्रजों की गुलामी की बेडिय़ों से मुक्ति दिलाई गई। देश की आजादी को आज 62 वर्ष बीत चुके हैं। स्वतन्त्र भारत दुनिया के अन्य विकासशील देशों की तुलना में तेजी से आगे बढ़ता हुआ विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा होने की तैयारी कर रहा है। यह सत्य है कि देश की विकास सम्बन्धी एक-एक ईंट में हमारे ही देश के कुशल नेतृत्व का पूरा योगदान है। परन्तु यदि इसी सिक्के के दूसरे पहलू पर हम आज नजर डालें तो हमें कुछ ऐसे तथ्य नजर आते हैं जिन्हें देखकर हमारी नजरें शर्म से झुक जाती हैं।

उदाहरण के तौर पर कल के नेताओं में बलिदान का जज़्बा था, वे नि:स्वार्थ सेवा भाव के साथ अपने पूरे कौशल एवं योग्यता के बल पर प्रभावी राजनीति किया करते थे। ऐसी राजनीति जिसमें कि नैतिकता एवं सिद्धान्त कूट-कूट कर भरे होते थे। ठीक इसके विपरीत आज की राजनीति मुख्य रूप से सत्ता प्राप्त करने के उद्देश्य को केन्द्र बिन्दु मानकर किया जाने वाला एक ऐसा पेशा बन कर रह गई है जिसमें अनपढ़, गुण्डे, बदमाश, लफंगे, स्वार्थी, धनार्जन की इच्छा रखने वाले, अखबारबाजी व प्रेस नोट की राजनीति कर अपने नाम को जनता के मध्य उछालने वाले तथा छल कपट के द्वारा राजनीति के क्षेत्र में अपना स्थान बनाने तथा अपना नाम रौशन करने वालों की भीड़ नजर आती है, जिसके परिणामस्वरूप देश की तरक्क़ी उस रफ़्तार से नहीं हो पा रही है जैसी कि होनी चाहिए। राजनीति में नैतिकता की न सिर्फ कमी होती दिखाई पड़ रही है बल्कि ऐसा लगने लगा है कि राजनीति जैसे पवित्र पेशे के लिए नैतिकता की बात करना ही कोई अनैतिक वार्तालाप बनकर रह गया हो। पारदर्शिता नाम की चीज सियासत से खत्म होती जा रही है और तो और इसी प्रदूषित एवं निम्नस्तरीय स्वार्थी एवं भ्रष्टï राजनीति की वजह से ही स्वयं देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी को यह स्वीकार करना

पड़ा था कि विकास के नाम पर एक रूपया जब केन्द्र सरकार पंचायत के विकास कार्योंके लिए रवाना करती है तो पंचायत तक आते-आते वह एक रूपया मात्र 25 पैसे ही रह जाता है। स्व० राजीव गांधी का साफ कहना था कि 75 पैसे देश के खोखले राजनैतिक ढांचों तथा भ्रष्टï राजनैतिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था की भेंट चढ़ जाता है। आज कांग्रेस का भविष्य समझे जाने वाले युवा नेता राहुल गांधी ने भी दो दशकों बाद अपने पिता की उसी सोच पर अपनी मुहर लगाते हुए यह पुर्णतय: स्वीकार किया है कि देश का राजनैतिक ताना-बाना हरगिज ठीक नहीं है। प्रश्न यह है कि यदि देश का राजनैतिक ढांचा चुस्त दुरूस्त एवं पारदर्शी हो तो क्या इस प्रकार के राजनैतिक व प्रशासनिक ह्रïास की कल्पना की जा सकती है। शायद नहीं।

दरअसल आज राजनीति में प्रवेश करने वाले लोगों पर यदि हम नजर डालें तो हमें यह देखकर दु:ख होगा कि इनमें अधिकांश वह लोग दिखाई देते हैं जो अशिक्षित होने के अलावा अपने जीवन के तमाम क्षेत्रों में असफल होने के बाद सफेद कुर्ते-पायजामे सिलवा कर समाज सेवा की आड़ लेकर राजनीति में सक्रिय हो गये हैं। ऐसे तत्वों की सक्रियता एक ओर तो राजनीति के क्षेत्र में इसलिए भी बढ़ती गई क्योंकि देश की जनसंख्या के साथ-साथ बेराजगारी भी अपने चरम पर पहुँच चुकी है। दूसरी तरफ ऐसे अपरिपक्व एवं असमाजिक लोगों के राजनीति में बढ़ते प्रवेश को देखकर योग्य, ईमानदार तथा देश सेवा का जज़्बा रखने वाले उन तमाम लोगों ने अपने आपको राजनीति के क्षेत्र से दूर रखना शुरू कर दिया जो असमाजिक तत्वों की राजनीति में घुसपैठ को कतई उचित नहीं समझते हैं। शरीफ एवं सज्जन व्यक्तियों द्वारा राजनीति से मुंह मोड़ लेने की घटना ने तीसरे दर्जे के ऐसे लोगों को इतना अधिक प्रोत्साहित किया कि आज राजनीति में जहाँ इनका वर्चस्व साफ नजर आता है वहीं योग्य एवं सज्जन राजनीतिज्ञ या तो राजनीति के दल-दल से दूर होता जा रहा है या फिर सक्रिय होते हुए भी स्वयं को असहाय एवं निष्प्रभावी महसूस करने लगा है। आज का आधारहीन तथाकथित नेता अपने आकाओं को तोहफे भेंट कर, अखबार नवीसों को तमाम प्रकार की 'भेंट देकर अपने राजनैतिक गॉडफादर के पक्ष में उसकी तारीफों के पुल बांधने वाले प्रेस नोट जारी कर स्वयं को सफल राजनीतिज्ञ मानता है। कोई दूसरे देशों के झण्डे जलाकर अपनी राजनीति चटकाता है तो कोई अफसरों व अन्य वरिष्ठï नागरिकों को स्मृति चिन्ह भेंटकर उन्हें सम्मानित करने के बहाने अपना ही मान-सम्मान बढ़ाने का प्रयास करता है। कोई अपने साथ चार लोगों को लेकर सड़कों पर दहशत फैलाने, कारों व जीपों में बैठकर तेज रफ़्तार से गाड़ी चलाने को ही सफल राजनीति मानता है तो कोई राष्ट्रीय राजमार्ग पर शहीदों की फोटो से लैस गाडिय़ों पर पिकनिक मनाए जाने की घटना को 'रथयात्रा का नाम देकर स्वयं को एक महान रथयात्री की श्रेणी में स्थापित करने का प्रयास करता है। अपराधियों की राजनैतिक सक्रियता का भी केवल एक ही उद्देश्य होता है, अपनी जान बचाना तथा शासन प्रशासन का संरक्षण प्राप्त करना। जाहिर है अपने इस उद्देश्य के लिए वे किसी एक राजनैतिक दल के साथ किसी सिद्धांतों के तहत बंधे नहीं होते। वे उसी दल के साथ होते हैं जो दल उनकी सुरक्षा की पूरी गारन्टी लेता हो।

उपरोक्त हालात को देखकर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम.लिंगदोह द्वारा देश के राजनीतिज्ञों के बारे में की गई हंगामा खेज टिप्पणी ठीक ही प्रतीत होती है। साथ-साथ हमें भी इस निर्णय पर पहुँचने के लिए बाध्य होना पड़ता है कि देश की राजनीति के वर्तमान गिरते हुए स्तर के लिए काफी हद तक नेताओं की कमजोर नर्सरी ही ज़िम्मेदार है। यदि देश को इस नासूर से मुक्ति दिलानी है तो ऐसी व्यवस्था करनी पड़ेगी जिससे कि शिक्षित, योग्य, ईमानदार एवं नीतियों व सिद्धांतों पर विश्वास रखने वाले समर्पित लोग ही सक्रिय राजनीति में भाग ले सकें।


निर्मल रानी
1630/11, महावीर नगर,
अम्बाला शहर,हरियाणा

8/12/2009

चरणदास चोर



यह अकल्पनीय था कि कीर्तिशेष रंगकर्मी हबीब तनवीर के विश्वप्रसिध्द नाटक ''चरणदास चोर'' पर उनके अपने प्रदेश याने छत्तीसगढ़ की सरकार ही प्रतिबंध लगा देगी। इसलिए जब कुछ अखबारों के माध्यम से यह जानकारी मिली तो विश्वास न करने का कोई कारण नहीं था तथा इस स्थिति में रोष, चिंता व आश्चर्य की मिलीजुली भावनाएं उमड़ना स्वाभाविक ही था। लेकिन इसके बाद खबर का जैसे-जैसे खुलासा हुआ यह समझ आया कि सरकार, मीडिया, प्रतिबंध की मांग करने वाले व इसका विरोध करने वाले सबने अपनी-अपनी तरफ से अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़े एक संवेदनशील मसले को उलझाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। जिस धैर्य व विवेक का परिचय दिया जाना चाहिए था वह इनमें से किसी ने नहीं दिखाया।


यह तथ्य सबसे पहले स्पष्ट कर लेना चाहिए कि छत्तीसगढ़ सरकार ने ''चरणदास चोर'' नाटक के मंचन पर या पुस्तक की बिक्री पर कोई रोक नहीं लगाई है। छत्तीसगढ़ सरकार ने, जहां तक हमारी जानकारी है, ऐसा कोई आदेश जारी नहीं किया है। इसके बाद इस तथ्य का उल्लेख करना लाजिमी है कि छत्तीगसढ़ शासन के स्कूली शिक्षा विभाग ने विभागीय मंत्री और सचिव के फोन पर दिए निर्देश के अनुरूप, 31 जुलाई की शाम वाणी प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित चरणदास चोर पुस्तक का पुस्तक वाचन अभियान के दौरान वाचन न करने का आदेश जारी किया। इस आदेश में प्रदेश के सभी जिला शिक्षा अधिकारियों को कहा गया कि वे इस 'प्रतिबंधित पुस्तक' की प्रति स्कूलों से बुलाकर अपने पास जमा कर लें। लेकिन उसमें मंचन पर रोक तथा पुस्तक वाचन सप्ताह के बाद रोक जारी रहने की बात नहीं थी। अब इस मामले को विस्तार में समझने की जरूरत है।


हबीब साहब का यह नाटक संभवत: 1987 मे पुस्तकायन नामक प्रकाशक ने छापा था। 2004 में वाणी प्रकाशन ने इसका नया संस्करण छापा। इसमें लेखक की जो प्रस्तावना थी वह पहले संस्करण की भूमिका से भिन्न थी। इसमें सतनामी समाज एवं सतनाम पंथ के प्रति हबीब तनवीर ने प्रशंसायुक्त विचार व्यक्त किए हैं, लेकिन ऐसी दो पंक्तियां हैं जो संभवत: किवदंती पर आधारित हैं अथवा असावधानी में लिखी गई हैं और जिन पर सतनामी समाज का रुष्ट होना सहज है। समाज के एक चर्चित नेता गुरु बालदास ने इसीलिए 2004 में नया संस्करण प्रकाशित होने के बाद मुख्यमंत्री डॉ। रमनसिंह से इसकी शिकायत की तथा आपत्तिजनक अंशों को विलोपित करने की मांग की। गुरु बालदास द्वारा आपत्ति दर्ज करना एक विधिसम्मत कदम था। यद्यपि यह शायद बेहतर होता कि वे हबीब तनवीर से सीधे संपर्क कर उनसे ही मांग करते कि वे उन दो वाक्यों को पुस्तक से हटा दें। फिर भी उन्होंने कोई उग्र कदम नहीं उठाया इसे नोट किया जाना चाहिए। 2004 में राज्य सरकार ने इस पर क्या कार्रवाई की यह पता नहीं चल पाया। संभवत: बात आई-गई कर दी गई। शिकायतकर्ता के पास स्वयं कोई रिकार्ड नहीं है। हमने उनसे पिछली शिकायत का ब्यौरा मांगा, लेकिन नहीं मिल पाया। अगर राज्य सरकार ने उस समय कोई आदेश किया होगा तो सामान्य प्रशासन विभाग, संस्कृति विभाग, शिक्षा विभाग अथवा वाणी प्रकाशन के पास उसकी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।


सन् 2008 में वाणी प्रकाशन ने ही इस पुस्तक का नया संस्करण छापा। पुस्तक में प्रथम पृष्ठ पर दी गई सूचना से पता चलता है कि छत्तीसगढ़ राज्य के स्कूली शिक्षा विभाग की पुस्तकालय विकास योजना के तहत यह पुस्तक छापी गई है। याने सरकार ने बड़ी संख्या में पुस्तक खरीदी और उसे स्कूलों में भेजा। यहां आकर सवाल उठता है कि क्या स्कूली शिक्षा विभाग को 2004 में दर्ज की गई आपत्ति के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। दूसरा प्रश्न उठता है कि पुस्तक खरीदने के पहले क्या उसका सावधानी से अध्ययन किया गया था। तीसरा प्रश्न भी है कि विभाग की पुस्तक खरीद की रीति-नीति क्या है। ये सारे सवाल उठाना लाजिमी है क्योंकि अगर स्कूली शिक्षा विभाग ने हर कदम पर आवश्यक सावधानी बरती होती तो इस तरह का विवाद खड़ा नहीं होता तथा राज्य सरकार को आलोचना का सामना न करना पड़ता।जब 2008 का संस्करण स्कूलों में पहुंचा तो एक बार फिर गुरु बालदास ने मुख्यमंत्री और स्कूली शिक्षामंत्री से मिलकर अपनी आपत्ति विधिसम्मत रूप से दर्ज की। इस बार सरकार हरकत में आई और 31 जुलाई को उपरोक्त आदेश जारी कर दिया। यहां रेखांकित करना चाहिए कि छत्तीसगढ़ राज्य की भाजपा सरकार ने हबीब तनवीर के प्रति कोई पूर्वाग्रह नहीं दिखाया अन्यथा उनकी किताब इतनी बड़ी संख्या में खरीदी ही क्यों जाती। लेकिन गुरु बालदास की आपत्ति मिलने के बाद जिस सुसंगत तरीके से कार्रवाई होना चाहिए थी वह नहीं हुई। ऐसा लगता है कि जबानी जमाखर्च ही चलता रहा। सरकार अगर ठीक से ध्यान देती तो पुस्तक की भूमिका में जो दो आपत्तिजनक वाक्य हैं उन्हें विलोपित करने का आदेश जारी होता और बात वहीं खत्म हो जाती। ऐसा न कर मानो हड़बड़ी में पुस्तक वाचन अभियान के दौरान पुस्तक न पढ़े जाने का आदेश जारी कर दिया गया जिसकी जरूरत नहीं थी। फिर आदेश में ''प्रतिबंधित पुस्तक'' संज्ञा का दो बार लापरवाही के साथ प्रयोग किया गया जिससे भ्रम फैल सकता है।


इस प्रकरण को बिना ठीक से समझे दो-तीन अखबारों ने जो रिपोर्टिंग की उससे भ्रम ज्यादा फैला, और देश भर में बुध्दिजीवियों के बीच तीखी प्रतिक्रिया हुई। एक समाचार में पुस्तक पर प्रतिबंध के साथ-साथ नाटय मंचन की प्रतिबंध की बात भी लिखी गई, जबकि आदेश में ऐसा नहीं कहा गया था। इसी समाचार में स्कूली शिक्षा मंत्री के हवाले से मंचन पर रोक लगाने की बात कही गई लेकिन उन्हें अधिकारिक रूप से उध्दृत नहीं किया गया। इस पत्र ने विभाग के सचिव से जरूर चर्चा की, जिन्होंने ''इस विवादित पुस्तक को प्रतिबंधित'' करने की बात कही। लेकिन आदेश जारी होने के बाद अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की। इसके बाद विरोध के स्वर उठना प्रारंभ हुए। सबसे पहले सीपीआईएम की प्रदेश इकाई ने निर्णय की आलोचना की, लेकिन उसने भी आदेश को देखना शायद जरूरी नहीं समझा। दिल्ली और भोपाल में भी छत्तीसगढ़ सरकार के निर्णय की घोर निंदा की गई। लेकिन यह सब एक अंग्रेजी अखबार में छपी रिपोर्ट के आधार पर ही हुआ तथा यह समझना कठिन नहीं है कि प्रकरण की पूरी जानकारी किसी के पास भी नहीं थी। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पुस्तकों और छुटपुट लेखों पर प्रतिबंध या अन्य सरकारी कार्रवाई करने का यह पहला मौका नहीं है। कांग्रेसी सरकार के समय में तो एक मंत्री के पिता और एक स्वतंत्र फीचर लेखिका को जेल की हवा भी खानी पड़ी थी। दरअसल इस नए प्रदेश की मुश्किल यही है कि साहित्य और संस्कृति के विविध आयामों के बारे में सरकार ने पिछले नौ साल में कभी भी सुचिंतित सोच का परिचय नहीं दिया है। चरणदास चोर पर प्रतिबंध इस आधी-अधूरी और चलताऊ मानसिकता का ही परिणाम है।''देशबन्धु'' सभी पक्षों से इस संवेदनशील प्रश्न पर समझदारी का परिचय देने का अपील करता है। हमारी मांग है कि छत्तीसगढ़ सरकार पुस्तक के वाचन पर लगा प्रतिबंध तुरंत हटाए। हमारी दूसरी मांग है कि पुस्तक की भूमिका से आपत्तिजनक पंक्तियां हटा दी जाए। हबीब तनवीर की एकमात्र वारिस सुश्री नगीन तनवीर को इसमें अपनी ओर से भी पहल करनी चाहिए। पुस्तक के विवादित अंश को विलोपित करने के साथ-साथ पुस्तक वापिस ग्रंथालयों में भेजी जाएं। फिर सरकार यह भी बताए कि उसकी पुस्तक खरीद नीति व प्रक्रिया क्या है तथा इसे सुचारू बनाने के लिए विशेषज्ञों की सलाह ली जाए। जिन अधिकारियों की लापरवाही से बिना सुधार के पुस्तक का नया संस्करण छप गया उनके बारे में भी सरकार विचार करे। हम अपने रचनाशील मित्रों व पत्रकारों को भी संयम बरतने की सलाह देंगे। अपनी निजी जानकारी की बिना पर यह जिक्र करना मुझे जरूरी लगता है कि मुख्यमंत्री डॉ। रमनसिंह ने हबीब तनवीर की बीमारी के समय एवं उनकी मृत्यु के बाद सरकारी स्तर पर आवश्यक वित्तीय प्रबंध करने के लिए भी स्वीकृति प्रदान की थी। इसलिए इस प्रकरण को सांप्रदायिक रंग देना उचित नहीं होगा। और अंत में सतनामी समाज को इस बात के लिए धन्यवाद देना चाहेंगे कि उन्होंने कानून अपने हाथ में लेने जैसा कोई अप्रिय कदम नहीं उठाया। अपनी धार्मिक, सामाजिक भावनाएं आहत होने पर आए दिन जो समूह हिंसक उपद्रवों पर उतर आते हैं उन्हें इससे सीख लेना चाहिए।(साभार)

ललित सुरजन

संपादक, देशबन्धु

रायपुर, छत्तीसगढ़

7/16/2009

कविता लिखनेवाला अधिक लड़ता है


डॉ. बलदेव
मुख्यमंत्री डॉ। रमन सिंह बहुत ठीक कहते हैं कि राज्य में कविता और लड़ाई साथ चलेगी। यह सिर्फ़ विश्वरंजन से मतलब नहीं सधनेवाले विरोधियों को दिया गया जबाव नहीं अपितु उन सारे बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, मीडियाकरों को भी चेतावनी है कि भाई, जिस तरह से आपने हिंसक और अराजक माओवादी और भ्रामक और पक्षपातपूर्ण तरीक़े से मानवाधिकार की वकालत की है उससे जुझ़ने के लिए केवल पुलिस को ही नहीं सभी को कविता और लड़ाई साथ-साथ करनी होगी । क्योंकि तिल को ताड़ बनाना सिर्फ़ आप ही नहीं जानते, हमारी जनता, सरकार और सारे सरकारी लोग भी उसका मुँहतोड़ जबाव देना जानते हैं।

साहित्य एक युद्ध ही तो है, जिसमें बाहर की लड़ाई भीतर लड़ी जाती है । लड़ाई के पीछे भी कहीं ना कहीं साहित्य क्रियाशील रहता है, जो उसके औचित्य-अनौचित्य को सिद्ध करता है । साहित्य मूलतः युद्ध की मनाही पर ज़ोर देता है, उसके स्थानापन्न विकल्पों की तलाश करता है और युद्ध अंततः साहित्य बनकर इतिहास के पन्नों में रेखांकित होकर सुनहरे भविष्य के विकल्पों का अभिज्ञान कराता रहता है । समय का मार्गदर्शन करता है । साहित्य और युद्ध दो पूरक क्रियायें हैं । आख़िर दोनों का लक्ष्य आत्मरक्षा होता है । साहित्यकार बाहर की लड़ाई को अधिनियमित करते हुए भीतर ही भीतर लड़ता है और योद्धा बाहर लड़ता है और भीतर की लड़ाई की दिशा तय करता है ।

चाहे वह कोई भी समय रहा हो, राज्य नामक व्यवस्था में दोनों ही सदैव प्रासंगिक और अपरिहार्य रहे हैं । राजशाही से लेकर वर्तमान गणतंत्र तक, हर व्यवस्था में साहित्यकार और योद्धा साथ-साथ सम्मान अर्जित करते रहे हैं । यदि छत्तीसगढ़ का पुलिस-मुखिया विश्वरंजन भीतर-बाहर दोनों लड़ाई में पारंगत हैं तो यह अयोग्यता नहीं अपितु सौभाग्य का विषय होना चाहिए । यह शुष्क पुलिस तंत्र की असंवेदनशीलता के विरूद्ध एक उत्तेजक और प्रेरक जन्मघूँटी भी है, जो लगातार असहिष्णुता की सीमा लांघते समय और परिस्थिति में अपरिहार्य है । जनता की भावनाओं, स्वप्नों और आकांक्षाओं को सिर्फ़ लाठी, बंदूक पकड़कर नहीं, शब्द और क़लम पर भी विश्वास रखकर अधिक सुगमता से फलीभूत किया जा सकता है । और यदि ऐसा विश्वरंजन करते हैं तो यह किस तरह आपत्तिजनक है, समझ से परे है ?

विगत 12 जुलाई को जब मदनवाड़ा में गणतंत्र के दुश्मनों के ख़िलाफ़ हमारे जांबाज और अदम्य पराक्रमी बी। के चौबे, गुप्ता और उनके साथी शौर्य का स्वर्णिम इतिहास रच रहे थे तब व्याकुलता और चिंता के साथ उनका पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन ही मार्गदर्शन कर रहे थे । जो यह कहते नहीं थक रहे कि वे उस समय साहित्य रस ले रहे थे, वे सिर्फ़ पूर्वाग्रही हैं, झूठे हैं । जो लोग 10-11 जुलाई को आयोजित साहित्य समारोह के बहाने डीजीपी विश्वरंजन की खामी निकाल रहे हैं यह न भूलें कि उनमें से ही कुछ अतिवादी किस्म के साहित्यकार और बुद्धिजीवी ठीक तब कविता पाठ के साथ-रसगुल्ला का स्वाद चख रहे थे जब हमारे राज्य के अनेकों बहादुर सिपाहियों के साथ छत्तीसगढ़ के माटी के सपूत और पुलिस अधीक्षक श्री चौबे के शहीद होने की ख़बर उनके टेबिल तक पहुँच चुकी थी ।

हम प्रमोद वर्मा पर केंद्रित आयोजन के परिप्रेक्ष्य में यह भी नहीं भूलें कि यह कार्य यहाँ के राजनेता, प्रबुद्ध वर्ग, साहित्यिक उत्थान का दंभ भरनेवाले तथाकथित जनतांत्रिक संगठनों और जनता का था जिसे उन्होंने एकसिरे से बिसार दिया था और जिसे एक पुलिस अधिकारी ने कर दिखाया। प्रमोद वर्मा मार्क्सवादी सौंदर्य चेतना में विश्वास करते हुए भी देशीय राग के हिमायती और हिंसात्मक विध्वंस के ख़िलाफ़ थे । वे समाजवादी प्रजातंत्र के हिमायती थे । उनके नज़रों में जनता से बड़ा कोई नहीं था । सत्ता भी नहीं । चाहे वह मार्क्सवादियों की हो या फिर माओवादियों की । जो लोग इस आयोजन से स्वयं को बौना पा रहे हैं वे इस समय अपनी लेखों और विज्ञप्तियों में अपनी भड़ास उतार रहे हैं । यह सभी जानते हैं कि ऐसे बुद्धिजीवियों या साहित्यिक संगठनों के अगुमा किस तक तक लिटरेरी डेमोक्रेसी और कितनी पवित्रता से क्या क्या करते रहे हैं ? उनके समझाइस या बडबोलेपन से लेकर इस राज्य का ना तो कभी सांस्कृतिक विकास हुआ है ना ही प्रजातांत्रिक ।

क्या इस सम्मेलन में राज्य के मुख्यमंत्री और महामहिम की भी भागीदारी नहीं थी ? ऐसे में क्या उन्हें भी मना कर दिया जाये कि वे ऐसे साहित्यिक आयोजनों से परहेज करें और ऐसा करना जनता और राज्य के हित में नहीं है । हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह आयोजन इसलिए भी महत्वपूर्ण साबित हुआ है, क्योंकि हमारे राज्य के मुखिया ने देश भर के बुद्धिजीवियों, आलोचकों, साहित्यकारों को छत्तीसगढ़ की महाविपदा माओवादी हिंसा को लेकर भी संबोधित किया और महामहिम राज्यपाल ने शासकीय अधिकारियों द्वारा अपने कर्तव्यों की औपचारिकता के बाद समाज के लिए किये जानेवाले कार्यों को समाज और देशसेवा करार दिया । और यह भी हमें नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी हर वक्त सिर्फ़ कर्तव्य पर ही नहीं जुटा होता । न मैं, न आप और न ही दुनिया का कोई। वह अपने जैविक, सांस्कृतिक, मौलिक और सामाजिक अधिकारों के प्रति भी सचेत रहता है और यही उसके कर्तव्यों को बल प्रदान करता है ।

जिन्होंने विश्वरंजन को 12-13 जुलाई को मानपुर-मदनवाड़ा के रास्ते में सैनिक वर्दी में देखा है वे बखूबी समझ सकते हैं कि उस समय एक कवि सेनापति किस तरह द्वंद्व और पीड़ा से गुज़र रहे थे। अपने बहादुर और शौर्यवान् नायकों को खोने का ग़म सिर्फ़ परिजन, नेता या जनता को नहीं उस सेनापति को भी होता है जिसके बल पर वह राज्य की शांति और सुरक्षा के लिए नेतृत्व भी करता है। स्वस्थ माँग, जायज आरोप और नैतिक टिप्पणी प्रजातंत्र को मज़बूत बनाती हैं किन्तु उसका भी समय होता है । असमय और आकारज टिप्पणी से तंत्र हतोत्साहित होता है । उसे अपनी उदात्त जनसेवा के उत्तर में मूर्खतापूर्ण आरोप से निराशा होती है । ऐसी घटनाओं का हल राजनीतिक चश्मे से कभी भी नहीं दिखा है। यह कितनी विडम्बना की बात है कि छत्तीसगढ़ में सक्रिय अनेक राजनीतिक घटक आज भी माओवादी हिंसा को प्रजातंत्र के विरूद्ध नहीं मानते हुए उसे मात्र सिर्फ़ सरकार की ग़रज बताते हैं । यह हमारे प्रदेश की अबौद्धिकता और निहायत अलाली नहीं तो और क्या है कि अब तक किसी भी तथाकथित सांस्कृतिक गरिमावाले लेखक, साहित्यकार, विचारक, शिक्षाविद की तरफ़ से मदनवाड़ा में हुए शहीद के प्रति न तो श्रद्धांजलि स्वरूप कोई टिप्पणी आयी है न ही कोई पहल । क्या हम अपने राज्य को ऐसी मौन अभिव्यक्ति का पाठ पढ़ाना चाहते हैं ? यदि हाँ, तो हमें उस मुक्तिबोध की दुहाई देने का कोई अधिकार नहीं बनता जिसके कहा था – तोड़ने ही होंगे मठ, उठाने ही होंगे अभिव्यक्ति के ख़तरे । मनुष्य नहीं कहेगा तो और कौन बोलेगा ।

किसी साहित्यकार को यह कहना कि वह साहित्य से सर्वथा दूर रहे ठीक उस तरह होगा कि वह साँस न ले । भोजन न करे । वह पुलिस की नौकरी करता है अतः वह सिर्फ़ लाठी चौबीसों घंटे पकड़कर गली-गली भटकता रहे और जनता चैन की नींद सोती रहे । यदि हम समाज को ऐसे ही देखना चाहते हैं भगवान बचाये ऐसे लोगों से । तब तो कोई यह भी कहेगा कि गुरूजी दिन के अलावा रात भर स्कूल खोलें रखे । न्यायाधीश चौबीसों घंटे कोर्ट में बैठें । सीमा के प्रहरी घर भी न लौंटे। पायलेट हवाई जहाज से उतरे हीं नहीं । नेता मंत्रालय में ही बैठे रहें । प्रतिपक्ष सिर्फ़ धरना, आंदोलन ही करते रहें । क्या छत्तीसगढ़ की जनता इतनी निंरकुश और इतनी पलायनवादी हो चुकी है ।

आप भी बोलिए कि यह मात्र राज्य सरकार की समस्या नहीं । यह केवल पुलिस की ड्यूटी नहीं कि वह आपके छत्तीसगढ़ को नक्सली विपदाओं से मुक्त बनाये रखे । यह वक्त निर्णय लेने की घड़ी है कि आप किसका वरण करना चाहते है ? माओवादी हिंसक तंत्र का या प्रजातंत्र का । अब पानी सिर से उतर चुका है । हर बच्चा बोले, हर युवक बोले, माँएं बोले, रिक्शावाला बोले, किसान बोले, मज़दूर बोले, अधिकार बोले । बोलें कि बस्स बहुत हो चुका, सिर्फ़ पुलिस ही नहीं लड़ेगी हम लडेंगे भी और नक्सलवादियों के ख़िलाफ़ बोलेंगे भी । (लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं )

6/24/2008

आदिवासियों को बहस से बाहर निकालें

-बसंत कुमार तिवारी


वामपंथी नेता एबी वर्धन का कहना है कि 'सलवा जुडूम को बंद कर देना चाहिए क्योंकि वह गैरकानूनी आंदोलन है। उन्होंने केन्द्र सरकार, जिसके वे पार्टनर हैं, से 'सलवा जुडूम के लिए धनराशि नहीं देने की मांग की है। श्री वर्धन ने यह नहीं बताया कि 'सलवा जुडूम और नक्सलियों के बीच पिस रहा आदिवासी दोनों से कैसे मुक्ति पाए। उनके पास भी कोई सटीक उत्तर या रास्ता नहीं है। श्री वर्धन ने भी मानवाधिकार आयोग, न्यायालय और एनजीओ संगठनों की तरह फतवा तो दिया पर रायपुर आकर बस्तर पहुंच कर वे 'सलवा जुडूम का जायजा लेते और नक्सलियों से बात कर उन्हें भी नक्सलवाद को छोड़ देने की सलाह देते तो शायद सही आकलन करते। दरअसल कठिनाई यही है कि अधिकांश लोग बयान देने और लंबे-लंबे लेख भी लिखते हैं जिनमें आदर्शवाद तो रहता है। जमीनी सच्चाई से रूबरू होना कतई नहीं रहता। लोग 'सलवा जुडूम की अव्यवस्था का विरोध कर रहे हैं, उस विचारधारा का नहीं जो गांधी के असहयोग की है। इस देश में अपनी राय देने वाले आंदोलन यदि गैरकानूनी हो जाएंगे तो लोकतंत्र कैसे बचेगा।

जहां तक आंदोलन के गैरकानूनी होने का प्रश्न है, श्री वर्धन यह बताते कि देश में आजादी के पहले और बाद में कौन सा आंदोलन कानूनी कहा गया। आजादी के लिए गांधी का स्वाधीनता आंदोलन, दांडी यात्रा से लेकर सन् 1977 का जेपी आंदोलन, सभी को गैरकानूनी कहा जाता रहा। श्री वर्धन की पार्टी की बंगाल की सरकार ने नंदीग्राम में जो किया वह वामपंथियों के लिए कानूनी था, पर अपना हक मांगने वाले ग्रामवासियों का आंदोलन 'गैरकानूनी। भाजपा नेता श्री आडवाणी अयोध्या की घटना को आंदोलन मानते हैं इसीलिए वे उसमें शामिल लोगों को कानून तोड़ने का अपराधी नहीं मानते। होता यही रहा है कि जो सत्ता में बैठा है वह अधिकार की हर कोशिश को गैरकानूनी कहता है और सत्ता से बाहर खड़ा आम आदमी उसे आंदोलन, क्योंकि वह उसे अपने अधिकार का संघर्ष मानता है।

इसी दौरान बस्तर के नक्सलवाद और 'सलवा जुडूम को लेकर कई लेख पढ़ने में आए। एक ने गांधी को जुडूम से बाहर निकल आने की मांग की। दूसरे ने नक्सलवाद का विरोध और 'सलवा जुडूम के समर्थन में भाजपा के दर्शन और नीतियों की बात कही। तीसरा लेख एक पुलिस अधिकारी का काम करते हुए लेखक और विचारक का था, जिसमें उन्होंने गांधी को छद्म गांधीवादियों के बीच से निकल आने की बात कही। एक का तर्क है कि पुलिस के अत्याचार से नक्सलवाद आया। कोई यह पूछे कि पहले कौन आया। बस्तर में नक्सलवाद पहले आया फिर जवाब में पुलिस आई। लेख अपने-अपने तर्कों और शब्दों के खेल में दिलचस्प और पठनीय हैं। इन्हें शहरी, अर्ध्दशहरी पाठक ही पढ़ेगा। वह आदिवासी शायद ही, जो नक्सलवाद और 'सलवा जुडूम के दो पाटों के बीच पिस रहा है। दरअसल हमने आदिवासी को इतना पढ़ना सिखाया ही नहीं कि वह बयानों और लेखों के संदेश समझ सकें।

जहां तक आदिवासी का प्रश्न है, वह न तो माओवाद को समझता है और न ही गांधीवाद या वामपंथ को पढ़ सकता है। उस आदमी के लिए कांग्रेस या भाजपा या वामपंथी सब एक से हैं। वह अपनी मुक्ति की तलाश में भटक रहा है और भटकता रहा है। सरकारी अमले, व्यापारियों के शोषण और उसके बुनियादी जल, जंगल और जमीन के अधिकार से वंचित कराने वालों से राहत पाने के दिवा स्वप्न में उसने नक्सलियों को शरण दी। उनके साथ सहयोगी बना। जब उसे यह समझ आ गया कि ये नए शोषक पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक हैं। अफसरशाही और व्यापारी तो उसे तिल-तिल कर मार रहे थे, नक्सली तो सीधे गोली मार देते हैं, तब उसने नक्सलियों से असहयोग करना शुरू किया। सामूहिक रूप से विरोध स्वरूप ही आदिवासियों ने 4 और 5 जून 2005 को नक्सलियों को पकड़ कर पुलिस के हवाले किया। यह सिलसिला चलता रहा और अब वह 'सलवा जुडूम के रूप में सामने है।


आदिवासी अपनी जमीन पर वापस जाना चाहता है। उसे लगता है कि अपने सामूहिक विरोध से वह शायद वहां लौट सकता है। उसकी कठिनाई यह है कि वह सुरक्षित कैसे रहे। किसी समय उसे लगा कि काकतीय वंश के उसके राजा के साथ वह सुरक्षित है। उसे लगा कि वह अपने जल, जंगल और जमीन पर राजा के सहारे लौट सकता है। इस आशा में वह आखरी राजा प्रवीर चंद भंजदेव के निमंत्रण पर जगदलपुर महल के सामने तीर कमान लेकर धीरे-धीरे एक लाख की संख्या में जमा हो गया। फिर क्या हुआ, सब मालूम है। सरकार ने कानून और गैरकानून के चक्कर में कुछ आदिवासी और राजा को ही मार डाला। पर इसके बाद तो स्थितियां और खराब होती गईं। 44 वर्ष मध्यप्रदेश में जितना शोषण नहीं हुआ, उससे कहीं ज्यादा छत्तीसगढ़ के आठ सालों में हुआ। बस्तर के इतिहास में इतनी मुश्किल में आदिवासी पहले कभी नहीं फंसा। पहले तो वह किसी तरह निकल आया अब उसके सामने कुंआ और खाई ही है।

दरअसल, आदिवासी किसी वाद की लड़ाई नहीं लड़ रहा। वादों की बहस शहरों में होती है। अखबारों और किताबों में। कुछ समझने के लिए तो कुछ मनोरंजन के लिए। आदिवासी तो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। वह फैशन की तरह नहीं, अति वास्तविक मानवाधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है।

वह किसी से गांधीवाद, किसी से माओवाद या भाजपावाद नहीं पढ़ना चाहता न ही समझना चाहता है। वह इन सबसे अलग अपनी मुक्ति चाहता है। उसे गांधी का असहयोग आंदोलन नहीं मालूम, वह माओवाद भी नहीं जानता, वह केवल अपनी रक्षा का रास्ता खोज रहा है। अपने आप जीने का हक चाहता है। उसका प्रश्न एबी वर्धन, कनक तिवारी, वीरेन्द्र पाण्डेय, विश्वरंजन और संदीप पाण्डेय ही नहीं सभी के सामने है। जिस तरह सभी के सामने कोई कारगर विकल्प नहीं है वैसा ही इस लेखक के पास भी नहीं है। एक बात लगती है कि बस्तर में वैचारिक संघर्ष या बहस की नहीं, व्यवहारिक पहल की जरूरत है। आदर्शवाद की बात करने वाले आदिवासियों को संकट से निकालने का कारगर रास्ता बताएं। एक रास्ता असहयोग का गांधीवादी रास्ता है दूसरा बंदूक की गोली। अब तक दोनों के परिणाम नहीं निकले। अब जरूरत सैध्दांतिक बहस की नहीं, ठोस विकल्प खोजने की है। बहस करने वालों उसे संकट से बाहर निकालो।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

यह तो नहीं है महात्मा गांधी का रास्ता


-संदीप पाण्डेय


रायपुर में छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम, 2005 की वापसी तथा इस अधिनियम के तहत गिरफ्तार तमाम निर्दोष लोगों, जैसे डॉ. विनायक सेन, अजय टीजी, साई रेड्डी, आदि, की रिहाई हेतु आयोजित दस दिवसीय उपवास पर एक लेख के माध्यम से छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक एवं साहत्यिकार विश्वरंजन ने टिप्पणी की है कि यदि गांधी आज जीवित होते तो शायद बस्तर के जंगलों में अकेले जा कर माओवादियों से कहते कि, 'मित्र! हिंसा छोड़ो, जो तुमसे असहमत हैं, उन्हें मारना छोड़ो, हम तुम्हें अब नहीं मारने देंगे। तुम्हे आदिवासियों को मारने के पूर्व हमें मारना पड़ेगा। हम उफ्फ तक नहीं करेंगे। हम हाथ तक नहीं उठाएंगे...

यह बात तो विश्वरंजन जी भी स्वीकार करेंगे कि राज्य की जो पुलिस व सेना के रूप में हिंसक शक्ति है वह नक्सलवादियों या किसी भी गैर राज्य हिंसक शक्ति से बड़ी है। विश्वरंजन जी जो बात गांधी के मुंह से गांधीवादियों के लिए कहलवाना चाहते हैं वही बात हम विश्वरंजन जी की पुलिस व उसके द्वारा समर्थित 'सलवा जुडूम नामक गैर संवैधानिक सशस्त्र बल के लिए कहना चाहेंगे। विश्वरंजन जी के अनुसार गांधी किसी भी हालत में उस समूह के साथ नहीं खड़े होते जिसका बुनियादी फलसफा हिंसा और आतंक पर टिका हुआ है। इसीलिए हम विश्वरंजन साहब को बताना चाहते हैं कि हम उनकी पुलिस, सलवा जुडूम व उनकी सरकार के साथ नहीं खड़े हैं।

इसका यह मतलब कतई नहीं है कि नक्सलवादियों द्वारा की गई हिंसा को जायज ठहराया जा सकता है। कुल मिलाकर विश्वरंजन जी जब नक्सलवादी हिंसा की बात करते हैं तो वे यह नहीं भुला सकते कि नक्सलवादी हिंसा असल में राज्य हिंसा के जवाब में प्रति हिंसा है। इस राज्य हिंसा में प्रत्यक्ष हिंसा तो शामिल है ही जिसके अंतर्गत लोग पुलिस सेना व सलवा जुडूम द्वारा की गई हिंसात्मक कार्रवाईयों के शिकार हुए हैं, लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण वह अप्रत्यक्ष हिंसा है जिसके तहत एक लंबी अवधि के दौरान आम लोगों को उनकी न्यूनतम मजदूरी, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत अनाज, मूलभूत चिकित्सा व अन्य सुविधाओं से वंचित कर उन्हें घुट-घुट कर मरने के लिए मजबूर किया गया है।

यह शोषण व भ्रष्टाचार की व्यवस्था तो विश्वरंजन साहब नक्सलवाद से पुरानी समस्याएं हैं और आपकी राज्य व्यवस्था ने स्थिति को ठीक करने के लिए कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया। बिना नक्सलवाद के मूल कारणों का विश्लेषण किए तथा नक्सलवाद के पनपने में राज्य व्यवस्था की भूमिका की बात किए बिना नक्सलवाद को सिर्फ कोसने से कुछ काम नहीं चलेगा। नक्सलवाद के पनपने का सीधा-सीधा मतलब है कि राज्य असफल रहा है। यदि राज्य ने अपने सभी नागरिकों को उनकी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु साधन उपलब्ध कराए होते तथा उन्हें सम्मान व सुरक्षा के साथ जीने का मौका उपलब्ध कराया होता तो शायद हमें आज नक्सलवाद की समस्या का सामना ही न करना पड़ता। नक्सलवाद की समस्या के निश्चित सामाजिक आर्थिक-राजनीतिक कारण हैं और उसका समाधान भी सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक क्षेत्रों में ही ढूंढ़ना होगा। नक्सलवाद की समस्या का समाधान सलवा जुडूम कतई नहीं हो सकता। राज्य व्यवस्था को अपने चरित्र में परिवर्तन लाना पड़ेगा। उसे सिर्फ संपन्न वर्ग, जिसमें अब ठेकेदार, कंपनियां व माफिया भी शामिल हैं, के संरक्षक की भूमिका छोड़कर आम गरीब वंचित नागरिकों का हितैषी बनना पड़ेगा।

इस बात में तो कोई शक है ही नहीं कि गांधी कभी भी नक्सलवादियों के हिंसा व आतंक के फलसफे का समर्थन नहीं करते लेकिन, विश्वरंजन साहब ने आज जिस शासन-प्रशासन तंत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं उसका भी कभी समर्थन नहीं करते। गांधी की ग्राम स्वराज्य व्यवस्था में तो हिंसा व आतंक के तरीकों का इस्तेमाल करने वाली पुलिस व सेना का कोई स्थान हो ही नहीं सकता। वह पुलिस जो आम नागरिकों के लिए दहशत का प्रतीक है को गांधी कभी स्वीकार करते ही नहीं। आपके थानों में जहां आम इंसान अपमानित होता है, साधारण सी प्राथमिकी भी दर्ज नहीं होती, 'पहुंच वाले अपराधी खुले घूमते हैं तथा निर्दोष लोगों को पकड़ कर जेलों में डाल दिया जाता है ऐसी व्यवस्था के मुखिया हैं आप यदि आज एक संवेदनशील साहित्यकार हैं तो हम आपसे यह तो उम्मीद नहीं ही करेंगे कि आप एक फासीवादी सरकार की सेवा करते हुए उसके फासीवादी तरीकों को जायज ठहराएंगे।

चलिए हमारी हिम्मत नहीं है कि हम जाकर बस्तर के जंगलों में नक्सलवादियों को अहिंसा का पाठ पढ़ा सके, लेकिन आपके पास तो पूरा तंत्र है। किसी भी गांधीवादी की संस्था से बहुत ज्यादा साधन आपके पास हैं। नक्सलवाद से लड़ने के लिए केंद्र सरकार ने आपको असीमित साधन उपलब्ध कराए हैं।

आप ही कुछ गांधीवादी तरीकों का प्रयोग क्यों नहीं करते? क्या आप पुलिस की व्यवस्था को और मानवीय बना सकते हैं? क्या आप प्रदेश के पुलिस मुखिया होने के नाते ऐसा माहौल बना सकते हैं कि आज गरीब नागरिक को पुलिस से डर न लगे और वह पुलिस को मित्र के रूप में स्वीकार कर सके? जब आम इंसान थानों में जाए तो उसका स्वागत गालियों से न हो बल्कि उसे सम्मानपूर्वक बैठाया जाए। क्या आपकी पुलिस लोगों को सुरक्षा प्रदान करने के साथ अन्य सरकारी योजनाओं, जैसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली, वृध्दावस्था- विधवा पेंशन, गरीबों के लिए आवास, भूमिहीनों के लिए पट्टे, मूलभूत शिक्षा स्वास्थ्य सुविधाएं तथा राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का पूरा-पूरा लाभ, बिना किसी भ्रष्टाचार के, उपलब्ध करा सकती है।

फिलहाल तो लोगों को छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत न्यूनतम एक सौ दिनों का रोजगार नहीं मिल रहा। व्यापक स्तर पर धांधली अलग है। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम भी एक राष्ट्रीय कानून है। क्या इस कानून की खुलेआम धाियां उड़ाने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों-जनप्रतिनिधियों- ठेकेदारों के खिलाफ आज छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम या गैर कानूनी गतिविधियां (निरोधक) कानून के तहत कोई कार्रवाईयां कर सकते हैं? क्या पुलिस प्रभावशाली लोगों की संरक्षक बने रहने के बजाए इस देश के आम इंसान के मौलिक एवं कानूनी अधिकारों की संरक्षक बन सकती है? मौलिक सवाल यह है कि क्या आज इस व्यवस्था में मूलचूल परिवर्तन लाने वाले कोई कदम उठा सकते हैं? सलवा जुडूम का प्रयोग तो कोई भी कर सकता है क्योंकि शासक वर्ग की मानसिकता में जनता के किसी उभार को कुचलने के लिए हिंसक रास्ता ही सहज रूप से आता है। किंतु क्या हम आप जैसे संवेदनशील अधिकारी से उम्मीद करें कि वह कोई सृजनात्मक अहिंसक प्रयोग करेगा जिसे वार्क में गांधीवादी श्रोणी में रखा जा सके?

हमारी जो क्षमता है उससे हम सरकार की सभी जन विरोधी नीतियों के खिलाफ बोलते रहेंगे। नक्सलवादियों की हिंसा का हम समर्थन नहीं करते। किंतु राज्य की ताकत व भूमिका नक्सलवादियों से बड़ी है। राज्य से हम उम्मीद करते हैं कि वह अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियां ठीक से निभाएगा। हमारा मानना है कि राज्य ही नक्सलवाद की समस्या के उभरने के लिए जिम्मेदार है तथा वही अपनी नीतियों में परिवर्तन कर इस समस्या पर काबू भी पा सकता है। हमारे लिए छत्तीसगढ़ विशेष जनसुरक्षा अधिनियम व गैर कानूनी गतिविधियां (निरोधक) अधिनियम के खिलाफ संघर्ष लोकतंत्र को बचाने संघर्ष है। समस्या पेचीदी है तथा समाधान भी आसान नहीं है यह आप भी जानते हैं। अत: नक्सलवाद की समस्या पर बहस को सिर्फ हिंसा-अहिंसा के पक्ष या विरोध में बहस तक सीमित न करें। अच्छा होगा यदि आप अपने कौशल का प्रयोग नक्सलवाद की समस्या के मानवीय समाज में लगाएं। जब तक आपके तरीके नहीं बदलते तब तक हम आपकी सरकार के खिलाफ बोलते रहेंगे तथा उपवास जैसे कार्यक्रमों का भी आयोजन करेंगे।

आपको याद है न गांधी ने क्या कहा था स्वराज्य के बारे में। स्वराज्य का मतलब सिर्फ कुछ लोगों द्वारा सत्ता प्राप्त कर लेना नहीं बल्कि बहुसंख्यक जनता के अंदर यह शक्ति पैदा होना है कि वह कुछ लोगों द्वारा सत्ता के दुरुपयोग का प्रतिकार कर सके। सलवा जुडूम सत्ता का दुरुपयोग है। लोगों के हाथ में हथियार देना कोई बुध्दिमानी पूर्ण कार्रवाई नहीं कही जाएगी। क्या हम इतिहास से यह सबक नहीं सीखेंगे कि जब भी गैर राज्य शक्तियों को हथियारों से लैस किया गया है वह कुछ समय के बाद अनियंत्रित हो जाती है तथा समाज के लिए घातक हो जाती हैं।

आखिर सलवा जुडूम के माध्यम से लोगों को गांव छोड़कर शिविरों में रहने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है? लोगों को उनके गांवों, खेतों, जंगलों से उजाड़कर उन्हें अपनी आजीविका के लिए भी मोहताज बनाकर हम उन्हें कैसी सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं? छत्तीसगढ़ प्राकृतिक संसाधनों में धनी है। फिर भी विडम्बना यह है कि लोग गरीब एवं लाचार।

गांधी के ग्राम स्वराज्य विचार के मुताबिक तो गांवों को ही सिर्फ यह अधिकार है कि वे अपनी व्यवस्था कैसे बनाएं। गांवों में प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन कैसे होगा, गांव में शिक्षा स्वास्थ्य सुरक्षा की व्यवस्था कैसी होगी यह तय करने का अधिकार स्थानीय लोगों को ही है। किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि छत्तीसगढ़ सरकार अपने प्राकृतिक संसाधनों पर से स्थानीय लोगों का अधिकार समाप्त कर पूंजीपतियों के मुनाफा कमाने के लिए उन्हें इन संसाधनों के खुले दोहन की छूट देना चाहते है।

क्या आप इस तथाकथित विकास के समर्थक हैं विश्वरंजन जी? यह विकास तो गांधी के विचारों के अनुकूल है नहीं। यदि आप नक्सलवादियों को नहीं समझा सकते तो कम से कम उन पूंजीपतियों को ही समझा दे कि जनता के प्राकृतिक संसाधनों से अपनी गिध्द दृष्टि हटा ले। यदि आप ये भी नहीं कर सकते तो गांधी के प्रिय विषय मद्यनिषेध पर तो कुछ पहल ले ही सकते हैं। क्या आप सरकार द्वारा शराब को बढ़ावा देने के कार्यक्रम जिससे फायदा सिर्फ शराब माफियों का हो रहा तथा आम इंसान का परिवार बरबाद हो रहा को रोकने के लिए कुछ कदम उठा सकते हैं?
(लेखक मैगसेसे पुरस्कार विजेता एवं गांधीवादी कार्यकर्ता हैं व इन दिनों रायपुर, छत्तीसगढ़ में कुछ विदेशी महिलाओं के साथ धरना पर बैठें हैं ।)

महात्मा गांधी को चाहिए उनसे मुक्ति!

वीरेन्द्र पाण्डेय


अब कोई संकट नहीं है। कम से कम गांधी को लेकर। न दक्षिण अफ्रीका में, न ही भारत में। कांग्रेस में भी कोई दुविधा नहीं है, बापू को लेकर। कोई संकट भी नहीं है। यही वजह है कि जो आग्रह महात्मा ने रखे थे, कांग्रेसी उसे छोड़ चुके हैं। गांधी चाहते थे कि शराब न पी जाए। स्वदेशी चीजें, कपड़े प्रयोग हों। देश की शिक्षा स्वदेशी भाषा में हो। राजभाषा-राजकाज की भाषा हिन्दी हो। कांग्रेसी ठर्रा से बोदका तक अपनी पसंद की मजे से गटक रहे हैं। खद्दर क्या, इस्तेमाल की कोई भी स्वदेशी वस्तु बड़े कांग्रेसी हाथ नहीं लगाते। बेटे-बेटियां विदेशों में पढ़ रहे हैं। काम-काज और राज-काज उन्हीं अंग्रेजों की भाषा में हो रहा है, जिन्हें गांधी ने भारत छोड़ने पर मजबूर किया था। कांग्रेस ने गांधी बापू और उनकी सीख से पल्ला झाड़ लिया है, क्योंकि गांधी का नाम सत्ता के शिखर पर पहुंचाने वाली लिफ्ट नहीं रही। उन्होंने अब अपने गांधी गढ़ लिए हैं। इंदिरा गांधी से लेकर राहुल गांधी तक। जब जैसे गांधी की जरूरत पड़ी, उसे आगे कर मतलब साध लिया। गांधी ने गोरी चमड़ी के अंग्रेजों को भारत से भगाया था, पर कांग्रेस ने गोरी चमड़ी की भी एक गांधी गढ़ ली है। फिर से अंग्रेजी राज का अनुभव कर रहे हैं। गांधी को भी कांग्रेस से कोई परेशानी नहीं है। गांधी ने जिस दिन लोक सेवक संघ बनाने की सलाह दी थी, उसी दिन उन्होंने कांग्रेस को तिलांजली दे दी थी। वैसे भी बापू कभी कांग्रेस के चवन्नी के सदस्य नहीं रहे।

गांधी ने कांग्रेस को और कांग्रेस ने गांधी को मुक्त कर दिया। नाथूराम गोडसे ने बापू को जीवनमुक्त कर दिया। गोडसे ने तो गांधी को एक ही बार मारा, पर ऐसे दावेदार हैं जो गांधी को समझने, जानने और मानने का दावा करते हैं। इन्होंने ही दुनिया को बताया कि गांधी ने कांग्रेस भंग कर लोक सेवक संघ बनाने की राय दी थी, पर इन बापू के मानने वालों ने भी कांग्रेस नहीं छोड़ी। अपितु कांग्रेसी नेताओं के दामन थाम कर सत्ता प्रतिष्ठिानों की सीढ़ियां चढ़ी। अधिकारों की मलाई तबियत से खाई। इन्होंने पूर्वाग्रहों की पोटली कांख में दाब रखी है। आंखों पर झूठ का गहरा काला चश्मा चढ़ा रखा है। देश की छोटी से लेकर सबसे बड़ी अदालत ने कह दिया है कि नाथूराम गोडसे संघ का स्वयंसेवक नहीं था, न ही गांधी हत्या से संघ का कोई संबंध है। पर बार-बार यही दोहराया जा रहा है। झूठ के ये पैरोकार हर बार पहले से ज्यादा तेज स्वर में घोषणा करते हैं कि संघ का आजादी के आंदोलन में कोई योगदान नहीं है। ये सुविधापूर्वक भूल जाते हैं कि संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार कांग्रेस के सदस्य और पदाधिकारी थे। कांग्रेस के आंदोलनों में जेल गए। राजद्रोह का मुकदमा उन पर चला। उनकी प्रेरणा से हजारों स्वयंसेवकों ने आजादी में अपना योगदान दिया। एक बार जब करीब साल भर की सजा के बाद रिहा हुए डॉ. साहब के सम्मान समारोह की अध्यक्षता मोतीलाल नेहरू ने की।

आंखों में झूठ का चश्मा चढ़ाए, कानों में पूर्वाग्रह की रूई ठूंसे हुए गांधी के इन झंडाबरदारों को यह सत्य न कभी दिखाई देता है न सुनाई देता है। गोडसे ने बापू को एक ही बार मारा, पर गांधी के ये चेले रोज-रोज उनकी हत्या कर रहे हैं। गांधी के ये शिष्य आज उस ओर पैर रखकर भी नहीं सोते, जिधर संघ की शाखा लगती है। लेकिन गांधी को संघ की शाखा को भेंट देने से परहेज नहीं था। पहली बार अपने पट्ट शिष्य जमनालाल बजाज के साथ वर्धा में बापू संघ स्थान पर गए। यह संघ शिक्षा वर्ग बजाज जी की ही जमीन पर लगा था। बापू 1 घंटा 30 मिनट यहां रहे। जिज्ञासाएं की, तिथि थी 25 दिसंबर 1934। बापू ने संघ को पहली भेंट दी प्रेम और शांति के दूत ईसा मसीह के जन्मदिन पर। अगले दिन उन्होंने डॉ. हेडगेवार से मुलाकात की इच्छा प्रकट की। मुलाकात हुई, सार्थक रही। उसके बाद कम से कम दो बार गांधी संघ के कार्यक्रम में गए। हर भेंट से गांधी संतुष्ट हुए संघ से जैसे सवाल आजतक पूछे जा रहे हैं। कभी गुरुदेव रविन्द्रनाथ के सामने नहीं रखे गए। स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण मिशन से भी नहीं पूछे गए। आज भी तर्क की नयी-नयी कसौटी लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कसा जाता है। संघ हर बार कुंदन साबित हुआ है। चेले फिर नयी कसौटियों के साथ उपस्थित होते रहते हैं।

जब गांधी अंग्रेजों की तोप से टकरा रहे थे, संघ भी उनके साथ खड़ा था। अपने लोहारखाने में अंग्रेजों की गुलामी से छुटकारा पाने के लिए एकता-अखंडता के शस्त्र ढाल रहा था। इसे देखने के लिए सच्चाई की आंखें चाहिए। भारत बड़ा भावुक देश है। जिसे महान मानता है, उसे भगवान का दर्जा दे देता है, इसमें सुविधा रहती है। महान आदमी के आचरण का अनुशरण नहीं करना पड़ता। साथ ही पंडे-पुजारियों का भी जुगाड़ हो जाता है। पर संघ यह मानता है कि मनुष्य कितना ही महान हो, उसके स्खलित होने, चूकने की गुंजाइश बनी रहती है। यही कारण है कि संघ ने भगवा ध्वज को अपना गुरू माना है। गांधी भी अपवाद नहीं हैं। जवाहरलाल नेहरू के प्रति उनका अतिरिक्त मोह का होना, बा पर अपनी इच्छा लादना, उनकी इच्छा के विरुध्द सुभाषचंद्र बोस का कांग्रेस अध्यक्ष बनना गांधी पचा नहीं पाए। अंतत: सुभाष जी को इस्तीफा देना पड़ा। इन्हें महान बापू की मानवीय कमजोरी ही कहा जाएगा।

संघ की नजरों में पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दिलाना मनुष्य से चूक होने के उदाहरण हैं। फिर भी संघ की दृष्टि में बापू महान आत्मा थे। संघ ने उन्हें अपनी प्रात: स्मरण की प्रार्थना में शामिल किया है। जैसे फिल्मी कलाकारों के एजेंट होते हैं, जो उनके समय का संयोजन करते हैं, उनकी अनुमति के बिना कलाकार न तो किसी फिल्म में काम करता है न ही शूटिंग के लिए तारीख देता हैं। वैसे ही ये गांधी के स्वयंभू एजेंट हो गए हैं। यही दुनिया को बताते हैं कि बापू ने जो किया उसका क्या अर्थ है। आज बापू होते तो क्या करते क्या नहीं करते। बाकी सबसे तो गांधी मुक्त हो गए, पर एजेंटों की कैद में आज भी छटपटा रहे हैं। बापू अगर इन एजेंटों से मुक्त हो पाए तो जरूर छत्तीसगढ़ आएंगे। जैसे पहले आए थे। इसी छत्तीसगढ़ के पंडित सुंदरलाल शर्मा के अछूतोद्वार के क्षेत्र में अपना गुरू माना था।

अब गांधी छत्तीसगढ़ आएंगे तो बस्तर जरूर जाएंगे। उनके मन में जो आदिवासियों के लिए काम न कर पाने की ग्लानि है, उसे दूर करेंगे। यह बात जरूर है कि गांधी जब यह जानेंगे कि जिस शराब के वे विरोधी हैं, वह आदिवासियों के रोजमर्रा जीवन का आवश्यक अंग है। वैसे ही मांसाहार और हिंसा जंगल में हर कदम पर मिलती है, क्योंकि जंगल में वही अपना अस्तित्व कायम रख सकता है, जिसके पास ताकत हो। ये सब बातें गांधी को दु:खी करेंगी। पर जब उन्हें पता लगेगा कि वनवासी माओवादी हिंसा के सामने सलवा-जुडूम चला रहे हैं। बस्तर की सात लाख की आबादी में सलवा-जुडूम आंदोलन में चार हजार से चालीस हजार कार्यकर्ता शामिल हो रहे हैं। इन कार्यकर्ताओं के हाथ में हथियार तो होते हैं, पर हिंसा के लिए नहीं, अपितु जंगल में राह की बाधा हटाने के लिए। यह शांति अभियान उन वनवासियों द्वारा चलाया जा रहा है, जो बापू के अहिंसा के दार्शनिक पक्ष को नहीं जानते। शराब और मांसाहार की बुराई को भी नहीं जानते। उनका सलवा-जुडूम उनके मन की सजह इच्छा है। वे नक्सली हिंसा का जवाब असहयोग से देने की नीति पर चल रहे हैं। गांधी 139 साल की उम्र में भी अपनी तर्ज के इस आंदोलन से जुड़ना चाहेंगे। हे राम, बापू के जान-पाण्डों को सद्-बुद्धि दो ताकि वे गांधी को अपने चंगुल से आजाद करें। बापू जुडूम में शामिल होंगे तो नेता के अभाव में कभी-कभी जुडूम आंदोलन थोड़ा बहुत बहक जाता है, नहीं भटक पाएगा। गांधी के सानिध्य में आदिवासी भी बुराई से मुक्त हो सकेंगे। गांधी को समझने, जानने, मानने वाले कृपा करके गांधी को अपनी कैद से आजाद करो ताकि गांधी सलवा-जुडूम से जुड़ सकें।
(लेखक जगदलपुर के पूर्व विधायक हैं)

6/20/2008

गांधी ! तुम निकल भागो फर्जी गाँधीवादियों के बीच से !


विश्वरंजन
पुलिस महानिदेशक,छत्तीसगढ़


एलबर्ट आईन्सटाईन ने कहीं लिखा है कि सदियों बाद लोग यह मानने को तैयार नहीं होंगे कि गाँधी जैसा कोई हाड़-माँस का व्यक्ति इस धरती पर कभी चला भी हो । गांधी के गुजरे हुए अभी सदियाँ नहीं बीती है । और किस स्थिति में गाँधी क्या करते, क्या नहीं करते इस विषय पर ऐसे लोग राय देने लगे हैं जो खुद के गिरेहबान में झाँकने की हिम्मत नहीं कर सकते। इसीलिए मैं गांधी पर लिखने से कतराता हूँ । कुछ लोग नहीं कतराते, यह सच है । पर उन्हें कतराना चाहिए ।

पर मैं गाँधी के विषय में और गाँधीवादियों के विषय में सोचता अवश्य हूँ । मेरा यह मानना है कि दूसरा गाँधी नहीं हो सकता, जैसे दूसरा राम नहीं हो सकता, दूसरा कृष्ण नहीं हो सकता, दूसरा बुद्ध नहीं हो सकता, दूसरा लाओत्से नहीं हो सकता, दूसरा ईसा नहीं हो सकता, दूसरा मोहम्मद नहीं हो सकता। वैसे एक गुलाब जैसा दूसरा गुलाब भी नहीं हो सकता। उसी तरह मैं सिर्फ विश्वरंजन हो सकता हूँ। कनक तिवारी सिर्फ कनक तिवारी हो सकते हैं। हम दोनों यदि अपने-अपने गिरहबान में झाँकते रहें तो निश्चित ही अच्छे इंसान हो सकते हैं। गाँधी नहीं हो सकते। और जैसे गुलाब के कारण कोई गुलाबवादी नहीं हो सकता, गाँधी के बाद संदीप पान्डेय या कोई भी गाँधीवादी नहीं हो सकता। गाँधी नोआखोली मे सम्प्रदायिक हिंसा रोकने के लिये अकेले ‘एकला चलो रे’ कहते हुए चल सकते थे। आज के गाँधीवादी बस्तर के जंगलों घूम कर माओवादियों से नहीं कह सकते कि “मित्र! हिंसा छोड़ो, जो तुमसे असहमत हैं, उन्हें मारना छोड़ो, हम तुम्हें अब नहीं मारने देंगे । तुम्हें आदिवासियों को मारने के पूर्व हमें मारना पड़ेगा। हम उफ्फ तक नहीं करेंगे। हम हाथ तक नहीं उठायेंगे......।”

गाँधी ऐसा कर सकते थे इसलिये जब गोडसे की गोली लगी तो उनके मुँह से निकला था- “हे राम।” आज यदि गोली क्या लाठी भी सिर पर पड़ जाये तो हमसे से ज्यादातर लोगों- मेरे, कनक तिवारी और ज्यादातर गाँधीवादियों के मुँह से निकलेगा “बार रे बाप”। तथाकथित गाँधीवादी जंगल जाकर माओवादियों से बातचीत करने की हिम्मत नहीं कर सकते। वे शहरी चौराहों पर धरना दे सकते हैं। गाँधी अपनी शुद्धि के लिये उपवास करते थे। उन्हें लगता था कि यदि ब्रिटिश हुकूमत उनकी कोई बात नहीं मान रही है तो कहीं कुछ खोट उनमें है जिसके कारण वे सही बात समझा नहीं पा रहे हैं । अतः उन्हें उपवास कर ख़ुद को शुद्ध करने की ज़रूरत है। गाँधी के उपवास मन और हृदय को शुद्ध करने के तरीके थे । गहन आत्म-विश्लेषण का जरिया था जिसके बाद वे दूसरों पर और मज़बूती से आज़ादी की लड़ाई में उतरते थे। गाँधी का उपवास दूसरों पर दबाव डालने की नियत से नहीं होता था जैसा तथाकथित गाँधीवादी आज करते हैं। पर मैं गलत हो सकता हूँ। मैं गाँधी नहीं हूँ और गाँधी के दिल और दिमाग में छुपे हर कारण, हर राज़ को उकेरने की क्षमता नहीं है। पर कनक तिवारी भी गाँधी नहीं हैं। न ही तथाकथित गाँधीवादी ।
मैं गांधी के विषय में सचमुच लिखना नहीं चाहता । पर कनक तिवारी ने बातचीत छेड़ ही दी है। मैंने पहले “गिरहबान में झाँकने” की बात कही है। गाँधी में यह ताकत थी। वे अपनी गलतियों, अपनी कमज़ोरियों का जिक्र अपने भाषणों में, अपने पत्रों में, अपने लेखों में खुल कर सकते थे। मैं आजकल के गाँधीवादियों में यह हिम्मत नहीं पाता । उनमें से कोई गाँधी की तरह खुली किताब नहीं है। वे ठीक-ठाक गाँधी का मुखौटा भी नहीं बना सकते जिसे वे पहन सके। उनके गाँधी के मुखौटों पर क्रोध भी झलकेगा, घृणा भी, दूसरों से ज्यादा जानने-समझने का अहंकार भी । मुखौटा लगा कर कोई नोआखोली या बस्तर के वीरान बियाबानों में नक्सली हिंसा रोकने के लिये नहीं चल सकता।

मैं एक गाँधीवादी को कुछ-कुछ जानता हूँ। और जितना जानता हूँ उसके कारण यह तो कह ही सकता हूँ कि वे झूठ बहुत बोलते हैं। वे रहते तो गाँधीवादी तरीके से हैं। आश्रम में निवसते हैं । ज़मीन पर सोते हैं। बहुत सादा खाना खाते हैं। पर ग्रांट्स या अनुदान के लिये बार-बार दिल्ली के गलियारों की खाक भी छानते रहते हैं। उनके पास देश-विदेश से अनुदान भी लाखों में आता है। अहिंसा के नाम पर नक्सलियों से याराना भी होता है। गाहे-बगाहे से ज्यादा नक्सलियों को बचाने की कोशिश करते हैं। गाँधीवादी होने का तो फायदा उन्हें है ही। नक्सलियों को और मज़बूत करने की नियत से झूठी कहानी भी फैलाते रहते हैं......। पर हैं तो वे गांधीवादी ही । मैं नहीं जानता कि गाँधीजी ऐसा करते या नहीं। कनक तिवारी भी नहीं जानते। हम दोनों गाँधी नहीं हैं। पर मुझे लगता है कि गाँधी ऐसा नहीं करते । भारतीय गाँधीवादियों में अहंकार भी बहुत होता है। मार्टिन लूथर किंग जूनियर, नेल्सन मण्डेला और विशप टूटू से बाहर वे जा नहीं सकते। परन्तु डारथी डे, सीजर चेवाज़ या बारबरा डेमिंग का नाम शायद ही सुना होगा। ये तथाकथित गाँधीवादी सही मायनों में गाँधी से ज्यादा नज़दीक है। इन सब ने झूठ का सहारा कभी नहीं लिया और अपनी कमज़ोरियों को छुपाने की कोशिश भी नहीं की। और इन सभी में जबर्दस्त आत्मविश्लेषण की क्षमता थी।

आत्मविश्लेषण ही बताता है कि हमारा असल उद्वेश्य क्या है ? खुद को ही जब घूरती हुई आँखों से जो हर क्षण देख सकता है वही खुद का बड़प्पन और कमीनापन दोनों देख सकता है। जब उद्देश्य दूषित हो तो गाँधी का नाम उछालकर लोगों को बहुत दिनों तक बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता। गाँधी को सलवा ज़ुडूम में रहना चाहिये या निकल भागना चाहिये, यह सब इसलिये बेमानी हो जाती है, क्योंकि गाँधी आज नहीं हैं। और कोई दूसरा गाँधी हो भी नहीं सकता। न विश्वरंजन हो सकता है गाँधी, न कनक तिवारी हो सकते हैं गांधी। और यदि गांधी आज होते तो न तो कनक तिवारी से पूछते न ही विश्वरंजन से कि उन्हें क्या करना चाहिए । पर इतना तो गाँधी की व्यापक दृष्टि जानी ही जाती है कि किसी भी हालत में उस समूह के साथ नहीं खड़ा होना है जिसका बुनियादी फलसफा हिंसा और आतंक पर टिका हुआ है। और यदि उनके साथ कोई नहीं चलता तो भी वे ‘एकता चालो रे’ कहते हुए बस्तर के ज़ंगलों में नक्ससियों के खिलाफ खड़े दिखते। गाँधी को इससे कोई वास्ता नहीं होता कि महेन्द्र कर्मा कांग्रेस में हैं अथवा नहीं। गाँधी इन चीज़ों से ऊपर उठ कर सोचते थे।

5/06/2008

राहुल गांधी के छत्तीसगढ़ दौरे का मतलब


कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी का दो दिवसीय छत्तीसगढ़ दौरा जहां प्रदेश कांग्रेस को स्फूर्ति दे गया, वहीं कई अलग तरह के संदेश भी छोड़ गया। देश को जानने और फिर संगठन में जोश फूंकने के लिए निकले युवा नायक के लिए यह दौरा एक ऐसा प्रसंग था जिसने उन्हें तमाम जमीनी हकीकतों के सामने खड़ा किया। राहुल गांधी के लिए छत्तीसगढ़ का दौरा बेहद भावनात्मक क्षण इसलिए भी था कि उनके पिता पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों के प्रति एक खास स्नेह रखते थे। राजीव ने भी अपने शुरूआती दिनों में इन क्षेत्रों का दौरा कर आदिवासी समाज की स्थिति को परखने का प्रयास किया था। जाहिर है राहुल गांधी के लिए यहां के हालात चौंकाने वाले ही थे। आजादी के 60 सालों के बाद आदिवासी जीवन की विषम परिस्थितियां और बस्तर के तमाम क्षेत्रों में हिंसा का अखंड साम्राज्य उन्हें नजर आया।

राहुल गांधी ने इस दौरे में आदिवासी समाज की जद्दोजहद और जिजीविषा के दर्शन तो किए ही अपने संगठन को भी परखा। उन्हें यह बात नागवार गुजरी कि आदिवासी इलाकों में उनके संगठन में आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व उस तरह से नहीं है, जितना होना चाहिए। उन्होंने यह साफ संकेत दिए कि कांग्रेस संगठन के सभी संगठनों में आदिवासी और दलित वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए। कांग्रेस के नए नायक को जमीनी हकीकतों का पहले से पता था। शायद इसीलिए वे अपने संगठन की सामाजिक अभियांत्रिकी को दुरूस्त करना चाहते हैं। कांकेर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए राहुल ने स्वयं को युवराज कहे जाने पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि यह शब्द सामंती समाज का प्रतीक है और एक प्रजातांत्रिक देश में यह शब्द अच्छा नहीं लगता। बस्तर, कांकेर और सरगुजा जिलों के दौरे के बाद राहुल क्या अनुभव लेकर लौटे हैं, इसे जानना अभी शेष है। आने वाले दिनों में जब छत्तीसगढ़ में विधानसभा, फिर लोकसभा के चुनाव होने हैं, तब कांग्रेस संगठन की परीक्षा होनी है। पिछले लोकसभा चुनाव में राज्य की 11 सीटों में सिर्फ एक ही कांग्रेस के हाथ लगी थी। बाद में राजनांदगांव लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस के देवव्रत सिंह ने सीट जीतकर जरूर यह संख्या दो कर दी। बावजूद इसके कभी कांग्रेस के गढ़ रहे छत्तीसगढ़ में इस समय भाजपा की सरकार है। इस गढ़ को तोड़ना कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती है। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी और उसके मुख्यमंत्री अपनी सरकार की वापसी के लिए आश्वस्त दिखते हैं। यह साधारण नहीं है कि दो वर्षों पूर्व अध्यक्ष बने डा. चरणदास महंत आज तक अपनी राज्य कार्यकारिणी की घोषणा तक नहीं कर सके हैं। कांग्रेस राज्य में टुकड़ों में बंटी है और आपसी खींचतान आसमान पर है। राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी भले ही अलग-थलग पड़ गए हों पर उनकी ताकत कांग्रेस का खेल बिगाड़ने में तो सक्षम है ही। दूसरी ओर चरणदास महंत बिना सेना के सेनापति बने हुए हैं। ऐसे में राहुल गांधी के सामने छत्तीसगढ़ के कांग्रेसियों में जोश फूंकने के अलावा उन्हें एकजुट करने की चुनौती भी है। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी की सरकार में आदिवासी, दलित और गरीब तबके को ध्यान में रखकर कई योजनाएं शुरू की हैं, जिसमें तीन रूपए किलो चावल की योजना प्रमुख है। इससे भाजपा इन क्षेत्रों में पुन: अपनी जीत सुनिश्चित मान रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में बस्तर और सरगुजा क्षेत्रों में भाजपा को व्यापक सफलता मिली थी। इसी को देखते हुए राहुल गांधी ने आदिवासी क्षेत्रों को ही केंद्र में लिया है। वे शहरी इलाकों के बजाय आदिवासी क्षेत्रों पर ही फोकस कर रहे हैं। इससे पार्टी को उम्मीद है कि आदिवासी क्षेत्रों में पुन: कांग्रेस की वापसी संभव हो सकती है और उससे दूर जा चुका आदिवासी वोट बैंक फिर से उनकी झोली में गिर सकता है। राहुल के दौरे को खास तौर से इसी नजरिए से देखा और व्याख्यायित किया जा रहा है।

25 अप्रैल, 2008 को जब वे अपनी भारत खोज यात्रा के तहत अंबिकापुर के दरिमा हवाई अड्डे पर उतरे तो वे लगातार अपनी पूरी यात्रा में इस बात का अहसास कराते रहे कि उनकी निगाह में आदिवासी समाज की कीमत क्या है। अंबिकापुर से विश्रामपुर और सूरजपुर के रास्ते के बीच सड़क किनारे आदिवासियों के हुजूम के बीच उन्होंने जा-जाकर उनकी समस्याएं पूछी। अंबिकापुर और विश्रामपुर के बीच पड़ने वाले लेंगा गांव में एक आदिवासी परिवार के साथ खाना भी खाया। इसी दिन शाम को 6 बजकर दस मिनट पर वे जगदलपुर में थे। अगले दिन जगदलपुर में भी उन्होंने आदिवासी बहुल ग्राम जमावाड़ा में आदिवासियों से घुल-मिलकर चर्चा की। आदिवासी समाज के लोग गांधी परिवार के इस नायक को अपने बीच पाकर भावुक हो उठे। कुल मिलाकर राहुल गांधी का छत्तीसगढ़ दौरा कांग्रेस संगठन में एक नया जोश फूंकने और आदिवासी समाज को एक नया संदेश देने में सफल रहा।

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उम्मीद है उनसे
0 राहुल छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद पहली बार वे यहां आए। इससे एक ओर वे जहां राज्य के दलितों, आदिवासियों, तथा पिछड़ेवर्ग के लोगों की समस्याओं को देखा और समङाा। वहीं दूसरी ओर उनकी यात्रा से राज्य के एनएसयूआई एव युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का उत्साहवर्धन भी हुआ। जिसका फायदा कांग्रेस पार्टी को आगामी चुनाव में मिलेगा। गांधी परिवार हमेशा से ही आदिवासियों, दलितों एवं पिछडेवर्ग का हिमायती रहा है। राहुल गांधी जिस सादगी के साथ लोगों के बीच में जाकर उनकी समस्याएं सुनते हैं, उसका व्यापक प्रभाव यहां के जनमानस पर पड़ेगा।
-डॉ. चरणदास महंत, अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ कांग्रेस

0 वे जिस लगन के साथ आम जनता के बीच पहुंचे, यह एक बहुत अच्छी बात है। एक युवा नेता होने के नाते इससे उन्हें छत्तीसगढ़ को जानने एवं समङाने का मौका मिला। यह छत्तीसगढ़ की जनता के लिए गौरव का विषय है। यद्यपि इसका सीधे तौर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा, लेकिन इससे युवाओं में एक नए उत्साह का संचार हुआ, जिसका लाभ आनेवाले आम चुनाव में पार्टी को मिलेगा।
-विद्याचरण शुक्ल, पूर्व केद्रीय मंत्री एवं वरिष्ठ नेता

0 राहुल गांधी उड़ीसा एवं कर्नाटक की यात्रा के बाद छत्तीसगढ़ आए। जिसका लाभ यहां की जनता को अवश्य मिलेगा। उनको यहां चल रही योजनाओं की जमीनी हकीकत के साथ यह भी पता चलेगा कि केन्द्र सरकार की योजनाओं का नाम बदल कर किस प्रकार राज्य सरकार इस योजना का पैसा उस योजना में लगा रही है। उनकी इस यात्रा से यहां हो रहे भ्रष्टाचार का मामला खुलकर सामने आया, जिसका लाभ बाद में ही सही लेकिन आम जनता को मिलेगा।
-मोतीलाल वोरा, कोषाध्यक्ष, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी

0 राहुल गांधी की यात्रा से हमें पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की यात्रा याद आई। इससे उनको देश को समङाने एवं करीब से देखने का मौका मिला। यह देश की जनता एवं स्वयं राहुल गांधी दोनों के लिए लाभदायक है, क्योंकि यही जानकारियां बाद में काम आएंगी। उनकी सरगुजा से बस्तर तक की यात्रा काफी महत्वपूर्ण है। आदिवासियों की बस्तियों में जाकर उनकी जानकारी लेना, वह भी राहुल गांधी द्वारा, स्वयं एक बहुत बड़ी बात है। जिसका राजनैतिक दृष्टिकोण से पार्टी को काफी लाभ मिलेगा।
-अरविन्द नेताम, पूर्व केन्द्रीय मंत्री

0 राहुल आदिवासियों के बीच पहुंचे। यह एक बड़ा अवसर है, जब राजीव गांधी के बाद कोई युवा नेता आदिवासियों के इतने करीब पहुंचा। उनकी इस यात्रा से चुनाव के पूर्व एक आपसी सदभावना का जो माहौल बनेगा, नि:संदेह उसका लाभ पार्टी को मिलेगा।
-अजीत जोगी, पूर्व मुख्यमंत्री व सांसद

0 उनके छत्तीसगढ़ प्रवास से राज्य में चतुर्दिक उत्साह का माहौल व्याप्त है। हमेशा से ही आदिवासियों एवं दलितों व पिछड़ेवर्ग के लोगों को गांधी परिवार का विशेष स्नेह प्राप्त रहा है। उनके प्रवास से यहां के कार्यकर्ताओं में एक नए उत्साह का संचार हुआ है। जिसका फायदा आगामी आम चुनाव में पार्टी को निश्चित रूप से प्राप्त होगा।
-सत्यनारायण शर्मा, पूर्व शिक्षा मंत्री


--संजय द्विवेदी
(लेखक हरिभूमि, रायपुर के संपादक हैं)