6/20/2008

गांधी ! तुम निकल भागो फर्जी गाँधीवादियों के बीच से !


विश्वरंजन
पुलिस महानिदेशक,छत्तीसगढ़


एलबर्ट आईन्सटाईन ने कहीं लिखा है कि सदियों बाद लोग यह मानने को तैयार नहीं होंगे कि गाँधी जैसा कोई हाड़-माँस का व्यक्ति इस धरती पर कभी चला भी हो । गांधी के गुजरे हुए अभी सदियाँ नहीं बीती है । और किस स्थिति में गाँधी क्या करते, क्या नहीं करते इस विषय पर ऐसे लोग राय देने लगे हैं जो खुद के गिरेहबान में झाँकने की हिम्मत नहीं कर सकते। इसीलिए मैं गांधी पर लिखने से कतराता हूँ । कुछ लोग नहीं कतराते, यह सच है । पर उन्हें कतराना चाहिए ।

पर मैं गाँधी के विषय में और गाँधीवादियों के विषय में सोचता अवश्य हूँ । मेरा यह मानना है कि दूसरा गाँधी नहीं हो सकता, जैसे दूसरा राम नहीं हो सकता, दूसरा कृष्ण नहीं हो सकता, दूसरा बुद्ध नहीं हो सकता, दूसरा लाओत्से नहीं हो सकता, दूसरा ईसा नहीं हो सकता, दूसरा मोहम्मद नहीं हो सकता। वैसे एक गुलाब जैसा दूसरा गुलाब भी नहीं हो सकता। उसी तरह मैं सिर्फ विश्वरंजन हो सकता हूँ। कनक तिवारी सिर्फ कनक तिवारी हो सकते हैं। हम दोनों यदि अपने-अपने गिरहबान में झाँकते रहें तो निश्चित ही अच्छे इंसान हो सकते हैं। गाँधी नहीं हो सकते। और जैसे गुलाब के कारण कोई गुलाबवादी नहीं हो सकता, गाँधी के बाद संदीप पान्डेय या कोई भी गाँधीवादी नहीं हो सकता। गाँधी नोआखोली मे सम्प्रदायिक हिंसा रोकने के लिये अकेले ‘एकला चलो रे’ कहते हुए चल सकते थे। आज के गाँधीवादी बस्तर के जंगलों घूम कर माओवादियों से नहीं कह सकते कि “मित्र! हिंसा छोड़ो, जो तुमसे असहमत हैं, उन्हें मारना छोड़ो, हम तुम्हें अब नहीं मारने देंगे । तुम्हें आदिवासियों को मारने के पूर्व हमें मारना पड़ेगा। हम उफ्फ तक नहीं करेंगे। हम हाथ तक नहीं उठायेंगे......।”

गाँधी ऐसा कर सकते थे इसलिये जब गोडसे की गोली लगी तो उनके मुँह से निकला था- “हे राम।” आज यदि गोली क्या लाठी भी सिर पर पड़ जाये तो हमसे से ज्यादातर लोगों- मेरे, कनक तिवारी और ज्यादातर गाँधीवादियों के मुँह से निकलेगा “बार रे बाप”। तथाकथित गाँधीवादी जंगल जाकर माओवादियों से बातचीत करने की हिम्मत नहीं कर सकते। वे शहरी चौराहों पर धरना दे सकते हैं। गाँधी अपनी शुद्धि के लिये उपवास करते थे। उन्हें लगता था कि यदि ब्रिटिश हुकूमत उनकी कोई बात नहीं मान रही है तो कहीं कुछ खोट उनमें है जिसके कारण वे सही बात समझा नहीं पा रहे हैं । अतः उन्हें उपवास कर ख़ुद को शुद्ध करने की ज़रूरत है। गाँधी के उपवास मन और हृदय को शुद्ध करने के तरीके थे । गहन आत्म-विश्लेषण का जरिया था जिसके बाद वे दूसरों पर और मज़बूती से आज़ादी की लड़ाई में उतरते थे। गाँधी का उपवास दूसरों पर दबाव डालने की नियत से नहीं होता था जैसा तथाकथित गाँधीवादी आज करते हैं। पर मैं गलत हो सकता हूँ। मैं गाँधी नहीं हूँ और गाँधी के दिल और दिमाग में छुपे हर कारण, हर राज़ को उकेरने की क्षमता नहीं है। पर कनक तिवारी भी गाँधी नहीं हैं। न ही तथाकथित गाँधीवादी ।
मैं गांधी के विषय में सचमुच लिखना नहीं चाहता । पर कनक तिवारी ने बातचीत छेड़ ही दी है। मैंने पहले “गिरहबान में झाँकने” की बात कही है। गाँधी में यह ताकत थी। वे अपनी गलतियों, अपनी कमज़ोरियों का जिक्र अपने भाषणों में, अपने पत्रों में, अपने लेखों में खुल कर सकते थे। मैं आजकल के गाँधीवादियों में यह हिम्मत नहीं पाता । उनमें से कोई गाँधी की तरह खुली किताब नहीं है। वे ठीक-ठाक गाँधी का मुखौटा भी नहीं बना सकते जिसे वे पहन सके। उनके गाँधी के मुखौटों पर क्रोध भी झलकेगा, घृणा भी, दूसरों से ज्यादा जानने-समझने का अहंकार भी । मुखौटा लगा कर कोई नोआखोली या बस्तर के वीरान बियाबानों में नक्सली हिंसा रोकने के लिये नहीं चल सकता।

मैं एक गाँधीवादी को कुछ-कुछ जानता हूँ। और जितना जानता हूँ उसके कारण यह तो कह ही सकता हूँ कि वे झूठ बहुत बोलते हैं। वे रहते तो गाँधीवादी तरीके से हैं। आश्रम में निवसते हैं । ज़मीन पर सोते हैं। बहुत सादा खाना खाते हैं। पर ग्रांट्स या अनुदान के लिये बार-बार दिल्ली के गलियारों की खाक भी छानते रहते हैं। उनके पास देश-विदेश से अनुदान भी लाखों में आता है। अहिंसा के नाम पर नक्सलियों से याराना भी होता है। गाहे-बगाहे से ज्यादा नक्सलियों को बचाने की कोशिश करते हैं। गाँधीवादी होने का तो फायदा उन्हें है ही। नक्सलियों को और मज़बूत करने की नियत से झूठी कहानी भी फैलाते रहते हैं......। पर हैं तो वे गांधीवादी ही । मैं नहीं जानता कि गाँधीजी ऐसा करते या नहीं। कनक तिवारी भी नहीं जानते। हम दोनों गाँधी नहीं हैं। पर मुझे लगता है कि गाँधी ऐसा नहीं करते । भारतीय गाँधीवादियों में अहंकार भी बहुत होता है। मार्टिन लूथर किंग जूनियर, नेल्सन मण्डेला और विशप टूटू से बाहर वे जा नहीं सकते। परन्तु डारथी डे, सीजर चेवाज़ या बारबरा डेमिंग का नाम शायद ही सुना होगा। ये तथाकथित गाँधीवादी सही मायनों में गाँधी से ज्यादा नज़दीक है। इन सब ने झूठ का सहारा कभी नहीं लिया और अपनी कमज़ोरियों को छुपाने की कोशिश भी नहीं की। और इन सभी में जबर्दस्त आत्मविश्लेषण की क्षमता थी।

आत्मविश्लेषण ही बताता है कि हमारा असल उद्वेश्य क्या है ? खुद को ही जब घूरती हुई आँखों से जो हर क्षण देख सकता है वही खुद का बड़प्पन और कमीनापन दोनों देख सकता है। जब उद्देश्य दूषित हो तो गाँधी का नाम उछालकर लोगों को बहुत दिनों तक बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता। गाँधी को सलवा ज़ुडूम में रहना चाहिये या निकल भागना चाहिये, यह सब इसलिये बेमानी हो जाती है, क्योंकि गाँधी आज नहीं हैं। और कोई दूसरा गाँधी हो भी नहीं सकता। न विश्वरंजन हो सकता है गाँधी, न कनक तिवारी हो सकते हैं गांधी। और यदि गांधी आज होते तो न तो कनक तिवारी से पूछते न ही विश्वरंजन से कि उन्हें क्या करना चाहिए । पर इतना तो गाँधी की व्यापक दृष्टि जानी ही जाती है कि किसी भी हालत में उस समूह के साथ नहीं खड़ा होना है जिसका बुनियादी फलसफा हिंसा और आतंक पर टिका हुआ है। और यदि उनके साथ कोई नहीं चलता तो भी वे ‘एकता चालो रे’ कहते हुए बस्तर के ज़ंगलों में नक्ससियों के खिलाफ खड़े दिखते। गाँधी को इससे कोई वास्ता नहीं होता कि महेन्द्र कर्मा कांग्रेस में हैं अथवा नहीं। गाँधी इन चीज़ों से ऊपर उठ कर सोचते थे।

2 टिप्‍पणियां:

Uttam Pandey ने कहा…

Mujhe Aaapka Vishya acha laga . Aaj Koi Bhi Aadmi Saphed kurta pahan kar neta ban jata hai. Ganhi ji kahe vakyo ko duharata hai. Aur janta use Gandhi ka hi rup maan leta hai. par aesa nahi hai vah neta bahar kuch dikhayi dena aur aandar me uski dannav pravriti chupi hui hoti hai.it

संजीव कुमार सिन्हा ने कहा…

गाँधी नोआखोली मे सम्प्रदायिक हिंसा रोकने के लिये अकेले ‘एकला चलो रे’ कहते हुए चल सकते थे। आज के गाँधीवादी बस्तर के जंगलों घूम कर माओवादियों से नहीं कह सकते कि “मित्र! हिंसा छोड़ो, जो तुमसे असहमत हैं, उन्हें मारना छोड़ो, हम तुम्हें अब नहीं मारने देंगे । तुम्हें आदिवासियों को मारने के पूर्व हमें मारना पड़ेगा। हम उफ्फ तक नहीं करेंगे। हम हाथ तक नहीं उठायेंगे......।”

बस एक ही नारा-छद्म गांधीवादियों से देश बचाओ।