6/08/2008

गुर्जर आंदोलन: सुलगते सवाल


आरक्षण की मांग को लेकर भारतवर्ष में अनेकों बार छोटे, बड़े, हिंसक व अहिंसक आंदोलन होते रहे हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में आरक्षण मुद्दे को लेकर मंडल आयोग की सिफ़ारिशों के विरोध व समर्थन में छेड़ा गया आंदोलन संभवत: अब तक का देश का सबसे चर्चित व विवादित आंदोलन था। अल्पसंख्यकों, दलितों तथा पिछड़े वर्ग के लोगों को आरक्षण दिए जाने के मुद्दे को लेकर देश में प्राय: राजनीति होती रहती है। राजनीतिज्ञों का अथवा राजनैतिक दलों का एक वर्ग यदि आरक्षण के समर्थन में अपने वोट बैंक सुदृढ़ करना चाहता है तो दूसरा पक्ष इसी आरक्षण की मांग के विरोध में वोट बैंक की संभावनाएं तलाशने लग जाता है। परन्तु राजस्थान से शुरु हुए गुर्जर आंदोलन ने अपनी उग्रता तथा एकजुटता के चलते देश के समस्त राजनैतिक दलों के समक्ष एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है कि संभवत: अब कोई समझदार नेता अथवा उसका दल भूल से भी किसी भी समुदाय से उसे आरक्षण दिए जाने का वायदा नहीं कर सकेगा।

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि आरक्षण की व्यवस्था इस देश में दलित व दबे कुचले समाज को ऊंचा उठाने के उद्देश्य से की गई थी। परन्तु बड़े दु:ख की बात है कि आरक्षण संबंधी नियमों व क़ानूनों का प्रारम्भ से ही दुरुपयोग होता आ रहा है। जाति के नाम पर मिलने वाले आरक्षण का लाभ आमतौर पर आरक्षित जाति के पात्र व्यक्तियों को मिलने के बजाए उसी जाति के असरदार, सम्पन्न अथवा ऊंची पहुंच रखने वाले लोगों को मिल जाता है। आरक्षण का लाभ उठाने वाले आरक्षित जाति के इसी वर्ग को 'क्रीमी लेयर' कहकर संबोधित किया गया है। देखा जा रहा है कि आमतौर पर क्रीमी लेयर आरक्षण का लाभ उठा रही है जबकि आरक्षण का वास्तविक अधिकारी आज भी अपनी बारी आने की प्रतीक्षा में बैठे हैं।

राजनैतिक दलों द्वारा देश की विभिन्न जातियों को अपनी ओर आकर्षित करने की इस होड़ में आरक्षण का कोटा इस क़द्र बढ़ा दिया गया है कि सामान्य श्रेणी में आने वाली अनेकों जातियां अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित नंजर आने लगी हैं। यही चिंताएं मंडल आयोग की सिंफारिशें लागू करते समय भी सिर चढ़कर बोली थीं। जबकि कई छात्रों द्वारा आत्मदाह कर लिया गया अथवा ऐसा करने का प्रयास किया गया था। अत्याधिक आरक्षण होते जाने से प्रभावित ब्राह्मण, व राजपूत जैसे सामान्य श्रेणी में आने वाले समुदायों की ओर से भी अब कभी-कभी आरक्षण मांगे जाने की आवाज़ सुनाई देती है। परन्तु आरक्षण की मांग के समर्थन में आंदोलन किया जाना तथा किसी राजनैतिक दल द्वारा किसी समुदाय विशेष से इस वायदे के साथ समर्थन मांगना कि यदि उसका दल सत्ता में आया तो उसे आरक्षित जाति के अन्तर्गत शामिल कर लिया जाएगा, इन दोनों ही बातों में भेद किया जाना ज़रूरी है।

गुर्जर समाज देश के प्राचीन एवं प्रतिष्ठित समाज में से एक है। देश की कृषि व्यवस्था, पशुधन व्यवस्था तथा भारतीय सेना में इस समुदाय की अहम भूमिका है। परन्तु दुर्भाग्यवश गुर्जर समुदाय अन्य सामान्य श्रेणी वाली जातियों की तरह शिक्षा, आत्मनिर्भरता तथा आधुनिकता की दौड़ में ख़ुद को शामिल नहीं रख सका। फिर क्या था। गुर्जरों की इसी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाने की रणनीति भारतीय जनता पार्टी द्वारा तैयार की गई। इस प्रकार राजस्थान में गत् 2003 में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने गुर्जर समुदाय से उसे पिछड़ी जाति में शामिल किए जाने का वायदा कर डाला। इस वायदे से उत्साहित होकर गुर्जर समुदाय ने भारतीय जनता पार्टी को राजस्थान में अपना भरपूर समर्थन दिया। परिणामस्वरूप भाजपा राजस्थान में सत्ता में आ गई। राजस्थान में भाजपा की सरकार बनने के कुछ समय बाद तक तो गुर्जर समाज इस बात की प्रतीक्षा करता रहा कि प्रदेश की भाजपा सरकार की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया गुर्जर समाज से किए गए अपने वायदे को लेकर संभवत: ख़ुद ही कोई पहल करेंगी। परन्तु राजनीतिज्ञों से वादा वंफाई की उम्मीदें रखना ही बेमानी होता है। आख़िरकार वही हुआ जिसकी उम्मीद की जा रही थी। राज्य सरकार गुर्जर समुदाय से किया गया अपना वादा भूल गई तथा टालमटोल की राह पर चलने लगी। परन्तु इस बार वसुंधरा सरकार का पाला किस और से नहीं बल्कि उस गुर्जर समाज से पड़ा था जो भारतीय जनता पार्टी को उसका वादा याद दिलाने के लिए तथा उसे पूरा कराने के लिए किसी भी हद तक जा सकता था।

यह आंदोलन 6 माह पूर्व भी इसी प्रकार देखते ही देखते उग्र हो गया था। उस समय भी कई लोगों की जानें गई थीं तथा सरकारी व निजी सम्पत्तियों का काफ़ी नुक़सान हुआ था। परन्तु पिछली बार राज्य सरकार द्वारा किसी प्रकार गुर्जर समुदाय के नेताओं को समझा-बुझा कर तथा 6 माह का और समय लेकर इस आंदोलन को टाल दिया गया था। अब जबकि गुर्जर आंदोलन के प्रथम चरण को समाप्त हुए 6 माह बीत चुके हैं, यही गुर्जर समाज निर्धारित समयावधि पूरी होने के बाद पुन: आंदोलन की राह पर निकल पड़ा है तथा राज्य सरकार को बार-बार उसके द्वारा किए जाने वाले वादों की याद दिला रहा है। गुर्जर आंदोलन अपने इस दूसरे चरण में उस दुर्भाग्यपूर्ण दौर से गुज़र चुका है जिसने आरक्षण हेतु देश में होने वाले सभी आंदोलनों को पीछे छोड़ दिया है। लगभग 60 आंदोलनकारियों की जानों को न्यौछावर कर देने वाले इस आंदोलन ने देश की अर्थव्यवस्था की भी कमर तोड़ कर रख दी है। मुंबई व गुजरात जैसे औद्योगिक नगरियों का सम्पर्क शेष भारत से सप्ताह से अधिक समय तक कटा रहा। ज़ाहिर है देश की औद्योगिक व्यवस्था, यातायात प्रभावित होने के परिणामस्वरूप बुरी तरह प्रभावित हुई। रेल पटरियों, रेलगाड़ियों, सरकारी बसों को क्षतिग्रस्त किया गया है। ऐसा लग रहा था कि मानो गुर्जर आंदोलन ने देश के विकास के पहिए को ही जाम कर रखा हो।

प्रश्न यह है कि आख़िर इतने बड़े पैमाने पर जान व माल के होने वाले नुक़सान का ज़िम्मेदार है कौन? गुर्जर समाज, उसके नेता या फिर वे लोग जो इसी समाज विशेष से लोकलुभावने वादे करने से नहीं हिचकिचाते तथा परम्परा अनुसार सत्ता में आने के बाद अपने किए गए वादों की ओर मुड़ कर भी नहीं देखते। ऐसी परिस्थिति में यदि कोई समाज विशेष पूरी तरह से संगठित होकर वादे करने वाले सत्ताधारी राजनैतिक दल को उसका वादा याद दिलाने हेतु सड़कों पर उतर आए तथा उसका स्वरूप वर्तमान गुर्जर आंदोलन जैसा हो जाए तो आख़िर इसमें दोष किसका है? वादा करने वाले उस पक्ष का जो सत्ता में आकर, वादाख़िलाफ़ी कर रहा है या उस पक्ष का जो वादे के धोखे में आकर वोट दे बैठा तथा अब उसी राजनैतिक दल को उसका वादा याद दिलाने हेतु सड़कों पर उतर आया है? जनता को इन सभी पहलुओं पर नज़र डालनी चाहिए तथा समस्त राजनैतिक दलों को ऐसे आंदोलनों से सबक़ लेना चाहिए ताकि भविष्य में आरक्षण हेतु चलाए जाने वाले किसी भी आंदोलन में सरकारी सम्पत्तियों का इस हद तक नुक़सान न हो सके और यदि इसकी पुर्नावृत्ति हो भी तो इसके ज़िम्मेदार लोगों को पूरी तरह से बेनक़ाब किया जा सके ।


निर्मल रानी
163011, महावीर नगर,
अम्बाला शहर,हरियाणा।

3 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

आपने एक सही राय जाहिर की इस गुर्जर आदोलन पर।

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…

आप का कहना सही है। राजनेता सिर्फ सरकार में आ कर अपना राज चलाते हैं और देश को धकियाते रहते हैं. जनता से किसी को कोई लेना देना नहीं है।

http://gurjar.110mb.com/ ने कहा…

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