6/05/2008

मदिरा जैसी नयना


उधर नशीला चाँद गगन में
इधर नशीले नयना
मादक वातावरण समूचा
मदिरा जैसी नयना ।


आज धरा ऐसी लगती है
जैसे हो मदिरालय
झूम रहे हैं सब मस्ती में
झूमे वृद्ध हिमालय ।


तारों की लड़िया अम्बर में
इधर देह में गहना
आज अलंकृत है वसुंधरा का
नाचे कोना-कोना ।


रजनीगंधा खिली सुहानी
पवन सुंगधित बहता
युवा हृदय में मकरध्वज का
प्रिये सुमन सर चलता ।


इधऱ आप हमसे लिपटी हैं
उधर चन्द्र से रैना
बेला लिपटी है पादप से
देख हमारी रैना ।

(कवि की नवीनतम् कृति काव्य-सरिता से )




डॉ सालिकराम अग्रवाल शलभ
१६, कैलास रेसिडेन्सी
मीरा दातार, पथ, शंकर नगर
रायपुर, छत्तीसगढ़
मो- ९३००६-६१००२२

1 टिप्पणी:

सत्याजीतप्रकाश ने कहा…

आजकल की कविताओं में सर्वश्रेष्ठ