5/17/2009

भास्कऱ डाँट काम की सेक्स पत्रकारिता

जब पत्रकारिता के मानदण्ड टूट जाते हैं तथा जब पत्रकारिता जन विरोधी तथा अपनी अस्मिता को बेंच चुकी होती है तो उसके पास अतार्किक तथा अप्रसंगिक चीजों का प्रचार प्रसार करने के इतर कोई अन्य चारा नहीं रह जाता। दैनिक भाष्कर वैसे तो काफी नामी हिन्दी न्यूज पेपर हैं लेकिन इसकी वेबसाईट देखने पर यह पता चलता हैं के यह पेपर मानसिक रूप से बिमार है और नव युवको को भी मानसिक रूप से बीमार करना चाहता है इसलिये दुनिया की वे खबरे जो बीमार लोगों और बीमार समाजों से आती है वह भाष्कर पर हेड लाईन बन जाती है। खोज खोज कर अश्लील खबरे तथा चित्र छापे जाते हैं जिससे साईट की रेटिंग बढ जाये।

इस वेबसाईट पर कोई विशेष खबर नहीं रहती न ही कोई राजनैतिक सामाजिक लेख जिससे पाठक जागरूक हो सके। इस वेबसाईट की तुलना तमाम ब्लागों से की जा सकती है जो इस तरह की चीजें अपने ब्लाग पर छापते हैं। रोग तथा वायर्ड न्यूज जिस तरह से इस न्यूज पेपर मे प्रमुख रूप से छप रहा है वह निश्चय ही पत्रकारिता के बदतर होते हालात को सामने रखता है।

इस वेबसाईट में कोई नई खबर नहीं होती, जितना बडा यह पेपर बताया जाता है उस हिसाब से इसके पास खबरे नहीं। गूगल हिन्दी पर प्रकट हो रही हिन्दी न्यूज वेबसाईट में बहुत सी जो अभी कम्पनी भी नहीं हैं तथा दो चार लोगों द्वारा चलाई जाती हैं उनकी खबरे नई होती हैं तथा जनता से जुडी होती हैं। यहाँ तक कि कुछ ब्लाँग भी इससे अच्छे हैं इसलिये नहीं कि वे बडे हैं बल्कि इसलिये कि वे अच्छी खबरें देते हैं जो इसन पेपरों में नहीं छपती तथा जो जनता की खबरे होती हैं तथा सच्ची होती हैं
न्यूज को ये खबरे बुरी तरह से दबाती हैं। न्यूज पेपर के ऐडीटर को नंगी तस्वीरें बडी प्रिय हैं इसलिये वे हर सेक्स की वायर्ड न्यूज पर इन कमोवेश पार्न तस्वीरों को चस्पा करवाते हैं जिससे नवयुवक आकर्षित हो तथा रेटिंग बढे। हिन्दी पत्रकारिता में इस तरह का क्रान्तिकारी बदलाव ऐतिहासिक है तथा जिसके सिर पर देश को मुद्दावीहीन करने का ठीकरा फोडा जाना चाहिये।

जनसत्ता के व्यंगकार अजदक ने जो प्रतिक्रिया इस रविवार को “सबसे उम्दा दिमाग” काँलम में लिखी है वह बहुत सटीकता के साथ तथा कथित मीडीया बुद्धिजीवीयों के खोखलेपन को सामने नंगा करता है। गलत तथा जनविरोधी परिघटनाओं को तरलीकृत कर ये लोग जनता को वायर्ड खबरों के चटखारे में लगाये रखते हैं। इसकी प्रतिक्रिया आज नहीं तो कल होनी ही हैंक्योंकि जब जनता के मुद्दों की अनदेखी की जाती है तो विस्फोट होता है, आतंकवाद पैर फैलाता है, माओवाद को ताकत मिलती है।

मिडीया का इस तरह वेष्यावृत्ति चरित्र में बदल जाना इस देश के लिये चिन्ता जनक है। बुद्धिजीवीयों को एक मंच पर आना चाहिये तथा एक नई मिडीया का निर्माण करना चाहिये जो सम्भव है।
प्रवीन उपाध्याय

5/12/2009

भारत भवन में विश्वरंजन का कविता पाठ


भोपालभारत भवन में शुक्रवार को छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक और जाने-माने कवि विश्वरंजन का कविता पाठ हुआ। यह कार्यक्रम भारत भवन के वागर्थ की पाठ श्रंखला के अंतर्गत आयोजित किया गया था।


उन्होंने कविता पाठ कि शुरुआत ‘यह कविता मेरी नहीं सबकी है, मंत्र की भांति उठती है जमीन, समुद्र से आज भी, साथ लिए आदिम ध्वनियों की कंपन और एक जबदस्त कोशिश’ से की। अपनी अगली रचना पढ़ते हुए उन्होंने कहा, ‘शब्द बोलते-बोलते मौन होंगे सहसा॥, ऐसे लिखते-लिखते रोशनाई सूख जाती है, एक अर्से तक होता रहा तूलिका व रंग का खेल.. पर सहसा एक दिन रंग बिखरते-बिखरते गिरने लगा परत दर परत’।


इसके बाद श्रोताओं के अनुरोध पर ‘अंधेरे से लड़ने के लिए एक स्वप्न का होना बेहद जरूरी हैं, अध खुली खिड़की से झांकता अंधेरा॥खुली किताब फड़फड़ाते पन्ने, कोई नहीं है यहां..टेबल पर बिछ जाएगी लैंप की रोशनी.. यह सब जानते है हुए भी नहीं मानूंगा हार.. स्वप्न पैदा करूंगा उनकी आंखों में’का पाठ किया। इसके पहले विश्वरंजन ने कहा कि भारत भवन को बहुत अर्से पहले बनते और बढ़ते देखा है। यहां आकर सभी से मुखातिब होना अपने आप में एक अलग अनुभूति है। इस अवसर पर डीआईजी (इंटेलिजेंस) अनुराधा शंकर सिंह, आईजी (कानून व्यवस्था) संजीव सिंह, संस्कृति सचिव मनोज श्रीवास्तव, मदन सोनी, नवल शुक्ल आदि उपस्थित थे।

5/04/2009

हरियाणा के मतदाता तय करेंगे हजकां का भविष्य

भारतवर्ष में हो रहे पन्द्रहवीं लोकसभा के आम चुनावों में जहां पूरे देश के लोगों की नज़रें इस बात पर जा टिकी हैं कि देखें दिल्ली दरबार पर किसकी सरकार का परचम लहराता है। वहीं देश के कुछ राज्य भी ऐसे हैं जो स्थानीय स्तर पर कुछ राष्ट्रीय स्तर के नेताओं की प्रतिष्ठïा का प्रश्र बने हुए हैं। ऐसा ही देश का एक समृद्घ एवं सम्पन्न राज्य है हरियाणा। इस राज्य में जनता सबसे अधिक उत्सुकता से यदि कुछ देख रही है तो वह है नवोदित राजनैतिक संगठन हरियाणा जनहित कांग्रेस तथा इसके सूत्रधार चौधरी भजन लाल का राजनैतिक भविष्य।
चौधरी भजन लाल देश की राजनीति में एक ऐसा नाम है जिसे राजनैतिक जगत के लोग विशेषकर तिकड़मबाजी की राजनीति पर नजर रखने वाले कभी भुला नहीं सकते। हरियाणा के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए जिस प्रकार चौ। भजन लाल ने रातों-रात राजनैतिक धर्म परिवर्तन करते हुए पूरे के पूरे जनता पार्टी के मंत्रिमंडल को कांग्रेस के मंत्रिमंडल के रूप में परिवर्तित कर दिया था, उसकी दूसरी मिसाल िफलहाल देश में कहीं भी देखने को नहीं मिली। इस निराली राजनैतिक घटना ने भजन लाल को 'राजनीति में पी। एच. डी. की उपाधि दे डाली थी। उनके इस राजनैतिक 'कौशल की वजह से चौधरी भजन लाल की गिनती कांग्रेस के केंद्रीय नेताओं में की जाने लगी। भजन लाल ने अपने राजनैतिक कौशल का जोरदार प्रदर्शन उस दौरान भी किया जबकि नरसिम्हाराव सरकार को गिरने से बचाने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के 4 सांसदों का लोकसभा में समर्थन कांग्रेस द्वारा हासिल किया गया। परन्तु इसमें भी कोई दो राय नहीं कि हरियाणा में कांग्रेस को मजबूत करने में तथा राज्य में कांग्रेस को सत्ता तक लाने में भजन लाल की अहम भूमिका रही।
परन्तु हरियाणा में चौ० भुपेन्द्र सिंह हुड्डा को जब से राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया, उसी समय से भजन लाल को तथा उनसे भी अधिक उनके छोटे पुत्र कुलदीप बिश्रोई को यह महसूस होने लगा कि कांग्रेस पार्टी द्वारा उन्हें ठगा गया है तथा भजन लाल को 2005 में राज्य का मुख्यमंत्री न बनाकर उनके साथ अन्याय किया गया है। उसी समय से भजन लाल ने कांग्रेस आलाकमान के विरुद्घ बगावत के स्वर बुलंद करने शुरु कर दिए थे। इस काम में भजन लाल से भी आगे-आगे चल रहे थे उनके पुत्र कुलदीप बिश्रोई। हालांकि कुलदीप बिश्रोई को कांग्रेस ने लोकसभा का चुनाव लड़वा कर भिवानी से सांसद भी निर्वाचित कराया था। कुलदीप के बड़े भाई चन्द्रमोहन को भजनलाल का पुत्र होने के नाते ही हरियाणा का उपमुख्यमंत्री भी बनाया गया। परन्तु भजन लाल के परिवार को यह सब कुछ मुख्यमंत्री का पद न मिल पाने के आगे तुच्छ महसूस हो रहा था। इस कुंठा की परिणिति कुछ इस प्रकार हुई कि कल तक सोनिया गांधी का गुणगान करने वाले कुलदीप बिश्रोई को सोनिया गांधी विदेशी महिला नज़र आने लगीं तथा राज्य की भुपेन्द्र सिंह हुड्डा सरकार भी उन्हें निकम्मी, अक्षम तथा अकुशल प्रतीत होने लगी। परिणामस्वरूप भजन लाल व उनके पुत्र कुलदीप बिश्रोई ने कांग्रेस को अपनी हैसियत बताने के लिए हरियाणा जनहित कांग्रेस नामक एक राज्य स्तरीय राजनैतिक दल का गठन किया। उनके इस नए राजनैतिक प्रयोग में हालांकि चन्द्रमोहन उनके सहयोगी नहीं बने। चन्द्रमोहन अपने जीवन के निजी जंजालों में कुछ ऐसा उलझे कि पहले तो उनके रहस्यमयी तरीकों से लापता होने का समाचार मिला। फिर अचानक पता चला कि चन्द्रमोहन जी ने अपनी आशिकी पर कुर्बान होते हुए धर्म परिवर्तन तक कर लिया है और वे चन्द्रमोहन के बजाए चांद मोहम्मद बन चुके हैं। हरियाणा एवं पंजाब हाईकोर्ट की एक अधिवक्ता अनुराधा बाली के साथ उनके निकाह की खबरें आईं। अनुराधा बाली भी फ़िजा मोहम्मद बन गईं। हरियाणा के उपमुख्यमंत्री जैसे जिम्मेदार एवं गरिमामयी पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा लापता हो जाने, आशिक़ी करने तथा धर्म परिवर्तन करने जैसी खबरों ने मुख्यमंत्री भुपेन्द्र सिंह हुड्डा को इस बात के लिए मजबूर किया कि वे अपनी पार्टी की तथा शासन की गरिमा को बचाए रखने के लिए चन्द्रमोहन को उनके पद से हटा दें। उधर भजन लाल भी अपने जयेष्ठï पुत्र की इस आशिकाना हरकत से आग बबूला हो उठे। उन्होंने भी अपने व अपनी नवगठित हरियाणा जनहित कांग्रेस के उज्जवल भविष्य के मद्दनेजर चन्द्रमोहन को अपनी सम्पत्ति तथा अपने रिश्तों से बेदखल कर दिया। इस प्रकार बेचारे चन्द्रमोहन- 'न सनम ही मिला न विसाले सनम के पर्याय बन गए। इस लोकसभा चुनाव के दौरान चन्द्रमोहन कहां हैं तथा वर्तमान राजनैतिक घटनाक्रम में उनकी क्या भूमिका है, किसी को पता नहीं। परन्तु भजन लाल अपने छोटे पुत्र कुलदीप को लेकर अपने परिवार के राजनैतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ते जरूर दिखाई दे रहे हैं।
यूं तो हरियाणा में कुल 10 संसदीय निर्वाचन क्षेत्र हैं। राज्य में मुख्य रूप से कांग्रेस, भाजपा-इनैलो गठबंधन, बहुजन समाज पार्टी तथा हरियाणा जनहित कांग्रेस के प्रत्याशी राज्य की लगभग सभी सीटों पर अपना भाग्य आजमा रहे हैं। मजे की बात तो यह है कि सभी राजनैतिक दलों के वरिष्ठï नेता पूरी की पूरी दस सीटें जीतने का अलग-अलग दावा भी पेश कर रहे हैं। सत्तारूढ़ कांग्रेस 2004 के लोकसभा चुनावों में प्राप्त हुई 9 सीटों को 10 सीटों में बदलने अथवा विगत् 9 सीटों की स्थिति को ही बरकरार रखने के लिए जी जान से संघर्ष कर रही है तो इनैलो भाजपा गठबंधन कांग्रेस से अधिक से अधिक सीटें छीन कर अगले वर्ष हरियाणा में होने वाले विधानसभा चुनावों पर अपनी नजरें गड़ाए हुए है। उधर बहुजन समाज पार्टी कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने के अपने राष्ट्रव्यापी अभियान के अन्तर्गत राज्य की सभी सीटों पर चुनाव लड़कर अपनी हैसियत का अंदाजा लगाने की कोशिश कर रही है। परन्तु इन सबसे अलग यदि राजनैतिक विश्लेषकों की नजरें बड़ी सूक्ष्मता से कुछ देख रही हैं तो वह है राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी भजन लाल तथा उनकी हरियाणा जनहित कांग्रेस का भविष्य जोकि इस बार पहली बार चुनाव लड़कर कांग्रेस को अपनी ताकत दिखाने की कोशिश में लगी है।
हजकां वैसे तो राज्य की सभी 10 सीटों पर अपने प्रत्याशी लड़ा रही है। परन्तु केवल दो ही लोकसभा सीटें ऐसी हैं जिन्हें उनके पक्ष में आशाओं व चुनौतियों की नजरों से देखा जा रहा है। इनमें एक हिसार की सीट पर स्वयं चौधरी भजन लाल अपना भाग्य आजमा रहे हैं जबकि भिवानी से कुलदीप बिश्रोई चुनाव मैदान में हैं। कुलदीप बिश्रोई भी अन्य दलों के 'बयान बहादुर नेताओं की तरह आठ या सभी दस सीटें जीतने की बात क्यों न कर रहे हों परन्तु राजनैतिक विशलेषकों की नजरें केवल हिसार और भिवानी में हजकां के संभावित प्रदर्शन पर ही लगी हुई हैं। इन दोनों ही सीटों को पिता-पुत्र ने अपनी प्रतिष्ठïा का प्रश्र बना लिया है। कुलदीप बिश्रोई स्वयं को हरियाणा का भावी मुख्यमंत्री बताकर मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं तो चौधरी भजन लाल अपने जीवन का अंतिम चुनाव बताकर मतदाताओं से उन्हें जिताने की भावनात्मक अपील कर रहे हैं। भजन लाल व कुलदीप को यह बखूबी मालूम है कि यदि वे दोनों कम से कम अपनी यह दो सीटें जीत सके फिर तो किसी हद तक वे कांग्रेस आलाकमान को अपनी राजनैतिक हैसियत का अन्दाजा लगवा पाने में सफल होंगे और यदि ऐसा न हो सका तो कांग्रेस छोड़कर गए और कई दूसरे नेताओं की तरह इन्हें भी यह अहसास हो जाएगा कि संगठन महान होता है, न कि व्यक्ति।
अब देखना यह है कि हरियाणा के मतदाता हरियाणा जनहित कांग्रेस को राज्य का विकास करने की इच्छा रखने वाले एक राज्यस्तरीय दल के रूप में लेते हैं अथवा एक ऐसे दल के रूप में जिसका उदय केवल इसलिए हुआ हो कि उसके संरक्षकों को कांग्रेस पार्टी उनकी इच्छाओं के अनुरूप सत्ता की उस कुर्सी पर बिठा पाने में असमर्थ रही जिसकी वे उम्मीद लगाए बैठे थे। निश्चित रूप से जहां देश का सम्पूर्ण चुनाव परिणाम दिलचस्प होने की संभावना है, वहीं हरियाणा में नवगठित हरियाणा जनहित कांग्रेस को लेकर आने वाले परिणामों के विषय में भी हरियाणा की जनता उतनी ही उत्सुक दिखाई दे रही है। समय बताएगा कि भजन लाल व कुलदीप बिश्रोई स्वयं को शरद पवार तथा ममता बैनर्जी की श्रेणी में स्थापित कर पाते हैं अथवा इनका हश्र उमा भारती जैसा होगा।
निर्मल रानी
1630/11, महावीर नगर,
अम्बाला शहर,हरियाणा

6 मीडियाकर्मी को ‘सृजनगाथा’ सम्मान

रायपुर में 6-7 जून को जुटेंगे देश के वरिष्ठ साहित्यकार

रायपुर। छत्तीसगढ़ की साहित्य, संस्कृति एवं भाषा की अंतर्राष्ट्रीय मासिक वेब पत्रिका सृजनगाथा डॉट कॉम के तृतीय सृजनगाथा सम्मान की घोषणा कर दी गई है । मीडिया की विभिन्न विधाओं में प्रतिवर्ष दिये जाने वाला यह सम्मान इस वर्ष रवि भोई, रायपुर (पत्रकारिता), महावीर अग्रवाल, दुर्ग (लघुपत्रिका), शिवशरण पांडेय, रायगढ़ (फ़ोटोग्राफ़ी), रणवीर सिंह चौहान, दंतेवाड़ा (वेब-पत्रकारिता), मिर्जा मसूद, रायपुर (रेडियो), राजेश मिश्रा, रायपुर (इलेक्ट्रानिक पत्रकारिता), अशोक सिंघई, कमलेश्वर साहू भिलाई, एवं बीएलपॉल, कोरिया (साहित्य) को दिया जा रहा है। सृजनगाथा के संपादक जयप्रकाश मानस ने बताया है कि यह सम्मान सृजनगाथा डॉट कॉम के तीन वर्ष पूर्ण होने पर 7 जून को एक समारोह में प्रदान किया जायेगा ।
इस अवसर पर ‘नयी प्रौद्योगिकी और साहित्य की चुनौतिया’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी भी होगी जिसमें देश के नामचीन आलोचक, कवि, संपादक केदार नाथ सिंह (दिल्ली), नंदकिशोर आचार्य (जयपुर), विश्वनाथ प्रसाद तिवारी (गोरखपुर), विजय बहादुर सिंह (कोलकाता), मैनेजर पांडेय (दिल्ली), प्रो। धनंजय वर्मा (भोपाल), अरुण कमल (पटना), कर्मेन्दु शिशिर (पटना), राजेश जोशी (भोपाल), लीलाधर मंडलोई (दिल्ली), विश्वजीत सेन (पटना), प्रभात त्रिपाठी (रायगढ़, डॉ. बलदेव (रायगढ़), हेमंत शेष (जयपुर), विश्वरंजन, व अनिल विभाकर (रायपुर) आदि शिरकत करेंगे ।

लघु पत्रिका ‘नई दिशाए’ के प्रधान संपादक एस. अहमद ने बताया कि पत्रिका के दो वर्ष पूर्ण होने पर इसी तारतम्य में समकालीन कविता के वरिष्ठ हस्ताक्षर विश्वरंजन की कविताओं पर केंद्रित संगोष्ठी 6 जून को होगी जिसमें ये सभी वरिष्ठ रचनाकार भाग लेंगे । संगोष्ठी का विषय ‘’विश्वरंजन की कविता में राजनीतिक परिप्रेक्ष्य’’ रखा गया है । इसके अलावा देश के ये वरिष्ठ कवि अपनी कविताओं का भी पाठ करेंगे । इस अवसर पर विश्वरंजन की कृति के तीसरे संस्करण का विमोचन भी किया जायेगा।

दो आलोचकों को प्रतिवर्ष प्रमोद वर्मा सम्मान

प्रमोद वर्मा की स्मृति में संस्थान का गठन

रायपुर । मुक्तिबोध, परसाई और श्रीकांत वर्मा के समकालीन तथा हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक प्रमोद वर्मा की स्मृति को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान का विधिवत पंजीयन किया गया है, जिसका विस्तार किया जायेगा । संस्थान द्वारा प्रत्येक वर्ष राष्ट्रीय आलोचना, साहित्य एवं शिक्षा पर केंद्रित संगोष्ठियों का आयोजन विभिन्न शहरों में किया जायेगा । हर साल किसी युवा और प्रतिभावान आलोचक को शोधवृत्ति भी प्रदान की जायेगी । इस अनुक्रम में इस वर्ष 10-11 जुलाई को रायपुर में आलोचना और प्रमोद वर्मा पर राष्ट्रीय विमर्श का आयोजन किया जा रहा है । संस्थान द्वारा प्रमोद वर्मा के लिखित साहित्य का समग्र पाँच खंडों में प्रकाशन भी किया जा रहा है, जिसका संपादन श्री वर्मा के आत्मीय मित्र और कवि विश्वरंजन कर रहे हैं । यह कृति राजकमल प्रकाशन द्वारा छापी जा रही है । इसके अलावा श्री वर्मा की स्मृति में दो राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार प्रारंभ किये जा रहे हैं । इसका उद्देश्य हिंदी में उस स्वस्थ आलोचना कर्म का सम्मान है जिनसे अपने समय के साहित्य, साहित्यकार और पाठक यानी मनीषा को नयी संचेतना और नयी दिशा से जुड़ने का द्वार खुलता हो । इस पुरस्कार के अंतर्गत दो आलोचकों को उनकी आलोचनात्क कृति या कर्म के लिए सम्मानित किया जायेगा। पुरस्कार के अंतर्गत दो चयनित आलोचकों को 10-11 जुलाई, 2009 को रायपुर में आयोजित दो दिवसीय साहित्य समारोह में 11,000 एवं 7,000 हज़ार नगद सहित प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह एवं प्रमोद वर्मा समग्र की एक-एक प्रति प्रदान किया जायेगा । पुरस्कारों का चयन निर्णायक मंडल द्वारा किया जायेगा जिसमें श्री केदार नाथ सिंह, दिल्ली, डॉ. विजय बहादुर सिंह, कोलकाता, डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, गोरखपुर, प्रो. धनंजय वर्मा, भोपाल एवं श्री विश्वरंजन तथा संयोजक जयप्रकाश मानस, रायपुर हैं । संस्थान के संयोजक ने बताया है कि इसके लिए प्रविष्टि बुलायी गई है । प्रथम वर्ग के अंतर्गत आलोचक को अपनी प्रकाशित कृति (साहित्य-आलोचना) की दो प्रतियाँ भेजना होगा जो किसी भी अवधि में प्रकाशित हों । द्वितीय वर्ग के अंतर्गत युवा आलोचक को अपनी प्रकाशित कृति (साहित्य-आलोचना) की दो प्रतियाँ भेजना होगा जो 2000 से 2009 की अवधि में प्रकाशित हों । ऐसी कृतियों के प्रकाशक, पाठक, संस्थायें भी उक्तानुसार प्रविष्टि भेज सकते हैं । प्रविष्टि के साथ आलोचक का बायोडेटा एवं छायाचित्र आवश्यक होगा । प्रविष्टि प्राप्ति की अंतिम तिथि – 30 मई, 2009 रखी गयी है । प्रविष्टि प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, सी-2/15, न्यू शांति नगर, रायपुर, छत्तीसगढ़ के पते पर भिजवायी जा सकती है ।

4/10/2009

राजेंद्र माथुरः हिंदी पत्रकारिता का नायक

पुण्यतिथि (9 अप्रैल,1991) पर विशेष-
आजादी के बाद की हिंदी पत्रकारिता में उन जैसा नायक खोजे नहीं मिलता। राजेंद्र माथुर सही अर्थों में एक ऐसे लेखक, विचारक और संपादक के रूप में सामने आते हैं जिसने हिंदी पत्रकारिता को समकालीन विमर्श की एक सार्थक भाषा दी। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को वह ऊंचाई दी जिसका वह एक अरसे से इंतजार कर रही थी। राष्ट्रीय एवं वैश्विक संदर्भों में जिस तरह से उन्होंने हिंदी को एक सामर्थ्य का बोध कराया वह उल्लेखनीय है।

7 अगस्त,1935 को मध्यप्रदेश के धार जिले की बदनावर तहसील में जन्मे राजेंद्र माथुर की प्राथमिक शिक्षा धार में ही हुई। इंदौर से उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की। श्री माथुर को अंग्रेजी साहित्य और दर्शन में बहुत रूचि थी। पढ़ाई पूरी होने के पहले ही 1955 से उन्होंने इंदौर की नई दुनिया में लिखना शुरू कर दिया था। साठ के दशक में उनका स्तंभ पिछला सप्ताह काफी लोकप्रिय हो गया था। 1970 तक वे इंदौर के एक कालेज में अंग्रेजी साहित्य का अध्यापन करते रहे और फिर पूरी तरह से पत्रकारिता के प्रति समर्पित हो गए। 1980 में वे द्वितीय प्रेस आयोग के सदस्य मनोनीत किए गए। 1981 में वे नई दुनिया का प्रधान संपादक बने। इसी तरह एक सफल पारी का निर्वहन करने के बाद अक्टूबर 1982 में वे दिल्ली से प्रकाशित नवभारत टाइम्स के संपादक बने। राजेंद्र माथुर की पूरी पत्रकारीय यात्रा में विचारों की जगह साफ दिखाई देती है।

साहित्य और पत्रकारिता की जिस तरह की जुगलबंदी आजादी के आंदोलन के दौरान ही कायम हो गयी थी और प्रायः वे ही पत्रकार एवं संपादक हिंदी की मुख्यधारा की पत्रकारिता का नेतृत्व कर रहे जो साहित्यकार भी थे। हिंदी पत्रकारिता के नायकों में इसी लिए साहित्यकार पत्रकारों की एक लंबी परंपरा देखने को मिलती है। इसके चलते तमाम संपादकों ने गति न होते हुए भी साहित्य लिखने की कोशिश की, जबकि यह कर्म एक विशेष कौशल की मांग करता है। राजेंद्र माथुर का ऐसे समय में राष्ट्रीय पत्रकारिता के फलक पर अवतरण एक ऐसे नायक की तरह हुआ जिसने साहित्य से इतर पत्रकारिता की भाषा को न सिर्फ संबल दिया वरन यह साबित भी किया कि पत्रकारिता एक अलग किस्म का कौशल है और यशस्वी संपादक होने के लिए साहित्य में गति होना अनिवार्य नहीं है। इस संदर्भ में राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी जहां विचार की पत्रकारिता के वाहक बने वहीं हिंदी को सूचना की ताकत का अहसास एसपी सिंह ने कराया। ये तीन नायक हमें न मिलते तो यह कहना कठिन है कि हिंदी पत्रकारिता का चेहरा- मोहरा आज कैसा होता। हिंदी पत्रकारिता यदि अंग्रेजी पत्रकारिता के अनुगमन से मुक्त होकर अपनी खास भाषा और शैली के साथ आत्मविश्वास पा सकी तो इसके लिए इन नायकों के कार्यों का मूल्यांकन जरूरी होगा। तो बात राजेंद्र माथुर की। माथुर साहब ने जिस तरह भारत के इतिहास, धर्म, दर्शन, संस्कृति, साहित्य, समाज और राजनीति में जैसी रूचि दिखायी वह प्रेरणा का बिंदु है। उनका विश्लेषण जिस तरह की बौद्धिक उत्तेजना पैदा करता है हिंदी के पाठक ऐसी सामग्री पहली बार अपनी भाषा में पा रहे थे। वे एक ऐसे पत्रकार थे जो लगातार अपने देश को जानने की कोशिश कर रहा था। उनकी देश के प्रति जिज्ञासा, भारत प्रेम उनके लेखन में सदैव महसूस होता है, वे अपने पाठकों को अपने साथ लेने की कोशिश करते हैं। हिंदी पत्रकारिता के वैचारिक दारिद्रय को लेकर वे बहुत सजग थे। राजेंद्र माथुर ने अंग्रेजी साहित्य में एमए किया था और अंग्रेजी भाषा पर उनकी पकड़ ने उनके सरोकार व्यापक किए। वे चाहते तो आसानी से किसी मुख्यधारा के अंग्रेजी अखबार में अपनी सेवाएं दे सकते थे। किंतु उन्होंने हिंदी को अपनाया। जाहिर तौर पर वे ज्यादातर लोगों से संवाद करना चाहते थे। अंग्रेजी साहित्य और विश्व की तमाम नई जानकारियों से वे लैस रहा करते थे। विदेशों में छप रही नई किताबों पर उनकी नजर रहती थी और वे उन्हें पढ़कर अपने पाठकों तक उसका आस्वाद पहुंचाते थे। प्रोफेसर ए। एल. बाशम की किताब- द वंडर दैट वाज इंडिया पर उन्होंने क्या बतलाता है हमें बाशम का अदभुत भारत नामक लेख लिखा। उन्होंने लिखा- यह किताब उन लोंगों को जरूर पढ़नी चाहिए जो विद्वान बने बगैर भारत के बारे में एक दृष्टि विकसित करना चाहते हैं।

राजेंद्र माथुर हिंदी अखबारों की विचारहीनता को लेकर लगातार सोचते रहे। एक संपूर्ण अखबार के बारे में भी उन्होंने सोचने की शुरूआत की। आज जब हिंदी की पत्रकारिता एक उंचाई ले रही है और विविध सामग्री अखबारों में जगह पा रही तब राजेंद्र माथुर की याद बहुत स्वाभाविक और मार्मिक हो उठती है। राजेंद्र माथुर की भारत की तरफ देखने की एक खास नजर थी। वे देश के महान नेताओं महात्मा गाँधी और पं। जवाहर लाल नेहरू से खासे प्रभावित थे। बावजूद इसके उनका लेखन तमाम सीमाओं का अतिक्रमण करता है। तमाम तरह के विचार उनके लेखन को प्रभावित करते हैं। अपने एक लेख गहरी नींद के सपनों में बनता हुआ देश में माथुर साहब भारत की अद्भुत व्याख्या करते हैं। वे भारतीय राज्य-राष्ट्र की एक नई व्याख्या करते नजर आते हैं। वे आज के एक बेहद विवादित विषय पर लिखते हैं कि – दरअसल जिसे हिंदु धर्म कहते हैं, वह इस लेख में वर्णित अर्थों में धर्म है ही नहीं। वह मिथक- संचय की भारतीय प्रक्रिया का नाम है। इस संचय – प्रक्रिया को त्यागकर कोई देश नहीं बन सका, तो हिंदुस्तान कैसे बनेगा, जिसकी निरंतरता तीन हजार साल से नहीं टूटी है। आशंका इस बात की है कि सिंहासन के झगड़ों के कारण और आसपास के दबावों के कारण कहीं यह संचय प्रक्रिया समाप्त न हो जाए और हिंदुत्व सचमुच एक धर्म न बन जाए। आज हिंदुत्व पर भारी दबाव है कि वह संकीर्ण और एकांगी और असहिष्णु बने।

राजेंद्र माथुर संभावनाओं और खतरों को भांपकर चलनेवाले दूरदर्शी पत्रकार थे। उनकी पंक्तियां जाहिर तौर पर भविष्य को व्यक्त कर देती हैं, एक लेख में वे लिखते हैं- राज्य के छोटे टुकड़े होने पर स्वराज्य का पारिभाषित अंतर समाप्त हो जाएगा, यह मानने का कोई कारण प्रतीत नहीं होता। यदि गाय मांस नहीं खाती तो छोटे-छोटे टुकड़े कर देने से उसकी खून की उल्टियां रूक नहीं जाएंगी। इसी लेख में वे लिखते हैं- चालीस साल से कभी अपने निजत्व से राज्य को क्षत-विक्षत करते कभी राज्य के खातिर अपने निजत्व लहूलुहान होते हुए देखते हुए हम चल रहे हैं। कोई संभावना नहीं है कि इस त्रास से निकट भविष्य से हमें मुक्ति मिलेगी। जब मिलेगी,तब तक हम बदल चुके होंगें और हमारा राज्य भी।
कुल मिलाकर राजेंद्र माथुर का लेखन और चिंतन हमें प्रेरित करता है और प्रभावित भी। राजेंद्र माथुर सही मायनों में एक ऐसे संपादक के रूप में सामने आते हैं जिसने समूची हिंदी पत्रकारिता को आंदोलित किया। वे अपने समय में एक लेखक और संपादक के रूप में ऐसी मिसाल कायम करते हैं जिसपर आज भी हिंदी पत्रकारिता को गर्व है। आज जबकि हिंदी पत्रकारिता पर कई तरह के संकट सवाल की तरह खड़े हैं श्री माथुर की स्मृति एक संबल की तरह हमारे साथ है।
संजय द्विवदी
रीडरः जनसंचार विभाग
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय,
प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र)
मोबाइल - 098935-98888 e-mail-
123dwivedi@gmail.com
Web-site- www.sanjaydwivedi.com

3/27/2009

बड़े आये चुनाव आयोग को समझानेवाले

व्यंग्य
विश्वरंजन साहब ! नक्सलियों से दो-दो हाथ लेना, उन्हें इस हद तक दबाव में ले आना कि वह बातचीत करने की तैयारी करने लगें एक बात है और चुनाव आयोग से लोहा लेना दूसरी बात । आप इतने दिनों से शासन में अधिकारी रह चुके हैं । आई-बी में भी थे और चुनाव आयोग के अंहकारी स्वभाव के बारे में आपको खुफिया जानकारियाँ भी ज़रूर होंगी। आप को मालूम ही होना चाहिये था कि आयोग का चपरासी भी आपके बाप-तुल्य है। आयोग के छोटे और मध्यम स्तर के अधिकारी आपके पितामह-तुल्य हैं। उसके ऊपर तो सभी ईश्वर-तुल्य हैं। आप क्यों गये थे उन्हें समझाने ? कैसे भूल गये कि समझने-समझाने से ऊपर की स्थिति में होता है आयोग और उसके अधिकारी। आपको क्या नहीं मालूम था जिन पुलिस अधीक्षकों के अस्मिता के लिये आपने आवाज़ उठाई उसे आयोग, चाहे तो आयोग का चपरासी भी यह पाठ पढ़ा सकता है कि बस्तर में नक्सलियों से कैसे लड़ा जाये....

पर विश्वरंजन जी आप बहुत भोले हैं, बहुत सरल हैं। कवि जो ठहरे । चित्रकार जो ठहरे । अब कवि तो सच ही बोलेगा। पर आप सिर्फ कवि नहीं हैं विश्वरंजन साहब, आप एक पुलिस अधिकारी भी हैं। डीजीपी। हैं। इतना तो आप जानते ही होंगे कि प्रशासनिक अधिकारी को बहुत बार झूठ का सहारा लेना पड़ता है। सच पर हमेशा अड़ियेगा तो मरियेगा ही। और फिर सच के लिये या अपने अधीनस्थ अधिकारियों की मान-मर्यादा के लिये तो बेवकूफ ही लड़ते-भिड़ते हैं। अच्छा अधिकारी ऊपर वालों की चापलूसी करता है और अधीनस्थ अधिकारियों को लात मारता है। और आपने तो ‘साहबों’ के दोगले चरित्र को अपनी बहुत सारी कविताओं में रेखांकित भी किया है। फिर आप कैसे ग़लती कर बैठे, आयोग के वाले साहबों के मनोविज्ञान को समझने में ?

आप शायद यह भी भूल गये कि सबसे बड़ा आतंकी अधिकारी ही होता है। जिसके पास जितना अधिकार वह उतना बड़ा आतंकी ! और चुनाव आयोग के पास तो अधिकार ही अधिकार हैं। चुनाव के दौरान तो न्यायालयों का भी डर नहीं है उसे । कोई सुनवाई की गुंजाइश नहीं है। किसी राज्य में आयोग का जो कारिन्दा है या जो कारिन्दे चुनाव के दौरान कुछ दिन के लिये तैनात कर दिये जाते हैं वे कैसे भी हों आयोग की नज़रों में राजा हरिश्चद्र होते हैं ? हरिश्चन्द्र कौन ? अरे वही जो डोम राजा के कारिन्द्रे थे काशी में।

पर राजा हरिश्चन्द्र तो सच्चे इंसान थे। सच ही बोलते थे। आज के हरिश्चन्द्रों की जमात ही कुछ और किस्म की है। बाज़ार में गर्म चर्चाओं को माने तो उनमें से एक तो दहेज प्रताड़ना के लिये अन्दर होना चाहिये था। कहा जा रहा है उस वक्त पुलिस को उस पर तरस आ गई। यह आपके छत्तीसगढ़ आने के पूर्व की घटना है विश्वरंजन साहब, जरा पुराने रिकार्डों का मुआयना कीजिये। भ्रष्ट्राचार की जाँच भी शायद आर्थिक अपराध शाखा कर रही है। एक अन्य कारिन्दे आज नहीं तो कल एक अपराधिक प्रकरण में फँस सकते हैं। बशर्ते पुलिस को तरस न आ जाये।

विश्वरंजन साहब, आपने बड़ी गलती की छत्तीसगढ़ आकर। उठा पटक के खेल में माहिर नहीं थे, न आपने किलाबन्दी की । नहीं तो नक्सलियों से लड़ने के पहले अपने आस-पास घुमते अधिकारियों की फाईले बनवाते । उनके खिलाफ पुराने प्रकरणों को फिर से खुलवाते। पहले आप “ब्लैकमेलिंग” कला में खुद को निपुण करते । और यदि आप यह सब नहीं करना चाहते थे तो क्या ज़रूरत थी चुनाव आयोग के कारिन्दों को राय-मशविरा देनें की। क्या ज़रूरत थी यह कहने की कि नक्सली क्षेत्र में पुलिस इंतेज़ाम उस इलाके में काम करने वाला पुलिस अधिकारी ज्यादा सही तरीके से कर सकता है। आपको जानना चाहिये था कि आयोग के कारिन्दे ऐसा नहीं मानते । आप फिजूल ही अपने लेखों में जब-तब यह शेर उद्धित करते रहे हैं-
जब तक ऊँची न हो ज़मीर की लौ
आँख को रौशनी नहीं मिलती

अब आप रौशनी देने चले थे उन्हें जिनके ज़मीर में आग ही नदारत थी। तो आपको चारों खाने चित होना ही था। जो चाह कर भी नक्सली नहीं कर पाये चुनाव आयोग कर गया। पर एक बात माननी पड़ेगी। आप गिरे ज़रूर पर टकराने के बाद गिरे। गिरते हैं सर सवार ही मैदाने जंग में । आप घुटनों के बल रेंगते हुए नहीं गिरे। देखिये न आपके चारों ओर दूसरे राज्यों के डीजीपी तो बिना कारण ही हटाये जा रहे हैं। चुनाव आयोग अतुलित बलधामा है। वह हरि है। और हरि के विषम में ज्यादा नहीं लिखा जा सकता। पाप लगता है। क्योंकि हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता.......
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-डॉ राजेन्द्र
पहचान प्रकाशन, कुशालपुर, रायपुर

3/24/2009

चुनाव आयोग के निर्देशों पर विचार-गोष्ठी

रायपुर । राजधानी की सक्रिय संस्था लोकमान्य सद्-भावना समिति के अध्यक्ष तपेश जैन ने बताया है कि कल २५ मार्च, २००९ को स्थानीय अमिट होटल में शाम ४ बजे नगर के बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, कलाकारों, रंगकर्मियों, पत्रकारों, समाजसेवियों, सहित आम नागरिकों की एक विचार-गोष्ठी आयोजित है ।
इस विचार-गोष्ठी का केंद्रीय विषय है - केंद्रीय चुनाव के आदेश और प्रजातंत्र । श्री जैन ने बताया है कि विगत दिनों जिस तरह से आयोग ने आदर्श आचरण संहिता के नाम पर आदेश जारी किये हैं वे उस निष्पक्षता के लिए तो आवश्यक हैं किन्तु उसके पीछे के कारणों पर भी चिंतन ज़रूरी है । उसके परिणामों को देखने से वे तानाशाहिता को भी प्रदर्शित करते हैं । कुछ ऐसे आदेश भी हैं जिस पर एकतरफा कार्यवाई तो की गई है किन्तु उसकी कोई सुनवाई नहीं हुई है । यह एक तरह से नागरिक अधिकारों, अभिव्यक्ति के अधिकारों का भी हनन है । यद्यपि आयोग को संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं जिसके आलोक में वह ऐसा कार्य कर सकता है किन्तु इसकी भी गांरटी आयोग को लेनी होगी जो राज्य या किसी व्यवस्था, संवैधानिक मूल्यों, स्वस्थ परंपराओं पर कुठाराघात सिद्ध न हो ।
श्री जैन ने इस संगोष्ठी में खुली चर्चा व विचार हेतु सर्वसंबंधितों को आमंत्रित किया है ।

विश्वरंजन की कविता स्वप्न देखने को प्रेरित करती है


भिलाई नगर। कल्याण महाविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा कवि, एवं छग के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन के सद्य:प्रकाशित एकाग्र संग्रह, 'एक नई पूरी सुबह' (जयप्रकाश मानस द्वारा संपादित)पर एक समीक्षा गोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कवि, कथाकार एवं आलोचक डॉ। प्रभात त्रिपाठी थे। विशेष अतिथि के रुप में डॉ. बलदेव, डॉ. एचएन दुबे, डॉ. सरोज प्रकाश एवं दुर्ग जिला के पुलिस अधीक्षक दीपांशु काबरा उपस्थित थे। अध्यक्षता ललित निबंधकार श्रीराम परिहार ने की है।
स्वागत भाषण देते हुए हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ। सरोज प्रकाश ने श्री विश्वरंजन की कविताओं पर आहूत समीक्षा गोष्ठी के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। डॉ. बलदेव ने कवि विश्वरंजन के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। कविता पाठ के लिए विश्वरंजन को आमंत्रित किया गया तो उन्होंने सहर्ष ही मंच पर खड़े होकर अपनी सात कविताओं का पाठ किया। कविता पाठ करने की उनकी अपनी मौलिक शैली है। कुछ कविताओं के शीर्षक इस तरह से है-तुम गलत कहती हो मैं तुम्हारा वही मुन्ना नहीं हूं मां, रात की बात, मैं फिर से नया लोहाबान जलाता हूं, साहब कोलाज और साधों। प्रेम में सब कुछ संभव है। कवि द्वारा अपनी ही कविता का सस्वर पाठ उपस्थित दर्शकों। श्रोताओं के लिए यादगार क्षण में तब्दील हो गया। विश्वरंजन के काव्य संग्रह पर तीन आलेख पढ़े गए जिसमें प्रथम दो आलेख डॉ. के.एस. प्रकाश, कमलेश्वर साहू द्वारा कविता के संदर्भ में पढ़े गए। तथा अंतिम आलेख शरद कोकास द्वारा विश्वरंजन के गद्य लेखन के संदर्भ में पढे ग़ये।विशेष आमंत्रित वक्ताओं ने भी विश्वरंजन की कविताओं के संदर्भ में अपने-अपने विचार व्यक्त किए। इनमें डॉ. अनिता करडेकर, विनोद साव, अशोक सिंघई, सियाराम शर्मा और रवि श्रीवास्तव ने काफी विस्तार से कविता के अर्थ को खोलने का प्रयास किया।
मुख्य अतिथि डॉ। प्रभात त्रिपाठी ने कहा कि विश्वरंजन ब्रह्माण्डीय चेतना के कवि हैं। उनका अनुराग जगत बहुस्तरीय है। जीवन और मनुष्यता के प्रति उत्कट लगाव ने उसके कविपन को संजोया, संवारा है। उनकी प्रेम कविता एक एैवीम नहीं है। उन्होंने अपने प्रेमानुभव को मूल्यदृष्टि में तब्दील किया है। डॉ। त्रिपाठी ने हिन्दी कविता पर हो रहे लोक लुभावन वासी बहस पर चिन्ता चाहिर की। उन्होंने उपस्थित पाठकों के समक्ष यह प्रश् उठाया कि कविता में समय किस तरह से रुपांतरित होता है? कवि का समय और दूसरे अनुशासनों में व्यक्त समय का अर्थ समान है अथवा भिन्न? यद्यपि उन्होंने गोष्ठी की बहस को काफी जीवंत माना। अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए राम परिहार ने कहा कि पिछले पचास वर्षों से हिन्दी में छोटा-बड़ा कवि बनाने का खेल चल रहा है। विश्वरंजन की कविता विकल्प प्रस्तुत करती है। विश्वरंजन ने एक संवेदनशील आम भारतीय नागरिक की हैसियत से कविता लिखी है। उन्होंने नये सिरे से शब्द सत्ता की प्रतिष्ठा की है। कार्यक्रम के अंत में आभार प्रदर्शन वरिष्ठ कवि एवं गीतकार मुकुंद कौशल ने किया। कार्यक्रम संचालन वरिष्ठ कवि नासिर अहमद सिकंदर और रजनीश उमरे ने किया।
उक्त अवसर पर किताब के संपादक जयप्रकाश मानस, एच एस ठाकुर, तपेश जैन, रामशरण टंडन आदि कई साहित्यकार एवं पत्रकार उपस्थित थे ।
प्रस्तुत: भागवत प्रसाद

2/07/2009

सृजनगाथा का नया अंक

सृजनगाथा के नये अंक में पढ़िये

कविता
◙ स्मरणीय - मुकुटधर पांडेय, डॉ. केदारनाथ सिंह
◙ कवि - मुमताज, स्व. विनय दुबे, विश्वरंजन, लाल्टू, नरेश अग्रवाल, कृष्णकान्त निलोसे, प्रभा मुजुमदार
◙ प्रवासी कवि - अंजना संधीर
◙ माह का कवि - संजीव बख्शी

भाषांतर
◙ जापानी हाइकू का भावानुवाद - नलिनीकांत
◙ रेत - हरजीत अटवाल -पंजाबी उपन्यास (भाग 15)

छंद
◙ माह के छंदकार - रंजीत भट्टाचार्य
◙ गीत - सुरेश कुमार पंडा, मदन मोहन शर्मा, अशोक शर्मा,
कुँअर बेचैन, शारदा कृष्ण
◙ ग़ज़ल - सजीवन मयंक, राम मेश्राम, चन्द्रसेन विराट, विज्ञान व्रत
◙ दोहे - रामानुज त्रिपाठी
◙ अजयगाथा - दंतेवाड़ा

हस्ताक्षर
◙ डॉ. उदय तिवारी : भाषा वैज्ञानिक - प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन
जब मैं इलाहाबाद में शोध कार्य कर रहा था, उसी अवधि में दिसम्बर 1961 में तिवारी जी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जबलपुर वहाँ के विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष के पद पर हिन्दी विभाग स्थापित करने हेतु चले गए थे। आगरा में नियुक्त होने के बाद वहाँ के कार्यभार के कारण मैं इतना व्यस्त हो गया कि डॉ. तिवारी जी को पत्र न लिख सका। जब मुझे डॉ. तिवारी जी का पत्र मिला जिसमें उन्होंने लिखा कि ``आगरे से तुमने कोई पत्र नहीं भेजा और न ही अपना समाचार ही लिखा तो इसे पढ़कर अपनी गलती का अहसास हुआ।
◙ फक्कड़ कवि थे निराला - कृष्ण कुमार यादव

व्याकरण
◙ एक शब्द - आग - गंगाप्रसाद बरसैंया

विचार-वीथी
◙ लोकतंत्र में राजनेता होना चाहिये - प्रो. महावीर सरन जैन
◙ जनतांत्रिक चेतना : परिवर्तन का द्योतक - नन्दलाल भारती

हिन्दी विश्व
◙ हिंदी पर हमला - रघु ठाकुर

प्रसंग-वश
◙ आतंकवाद और महिलाएँ - डॉ. सुनीता ठाकुर
दूसरों पर आसानी से यकीन न करना, अपनी इज़्ज़त के लिए मर मिटना, परपुरुष की सहायता तो क्या उससे बात तक न करना जैसी बहुत से हिदायतें हम औरतों ने अपने पुरखों से सीखी होती हैं। ये हिदायतें हमें सिर्फ़ अपने परिवार के सदस्यों तक ही सीमित रहकर जीना सिखाती है। इससे अलग तौर तरीक़े अपनाने वाली महिलाओं को क्या-क्या सुनना और झेलना पड़ता है यह हम सभी औरतें, औरत होने के नाते अच्छी तरह से जानती हैं। यही कारण था कि बहुत-सी औरतें अपनी सरज़मीं पर ही मौजूद सहायताओं को नकार कर एक अनजान शहर में भटकने को तैयार हो जाती हैं। एक ज़मीन से उखड़ती हैं और दूसरी पर उपज नहीं पातीं।

मूल्याँकन
◙ नाटककार और रंगमंच - मोहन राकेश
रंगमंच की पूरी प्रयोग-प्रक्रिया में नाटककार केवल एक अभ्यागत, सम्मानित दर्शक या बाहर की इकाई बना रहे, यह स्थिति मुझे स्वीकार्य नहीं लगती। न ही यह कि नाटककार की प्रयोगशीलता उसकी अपनी अलग चारदीवारी तक सीमित रहे और क्रियात्सक रंगमंच की प्रयोगशीलता उससे दूर अपनी अलग चारदीवारी तक । इन दोनों को एक धरातल पर लाने के लिए अपेक्षित है कि नाटककार पूरी रंग-प्रक्रिया का एक अनिवार्य अंग बन सके।
◙ हिंदी साहित्य-पत्र-पत्रिका की प्रांसगिकता - डॉ. वीरेन्द्र यादव

शेष-विशेष
राजनीति....
◙ ओबामा : आशाएँ व चुनौतियाँ - तनवीर जाफ़री
ओबामा के शांति प्रयासों के बावजूद अफ़ग़ान-पाक सीमा पर निरंतर बगड़ते हालात तथा पूरे पाकिस्तान में चरमपंथियों के फैलते प्रभाव ने अमेरिका की चिंताएँ काफ़ी बढ़ा दी हैं। कई प्रमुख अमेरिकी कूटनीतिज्ञों को इस बात का संदेह है कि बावजूद इसके कि 9/11 के बाद अब तक अमेरिका पर कोई चरमपंथी हमला नहीं हुआ है। परन्तु इस बात की प्रबल संभावना है कि चरमपंथियों द्वारा अगले हमले की योजना पाकिस्तान में बनाई जा सकती है।
रिपोर्ताज....
◙ यहाँ होती है सृष्टिकारों की सृष्टि - उमाशंकर मिश्र
शोध....
◙ हिंदी लघुकथा का विकास - डॉ. अंजलि शर्मा
इन दिनों....
◙ वैश्विक प्रयासों से संभव, आतंकवाद से छुटकारा - तनवीर जाफ़री

कहानी
◙ मैंगोलाइट - तरुण भटनागर
ठीक है, ग्लोब में नहीं है । मास्टर कहता कि, एटलस में नहीं है, नहीं है, दुनिया जहान के नक्शों में । नहीं है देश-दुनिया में । चर्चा में भी नहीं है । पेपरों में, रोज़ के रेडियो के समाचार में भी नहीं है । संयुक्त राष्ट्र संघ की सूची में नहीं है, नहीं है, ओलंपिक के झण्डाबरदार खिलाडियों की परेड में । नहीं है, डाक टिकटों में । कि तिब्बत की कोई मुद्रा नहीं, नहीं उसका कोई झण्डा । कहीं नहीं, किसी देश में नहीं तिब्बत का कोई राजदूत, कोई एम्बेसेडर । संसार में कहीं नहीं तिब्बत का कोई दफ्तर.......... ।
◙ हार ले आना ! - योगन्द्र सिंह राठौर
◙ गुजराती कहानी - जूही - लता हिराणी

संस्मरण
◙ परचून की दुकान से - सुरेश पंडा
एक बार ऐसा हुआ कि शुक्ल जी ने सूचना भिजवायी कि बाबा नागार्जुन आये हैं । जूटमिल धर्मशाला में ठहरे हैं। ज़ल्द पहुँचो । हम राधेश्याम गोयल़, श्रीधर आचार्य शील़, मुस्तफा आदि तीन चार लोग पहुँच गये । वहाँ पर शुक्ल जी शर्मा जी आदि बरिष्ठ लोग बाबा नागार्जुन के साथ बैठे चर्चा में मशगुल थे । देश के इतने बरिष्ठ साहित्यकार को सशरीर समक्ष देखकर हम सभी को संकोच हो रहा था । हम सब भी किनारे एक तरफ़ बैठ गये ।

लघुकथा
◙ दूरअंदेश - मोहम्मद कय्युम
◙ मजबूरी - राजमल डांगी
◙ पागल प्रेमी - श्याम कुमार पोकरा


लोक-आलोक
◙ मोहरी - छत्तीसगढ़ की अनमोल धरोहर - आसिफ़ इकबाल
आदि से आधुनिक होने के सफर में मनुष्य के संग-संग वाद्यों में भी अनगिनत परिवर्तन हुए हैं, किन्तु आज भी ऐसे अनेक श्रेष्ठ वाद्य बचे हैं, जिन्हें परिवर्तन का तीव्र प्रवाह भी परिवर्तित नहीं कर पाया है। ऐसे ही वाद्यों को लोकवाद्य की संज्ञा दी जाती है। इनमें छत्तीसगढ़ का दुर्लभ लोकवाद्य ‘मोहरी’ है, जो मांगलिक प्रसंगों पर बजाया जाने वाला पारम्परिक वाद्य है। इस लोकवाद्य को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने में राजनांदगांव जिले के पंचराम देवदास का स्थान अग्रक्रम में बना हुआ है।

व्यंग्य
◙ स्वागतम् ! सुस्वागतम् !! - अशोक गौतम

पुस्तकायन
◙ जाग एक बार - श्री बबन प्रसाद मिश्र
◙ घर-बेघर - कमल कुमार
◙ स्त्री संशब्द : विवेक और विभ्रम-कमल कुमार व मुक्ता

ग्रंथालय में (ऑनलाइन किताबें)
◙ लौटते हुए परिंदे(कहानी संग्रह) - सुरेश तिवारी
◙ इंद्रधनुष (कविता संग्रह) - डॉ. महेन्द्र भटनागर
◙ प्रिय कविताएँ (कविता संग्रह) - भगत सिंह सोनी

हलचल
(देश विदेश की सांस्कृतिक खबरें)
◙ 'लेखक और प्रतिबध्दता' और 'मॉस्को की डायरी' का विमोचन
◙ पुस्तक संकट में नहीं है
◙ साहित्यकार संदर्भ कोश का प्रकाशन
◙ महेन्द्र कपूर को गान सम्राज्ञी लता मंगेशकर पुरस्कार
◙ जनवादी नाटककार राजेश कुमार को मोहन राकेश सम्मान
◙ प्रख्यात कवि डा. केदारनाथ सिंह को भारत-भारती
◙ हिन्दी के प्रचार-प्रसार में मीडिया की भूमिका पर संगोष्ठी

12/12/2008

अ.भा. पुरस्कारों हेतु रचनाकारों की प्रविष्टियाँ आमंत्रित

छत्तीसगढ राज्य की बहुआयामी सांस्कृतिक संस्था “सृजन-सम्मान ” की प्रादेशिक कार्यालय द्वारा साहित्य, संस्कृति, भाषा एवं शिक्षा की विभिन्न 28 विधाओं में प्रतिष्ठित रचनाकारों को पिछले 7 वर्षों से प्रतिवर्ष दिये जाने वाले सम्मान हेतु प्रविष्टियाँ आमंत्रित की गई हैं । प्रविष्टि भेजने की अंतिम तिथि 15 फरवरी 2008 है।

छत्तीसगढ राज्य के गौरव पुरुषों की स्मृति में दिये जाने वाले यह सम्मान प्रतिवर्ष आयोजित 2 दिवसीय अखिल भारतीय साहित्य महोत्सव में प्रदान किये जाते हैं । संस्था द्वारा सम्मान स्वरुप रचनाकारों को 21, 11, 5, हजार नगद, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह, शॉल, श्रीफल एवं 500 रुपयों की कृतियाँ प्रदान की जाती हैं ।

पुरस्कारों का विवरण निम्नानुसार है –
01. हिंदी गौरव सम्मान – हिंदी वेबसाइट संपादक/ब्लॉगर
02. पद्मश्री मुकुटधर पांडेय सम्मान – लघुपत्रिका संपादक
03. पद्मभूषण झावरमल्ल शर्मा सम्मान – पत्रकारिता हेतु समर्पित
04. महाराज चक्रधर सम्मान – ललित निबंध
05. मंहत बिसाहू दास सम्मान – कबीर साहित्य
06. पं. गोपाल मिश्र सम्मान- कविता
07. नारायण लाल परमार सम्मान - नवगीत/ गीत/ बालसाहित्य
08. डॉ.बल्देव प्रसाद मिश्र सम्मान - कहानी
09. माधव राव सप्रे सम्मान – लघुकथा
10. दादा अवधूत सम्मान – शैक्षिक लेखन
11. प्रमोद वर्मा सम्मान - हिंदी आलोचना
12. रामचंद्र देशमुख सम्मान – लोक लेखन/ प्रस्तुति
13. प्रवासी सम्मान - विदेश में रहकर हिन्दी सेवा
14. समरथ गंवईहा सम्मान – व्यंग्य लेखन
15. विश्वम्भर नाथ सम्मान – छांदस विधा
16. मावजी चावडा सम्मान – बाल साहित्य/समीक्षा/ शोध/पत्रकारिता
17. मुस्तफा हुसैन सम्मान – ग़ज़ल लेखन
18. राजकुमारी पटनायक सम्मान - भाषा एवं लोकभाषा के विशेषज्ञ
19. हरि ठाकुर सम्मान- समग्र व्यक्तित्व एवं कृतित्व
20. अनुवाद सम्मान- अनुवाद के क्षेत्र में विशेष - कार्य
21. अहिन्दीभाषी सम्मान – ग़ैरहिंदी भाषी द्वारा हिंदी सेवा
22. प्रथम कृति सम्मान – पहली प्रकाशित कृति
23. कृति सम्मान - प्रकाशित पांडुलिपि
24. महेश तिवारी सम्मान – वैचारिक लेखन
25. सृजनश्री – प्रकाशित कृति

नियमः-
१.प्रथम कृति सम्मान के अंतर्गत चयनित अप्रकाशित पांडुलिपि को प्रकाशित कर 100 प्रतियाँ रचनाकार को प्रदान की जायेगी । इसमें इस वर्ष आलोचना/समीक्षा विधा पर ही विचार किया जायेगा ।

२-कृति सम्मान हेतु किसी वरिष्ठ रचनाकार की प्रकाशित या अप्रकाशित किन्तु अत्यंत महत्वपूर्ण पांडुलिपि को चयनोपरांत प्रकाशित की जायेगी, जिसकी 100 प्रतियाँ रचनाकार को प्रदान की जायेगी। इसमें इस वर्ष आलोचना विधा पर ही विचार किया जायेगा ।

३-हिन्दी गौरव सम्मान हेतु अपने बेबसाईट या ब्लाग का विस्तृत विवरण, तकनीकी पक्ष, प्रबंधन, पता, ई-मेल आदि हमारे पते पर भेजना होगा ।

४- प्रविष्टि में रचनाकार स्वयं या अनुशंसा करने वाले को रचनाकार का बायोडाटा, 1 छायाचित्र, कृति की दो प्रतियाँ अनिवार्यतः भेजनी होगी ।

5-प्रविष्टि वाले डाक में सम्मान का नाम एवं वर्ष – 2008 लिखा होना अपेक्षित रहेगा ।
६- उच्च स्तरीय चयन मंडल का निर्णय सर्वमान्य होगा ।

प्रविष्टि हेतु संपर्कः-
जयप्रकाश मानस
संयोजक, चयन समिति,
सृजन – सम्मान,
छत्तीसगढ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय परिसर,
पेंशनवाडा, रायपुर, छत्तीसगढ, पिन-492001,
मोबाइल नं. 94241-82664
ई-मेल – srijan2samman@gmail.com

11/29/2008

इधर देश है

इधर
दहशतगर्दी थे ही नहीं
फिर भी उभर रहे थे जगह-जगह खूनी पंजे
इधर
न गोली चल रही थी न ग्रेनेड
फिर भी हताहत हो रहे थे लोग
इधर
ख़ौफ़ का कोई भी संकेत नहीं था
फिर भी सारे लोग सकते में थे

इधर
सबकुछ था शांत निःस्तब्ध
फिर भी सभी तैयार हो रहे थे युद्ध के लिए

उधर मुंबई है
इधर देश है

11/28/2008

मुंबई : दो कविताएँ

देखते ही देखते

पानी के रास्ते से छिपते-छिपाते आया हुआ आंतक
मिट जायेगा बुलबुले की तरह
बारुदी गंध की बंधक हवा को
चीरते हुए लौट आयेंगे पंछी ठीहे में
खैनी की तरह दबा देगा सारे ख़ौफ़
वह पानपुरी वाला
गलियों में बेहिचक गेंद उछालेंगे छोटे-छोटे सचिन
ख़ुशनुमा तासीर वाली मुंबई
भूला जायेगी सबकुछ एक दुःस्वप्न की तरह
सब कुछ अपने होने के अंदाज़ में
होंगे सही सलामत फिर से
देखते-ही-देखते
पहले की तरह

पहले की तरह
कुछ नहीं होंगे तो सिर्फ वे ही
जो सबको बचाते हुए चले गये थे
हर बार की तरह
देखते-ही-देखते
0000


देवता


जिन्हें बेमौत मारा गया
सारे-के-सारे इंसान थे

जो बेमुरव्वत मार रहे थे
वे भी इंसान हो सकते थे

सिर्फ़ मरने-मारने की नहीं
बात उसकी हो रही है
जोमरने-मारने वालों को बचाने के लिए मर रहा था
बात उसकी नहीं हो रही
कि मरने-मारने वालों से कौन जन्नत पायेगा
बात सिर्फ उसकी ही हो रही है
जो बचे हुए लोगों को जन्नत सौंपकर
रूख़सत हुए हैं
बिलकुल अभी-अभी


बात देवता की हो रही है ।

11/26/2008

दिनकर की उपेक्षा देशहित में नहीं



अभी-अभी समाचार मिला है कि हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जन्मशती मनाने के लिए राष्ट्रीय समिति गठित करने की माँग ठुकरा दी है। बाकायदा प्रधानमंत्री कार्यालय ने संस्कृति मंत्रालय को इसकी लिखित जानकारी भी भिजवा दी है । जबकि इसके पहले प्रधानमंत्री ने संस्कृति मंत्री अंबिका सोनी से व्यक्तिगत तौर पर दिनकर की जन्मशती मनाने के प्रसंग में विचार-विमर्श भी किया था। अब प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने दिनकर के लिए राष्ट्रीय समिति गठित करने का प्रस्ताव मंजूर नहीं किया।



उल्लेखनीय है कि कई साहित्यिक और सामाजिक संस्थाओं सहित सांसदों ने भी राष्ट्रकवि की जन्मशती राष्ट्रीय स्तर पर मनाने के लिए प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय समिति गठित करने का मुद्दा उठाया था । इस क्रम में पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में सांसदों को भी गिनाया जा सकता है जिन्होंने प्रतिनिधिमंडल के रूप में प्रधानमंत्री से मुलाकात कर यह मांग की थी। सूचना के अनुसार इसी विषय पर जद-यू के पूर्व सांसद वशिष्ठ नारायण सिंह के आवास पर एक बैठक भी हुई थी । संस्कृति मंत्रालय किसी महापुरुष की जन्मशती उनकी सौवीं जयंती के बाद ही मनाता है। ज्ञातव्य हो कि दिनकर की सौवीं जयंती गत 23 सितंबर को थी।
रामधारी सिंह दिनकर हिन्दी के एक प्रमुख लेखक थे। राष्ट्र कवि दिनकर आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं। बिहार प्रांत के बेगुसराय का सिमरिया घाट कवि दिनकर की जन्मस्थली है। इन्होंने इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई पटना विश्वविद्यालय से की। साहित्य के रूप में इन्होंने संस्कृत, बंग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था।

रामधारी सिंह दिनकर स्वतंत्रता पूर्व के विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रकवि के नाम से जाने जाते रहे। वे छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे। एक ओर उनकी कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रांति की पुकार है, तो दूसरी ओर कोमल श्रृँगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है। इन्हीं दो प्रवृत्तियों का चरम उत्कर्ष हमें कुरूक्षेत्र और उवर्शी में मिलता है।

दिनकर 1952 में राज्यसभा के मनोनीत सदस्य थे और 1959 में उन्हें पद्मभूषण मिला था। उन्हें संस्कृति के चार अध्याय पुस्तक पर साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला था, जिसकी भूमिका पंडित जवाहर लाल नेहरू ने लिखी थी। उन्हें ऊर्वशी पर ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला था।



पटना विश्वविद्यालय से बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे एक विद्यालय में अध्यापक हो गए। १९३४ से १९४७ तक बिहार सरकार की सेवा में सब-रजिस्टार और प्रचार विभाग के उपिनदेशक पदों पर कार्य किया। १९५० से 1९५२ तक मुजफ्फरपुर कालेज में हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे, भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति के पद पर कार्य किया और इसके बाद भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार बने। उन्हें पदमविभूषण की से भी अलंकृत किया गया। पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय के लिये आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा उर्वशी के लिये भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कर प्रदान किये गए। अपनी लेखनी के माध्यम से वह सदा अमर रहेंगे।



उनकी प्रमुख कृतियाँ है - गद्य रचनाएं - मिट्टी की ओर, रेती के फूल, वेणुवन, साहित्यमुखी, काव्य की भूमिका, प्रसाद पंत और मैथिलीशरणगुप्त, संस्कृति के चार अध्याय। पद्य रचनाओं में रेणुका, हुंकार, रसवंती, कुरूक्षेत्र, रश्मिरथी , परशुराम की प्रतिज्ञा, उर्वशी, हारे को हरिनाम आदि महत्वपूर्ण कृतियों के रूप में समादृत होती रही हैं ।

प्रमुख आलोचक एवं साहित्य अकादमी के वरिष्ट सदस्य श्री विश्वनाथ प्रसाद तिवारी एवं गिरीश पंकज ने बताते है कि साहित्य अकादमी ने अगले वर्ष फरवरी के प्रथम सप्ताह में दिनकर पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी करने का निर्णय लिया है। साहित्य अकादमी दिनकर के जीवन एवं कृतित्व पर एक वृत्तचित्र का निर्माण भी कर रही है। पिछले दिनों उसने दिनकर संचयन प्रकाशित किया है। यह अलग बात है । किसी राष्ट्रकवि की जन्मशती वर्ष नहीं मनाना समझ से परे है । वह भी ऐसी परिस्थितियों में जब चारों और आंतकवाद पाँव पसार रहा है । राष्ट्रीयता की भावना लगातार कम होती जा रही है । साहित्य और संस्कृति को तिलाजंलि देकर आम भारतीय स्वार्थ के अंधकूप में स्वयं को डालता जा रहा है । राष्ट्र, राष्ट्रीयता और देशप्रेम को स्वार्थ के आगे नतमस्तक होना पड़ रहा है एक यही तो क्षेत्र बचता है कि पुरखों की याद कर फिर से देशवासी को स्मरण कराया जाय कि यह दिनकर का देश है, भूषण का देश है, सेनापति का देश है, अब्दूल रहीम खानखाना का देश है जो युद्ध क्षेत्र में भी जाते थे और अपनी ओजस्वी कविता से मन प्राण को भी जीवंत बनाये रखते थे । यदि ऐसे कवियों को किसी दल या किसी राजनीति के कारण उपेक्षित किया जाय तो यह गंभीर दिशा का परिचायक ही है । राजनीति कम से कम साहित्यकारों, कलाकारों के नाम पर नहीं होना चाहिए । राष्ट्रभक्ति सिर्फ़ भाजपा का विषय नहीं । वह केवल कांग्रेस का विषय नहीं । न ही मार्क्सवादियों का । उसे सभी का विषय बनाया जाना चाहिए । उसे समस्त जनता और उसकी मनीषा के अनुरूप विचार किया जाना चाहिए । यह दीगर बात है कि ऐसी जयंतियों, समारोहों के पीछे सिर्फ़ दिल्ली या बड़ी राजधानियों के दलाल किस्म के साहित्यकार या उनके गुर्गे ही अधिक सक्रिय रहते रहे हों, पर उसे वास्तविक रूप से गाँव गलियों के जनता तक पहुँचाने केलिए ऐसे आयोजनों पर ज़रूर विचार किया जाना चाहिए । एक प्रधानमंत्री से वह भी अधिक ईमानदार और तटस्थ व्यक्ति से ऐसी आशा तो की ही जा सकती है ।

बहरहाल हम अपने प्रधानमंत्री से सिर्फ़ गुजारिश ही तो कर सकते हैं । मानना न मानना तो उनके वश की बात है । उनकी इच्छा वे ही जाने । पर एक साहित्यकार के नाते तो हम ऐसी हरकतों का विरोध करना चाहते हैं दिनकर की पंक्तियों को ही याद करते हुए –
सच है सत्ता सिमट-सिमटजिनके हाथों में आयी,


शान्तिभक्त वे साधु पुरुषक्यों चाहें कभी लड़ाई ?
सुख का सम्यक-रूप विभाजन
जहाँ नीति से, नय से
संभव नहीं; अशान्ति दबी हो
जहाँ खड्ग के भय से,
जहाँ पालते हों अनीति-पद्धतिको सत्ताधारी,


जहाँ सूत्रधर हों समाज केअन्यायी, अविचारी;
नीतियुक्त प्रस्ताव सन्धि के
जहाँ न आदर पायें;
जहाँ सत्य कहने वालों के
सीस उतारे जायें;
जहाँ खड्ग-बल एकमात्रआधार बने शासन का;


दबे क्रोध से भभक रहा हो


हृदय जहाँ जन-जन का;
सहते-सहते अनय जहाँ
मर रहा मनुज का मन हो;
समझ कापुरुष अपने को
धिक्कार रहा जन-जन हो;
जयप्रकाश मानस

10/14/2008

प्रमोद वर्मा पर केंद्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय आयोजन

1800 पृष्ठीय प्रमोद वर्मा समग्र का प्रकाशन
श्रेष्ठ आलोचक को प्रतिवर्ष सम्मान

रायपुर । हिंदी के प्रखर आलोचक और कवि प्रमोद वर्मा पर अभिकेंद्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय आयोजन आगामी फरवरी-मार्च माह में किया जायेगा, जिसमें देश के प्रमुख आलोचकों, संपादकों, साहित्यकारों के अलावा विदेश के साहित्यकारों को आमंत्रित किया जा रहा है । यह महती आयोजन छत्तीसगढ़ के बहुमुखी प्रतिभा के धनी एवं राष्ट्रीय स्तर पर राज्य का नाम उजागर करने वाले विभूतियों की स्मृति को चिरस्थायी बनाने की दिशा में सतत् क्रियाशील एवं राज्य की बहुआयामी सांस्कृतिक संस्था सृजन-सम्मान की राज्य इकाई और नव गठित प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के बैनर तले किया जायेगा । उक्त अवसर पर प्रमोद वर्मा समग्र साहित्य एवं उन पर केंद्रित ग्रंथ का विमोचन भी किया जायेगा। इसके अलावा उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए देश के एक वरिष्ठ कवि आलोचक को प्रतिवर्ष दिये जाने वाला प्रमोद वर्मा स्मृति राष्ट्रीय सम्मान भी प्रारंभ किया जा रहा है ।

प्रमोद वर्मा समग्र का संपादन उनके मित्र और वरिष्ठ कवि श्री विश्वरंजन कर रहे हैं । इस संकलन में श्री प्रमोद वर्मा द्वारा लिखित सभी 17 काव्य संग्रह, निबंध, आलोचना, मोनोग्राफ, यात्रा-संस्मरण, डायरी, नाटक सहित अप्रकाशित कृतियों का प्रकाशन भी किया जा रहा है । इसमें साहित्य रूप और सृजन-प्रक्रिया के संदर्भ, अँगरेज़ी की स्वच्छंद कविता, रोमान की वापसी, हलफ़नामा, कविता दोस्तों में बुलाने से नहीं आती नदी, मुक्तिबोध पर मोनोग्राफ़, कल और आज के बीच, लंबा मारग दूरी घर, कदाचित् संदर्शन प्रकाशित संग्रह हैं और यूरोप प्रवास पर एक डायरी, सामारुमा एवं अन्य कविता, समालोचना तथा नाटक की एक-एक अप्रकाशित कृतियाँ समादृत की जा रही हैं । यह समग्र कुल 1800 पृष्ठों का होगा जिसमें 2 खंड होंगे। इसमें उनकी 4 अप्रकाशित पांडुलिपियाँ भी सम्मिलित हैं जिसे उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कल्याणी वर्मा सौजन्यवश उपलब्ध करा रही हैं । इसके अलावा स्व। प्रमोद वर्मा पर केंद्रित एक किताब भी 'न होना प्रमोद वर्मा का' के नाम से से प्रकाशित की जा रही है । इसका संपादन युवा साहित्यकार जयप्रकाश मानस एवं सुरेन्द्र वर्मा कर रहे हैं । इस कृति में श्री वर्मा जी के समकालीन रचनाकारों के मध्य हुए पत्राचारों, उन्हें लेकर रचनाकारों के संस्मरणों, आलोचनात्मक लेखों, फ़ोटोग्राफ आदि समादृत की जा रही है ।

सृजन-सम्मान के महासचिव राम पटवा द्वारा जारी विज्ञप्ति में रचनाकारों से आग्रह किया गया है कि श्री प्रमोद वर्मा से जुड़े संस्मरण, तस्वीरें, आलोचनात्मक लेख आदि जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान, एफ-3, छग माध्यमिक शिक्षा आवासीय कॉलोनी, पेंशनवाड़ा, रायपुर के पते पर भेज सकते हैं ।

7/12/2008

समकालीन साहित्य सम्मेलन का 30 वाँ अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन दुबई में

मुंबई । समकालीन साहित्य सम्मेलन का 30 वाँ अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन संयुक्त राज्य अमीरात के दुबई में होने जा रहा है । मुख्य सम्मेलन 29 जुलाई से 3 अगस्त 2008 तक होगा । ज्ञातव्य हो कि इस संगठन का गठनम धर्मयुग के पूर्व उप संपादक और वरिष्ठ रचनाकार श्री महेन्द्र कार्तिकेय ने किया था । विगत सम्मेलन ब्रिटेन में किया गया था जिसमें अनेक देशों के शताधिक रचनाकारों ने अपना हस्तेक्षेप किया था ।

इस सम्मेलन में विश्व भर के 200 से अधिक अधिक साहित्यकार, हिंदी सेवी, प्रचारक और शिक्षाविद् सम्मिलित हो रहे हैं । सम्मेलन में कई विषयों पर संगोष्ठी होगी जिसमें 1. हिंदी भाषा का साहित्य का अतंरराष्ट्रीय परिदृश्य 2. हिंदी काव्य एवं साहित्य में नारीवाद (उपन्यास एवं कहानी के संदर्भ में) 3. हिंदी उपन्यास में यथार्थ प्रमुख सत्र हैं । इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय काव्यपाठ का आयोजन भी इस दरमियान किया जा रहा है।

समकालीन साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद श्री रत्नाकर पांडेय तथा सचिव श्री वैभव कार्तिकेय ने अपनी विज्ञप्ति में बताया है कि इस आयोजन में विश्व भर के हिंदी रचनाकारों को एक दूसरे की रचनाशीलता को समझने और परखने का भी मौक़ा मिलेगा । यह सम्मेलन दुबई में होगा । इसके अलावा हिंदी संस्कृति से जुड़े रचनाकार सद्भाव यात्रा में शरजाह, आबुधाबी, रसलखेमा और रेगिस्तान इलाकों में अपनी दस्तक देंगे । इसमें अभी तक 20 से अधिक देशों के साहित्यकारों ने अपनी सहभागिता सुनिश्चित की है ।

इस सम्मेलन में भारत के 16 राज्यों के साहित्यकारों के साथ छत्तीसगढ़ से जयप्रकाश मानस, डॉ. सुधीर शर्मा, डॉ. जे.आर.सोनी, डॉ. राजेन्द्र सोनी, एच.एस. ठाकुर, सुरेश तिवारी, संजीव ठाकुर, सत्यदेव शर्मा, आर. साहू, रामशरण टंडन, टामन लाल सोनवानी आदि साहित्यकार भाग ले रहे हैं ।

संगोष्ठी में प्रतिभागिता व विस्तृत जानकारी के लिए जयप्रकाश मानस संपादक, सृजन गाथा, एफ-3, माध्यमिक शिक्षा मंडल, पेंशनवाडा, विवेकानंद नगर, रायपुर, छत्तीसगढ़ से संपर्क कर सकते हैं ।

(वैभव कार्तिकेय, मुंबई की रपट)

7/11/2008

ये हैं बस्तर के गांधी


हमें कवर्धा से रमला देहारी का यह लेख मिला है, उसे हम बिना किसी काट-छांट के यहां छाप रहे हैं । देहारी शिक्षक हैं और आदिवासी के लिए कुछ खास अध्ययन से जुड़े हैं । वे मूलतः दंतेवाड़ा ज़िले के निवासी हैं । - संपादक

मैं दंतेवाड़ा जिले में दंतेश्वरी मंदिर में विराजनेवाली लोकदेवी दंतेश्वरी और वहाँ के आदिवासियों के बारे में सबकुछ जानते हुए भी वैसे नहीं जानता जिसे मैं व्यक्तिवाचक संज्ञा में जान सकूँ । हो सकता है कि यह मेरी कमज़ोरी ही कहलायेगी कि मैं बस्तर के किसी गांधीवादी हिमांशु कुमार को नहीं जानता । यह कैसे संभव है कि मैं हर गांधीवादी को जान भी लूँ । पर जिस तरह से मैं कथित गांधीवादी हिमांशु कुमार को अब जान पाया हूँ उससे कह सकता हूँ और समझ सकता हूँ कि क्योंकर गांधीवाद पर आज की पीढ़ी विश्वास नहीं करती ।

मैं कोई पहेली नहीं बुझा रहा । सीधे मुख्य बात की ओर आपको ला रहा हूँ । मैंने बहुत पहले एक लेख पढ़ा था । कभी-कभी मैं इंटरनेट पर प्रकाशित होने वाले ब्लॉग लेखों को पढ़ लेता हूँ । उस लेख का शीर्षक था - ................ और जहाँ तक मुझे याद है, उसके लेखक थे विश्वरंजन । राज्य के पुलिस महानिदेशक और पुलिस महानिदेशक ।


चाहें तो आप भी उसे पढ़ सकते हैं – यह रहा उसका पता (लिंक)


यदि आप उस लेख को पढ़ चुके हों तो आप भी सहमत होंगे कि उस लेख में कहीं भी किसी हिंमांशु कुमार का ज़िक्र नहीं हुआ है । न इशारों में, न बिम्बों में । नामधारी तो प्रश्न ही नहीं उठता । मुझे इस लेख से सुखद आश्चर्य हुआ कि राज्य के पुलिस महानिदेशक के रूप में हमने एक ऐसे विचारक को भी पा लिया है जो राज्य की इज्जत और आदिवासी अस्मिता को भली भाँति पहचानता है और इतना ही नहीं वह प्रजातंत्र के लिए उस तरह से वैचारिक कक्षों में भी पूरी तरह सक्रिय और कटिबद्ध है जितना इस दौर के माओवादी यानी कि अराजक तत्व जो सशस्त्र क्रांति की ज़िद पर दीन आदिवासियों को ही अपनी हिंसा का शिकार कर रहे हैं । इससे पहले हम किसी भी पुलिस अधिकारी की ओर से अपने पक्ष मे वैचारिक फ़ोरमों पर लड़ते हुए नहीं देख पाये । यह पूर्व मध्यप्रदेश के ज़माने की बात न हो तो न हो, पर नये राज्य छत्तीसगढ़ में तो उन्हें इस रूप में अपने हितैषी के रूप में उन्हें मैं आदिवासी होने के नाते नमन करता हूँ जो हमारी वेदना को स्वर दे रहे हैं । हमारे दर्द की दरख़्वास्त स्वयं लिख रहे हैं । इससे पहले हमने पुलिस के अधिकारियों को माँ-बहन की गाली देते अधिक, गुलछर्रे उड़ाते अधिक और व्यवस्था के नाम पर चिंतित कम ही देखा है । और शायद यही कारण हो सकता है कि कार्यपालिका के पंगु, भ्रष्ट और कामचोर हो जाने के कारण ही हम आदिवासियों को शोषण और अपनी मूर्खता का शिकार होना पड़ा । ख़ैर... मेरा उद्देश्य यहाँ विश्वरंजन की भाटगिरी नही है पर मेरी नैतिकता की ओर से तकाज़ा था कि मै एक आदिवासी और पढ़ा लिखा आदिवासी होने के कारण जो महसूसता हूँ उसे ज़रूर लिखूँ । सो लिख रहा हूँ । मैं नहीं जानता कि कितने ऐसे लोग हैं जो मेरी अभिव्यक्ति को वास्तविक मानें । क्योंकि सारी दुनिया हमे अनपढ़, ज्ञानहीन, पिछड़ा, पंरपरावादी और जंगली घोषित करने पर तुला हुआ है । और इस समय भी जबकि हम इक्कीसवीं सदी मे पहुँच चुके हैं और उसकी तब्दीली की आँच को धीरे-धीरे महसूस रहे भी हैं ।


बहरहाल मुख्य विषय पर आता हूँ । दंतेवाड़ा सहित बस्तर और अबुझमाड के बहुत सारे एनजीओ के बारे में सामान्य जानकारी रखता हूँ । मेरे बचपन के मित्र भी वहाँ रहते हैं । मैं तो फिलहाल इन दिनों कवर्धा में रहता हूँ और मास्टरी करता हूँ । मेरा नाम गोवर्धन दिहारी है । मेरा जन्म भी दंतेवाड़ा में हुआ है और बचपन भी वहीं गुज़रा है । मैं पिछले कई वर्षों के समय को जानता हूँ कि कैसे सरकारी लोगों के साथ-साथ एनजीओ के फर्जी दुकानकारों ने अपने स्वार्थ के लिए हम आदिवासियों को लूटा और और वह संकट आज भी जारी है ।

पिछले दिनों मैं रायपुर होते हुए जगदपुर से कवर्धा लौट रहा था । रेल्वे स्टेशन पर बैठे-बैठे भूख लगी तो सोचा कुछ खा पीलूँ । एक छोटे से होटल मे मैने भजिया खरीदी । अचानक मुझे भजिया खरीदते समय एक पीले रंग के अखबार, (जो मुझे लपेट कर भजिया दिया गया था) मैं मेरे पड़ोसी जिले के किसी हिमांशु कुमार का नाम दिखा और मुख्य शीर्षक – वनवासी चेतना आश्रम का पत्र डीजीपी के नाम । (आप चाहें तो उसे पढ़ सकते हैं । मैंने उसे कवर्धा के एक कैफे वाले से स्कैनिंग करवा के यहाँ सबूत के लिए रखा है)

मैंने पहले डीजीपी का एकमात्र लेख पढ़ा था । मुझे तत्काल सदर्भ समझने में कोई दिक्कत नहीं हुई । सो मेरी जिज्ञासा एकाएक बढ़ गई । सोचा कुछ होगा । वह भी मेरे अपने क्षेत्र के बार में है तो क्यों न उसे सहेज के रख लिया जाय । मैं भजिया को खाते समय प्रयास करता रहा कि वह पेपर कहीं से भी अपठनीय न बन जाये । मैं उसे समेट के रख लिया ।

मैं तो पढ़ ही चुका हूँ । आप पढ़ चुके हों तो बतायें कि डीजीपी साहब के इस लेख मे कहाँ लिखा है कि हिमांशु कुमार ऐसा करते हैं, वैसा करते हैं । जब मेरी समझ में नही आयी तो मैं अपने हायर सेकेंडरी के प्रिंसिपल साहब से राय लेना उचित समझा जो हिंदी और राजनीति विज्ञान में अर्थात् दो-दो विषय में एमए हैं । कि सर इस दोनों लेखों को पढ़कर बताये कि कौन वास्तव में बुरा है ? कुछ और भी व्याख्याता भी जुड़ गये मेरी इस उलझन में ।

हम सब लोगों ने जो अंति राय बनायी । इसमे यदि मैं केवल अपनी व्यक्तिगत बात कहूँ तो भी ऐसे हिमांशु कुमार जैसे कथित गांधीवादियों ने ही बस्तर को बेचने और माओवादियों जिसे दुनिया नक्सली या नक्सलवादी कहती है के लिए पोस्टआफिस का काम किया है । ये लोग भी कम दुनियादार नही है जिनका केवल उद्देश्य दिखावा और भीतर से पैसा कमाना है ।

मैंने पत्र लिखकर दंतेवाड़ा के कई लोगों से पूछा कि क्या कोई हिमांशु कुमार नामक कोई व्यक्ति है जो गांधी का गुण गाता है ?

मैं अब इस संकट मैं तो खुद को नहीं फँसा सकता । इसलिए सभी मित्रों का नाम नहीं ले सकता । पर जो मुझे वहाँ से जानकारी मिली है उसे यहाँ रखने में कोई गड़बड़ी नहीं है । मुझे मिली जानकारी अनुसार-

“ हिमांशु नामक व्यक्ति के बारे मे सबकुछ हम नहीं जानते । उसका सब कुछ ऐसा नही है कि आर-पार देखा जा सके । गांधीवादी होता यदि वह, तो उसके बारे में सबकुछ हम जान सकते हैं । वह कब आया – हमे ठीक-ठीक तिथि नही पता । वह जब दंतेवाड़ा आया तो वैसा नहीं था, जैसा आज है । पहले वह कम दाम का कपड़ा पहनता था । उसके पास कोई साईकिल भी नहीं थी । पर अब वह सुनते हैं हवाई जहाज में देश विदेश बुलाया जाता है । उसके जूते भी अब महँगे हैं । एक सयाने पिता का यह भी कहना है कि पहले वह सिर्फ हिंदी जानता था अब कुछ स्थानीय बातों को भी जान चुका है । पहले वह एक घर के लिए कई लोगों के सामने गिड़गिड़ाता रहा। भोले आदिवासियों में से कई लोग उसे अपनी सुविधा अनुसार कुछ जगह देने के लिए तैयार हो गये थे । अब जो भी गैर भारतीय आते हैं उससे ही मिलते हैं । वही वहीं ले जाता है जहाँ हम भी जाने से डरते हैं । हमारे मन में यही प्रश्न उठता है कि यह क्या जादू जानता है, भगवान जाने । पर हमे इससे कोई दिक्कत नहीं । पर हम इसे व्यक्ति पर पूर्ण निर्भर नहीं है । हम इतना तो जानते हैं कि ऐसे लोंगों को सरकार भी पैसा देती है कि वे हमारे बीच रहें । ”
एक मित्र का पत्र में लिखा है कि – यह हिमांशु का एक बार एक व्यक्ति से झगड़ा भी हो चुका है । और कई आदिवासी लोग उसके बारे में बहुत अच्छा नही सोचते । वह जो करता है उससे हमे लाभ हो रहा है पर वह कई बार दादाओं (नक्सलियों का स्थानीय संबोधन) के एरिया में क्यों चला जाता है – खास कर तब जब दिल्ली, विदेश के लोग आते हैं तो – क्या वही उनसे मिलाने के लिए नियुक्त किया गया है ? हम उसका तो बिगाड़ नहीं सकते । न ही उसका बिगाड़ना हमारा उद्देश्य । पर उसके पत्नी और रिश्तेदारों के रहन सहन के बारे मे जो जानकारी मिली है उससे हम कह सकते हैं कि वह गांधी के नाम पर केवल संस्था चलाता है । गांधी जैसा है या नहीं ।

जो जानकारी मिली है उसके अनुसार किसकी हिमांशु कुमार नामक व्यक्ति ने किसी आदिवासी के नक्सलवादियों के हाथों मारे जाने या सताये जाने पर कभी भी पेपर में बयान नहीं दिया है न ही हम आदिवासियों की मीटिंग लिया है न ही हम लोगो को उनके विरूद्द लड़ने के लिए बात किया है । वैसे भी हम उनकी ताकत तो जानते हैं ही हैं । हम यहाँ ऐसा नही कहना चाहते हैं कि वह गांधी जैसा नहीं रहता पर वह जाने क्यों वह हम गरीब जैसा न रहता है न खाता पीता है । वह जो भी करता है देश और विदेश के पैसों सो करता है । हम कैसे उस पर विश्वास करें कि वह हमारे लिए ही आया है ।
जहाँ तक किसी हिमांशु के बारे में हम जितना जानते हैं वह कभी दिल्ली के किसी बड़े नेता का अपने को खास बताता है । गांधी राम या ईश्वर या कि आम आदमी के अलावा स्वय को खास नही बताते थे ।
गांधी उपवास करके लोगों को झुका देते थे । हमने कभी नहीं देखा और नहीं सुना वे दादाओं को समझाने के लिए उपवास रखे हैं । गांधी हिंसा का जवाब अहिंसा से देते हैं । यहाँ वाले हिमांशु जिसके बारे में हम जानते हैं वे हर दिक्कत पर हम आदिवासियों को कोर्ट कचहरी और कानून के लिए जाने की बात करते हैं । कभी नही कहते कि हम अपनी बात को अपनी गुड़ी में ही सुलझायें । गांधी पंचायती राज पर विश्वास करते थे ।
राजनेताओं से कैसे संबंध हैं उनके के जवाब में मेरे परिचितों का कहना है कि राजनेताओं के बारे में हम कम जानते हैं । तो उनके बारे में कैसे जाने कि वे किधर के हैं ?

क्या उस पर विश्वास किया जा सकता है ? के जवाब में कहा गया है कि जो हमारे जैसा नहीं रह सकता । जो हमारे जैसे नहीं सोच सकता । जो हमारे जैसे कपड़े नहीं पहन सकता । जो हमारे कुल गोत्र का न हो । जो हमारे कुल देवता की पूजा नही करता । जो जंगल झाड़ी को अपना आवास नहीं समझता वह कैसे हमारा हो सकता है । और कैसे उस पर पूरा विश्वास करें हम । यदि वह सचमुच गांधी जैसा काम करता तो सभी नक्सवादी नही तो कम से कम दो चार नक्सवादी उससे प्रभावित होकर आत्मसमर्पण कर चुके होते । हमारे कुछ पढ़े लिखे मित्र कहते है कि इनकी संस्था के कर्ता धर्ता स्वयं ये और उनकी पत्नी ही हैं । और कोई लोग या आदिवासी भले ही उनकी संस्था में काम करते हैं वह वे कार्यकारिणी या कोषाध्यक्ष या सचिव के रूप मे हैं ही नहीं । इनके सारे बैंक खातों संचालन वे स्वयं करते हैं । गांधी कम से कम ऐसा नहीं करते थे । वे ट्रस्टीशिप के हिमायत थे ।
हाँ उसकी प्रशंसा करनी होगी कि वह दिल्ली का होकर भी यहाँ रहता है । वास्तव में किन अर्थों में रहता है हमने जानने की पूरी कोशिश नही की है । न ऐसा सोचा है ।

यह सब बात जानने के बाद मैं यही कहना चाहता हूँ कि यह कैसा गांधीवादी है जो कहीं भी लड़ने झगड़ने के लिए तैयार बैठा है । मैं नहीं जानता कि विश्वरंजन कितने आदिवासी प्रिय हैं या यह गांधीवादी । पर दोनों लेखों को पढ़ने के बाद मैं कह सकता हूँ कि विश्वरंजन गांधीवाद के नाम पर शोषण करने वालों के खिलाफ हैं । जबकि हिमांशु कुमार स्वयं को गांधीवाद मानकर विश्वरंजन को चिढ़ाना चाहते हैं – यह कह कर कि यदि गांधी होते तो आदिवासियों की तरफ से लड़ रहे होते और आपकी (विश्वरंजन की हिरासत में होते) और आप यानी विश्वरंजन के रूप में ड़ीजीपी उन्हें माओवादी का खिताब दे चुके होते ।
यहाँ यह साफ समझ में आता है कि पुलिस या राज्य को माओवादी से आपत्ति है और यह भी समझ आता है कि माओवाद से हिमांशु को कोई आपत्ति नहीं है । यह कैसे विश्वास किया जा सकता है कि गांधी माओवाद को पंसद करते । यदि आज वह होते । हिमांशु की बात यानी पत्र से साफ यह भी कहा जा सकता कि वे अपने को गांधी का औलाद कहकर एक और गांधीवाद के नाम बस्तर में अपनी निरंतर उपस्थिति की गांरटी भी चाहते हैं और दूसरी और माओवाद के पक्ष में भी वातावरण बनाना चाहते हैं । यह राजनीति हैं । गांधी होते तो सीधे सीधी अहिंसा की बात करते । पर ऐसा करते वक्त वह हिंसक और आंतकवादियों (नक्सलियों की) के आत्म सुधार के लिए प्रार्थना, उपवास करते । हिमांशु यह कब करते हैं हमे नहीं पता ।
हिमांशु के जबरदस्ती लेख से यह भी मुझे लगता है कि माओवाद को सिर्फ पुलिस का दुश्मन समझते हैं - जब वे कहते हैं कि –
1. सलवा जुडूम के कहने से बच्चों के मुंह से कौर छीन लिया है । और बीमार आदिवासियों की दवा बंद कर दी है ।
2. पुलिस आज भी कानून पर ड़ट जाये ... तो माओवादियों को छोड़ जनता आपके पीछे हो लेगी ।
3. गांट घर बैठे ही आयी है ।

यहाँ मेरा कुछ प्रश्न है कथित हिमांशु जी से, जिसे मैं कभी भी नहीं मिला ।
1. सलवा जुड़ूम नहीं था तो बच्चों के मुंह से कौन नहीं छीनता था । और बीमार आदिवासियों की दवा भी बंद नहीं होती थी । इसका मतलब तो यही हुआ कि बस्तर में सब खुशहाल थे और अस्पताल भी काम करते थे । तब कैसे माओवादी वहां आ धमके । कैसे आपने वहाँ पाँव जमाने का विरोध नहीं किया ? आप तो माओवादी यानी हिंसा के विरोधी थे । गांधीवादी थे । यानी अहिंसक भी । आप यह बतायें यह अस्पताल कौन बर्बाद कर रहा है अब । पुलिस या सरकार या नेता या माओवादी ? क्योंकि आप भी तो वहाँ कई साल से वहाँ रह रहे हैं । क्या पुलिस के आने मात्र से ही बस्तर में सब कुछ बिगड़ गया । और माओवादियों के रहने से सब कुछ ठीक ही चल रहा था । यदि ठीक नहीं चल रहा था तो एक गांधीवादी के रूप मे आपने क्या क्या और कब कब ठीक किया । आपने अपने घर से कितना पैसा लगाया । कितना पैसा रूपया लगाया भारत सरकार का या किसी अन्य देश का । आपने क्या कभी माओवादियों की हिंसा का शांतिपूर्ण विरोध किया ? यदि नहीं किया तो आप कैसे प्रजातंत्र के हिमायती है ? यदि नही हैं तो फिर कैसे गांधी का नाम मिट्टी में मिला रहे हैं ? आप यह बताये कि जब आज आदिवासियों के हर सरंक्षकों को एक एक कर और चुन चुनकर माओवादी मौत के घाट उतार रहे हैं तो आपको कैसे वे छोड रहे हैं जबकि आप तो आदिवासी चेतना के लिए पैसा लेकर काम कर रहे हैं । यह कौन सा गांधीवादी रहस्य है ?
2. आपका मतलब यही है कि पुलिस कानून पर नही डटी है ? या नहीं ड़टी थी । तब क्या आप स्वयं चाहते हैं कि बस्तर पुलिस का अड़्ड़ा बन जाये ? आपके कहने का एक मतलब क्या यही तो नही कि जो भी बस्तर की समस्या है उसके पीछे सिर्फ पुलिस की नाकामी नहीं है । यदि ऐसा है तो वही तो पुलिस राज्य के आदेश पर कर रही है । और राज्य ही क्यों आपके केंद्र का भी तो यही इशारा है । आप जब यह कहते हैं कि माओवादी को छोड़कर जनता पुलिस के पीछे ही हो लेगी – तो क्या इसका मतलब यह नहीं है कि आप माओवादियों की उपस्थिति से पूरी तरफ वाकिफ़ है । इसका यह भी मतलब है कि आप माओवाद की उपस्थिति को पुलिस की अनुपस्थिति में वांछित समझते हैं । या विकल्प समझते हैं । यदि ऐसा नही होता तो आपके लेख में माओवादियों के बारे में भी पोल खोला जाता । गांधीवाद के नाम पर उनकी भर्त्सना की जाती जिसे आपने कभी नहीं किया । मैंने बार-बार आपके नाम को इंटरनेट पर सर्च किया तो मुझे यही मिला कि आप सदैव व्यवस्था के विरोध में बोलने के आदि हैं । और ऐसा मैं बीबीसी हिंदी मे प्रसारित समाचारों के प्रमाण पर कह पा रहा हूँ । वहाँ पिछले वर्षों में जो कुछ भी लंदन बीबीसी से बस्तर के बारे में प्रसारित हुआ है उसमें आपका संदर्भ अधिक है जैसे आपके अलावा दंतेवाड़ा का कोई भी अन्य हितचिंतक था ही नहीं या है ही नहीं । और हितचिंतक ही क्यों मीडिया कर्मी या समाजसेवी भी । बाकी कलेक्टर, बीड़ीओ, आदिवासी नेता, समाजसेवी जायें भाड़ में । क्या आप बताना चाहेंगे कि यह कैसे संभव होता है कि बीबीसी जैसी संस्था केवल आपको ही कोट करती है ? और आप हर बार बस्तर में व्यवस्था का विरोध करते हैं । हाँ आप कभी भी खुलकर हिंसावादियों, नक्सवादियों और माओवादियों के बारे नहीं बोलते । जो भी बोलते हैं उसका मतलब इतना गैर गंभीर होता जिससे किसी भी नक्सलियों की मान हानि नहीं होती ।
3. आपको ग्रांट घर बैठे कैसे मिलती है ? यह हमें सिखने या जानने की नई बात है । या तो आप बड़े तोप से जुड़े हैं या फिर आप इतना तो रिश्वत तो देते हैं - संबंधित ग्रांट वालों को कि वे फट से राशि घर पहुँचा देते हैं । वह भी ऐसे बस्तर में जहाँ कोई फंड आज तक समय से नहीं पहुँचता और वह भी बिना रिश्ववत के । क्या आपको फंड़ देने वाले इतने कारगर व्यवस्था वाले हैं । यदि आपको विदेशी फंड़ मिलता है तो हमें यह भी पता है कि वह किन किन उद्श्यों के लिए और किन किन हांथों से होकर मिलती है ? कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं ? यदि ऐसा है तो आपने अब तक बस्तर या दंतेवाड़ा के विकास के लिए कितनो युवाओं की संस्थाओं का निर्माण किया है ? कितनो को उनके द्वारा स्वयं प्रोजेक्ट उनके ही इलाके में चलाने की पहल की है ? नहीं ना । ठीक भी है । कोई भी दुकानदार ऐसा नहीं करता । किसी और को .... दू बनाना भाई जी ।

हम आदिवासी हैं । आप हमारे नाम पर ज्यादा राजनीति ना करें । प्रचार का भूखा गांधी जी भी नहीं थे । वे केवल काम पर विश्वास करते थे । यदि आपको चेतना ही फैलानी है तो बिलावजह राजधानी की ओर न लपकें । आपका कर्मक्षेत्र पेपरबाजी नहीं । आप चेतना के ज्ञाता है । दंतेवाड़ा में चेतना फैलायें । पेपर में लिखकर असत्य के लिए समय न गवांये । क्योंकि आप तो गांधी के अनुयायी है । सच के अनुयायी हैं । हाँ इसमें यदि आपकी राजनीति हो तो मुझे कुछ भी नहीं कहना । प्रजातंत्र है । कोई भी कुछ कह सकता है । पर सच्चे गांधीवाद है तो अपनी अहिंसा से दंतेवाड़ा की हिंसा को रोकने का कोई करतब दिखाइये आखिर आपके पास भी तो किसी ना किसी रूप में देश विदेश से दंतेवाड़ा के हम परिवारों के लिए एक बड़ा राशि बार बार हर साल मिलती ही जा रही है ।

7/04/2008

दिल्लीवाले भी सच देखना-बोलना सीख रहे हैं..

दिल्ली की पत्रकारिता ने उस मिथक को त्यागना शुरु कर दिया है जिसके लिए उसे अंधा, गूँगा, बहरा और लूला भी कहा जाता था । प्रकारांतर से उसे हितनिष्ठ और स्वार्थी कहा जाता रहा है । दिल्ली, जिसे अल्प पहचानवालों की भाग्यरेखा तय करने का इगो था, लगता है वे अब सच कहने लगे हैं, अपने अंहकार को त्यागकर ।

हो सकता है इसे आप दिल्ली के अपवाद के रूप में भी मानें । पर वास्तविकता यही है कि दिल्ली अब तक छत्तीसगढ़ की माँ-बहन एक करने पर तुला हुआ था । वह कही गयी या पढ़ायी गई बात ही दुनिया को बताती रही । अब इससे कहीं आगे निकलने और दुध का दुध करने के लिए नयी पीढ़ी तैयार दिखती है । जी हाँ, इसकी पहल होती है उमाशंकर जैसे खोजी पत्रकारिता और तटस्थ दृष्टि के मालिक युवा पत्रकार ने, जिसे उसके चाहनेवालों ने बस्तर जाने से रोका भी था । और न जाने क्या-क्या हिदायत दी थी ।

उन्होंने पत्रकारिता की नाक रख ली है । उन्होंने मानवाधिकार के लम्बरदार गौंटिया (जमींदारों के पिठलग्गूओं) के लिए एक नया सबक दिया है कि वे ही सही नहीं है । उनकी आँखों पर अब दुनिया विश्वास नही करने वाली । कहिए कैसे ? तो वह ऐसे कि जिसे परखने के लिए आपको उनकी यह बात पढ़नी होगी । धैर्य के साथ । कुंठा को खूँटी पर टाँग कर । अपने पूर्वाग्रहों को तिलांजलि देकर । यदि आप तैयार हैं तो पढ़िये उनकी सत्यनिष्ठ और संपूर्ण तटस्थ पत्रकारिता की रिपोर्ट जो यहाँ संदर्भित है -

दंतेवाडा़ के सलवा जुडूम कैंप को देखने के बाद मैंने रायपुर की ओर कूच कर दिया। मैं जानना चाहता था कि भारी-भरकम बजट और विदेशी सहयोगियों के सहारे चलनेवाले मानवाधिकार आंदोलनों का जमीनी जुड़ाव क्या है और ऐसा करने के पीछे उनके अपने तर्क क्या हैं? मन में यह सवाल था कि सुरक्षाकर्मी यदि लोगों के मानवाधिकार का हनन कर रहे हैं तो नक्सली क्या कर रहे हैं?

रायपुर में रहकर कई तरह की बातें मानवाधिकारवादियों के बारे में सुनने को मिल रही थी। जिनमें से एक था कि मानवाधिकारवादी सलवा जुडूम का विरोध करके नक्सलवाद को जस्टीफाई कर रहे हैं। दूसरी ओर महेंद्र कर्मा तथा डीजीपी विश्वरंजन से जब मुलाकात हुई तो उन्होंने इस तरह की कवायदों को सलवा जुडूम के खिलाफ एक दुष्प्रचार करार दिया। डीजीपी ने तो यहां तक कहा कि दुष्प्रचार करने वालों को यह तय करना होगा कि आप किसके साथ हैं, प्रजातांत्रिक व्यवस्था के साथ या फिर नक्सलवाद के साथ, यदि आप नक्सलवाद के साथ हैं तो आपको इस देश के संविधान के मुताबिक यहां की सुरक्षा एजेंसियों से कोई नहीं बचा पाएगा। इस तरह उहापोह को लेकर मैंने किसी मानवाधिकार कार्यकर्ता से मिलकर जिज्ञासा शांत करने का निर्णय लिया। रायपुर पहुंचकर मैंने मानवाधिकार कार्यकर्ता सुभाष महापात्र को फोन लगाया तो किसी महिला ने फोन उठाया और कहा कि आप आ जाइये, सुभाष जी अभी घर पर ही मिलेंगे। सवेरे ही मैं ऑटो पकड़ कर सुभाष महापात्र के महावीर नगर स्थित घर की तरफ निकल पड़ा। रास्ते में मैं डीजीपी विश्वरंजन की वह बात बार बार मस्तिष्क में झंझावात उत्पन्न कर रही थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि `नक्सली इस देश का संविधान ही नहीं चाहते हैं।´ फिर नक्सलवादियों के आदर्श माने जाने वाले `माओ´ की बात भी याद आती है कि `सत्ता बंदूक की गोली से निकलती है।´ मन में सवाल उठ रहा था कि क्या नक्सलवाद वास्तव में इस देश के संविधान, प्रजातंत्र के लिए ख़तरा है?

यही सब सोचते सोचते मैं महावीर नगर के नाके पर पहुंच गया, मुझे वहां से एमआईजी-22 सहयोग अपार्टमेंट जाना था। पूछने पर पता चला कि सहयोग अपार्टमेंट अभी करीब डेढ़ दो किलोमीटर की दूरी पर है। रिक्शे में बैठकर मैं सहयोग अपार्टमेंट की तरफ चल पड़ा। सहयोग अपार्टमेंट पहुंचकर रिक्शा छोड़कर पैदल ही एमआईजी-22 को खोजना शुरु कर दिया। कई गलियों में ढूंढा, लेकिन जब नहीं मिला तो मैने एक लड़के से पूछा। उस लड़के ने कहा कि `भाई साहब यहां कई लोग आते हैं जो एमआईजी-22 के बारे में पूछते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि यह पता ही गलत है।´ उसकी बात सुनकर एक बार तो मैं चकरा गया और संदिग्धता तनिक और बढ़ गई। लेकिन मैं उस गली से बाहर निकल कर आया और नुक्कड़ के एक जनरल स्टोर के मालिक से पता पूछा तो उसने इशारा करते हुए बताया कि उस गली के कोने पर एमआईजी-21 है और एमआईजी-22 भी वहीं होना चाहिए। इतना बताकर उस व्यक्ति के मुंह से सहज ही निकल पड़ा कि वहां तो विदेशी (अंग्रेज) रहते हैं। उसकी बात सुनकर मुझे विश्वास सा हो गया कि हो न हो, वही मेरा गंतव्य स्थान है, क्योंकि अपने देशवासियों के मानवाधिकार की वकालत हम खुद तो कर ही नहीं सकते न, इसके लिए हमें विदेशियों की शरण में जाना ही पड़ता है। वहां जाकर देखा तो एक बड़े से मकान के बाहर बड़ा सा लोहे का गेट लगा हुआ था। गेट पर एक आदिवासी पुरुष लुंगी लपेटे खड़ा था और लुंगी के दूसरे सिरे को घुमाकर उसने कंधे पर रखकर अपने एक हाथ को ढका हुआ था। ध्यान से देखने पर पता चला कि उसका वह हाथ जिसको ढका गया था, इंजर्ड होने के कारण सूजा हुआ था। उस घायल आदिवासी को देखकर यह तो निश्चित हो गया था कि यही मानवाधिकार कार्यकर्ता का घर होना चाहिए।

मैंने उस आदमी को बुलाकर दरवाजा खोलने के लिए इशारा किया। पहले तो आदिवासियों की सहज प्रवृत्तिवश वह सकुचाता हुआ सिर झुकाकर दूसरी तरफ चला गया, लेकिन मैंने जब दुबारा बुलाया तो उसने आकर दरवाजा खोल दिया। अंदर घुसते ही दाहिने हाथ पर दरवाजे के बाहर छोटी सी तख्ती लगी हुई थी, जिस पर लिखा था `एफएफएफडीए´ (फोरम फॉर फैक्ट फाइंडिंग डाक्युमेंटेशन एण्ड एडवोकेसी)। यह सुभाष महापात्र द्वारा चलाए जा रहे मानवाधिकार संगठन का नाम है। दरवाजा खोलते ही सामने एक रॉकस्टार की तरह बाल बढ़ाए हुए गोरा विदेशी कम्प्यूटर स्क्रीन पर नजर गड़ाए हुए बैठा हुआ था। मैने उससे सुभाष महापात्र के बारे में पूछा तो इशारा करते हुए उसने अंदर जाने को कहा। उसके भावविहीन चेहरे को देखकर लग रहा था मानो वह भारत में हो रहे इस तथाकथित मानवाधिकार को लेकर बेहद चिंतित हो। अंदर जाने के लिए जैसे ही मैं बढ़ा तो वहीं पर संभवत: दो अन्य विदेशी मानवाधिकारवादी कम्पयूटर पर नजरे गड़ाए ऐसे तल्लीन बैठे थे, मानो वे निरंतर कुछ ट्रैक करने में जुटे हुए थे। उनमें एक महिला थी, जिसने कानों में हैडफोन भी लगाया था। थोड़ा और आगे बढ़ने पर सामने ही कुछ और लोग खड़े दिखाई दिये, जिनमें कई लोग विशुद्ध जनजातीय वेशभूषा में थे, जिन्हें देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था कि वे आदिवासी हैं।

अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब तक आप किसी चीज से अनभिज्ञ हैं तब तक आप समान्य व्यक्ति की तरह बेपरवाह होकर जीवन जी रहे होते हैं, लेकिन जब आप चीजों को समझने लगते हैं तो आप संतोष का अनुभव होता है अथवा निराशा में डूब कर व्यक्ति मानसिक तौर पर अशांत होने लगता है। कुछ ऐसा ही मुझे उन देशी विदेशी मानवाधिकारवादियों और उनके बीच मुंह लटकाये खड़े करीब दर्जन भर आदिवासियों को देखकर महसूस हो रहा था। लेकिन मैंने सहज होने की कोशिश करते हुए पूछा, क्या बात है? सुभाष जी, आप काफी टेन्श दिखाई पड़ रहे हैं। वे बोले हां, अब देखिये न इन लोगों को कोई रात को तीन बजे यहां छोड़कर चला गया और बताया भी नहीं कि ये लोग कौन हैं। सुभाष ने बताया कि उन आदिवासियों में से दो को पुलिस की गोली भी लगी है। यह सुनते ही मेरे मन में सवाल उठा कि क्या ये आम आदिवासी ही हैं, जिन्हें गोली लगी है? संभवत: नक्सली भी हो सकते हैं, क्योंकि दंतेवाड़ा में जिन सुरक्षा बलों पर बाजार में नक्सलियों ने हमला किया था, वे भी तो आम आदिवासियों की ही वेशभूषा में थे. हालांकि यह मेरी तत्कालीन मन:स्थिति की उपज हो सकती है, इसे निर्णायक नहीं माना जाना चाहिए।
उनके पूछने पर मैने बताया कि सलवा जुडूम को लेकर मुझे बात करनी है। इतना सुनकर सुभाष महापात्र थोड़ा अचकचाए फिर उन्होंने कहा कि `सलवा जुडूम तो 2005 से पहले ही शुरु हो गया था। पुलिस इसके लिए काफी पहले से ही रिहर्सल कर रही थी और 2003 में बीजेपी सरकार के आने पर ही इसकी शुरुआत हो गई थी। बकौल सुभाष सलवा जुडूम को नेता लोग चला रहे हैं। मैंने पूछा कि आखिर नेता इस आंदोलन को क्यों चला रहे है? जबकि सरकार और यहां तक कि विपक्ष के नेता महेन्द्र कर्मा भी यह कहते हैं कि यह लोगों का स्व-स्फूर्त आंदोलन है। जवाब में वे कहते हैं कि ऐसा सरकार जंगल में कंपनियों के सम्राज्य को खड़ा करने के लिए कर रही है। लोगों को गांवों से निकालकर लाया जा रहा है, जिससे कंपनियों का रास्ता साफ हो सके। लेकिन साथ ही इस ओर भी ध्यान देना होगा कि आदिवासियों के वनक्षेत्र में बसे गांव छोड़ देने से नक्सलियों की ढाल खत्म हो जाएगी। यह भी नक्सलियों के लिए चिंता का एक विषय है। मैनें अगला सवाल पूछते हुए कहा कि महेन्द्र कर्मा, जो इस आंदोलन के नेता है वे तो बाद में इस अभियान से जुड़े थे, जबकि आप कह रहे हैं कि यह नेताओं द्वारा शुरु किया गया है? इस पर वे कहते हैं कि अगर कर्मा बाद में सलवा जुडूम से जुड़े थे तो वे नेता कैसे बन गए। मैनें पूछ लिया कि नक्सलियों का संघर्ष किससे है और किस वर्ग के हित की लड़ाई वे लड़ रहे हैं? सुभाष थोड़ा तिलमिला जाते हैं और कहते हैं कि इसका जवाब देना मेरा काम नहीं है, मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता हूं, यह सवाल आप नक्सलियों से जाकर पूछिये।

सुभाष कहते हैं कि जनता ने वोट के रूप में अपनी शक्तियां सरकार को दे दी हैं और सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह जनता की रक्षा करे। मैनें कहा कि सरकार ने सुरक्षा के लिए ही तो सलवा जुडूम कैंपों में सुरक्षा बल तैनात किये हैं। जवाब में वे कहते हैं कि आखिर कैम्प में क्यों आदिवासियों को रखा जा रहा है? क्यों नहीं उन्हें उनके गांव में रहने दिया जाता? मैंने कहा कि यदि सलवा जुडूम शिविरों से सुरक्षा हटा ली जाए तो क्या नक्सली गांव वापस जाने पर उन आदिवासियों को जिन्दा छोड़ेंगे? तब क्या आदिवासियों का मानवाधिकार हनन नहीं होगा? वे कहते हैं कि इस बात की क्या गारंटी है कि शिविरों में रहने पर पुलिसवाले इन लोगों को नहीं मारेंगे, उनका मानवाधिकार हनन नहीं करेंगे? वे कहते हैं कि सरकार और प्रशासन ने इस तरह की परिस्थितियों को पैदा किया हैं। आप आदिवासियों को सुरक्षा नहीं दे पाए, विकास नहीं किया जिसका आक्रोश नक्सलवाद के रूप में उभर कर आता है। वे कहते हैं कि व्यवस्था में भ्रष्टाचार है, इसलिए नक्सली टावर गिरा देते हैं। आप इसकी भी सुरक्षा नहीं कर पाते हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या बिजली का टावर गिराने से बस्तर के करीब 20 लाख लोगों का मानवाधिकार हनन नहीं हुआ? इसका जवाब वे गोलमोल कर जाते हैं और कहते हैं कि इसकी परिस्थितियां सरकार ने ही पैदा की हैं।

जब उनसे सवाल किया कि सर्वहारा की वकालत करने वाले नक्सली आखिर उनकी आजीविका के एकमात्र साधन हाट बाजार को क्यों जला देते हैं, उनके गांवों को क्यों जला देते हैं, आंगनबाड़ियों और बाल आश्रमों को क्यों धवस्त कर देते हैं, क्या यह मानवाधिकार हनन नहीं है? सुभाष सीधे तौर पर इसके लिए सलवा जुडूम के नेता महेन्द्र कर्मा पर निशाना साधते हुए कहते हैं कि `गांवों को तो ये नेता लोग जलवा रहे हैं, जिससे आदिवासियों को वहां से बाहर लाया जा सके।´ मैंने पूछा कि दूर दराज के गांवों में बसे करीब 60 हजार आदिवासी किसी नेता के कहने पर क्या इकट्ठा किये जा सकते हैं, जबकि उन्हें यह मालूम हो कि ऐसा करने पर वे नक्सलियों की बंदूक के निशाने पर आ जाएंगे? इस प्रश्न का वे संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाते हैं और कहते हैं कि लोगों को जर्बदस्ती कैंपों में लाया जा रहा है। लेकिन जब यह पूछा जाता है कि पुलिसकर्मी भी तो इस लड़ाई में मर रहा है, क्या उसका और उसके परिवार का कोई मानवाधिकार नहीं है? जवाब मिलता है `नहीं, पुलिस का कोई मानवाधिकार नहीं होता, वह तो ड्यूटी पर होता है, मानवाधिकार तो आम नागरिकों का होता है।" क्या हमें सुभाष महापात्र की बात मान लेनी चाहिए?

सुभाष सवाल उठाते हैं कि आपने सलवा जुडूम क्यों शुरु किया? कंधार का उदाहरण देते हुए वे "सेफ पैसेज" की भी बात करते हैं। पुलिस व्यवस्था पर आरोप लगाते हुए वे कहते हैं कि पुलिस भ्रष्ट है, यही कारण था कि नक्सलियों से लड़ने के लिए आए केपीएस गिल भी वापस लौट गए? लेकिन जब उनसे पूछा गया कि केपीएस गिल ने जिस तरह की कार्यवाही पंजाब में की थी, क्या वैसा ही बस्तर में भी हो सकता है? जवाब में सुभाष कहते हैं कि पुलिस को चाहिए की नक्सलियों को गिरफतार करे और कोर्ट में ट्रायल करवाए। अंत में सुभाष कहते हैं कि हो सकता है आप मेरी बातों का संदर्भ बदलकर प्रस्तुत कर दें, क्योंकि अक्सर ऐसा किया जाता है और हम भी ऐसा ही करते हैं। वे कहते हैं कि अगर आप ऐसा करते हैं तो मुझे खण्डन करना पड़ेगा। उस पल मुझे अपने पास टेपरिकार्डर न होने की कमी बेहद खली थी, क्योंकि उनकी इस बात से ऐसा लगा कि संभवत: वे मेरे लिखे को भी गलत ठहरा दें। ख़ैर जो भी हो, इस उठापटक का दुष्परिणाम आखिरकार आम आदिवासियों को ही भुगतना पड़ रहा है।


सच है ना !
अब सचमुच दिल्ली सच कहना सीख रही है । विस्फोट के प्रति आभार । आभार उमाशंकर मिश्र के प्रति भी

दुनिया की सबसे अच्छी पत्रिका तक पहुँचने का रास्ता

इस अंक में
संपादकीय
संपादक को सिर्फ़ संपादक ही बचा सकता हैसंपादक व्यवसायी नहीं । जिस दिन से उसे व्यवसाय का हिस्सा बनाया जा रहा है, उस दिन से वहाँ गंदी नाली का पानी बह रहा है । वहाँ केवल सडांध है । वहाँ न विचार है न संवाद । ऐसे में, उसे कैसे बचाया जा सकता है कि उसे डायरिया न हो। मलेरिया ना हो । व्यवसाय वह मादा ऐनाफिलीज है जिसके काटते ही संपादक मैनेजर हो जाता है । संपादक को बचाने का काम केवल संपादक कर सकता है । मालिक नहीं । मैनेजर नहीं ।

समकालीन कविताएँ
◙ स्मरणीय- नरेश मेहता एवं धूमिल
◙ जितेन्द्र श्रीवास्तव
◙ स्वप्निल श्रीवास्तव
◙ जसवीर चावला
◙ सुभाष नीरव
◙ प्रवासी कवि - सत्येंद्र श्रीवास्तव
◙ माह का कवि - इंदिरा परमार

छंद
◙ ज़हीर कुरैशी ◙ रमेशचन्द शर्मा 'चन्द्र' ◙ विजय किशोर मानव
◙ विनीता गुप्ता ◙ श्याम सखा 'श्याम' ◙ देवमणि पांडेय
◙ अनिरूद्द नीरव
◙ माह के छंदकार - योगेन्द्र दत्त शर्मा
◙ प्रवासी क़लम - कमल किशोर सिन्ह
◙ अजय गाथा - उमरिया कैसे बीते राम

भाषांतर
◙ बदचलन औरत - अलबर्ट कामू की कहानी
◙ रेत(पंजाबी उपन्यास/भाग-8 ) - हरजीत अटवाल/सुभाष नीरव

हस्ताक्षर
प्रेमचंद की 128 वीं जयंतीः31 जुलाई पर विशेष पर विशेष
◙ प्रेमचंद के सामाजिक,साहित्यिक विमर्श-कृष्ण कुमार यादव
अपने वैयक्तिक जीवन के संघर्षों से प्रेमचन्द ने जाना था कि संघर्ष का रास्ता बेहद पथरीला है और मात्र संवेदनाओं व हृदय परिवर्तन से इसे नहीं पार किया जा सकता। यही कारण था कि प्रेमचन्द ऊपर से जितने उद्विग्न थे, अन्दर से उतने ही विचलित। वस्तुत: प्रेमचन्द एक ऐसे राष्ट्र-राज्य की कल्पना करते थे जिसमें किसी भी तरह का भेदभाव न हो- न वर्ण का, न जाति का, न रंग का और न धर्म का।

कथोपकथन
प्रेमचंद की 128 वीं जयंतीः31 जुलाई पर विशेष पर विशेष
◙ प्रगतिशीलों ने प्रेमचंद के जीवन के तथ्यों को छिपाया
कमल किशोर गोयनका से जयप्रकाश मानस की विशेष बातचीत
असल में कम्युनिस्टों को भारत में पैर जमाने के लिए भारत के हृदय – हिंदी प्रदेश में प्रवेश करना ज़रूरी थी और वे इसके लिए किसी राजनेता का सहारा नहीं ले सकते थे। उन्हें प्रेमचंद से अधिक उपयुक्त कोई साहित्यकार नहीं मिल सकता था, जिसकी लोकप्रियता हिंदी तथा उर्दू दोनों भाषाओं में थी। यही कारण है कि प्रेमचंद ने ‘प्रगतिशील’ शब्द को ही निरर्थक माना, क्योंकि वे इस शब्द को कम्युनिज्म से जोड़ने को तैयार नहीं थे ।

मूल्याँकन
◙ 1857 का सच - रमणिका गुप्ता
◙ ग़ज़ल में व्यंग्य की धार - द्विजेन्द्र द्विज

बचपन
◙ तीन बाल गीत - शरद तैलंग

लोक-आलोक
◙ छत्तीसगढ़ी की तीन लोककथाएँ - जयप्रकाश मानस

शेष-विशेष

आधी दुनिया....
◙ अमेरिका की आधी दुनिया - रचना श्रीवास्तव
तकनीक...
◙ एसएमएस की रंगीन दुनिया - रविशंकर श्रीवास्तव
विचार...
◙ पाला चुनने का अधिकार - संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
◙ बिदा करना चाहते हैं, हिंदी को कुछ अख़बार - प्रभु जोशी
आत्मकथा....
◙ मुसाफिर हूँ यारों - संजय द्विवेदी
शोध....
◙ दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता - डॉ. सी. जय शंकर बाबु

प्रवासी-पातियाँ
अमेरिका की धरती से....
◙ अमेरिका में क्या देखा - लावण्या शाह
◙पिट्सबर्ग की देन - अनुराग शर्मा


कहानी
◙ सलीना तो सिर्फ़ शादी करना चाहती थी-उषा राजे सक्सेना
दूसरे पलँग पर तकिए के सहारे अधलेटे बोखारी ने जब सलीना के रुदन की आवाज़ सुनी तो वह लेटा नहीं रह सका, किडनी निकाले जाने के कारण बोखारी के 'ब्लैडर' और दूसरी किडनी में बुरी तरह 'इन्फेक्शन' फैल गया था वह तेज़ बुखार में तड़प रहा था फिर भी दर्द से कराहता, ड्रिप स्टैन्ड के साथ खुद को घसीटता हुआ सलीना के बिस्तर के पास रखी कुर्सी पर आ बैठा, 'सलीना, मेरी सलीना, रो मत, मेरी जान' क़हते हुए उसने सलीना माथे को सहलाते हुए आगे कहा, 'सल्लो तू दिल ना छोटाकर तू सिटीकाक्रोफ़' और 'वाशोवा' पहनकर मेरे साथ आइल पर चलेगी ।
◙ चंदमुखी - गोवर्धन यादव
◙ एक और द्रौपदी - शेर सिंह
◙ धरती की ममता - स्टीफनज्विग

धारावाहिक उपन्यास
◙ पाँव ज़मीन पर - शैलेन्द्र चौहान - भाग 3
हमारे घर के एक ओर डोकरी अइया का घर था तो दूसरी ओर एक पतली गली के बाद पलटू दाऊ रहते थे । उनकी पूरी तरह रुई की तरह सफेद हुई दाढ़ी मुझे बहुत अच्छी लगती थी । दाढ़ी थी भी खूब लंबी, एकदम दिव्य पुरुष लगते थे वे, गाँव वाले उन्हें साधू कहते । उनके साथ उनकी एक मात्र संतान बिट्टी रहती थी और बिट्टी का लड़का किशन । किशन मुझसे पाँच छ: वर्ष बड़ा था । हमारे गाँव में स्कूल नहीं था सो किशन कोई दो तीन मील दूर घिटौली पढ़ने जाता । वह कभी-कभी ही हमारे साथ खेलता । एक दिन उनके घर के सामने खड़ा बड़ा सा नीम का पेड़ गिर गया, अब तो हमारे मजे ही आ गए ।

व्यंग्य
◙ मँहगाई है जहाँ, आन-बान-शान है वहाँ - अविनाश वाचस्पति

लघुकथा
◙ तीन लघुकथायें - अभिज्ञात

ललित निबंध
◙ चुनाव जीत गया - गाँव हार गया-कृष्ण बिहारी मिश्र

संस्मरण
◙ सागर मध्य पहाड़ी आश्रय - काप्रि - सुभाष काक

पुस्तकायन

◙ दिल से दिल तक - देवी नागरानी
◙ बेहत्तर दुनिया के लिए - डी डी मायर्स
◙ कारवाँ लफ़्जों का - जयंत कुमार थोरात

ग्रंथालय में (ऑनलाइन किताबें)
◙ लौटते हुए परिंदे(कहानी संग्रह) - सुरेश तिवारी
◙ कारवाँ लफ़्जों का (मुक्तक एवं ग़ज़ल संग्रह) - जयंत थोरात
◙ प्रिय कविताएँ - भगत सिंह सोनी

हलचल
(देश विदेश की सांस्कृतिक खबरें)
◙ उषा राजे सक्सेना का नया कहानी संग्रह विमोचित
◙ संतोष चौबे को रामेश्वर गुरू पुरस्कार
◙ हिंदीभाषियों को इंटरनेट से जोड़ने अनूठी पहल-रफ़्तार
◙ "ज़िंदगी ख़ामोश कहाँ'' हुई लोकार्पित