6/14/2008

बस्तर में यूं शुरू हुआ सलवा जुडूम का आंदोलन


-वीरेन्द्र पाण्डे
वैसे तो बस्तर के हर बच्चो ने सलवा जुडूम का नाम सुन रखा है। छत्तीसगड़ के बहुत कम लोग होंगे, जिन्होंने इस अभियान के बारे में कुछ न सुना हो। अब तो सलवा जुडूम देश की सबसे बड़ी अदालत तक जा पहुंचा है। उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर मानवाधिकार आयोग के 13 सदस्य बस्तर में इस अभियान को जानने में जुटे हैं। जुडूम देश की सीमाओं को पार कर, विदेशों में भी चर्चित हो रहा है। लेकिन यह भी वास्तविकता है कि अधिकांश लोगों को इसकी सतही समझ है। इसी अधूरी समझ के आधार पर वे पक्ष-विपक्ष में खड़े हैं।

सलवा-जुडूम को समझने से पहले बस्तर के जन-मन को, नक्सलियों के आगमन को, उनके तौर-तरीकों को समझना होगा। बस्तरिहा जंगल में रहता है। जंगल उसकी पाठशाला है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी से वह निरंतर सीखता रहता है। जंगल से उसने कई सबक कंठस्थ किए हैं। एक वनवासी कभी संग्रह नहीं करता। वह देखता है कि कोई पेड़, कोई पशु किसी प्रकार का संग्रह नहीं करता, संपत्ति निर्माण नहीं करता। आदिवासी ने किसी जैनाचार्य से दीक्षा नहीं ली हैं, किन्तु यह अपरिग्रह का श्रेष्ठ उदाहरण है। दूसरा वह परम स्वतंत्र रहना चाहता है। जैसे जंगल के पक्षी-पशु पर किसी का राज नहीं है। पेड़-पौधे का कोई मालिक नहीं है। वैसे ही वनवासी अपनी मर्जी का मालिक है। राजशाही तक उनके जीवन शैली में सरकार को कोई दखल नहीं था। किन्तु अंग्रेजों ने जब जंगल कानून बनाया, तब से आदिवासी के जीवन में सरकार का दखल शुरू हुआ।

आदिवासी के लिए सरकार का मतलब था, पटवारी, फारेस्टर और थानेदार। इन तीनों ने उनकी जीवन शैली में हस्तक्षेप करना आरंभ किया। उसका मन व्यथित तब होता जब उसे उसकी मर्जी के खिलाफ, तहसील, थाने और वन विभाग में बार-बार पेशी के लिए बुलाया जाता। सरकार के साथ उसकी स्मृतियां कटु से कटुतर होती गईं। ऐसे ही समय में नक्सलियों का प्रवेश बस्तर में हुआ। अस्सी के दशक में नक्सली बस्तर आए। वे हथियार लेकर आए। पर उन्होंने हथियार का उपयोग बस्तरवासियों पर नहीं किया। उन्होंने बस्तर के लोगों को मार्क्स का दर्शन नहीं समझाया। न ही माओ की लाल किताब से उध्दरण दिए। बल्कि उन्होंने उनकी जीवन शैली, संस्कृति, आचार-व्यवहार का गहराई से अध्ययन किया। उनसे उनकी भाषा में संवाद किया। अपना प्रभाव जमाने के लिए एक रणनीति पर काम किया। उन्होंने जान लिया कि आदिवासी सरकार से दु:खी हैं। जब भी सरकार ग्रामवासियों के बीच आती है, नक्सली जन-अदालत जोड़ते। आदिवासियों से सरकार के प्रति शिकायतें पूछते। फिर उन्हें सबके सामने दंडित करते। यदि फारेस्टर, पटवारी, थानेदार ने ग्रामवासियों से रकम या पशु-पक्षी लिए होते तो उसकी क्षतिपूर्ति कराते। धीरे-धीरे उनके आतंक से सरकारी कर्मचारियों का गांव में आना बंद हो गया। गांव वालों को 'दादा लोग भगवान लगने लगे। उन्होंने न केवल दादा लोगों का स्वागत किया बल्कि आश्रय भी दिया। उनकी बातें भी मानने लगे। धीरे-धीरे 'दादाओं ने गांव के उद्दण्ड नौजवानों को संघम सदस्य बनाकर अपने साथ मिला लिया। कई झूठे-सच्चो आरोप लगाकर गांव के प्रतिष्ठित जनों को अपमानित किया। उनके प्रभाव को शून्य करने के लिए घृणित से घृणित उपाय किए। कुछ वर्षों में दक्षिण बस्तर के जन-जीवन में नक्सलियों का पूर्ण वर्चस्व स्थापित हो गया। इसमें सर्वाधिक योगदान हिंसा-आतंक का था। जो दादाओं के माफिक लोग नहीं थे, उन्हें जन-अदालत में मुखबिर घोषित कर डंडों से पीट-पीट कर क्रूरता से मार डालते।

वनवासियों ने एक दिन जिन्हें मुक्तिदूत समझा था, वे यमदूत साबित होने लगे। सरकार तो कभी-कभार उनके जीवन में हस्तक्षेप करती थी, सरकार गांव में आती और चली जाती। लेकिन 'दादा तो ग्राम प्रमुख और संघम के रूप में हरदम उपस्थित रहते। ग्रामवासियों की हर गतिविधि पर उनकी पैनी नजर रहती। वनवासी को अब लगने लगा था कि वह कुएं से निकलकर खाई में गिर गया है।

नक्सलियों के आदेश उनके जीवन को नरक किए दे रहे थे। उनके जब मन में आता साप्ताहिक हाट बंद कर देते। ये हाट न केवल आदिवासियों की आर्थिक एवं जीवन की जरूरत को पूरा करते हैं बल्कि ये उनके सांस्कृतिक सम्मेलन स्थल हैं। नाते-रिश्तेदारों से मेल-जोल के स्थान हैं। खबरों-सूचनाओं के आदान-प्रदान के केंद्र भी। ये आदिवासी के जीवन में वीक एंड जैसा महत्व रखते हैं। कभी दादाओं का हुक्म होता है तेंदूपत्ता तोड़ाई बंद होगी। जीवन में उनका हस्तक्षेप बहुत बढ़ गया। किसी को अपने रिश्तेदार से मिलने जाना हो तो अनुमति लेनी पड़ती है। अब तो उन्होंने प्रत्येक परिवार से एक नौजवान की मांग रख दी है। ऐसे में स्थितियां असहय होती जा रही थी।

साहस करके बेदरे थाना के दस गांव के 65 लोग, जिनमें कुछ सरपंच, पटेल भी थे एकत्र हुए। विचार-विमर्श के बाद तय हुआ, कुछ किया जाए, गुलामी के इस जुएं को उतार फेंकने के लिए। पर कुछ करने से पहले सरकार-कलेक्टर से रक्षा की गुहार लगाई जाए। दस आवेदन कलेक्टर के नाम से गांववार बनाए गए। सबका मजमून एक ही था। गांव वालों ने अपने-अपने गांव के आदेवन में हस्ताक्षर किए। पत्र में लिखा गया कि हमारे क्षेत्र में नक्सलियों का इतना आतंक छा गया है कि हम जान-माल की सुरक्षा नहीं कर पा रहे हैं। हम पर अत्याचार होता है। हमारी धन-सम्पत्ति डरा-धमका कर ले जाते हैं। मां-बहन, जवान लड़के-लड़कियों को साथ भेजने का फरमान जारी करते है। पत्र में अनुरोध किया गया कि हमें नक्सलियों से बचाए या फिर हमें अपने स्तर पर मरने-मारने के लिए छोड़ दें।

14 पंक्तियों में 94 शब्दों के अनगढ़ वाक्यों में लिखा पत्र ग्रामीणों की छटपटाहट व विवशता को पूरी शिद्दत से दर्शाता है। पत्र लिख तो दिया, पर मन में आशंका बनी हुई थी। पत्र की जानकारी दादाओं को लग गई तो क्या होगा? लिखे गए सभी आवेदन कलेक्टर कार्यालय में 14 जून 2005 को मिले। ग्रामीण सरकार की ओर कार्यवाही की प्रतीक्षा कर रहे थे। पर जैसा 1857 की क्रांति के समय हुआ। तय तारीख थी 10 मई। लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनी कि मंगल पांडेय ने पहली गोली 29 मार्च को ही चला दी। बस्तर में भी एक ऐसी घटना हुई और सलवा-जुडूम आरंभ हो गया।

बेंदरे थाने के 50-60 जवान बीजापुर से राशन लेकर ट्रैक्टर से बेंदरे जा रहे थे। एक जवान ट्राली में राशन के साथ था। बाकी सुरक्षा कारणों से पैदल चल रहे थे। ट्रैक्टर और पैदल जवानों की बीच एक से डेढ़ किलोमीटर का फासला था। जब बेंदरे थोड़ी दूर रह गया तो ट्रैक्टर ने राह बदल ली। जवान को शंका हुई, वह ट्रैक्टर से कूदकर अपने साथियों के पास पहुंचा। उन्हें स्थिति से अवगत कराया। सभी पुलिस वाले टायरों के निशान के सहारे 'करकेली गांव पहुंचे। ट्रैक्टर वहां खड़ा मिला। राशन उतारा नहीं गया था। ट्रैक्टर के नजदीक 4-5 आदमी थे। पुलिस वाले उन आदमियों को पीटते हुए अपने साथ थाने ले आए। ट्रैक्टर भी साथ ले गए। गांव वालों को जब घटना का पता लगा तो वे उत्तेजित हो गए। वे जानते थे कि जिन्हें पुलिस वाले पकड़ ले गए हैं, वे निर्दोष हैं। दोषी तो गांव में नक्सलियों द्वारा नियुक्त प्रतिनिधि हैं। धीरे-धीरे पूरा गांव इकट्ठा हो गया। उत्तेजना में लोगों ने तय किया कि पुलिस ने जिन निर्दोषों को पकड़ा है, उसे छुड़ाकर लाएं। जो इस घटना का असली अपराधी है, उसे पुलिस को सौंप दिया जाए। गांव वालों ने ऐसा ही किया। नक्सली को सौंपकर गिरफ्तार निर्दोष ग्रामीणों को छुड़ा लाए। बरसों से मन में संचित हो रहे गुस्से और असहायता के बोध ने ग्रामीणों से भारी दुस्साहसिक कार्य करा लिया।

रात में जब सब अपने ठिकानों पर रात्रि विश्राम करने गए तब तक तात्कालिक उत्तेजना समाप्त हो चुकी थी। शांत चित्त से पूरे घटनाक्रम पर विचार किया। सभी आने वाली आफत के बारे में सोचकर कांप उठे। दादाओं के न्याय विधान में इस अपराध की एक ही सजा है, नृशंस तरीके से मृत्युदंड। जैसे तैसे गांव ने आंखों में रात काटी।

सुबह फिर सारा गांव एकत्र हुआ। ग्रामीणों ने बीते कल की घटना पर विचार किया। सबको मालूम था कि इस कृत्य पर नक्सलियों की क्या प्रतिक्रिया होगी। निश्चय हुआ पीछे न हटा जाए। नक्सलियों की गुलामी का जुआं उतार फेंके। आस-पास के ग्रामों में खबर भेजकर मदद मांगी जाए। सारे गांव ने निश्चय किया कि आज से नक्सलियों को न कोई सहयोग देंगे न ही उनके किसी आदेश को मानेंगे। गांव के सभी संघम सदस्यों को भी सारे गांव ने विवश किया। उन्होंने समर्पण कर दिया और गांव वालों के साथ सहयोग का वादा किया। बस्तर में प्रचलित रीति के अनुसार सभी को 'माटी किरिया खिलाई गई। किरिया माने कसम। बस्तर में तीन कसमें प्रचलित हैं, माटी (भूमि का मिट्टी) की दंतेश्वरी माई की (दंतेवाड़ा की देवी) आया (मां) किरिया। माटी किरिया सबसे बड़ी कसम है। बस्तर के छोटे से गांव 'करकेली से दुनिया के इतिहास के महानतम शांति आंदोलन की शुरुआत हो चुकी थी। लेकिन आरंभ के दिनों में यह अभियान अनाम था। यह आंदोलन कई मायनों में विशेष था। इसका कोई नेता नहीं था। न यह कोई लंबे विचार-विमर्श से शुरू हुआ था। यह कहां तक और कब तक चलेगा यह भी तय नहीं था। यही सलवा-जुडूम आंदोलन था।
(लेखक जगदलपुर के पूर्व विधायक हैं)

3 टिप्‍पणियां:

राजीव रंजन प्रसाद ने कहा…

वीरेन्द्र जी,

आपका मैं हृदय से आभारी हूँ कि बस्तर के सच को आपने सशक्तता से उजागर किया है। आप जैसे जनप्रतिनिधि अगर यह बीडा उठा लें तो बस्तर में सचमुच क्रांति और शांति हो सकती है। बाहरी दुनिया भी तो जाने कि जंगल कैसे जल रहा है...

***राजीव रंजन प्रसाद

हर्षवर्धन ने कहा…

जानकारी बढ़ाने वाला लेख।

Vidhu ने कहा…

salvajudoom andolan par ye ek
jankaari bhara lekh hai,...chatisgadh sarkar ne ek udaharan pesh kiya hai aadi vasiyon ke jeevan main is tarah ye ek shubh pahal thi,..salvajudoom per mere paas ek kavita aur jaan kari hai kabhi shair karungi