8/29/2009

टेक्नालाजी में कैद हो रही है भाषा



भोपाल । हिंदी के प्रख्यात कवि-आलोचक एवं दस्तावेज पत्रिका के संपादक डॉ विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का कहना है कि आने वाले समय में भाषा, टेक्नालाजी में कैद हो जाएगी और दुनिया के तमाम लोग अपनी भाषा खो बैठेगें। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग द्वारा मीडिया की हिंदी और हिंदी का मीडिया विषय पर छात्रों से संवाद कर रहे थे।



उन्होंने कहा कि हम भाषा के महत्व को समझ रहे होते तो हालात ऐसे न होते। भाषा में ही हमारे सारे क्रियाकलाप संपन्न होते हैं। मीडिया भी भाषा के संसार का एक हिस्सा है। हम जनता से ही भाषा लेते हैं और उसे ज्यादा ताकतवर और पैना बनाकर समाज को वापस करते हैं। इस मायने में मीडियाकर्मी की भूमिका साहित्यकारों से ज्यादा महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि यह साधारण नहीं है कि आज भी लोगों का छपे हुए शब्दों पर भरोसा बचा हुआ है। किंतु क्षरण यदि थोड़ी मात्रा में भी हो तो उसे रोका जाना चाहिए। श्री तिवारी ने कहा कि साहित्य की तरह मीडिया का भी एक धर्म है, एक फर्ज है। सच तो यह है कि हिंदी गद्य की शुरूआत ही पत्रकारिता से हुयी है। इसलिए मीडिया को भी अपनी भाषा के संस्कार, पैनापन और शालीनता को बचाकर रखना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि भाषा सक्षम है तो उसमें जबरिया दूसरी भाषा के शब्दों का घालमेल ठीक नहीं है।



कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि भाषा को लेकर पूरी दुनिया अनेक संघर्षों की गवाह है, किंतु यह दौर बहुत कठिन है जिसमें तमाम भाषाएं और बोलियां लुप्त होने के कगार पर हैं। ऐसे में हिंदी मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह अपनी बोलियों और देश की तमाम भाषाओं के संकट में उनके साथ खड़ी हो। श्री मिश्र ने कहा कि भाषा को जानबूझकर भ्रष्ट नहीं बनाया जाना चाहिए। इसके पूर्व कुलपति श्री मिश्र ने शाल और श्रीफल से डा। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का सम्मान किया।



कार्यक्रम का संचालन जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया तथा आभार प्रदर्शन मोनिका वर्मा ने किया। इस मौके पर पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष पुष्पेंद्रपाल सिंह, जनसंपर्क विभाग के अध्यक्ष डा. पवित्र श्रीवास्तव, मीता उज्जैन, संजीव गुप्ता, डा. अविनाश वाजपेयी, शलभ श्रीवास्तव तथा विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएं मौजूद थे।

8/28/2009

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१०-११ जुलाई, २००९ - प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह उद्घाटन समारोह स्वागत भाषण देते हुए संस्थान के संतोष रंजन एवं दायें से खगेन्द्र ठाकुर, विनोद कुमार शुक्ल, नंदकिशोर आचार्य, शिव कुमार मिश्र, मुख्य मंत्री, रमन सिंह, मंत्री द्वय बृजमोहन अग्रवाल, केदार कश्यप, प्रभाकर श्रोत्रिय एवं ए. अरविंदाक्षन

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१०-११ जुलाई, २००९ - प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह उद्घाटन समारोह में दीप प्रज्ज्वलित करते हुए ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक और आलोचक डॉ प्रभाकर श्रोत्रिय ।

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१०-११ जुलाई, २००९ - प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह उद्घाटन समारोह में दीप प्रज्ज्वलित करते हुए बायें से मुख्यमंत्री, डॉ रमन सिंह, ए अरविंदाक्षन, नंदकिशोर आचार्य और संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल

देश की दयनीय राजनीति एवं नेताओं की कमज़ोर नर्सरी


राजनीति शब्द से ही जैसा कि स्पष्ट हो जाता है कि राज करने अथवा राज चलाने सम्बन्धी नीति को ही राजनीति कहा जाता है। यहाँ यह समझ पाने में अधिक परेशानी नहीं होनी चाहिए कि राज करने या चलाने जैसी अति संवेदनशील एवं गम्भीर ज़िम्मेदारी को अंजाम देने के लिए इस पेशे में शामिल व्यक्ति को अत्याधिक योग्य, दक्ष, ईमानदार, समाज में स्वीकार्य तथा कुशल नेतृत्व प्रदान कर पाने की क्षमता रखने वाला व्यक्ति होना चाहिए। अशोक सम्राट, चन्द्रगुप्त, चाणक्य जैसे राजनीति के सिद्ध पुरूषों से लेकर सुभाष चन्द्र बोस, महात्मा गांधी, पंडित जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लालबहादुर शास्त्री तथा इंदिरा गांधी सरीखे देश के सुप्रसिद्ध राजनैतिक महापंडितों तक भारतीय राजनीति का इतिहास ऐसे तमाम राजनैतिक दिग्गजों के नामों से भरा पड़ा है जिन पर न सिर्फ़ भारत की जनता बल्कि स्वयं देश की राजनीति भी गर्व महसूस करती है।

वास्तव में यह हमारे देश का सौभाग्य है कि प्राचीनकाल से ही हमारे देश को राजनीति के क्षेत्र में ऐसी विलक्षण प्रतिभाएं मिलीं जिन्होंने अपने तमाम राजनीतिक फैसलों के द्वारा देश को आगे ले जाने, देशवासियों को न्याय देने, तथा देश की प्रगति और विकास में अपनी योग्यताओं एवं प्रतिभाओं का भरपूर इस्तेमाल किया। यदि हम आज के समय में पश्चिमी देशों की साम्राज्यवादी नीतियों के कारण विश्व के बिगड़ते हुए हालात पर नज़र डालें तथा प्रभावित देशों में मच रही तबाही व बर्बादी एवं आए दिन होने वाले कत्ले आम पर गौर करें तो हमें अपने देश के कुशल राजनीतिज्ञों की योग्यता पर यह सोचकर और भी गर्व होता है कि 200 वर्षों की गुलामी के बाद भी किस प्रकार उनके द्वारा बिना किसी भीषण संघर्ष किए देश को अंग्रजों की गुलामी की बेडिय़ों से मुक्ति दिलाई गई। देश की आजादी को आज 62 वर्ष बीत चुके हैं। स्वतन्त्र भारत दुनिया के अन्य विकासशील देशों की तुलना में तेजी से आगे बढ़ता हुआ विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा होने की तैयारी कर रहा है। यह सत्य है कि देश की विकास सम्बन्धी एक-एक ईंट में हमारे ही देश के कुशल नेतृत्व का पूरा योगदान है। परन्तु यदि इसी सिक्के के दूसरे पहलू पर हम आज नजर डालें तो हमें कुछ ऐसे तथ्य नजर आते हैं जिन्हें देखकर हमारी नजरें शर्म से झुक जाती हैं।

उदाहरण के तौर पर कल के नेताओं में बलिदान का जज़्बा था, वे नि:स्वार्थ सेवा भाव के साथ अपने पूरे कौशल एवं योग्यता के बल पर प्रभावी राजनीति किया करते थे। ऐसी राजनीति जिसमें कि नैतिकता एवं सिद्धान्त कूट-कूट कर भरे होते थे। ठीक इसके विपरीत आज की राजनीति मुख्य रूप से सत्ता प्राप्त करने के उद्देश्य को केन्द्र बिन्दु मानकर किया जाने वाला एक ऐसा पेशा बन कर रह गई है जिसमें अनपढ़, गुण्डे, बदमाश, लफंगे, स्वार्थी, धनार्जन की इच्छा रखने वाले, अखबारबाजी व प्रेस नोट की राजनीति कर अपने नाम को जनता के मध्य उछालने वाले तथा छल कपट के द्वारा राजनीति के क्षेत्र में अपना स्थान बनाने तथा अपना नाम रौशन करने वालों की भीड़ नजर आती है, जिसके परिणामस्वरूप देश की तरक्क़ी उस रफ़्तार से नहीं हो पा रही है जैसी कि होनी चाहिए। राजनीति में नैतिकता की न सिर्फ कमी होती दिखाई पड़ रही है बल्कि ऐसा लगने लगा है कि राजनीति जैसे पवित्र पेशे के लिए नैतिकता की बात करना ही कोई अनैतिक वार्तालाप बनकर रह गया हो। पारदर्शिता नाम की चीज सियासत से खत्म होती जा रही है और तो और इसी प्रदूषित एवं निम्नस्तरीय स्वार्थी एवं भ्रष्टï राजनीति की वजह से ही स्वयं देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी को यह स्वीकार करना

पड़ा था कि विकास के नाम पर एक रूपया जब केन्द्र सरकार पंचायत के विकास कार्योंके लिए रवाना करती है तो पंचायत तक आते-आते वह एक रूपया मात्र 25 पैसे ही रह जाता है। स्व० राजीव गांधी का साफ कहना था कि 75 पैसे देश के खोखले राजनैतिक ढांचों तथा भ्रष्टï राजनैतिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था की भेंट चढ़ जाता है। आज कांग्रेस का भविष्य समझे जाने वाले युवा नेता राहुल गांधी ने भी दो दशकों बाद अपने पिता की उसी सोच पर अपनी मुहर लगाते हुए यह पुर्णतय: स्वीकार किया है कि देश का राजनैतिक ताना-बाना हरगिज ठीक नहीं है। प्रश्न यह है कि यदि देश का राजनैतिक ढांचा चुस्त दुरूस्त एवं पारदर्शी हो तो क्या इस प्रकार के राजनैतिक व प्रशासनिक ह्रïास की कल्पना की जा सकती है। शायद नहीं।

दरअसल आज राजनीति में प्रवेश करने वाले लोगों पर यदि हम नजर डालें तो हमें यह देखकर दु:ख होगा कि इनमें अधिकांश वह लोग दिखाई देते हैं जो अशिक्षित होने के अलावा अपने जीवन के तमाम क्षेत्रों में असफल होने के बाद सफेद कुर्ते-पायजामे सिलवा कर समाज सेवा की आड़ लेकर राजनीति में सक्रिय हो गये हैं। ऐसे तत्वों की सक्रियता एक ओर तो राजनीति के क्षेत्र में इसलिए भी बढ़ती गई क्योंकि देश की जनसंख्या के साथ-साथ बेराजगारी भी अपने चरम पर पहुँच चुकी है। दूसरी तरफ ऐसे अपरिपक्व एवं असमाजिक लोगों के राजनीति में बढ़ते प्रवेश को देखकर योग्य, ईमानदार तथा देश सेवा का जज़्बा रखने वाले उन तमाम लोगों ने अपने आपको राजनीति के क्षेत्र से दूर रखना शुरू कर दिया जो असमाजिक तत्वों की राजनीति में घुसपैठ को कतई उचित नहीं समझते हैं। शरीफ एवं सज्जन व्यक्तियों द्वारा राजनीति से मुंह मोड़ लेने की घटना ने तीसरे दर्जे के ऐसे लोगों को इतना अधिक प्रोत्साहित किया कि आज राजनीति में जहाँ इनका वर्चस्व साफ नजर आता है वहीं योग्य एवं सज्जन राजनीतिज्ञ या तो राजनीति के दल-दल से दूर होता जा रहा है या फिर सक्रिय होते हुए भी स्वयं को असहाय एवं निष्प्रभावी महसूस करने लगा है। आज का आधारहीन तथाकथित नेता अपने आकाओं को तोहफे भेंट कर, अखबार नवीसों को तमाम प्रकार की 'भेंट देकर अपने राजनैतिक गॉडफादर के पक्ष में उसकी तारीफों के पुल बांधने वाले प्रेस नोट जारी कर स्वयं को सफल राजनीतिज्ञ मानता है। कोई दूसरे देशों के झण्डे जलाकर अपनी राजनीति चटकाता है तो कोई अफसरों व अन्य वरिष्ठï नागरिकों को स्मृति चिन्ह भेंटकर उन्हें सम्मानित करने के बहाने अपना ही मान-सम्मान बढ़ाने का प्रयास करता है। कोई अपने साथ चार लोगों को लेकर सड़कों पर दहशत फैलाने, कारों व जीपों में बैठकर तेज रफ़्तार से गाड़ी चलाने को ही सफल राजनीति मानता है तो कोई राष्ट्रीय राजमार्ग पर शहीदों की फोटो से लैस गाडिय़ों पर पिकनिक मनाए जाने की घटना को 'रथयात्रा का नाम देकर स्वयं को एक महान रथयात्री की श्रेणी में स्थापित करने का प्रयास करता है। अपराधियों की राजनैतिक सक्रियता का भी केवल एक ही उद्देश्य होता है, अपनी जान बचाना तथा शासन प्रशासन का संरक्षण प्राप्त करना। जाहिर है अपने इस उद्देश्य के लिए वे किसी एक राजनैतिक दल के साथ किसी सिद्धांतों के तहत बंधे नहीं होते। वे उसी दल के साथ होते हैं जो दल उनकी सुरक्षा की पूरी गारन्टी लेता हो।

उपरोक्त हालात को देखकर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम.लिंगदोह द्वारा देश के राजनीतिज्ञों के बारे में की गई हंगामा खेज टिप्पणी ठीक ही प्रतीत होती है। साथ-साथ हमें भी इस निर्णय पर पहुँचने के लिए बाध्य होना पड़ता है कि देश की राजनीति के वर्तमान गिरते हुए स्तर के लिए काफी हद तक नेताओं की कमजोर नर्सरी ही ज़िम्मेदार है। यदि देश को इस नासूर से मुक्ति दिलानी है तो ऐसी व्यवस्था करनी पड़ेगी जिससे कि शिक्षित, योग्य, ईमानदार एवं नीतियों व सिद्धांतों पर विश्वास रखने वाले समर्पित लोग ही सक्रिय राजनीति में भाग ले सकें।


निर्मल रानी
1630/11, महावीर नगर,
अम्बाला शहर,हरियाणा

8/12/2009

चरणदास चोर



यह अकल्पनीय था कि कीर्तिशेष रंगकर्मी हबीब तनवीर के विश्वप्रसिध्द नाटक ''चरणदास चोर'' पर उनके अपने प्रदेश याने छत्तीसगढ़ की सरकार ही प्रतिबंध लगा देगी। इसलिए जब कुछ अखबारों के माध्यम से यह जानकारी मिली तो विश्वास न करने का कोई कारण नहीं था तथा इस स्थिति में रोष, चिंता व आश्चर्य की मिलीजुली भावनाएं उमड़ना स्वाभाविक ही था। लेकिन इसके बाद खबर का जैसे-जैसे खुलासा हुआ यह समझ आया कि सरकार, मीडिया, प्रतिबंध की मांग करने वाले व इसका विरोध करने वाले सबने अपनी-अपनी तरफ से अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़े एक संवेदनशील मसले को उलझाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। जिस धैर्य व विवेक का परिचय दिया जाना चाहिए था वह इनमें से किसी ने नहीं दिखाया।


यह तथ्य सबसे पहले स्पष्ट कर लेना चाहिए कि छत्तीसगढ़ सरकार ने ''चरणदास चोर'' नाटक के मंचन पर या पुस्तक की बिक्री पर कोई रोक नहीं लगाई है। छत्तीसगढ़ सरकार ने, जहां तक हमारी जानकारी है, ऐसा कोई आदेश जारी नहीं किया है। इसके बाद इस तथ्य का उल्लेख करना लाजिमी है कि छत्तीगसढ़ शासन के स्कूली शिक्षा विभाग ने विभागीय मंत्री और सचिव के फोन पर दिए निर्देश के अनुरूप, 31 जुलाई की शाम वाणी प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित चरणदास चोर पुस्तक का पुस्तक वाचन अभियान के दौरान वाचन न करने का आदेश जारी किया। इस आदेश में प्रदेश के सभी जिला शिक्षा अधिकारियों को कहा गया कि वे इस 'प्रतिबंधित पुस्तक' की प्रति स्कूलों से बुलाकर अपने पास जमा कर लें। लेकिन उसमें मंचन पर रोक तथा पुस्तक वाचन सप्ताह के बाद रोक जारी रहने की बात नहीं थी। अब इस मामले को विस्तार में समझने की जरूरत है।


हबीब साहब का यह नाटक संभवत: 1987 मे पुस्तकायन नामक प्रकाशक ने छापा था। 2004 में वाणी प्रकाशन ने इसका नया संस्करण छापा। इसमें लेखक की जो प्रस्तावना थी वह पहले संस्करण की भूमिका से भिन्न थी। इसमें सतनामी समाज एवं सतनाम पंथ के प्रति हबीब तनवीर ने प्रशंसायुक्त विचार व्यक्त किए हैं, लेकिन ऐसी दो पंक्तियां हैं जो संभवत: किवदंती पर आधारित हैं अथवा असावधानी में लिखी गई हैं और जिन पर सतनामी समाज का रुष्ट होना सहज है। समाज के एक चर्चित नेता गुरु बालदास ने इसीलिए 2004 में नया संस्करण प्रकाशित होने के बाद मुख्यमंत्री डॉ। रमनसिंह से इसकी शिकायत की तथा आपत्तिजनक अंशों को विलोपित करने की मांग की। गुरु बालदास द्वारा आपत्ति दर्ज करना एक विधिसम्मत कदम था। यद्यपि यह शायद बेहतर होता कि वे हबीब तनवीर से सीधे संपर्क कर उनसे ही मांग करते कि वे उन दो वाक्यों को पुस्तक से हटा दें। फिर भी उन्होंने कोई उग्र कदम नहीं उठाया इसे नोट किया जाना चाहिए। 2004 में राज्य सरकार ने इस पर क्या कार्रवाई की यह पता नहीं चल पाया। संभवत: बात आई-गई कर दी गई। शिकायतकर्ता के पास स्वयं कोई रिकार्ड नहीं है। हमने उनसे पिछली शिकायत का ब्यौरा मांगा, लेकिन नहीं मिल पाया। अगर राज्य सरकार ने उस समय कोई आदेश किया होगा तो सामान्य प्रशासन विभाग, संस्कृति विभाग, शिक्षा विभाग अथवा वाणी प्रकाशन के पास उसकी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।


सन् 2008 में वाणी प्रकाशन ने ही इस पुस्तक का नया संस्करण छापा। पुस्तक में प्रथम पृष्ठ पर दी गई सूचना से पता चलता है कि छत्तीसगढ़ राज्य के स्कूली शिक्षा विभाग की पुस्तकालय विकास योजना के तहत यह पुस्तक छापी गई है। याने सरकार ने बड़ी संख्या में पुस्तक खरीदी और उसे स्कूलों में भेजा। यहां आकर सवाल उठता है कि क्या स्कूली शिक्षा विभाग को 2004 में दर्ज की गई आपत्ति के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। दूसरा प्रश्न उठता है कि पुस्तक खरीदने के पहले क्या उसका सावधानी से अध्ययन किया गया था। तीसरा प्रश्न भी है कि विभाग की पुस्तक खरीद की रीति-नीति क्या है। ये सारे सवाल उठाना लाजिमी है क्योंकि अगर स्कूली शिक्षा विभाग ने हर कदम पर आवश्यक सावधानी बरती होती तो इस तरह का विवाद खड़ा नहीं होता तथा राज्य सरकार को आलोचना का सामना न करना पड़ता।जब 2008 का संस्करण स्कूलों में पहुंचा तो एक बार फिर गुरु बालदास ने मुख्यमंत्री और स्कूली शिक्षामंत्री से मिलकर अपनी आपत्ति विधिसम्मत रूप से दर्ज की। इस बार सरकार हरकत में आई और 31 जुलाई को उपरोक्त आदेश जारी कर दिया। यहां रेखांकित करना चाहिए कि छत्तीसगढ़ राज्य की भाजपा सरकार ने हबीब तनवीर के प्रति कोई पूर्वाग्रह नहीं दिखाया अन्यथा उनकी किताब इतनी बड़ी संख्या में खरीदी ही क्यों जाती। लेकिन गुरु बालदास की आपत्ति मिलने के बाद जिस सुसंगत तरीके से कार्रवाई होना चाहिए थी वह नहीं हुई। ऐसा लगता है कि जबानी जमाखर्च ही चलता रहा। सरकार अगर ठीक से ध्यान देती तो पुस्तक की भूमिका में जो दो आपत्तिजनक वाक्य हैं उन्हें विलोपित करने का आदेश जारी होता और बात वहीं खत्म हो जाती। ऐसा न कर मानो हड़बड़ी में पुस्तक वाचन अभियान के दौरान पुस्तक न पढ़े जाने का आदेश जारी कर दिया गया जिसकी जरूरत नहीं थी। फिर आदेश में ''प्रतिबंधित पुस्तक'' संज्ञा का दो बार लापरवाही के साथ प्रयोग किया गया जिससे भ्रम फैल सकता है।


इस प्रकरण को बिना ठीक से समझे दो-तीन अखबारों ने जो रिपोर्टिंग की उससे भ्रम ज्यादा फैला, और देश भर में बुध्दिजीवियों के बीच तीखी प्रतिक्रिया हुई। एक समाचार में पुस्तक पर प्रतिबंध के साथ-साथ नाटय मंचन की प्रतिबंध की बात भी लिखी गई, जबकि आदेश में ऐसा नहीं कहा गया था। इसी समाचार में स्कूली शिक्षा मंत्री के हवाले से मंचन पर रोक लगाने की बात कही गई लेकिन उन्हें अधिकारिक रूप से उध्दृत नहीं किया गया। इस पत्र ने विभाग के सचिव से जरूर चर्चा की, जिन्होंने ''इस विवादित पुस्तक को प्रतिबंधित'' करने की बात कही। लेकिन आदेश जारी होने के बाद अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की। इसके बाद विरोध के स्वर उठना प्रारंभ हुए। सबसे पहले सीपीआईएम की प्रदेश इकाई ने निर्णय की आलोचना की, लेकिन उसने भी आदेश को देखना शायद जरूरी नहीं समझा। दिल्ली और भोपाल में भी छत्तीसगढ़ सरकार के निर्णय की घोर निंदा की गई। लेकिन यह सब एक अंग्रेजी अखबार में छपी रिपोर्ट के आधार पर ही हुआ तथा यह समझना कठिन नहीं है कि प्रकरण की पूरी जानकारी किसी के पास भी नहीं थी। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पुस्तकों और छुटपुट लेखों पर प्रतिबंध या अन्य सरकारी कार्रवाई करने का यह पहला मौका नहीं है। कांग्रेसी सरकार के समय में तो एक मंत्री के पिता और एक स्वतंत्र फीचर लेखिका को जेल की हवा भी खानी पड़ी थी। दरअसल इस नए प्रदेश की मुश्किल यही है कि साहित्य और संस्कृति के विविध आयामों के बारे में सरकार ने पिछले नौ साल में कभी भी सुचिंतित सोच का परिचय नहीं दिया है। चरणदास चोर पर प्रतिबंध इस आधी-अधूरी और चलताऊ मानसिकता का ही परिणाम है।''देशबन्धु'' सभी पक्षों से इस संवेदनशील प्रश्न पर समझदारी का परिचय देने का अपील करता है। हमारी मांग है कि छत्तीसगढ़ सरकार पुस्तक के वाचन पर लगा प्रतिबंध तुरंत हटाए। हमारी दूसरी मांग है कि पुस्तक की भूमिका से आपत्तिजनक पंक्तियां हटा दी जाए। हबीब तनवीर की एकमात्र वारिस सुश्री नगीन तनवीर को इसमें अपनी ओर से भी पहल करनी चाहिए। पुस्तक के विवादित अंश को विलोपित करने के साथ-साथ पुस्तक वापिस ग्रंथालयों में भेजी जाएं। फिर सरकार यह भी बताए कि उसकी पुस्तक खरीद नीति व प्रक्रिया क्या है तथा इसे सुचारू बनाने के लिए विशेषज्ञों की सलाह ली जाए। जिन अधिकारियों की लापरवाही से बिना सुधार के पुस्तक का नया संस्करण छप गया उनके बारे में भी सरकार विचार करे। हम अपने रचनाशील मित्रों व पत्रकारों को भी संयम बरतने की सलाह देंगे। अपनी निजी जानकारी की बिना पर यह जिक्र करना मुझे जरूरी लगता है कि मुख्यमंत्री डॉ। रमनसिंह ने हबीब तनवीर की बीमारी के समय एवं उनकी मृत्यु के बाद सरकारी स्तर पर आवश्यक वित्तीय प्रबंध करने के लिए भी स्वीकृति प्रदान की थी। इसलिए इस प्रकरण को सांप्रदायिक रंग देना उचित नहीं होगा। और अंत में सतनामी समाज को इस बात के लिए धन्यवाद देना चाहेंगे कि उन्होंने कानून अपने हाथ में लेने जैसा कोई अप्रिय कदम नहीं उठाया। अपनी धार्मिक, सामाजिक भावनाएं आहत होने पर आए दिन जो समूह हिंसक उपद्रवों पर उतर आते हैं उन्हें इससे सीख लेना चाहिए।(साभार)

ललित सुरजन

संपादक, देशबन्धु

रायपुर, छत्तीसगढ़

8/10/2009

यह सांस्कृतिक गुंडागर्दी है ।

आशुतोष कुमार के नाम एक पत्र


आशुतोष कुमार नामक किसी पत्रकार या लेखक द्वारा जनसत्ता में प्रकाशित लेख ( प्रख्यात कवि आलोचक श्री अशोक बाजपेयी के जनसत्ता 19 जुलाई, 2009 के अंक में कभी-कभार में प्रकाशित आलेख ‘सहचर की याद’ के एक वाक्य को बीज वाक्य बनाकर लिखे गये ) ‘यह सांस्कृतिक सलवा-जुडूम है’ पढ़कर जाने क्यों, पर मुझे माओ-त्से-तुंग की ही याद हो आई जिन्होंने कभी घिसे पिटे पार्टी लेखन करनेवाले अपने साथियों से ही कहा था –


“सर्वहारा वर्ग का सबसे तीक्ष्ण और सबसे कारगर हथियार है उसका गंभीर और जुझारू वैज्ञानिक रवैया । कम्युनिस्ट पार्टी दूसरे लोगों को डराने धमकाने के भरोसे जीवित नहीं रहती, बल्कि मार्क्सवाद लेनिनवाद के सत्य के भरोसे जीवित रहती है, तथ्यों के ज़रिए सत्य की तलाश करने के भरोसे और विज्ञान के भरोसे जीवित रहती है । इस बात को बताने की ज़रूरत नहीं है कि पाखंड का सहारा लेकर अपने लिए शोहरत और ओहदा हासिल करने का विचार तो और भी घृणास्पद है । ”


वैसे उन्होंने ऐसे लेखकों पर कई आरोप लगाये थे – कि ऐसा लेखक अक्सर खोखले शब्दजाल से पन्ने भरता जाता है । कि वह जनता को जानबूझकर डराने धमकाने के लिए ख़ास अंदाज अख्तियार करता है, यह बेहद ख़राब क़िस्म के ज़हर से भरा होता है । कि उसमें उत्तरदायित्व की भावना का अभाव होता है, वह जहाँ भी जन्म लेता है जनता को नुकसान पहुँचाता है और उसके प्रसार से देश बरबाद हो जायेगा और जनता तबाह हो जायेगी।
रूस या चीन में तो नहीं पता नहीं किन्तु मार्क्स और लेनिन के भारतीय चेले अभी भी यही कर रहे हैं और इस अनुक्रम में आशुतोष कुमार के लेख का जो रहस्यवाद है वह भी यही साबित करने का अर्थहीन, भ्रामक और सफ़ेद झूठ का दुर्गंध फैलाता कुप्रयास है । कुछ अर्थों में कुंद और जड़ मानसिकता का परिचायक भी ।


पूछें कैसे ? वह ऐसे कि न तो लेख के लेखक को “सलवा-जुडूम” की वास्तविकता का पता है न उसके इतिहास का । शब्द के भाषा-वैज्ञानिक मतलब और निहितार्थ जानने का तो प्रश्न ही नहीं उठता । यदि उन्हें सलवा जुडूम का जन्म किन कारणों से हुआ इसकी सही जानकारी रहती तो वे अपने लेख का शीर्षक “यह सांस्कृतिक सलवा-जुडूम है” देने का दुस्साहस भी नहीं कर पाते । मुश्किल यह है कि सलवा जुडूम के बिषय में या तो वे उन मित्रों की बातों पर भरोसा कर के लिखते हैं जो नक्सलियों से नज़दीकी रिश्ता रखते हैं या फिर उन लोगों पर भरोसा करते हैं जो बस्तर का 4-5 दिन का दौरा कर अपने को बस्तर की समस्याओं के विशेषज्ञ मानने लगते हैं ।


लेखक सर्वथा भूल जाता है कि कहीं वह ऐसा करके करोड़ों आदिवासियों की उस जन-भावना और विद्रोह को भी झूठ साबित करने की बौद्धिक चेष्टा तो नहीं कर रहा हैं जिसमें उनकी आज़ादी निहित है ? लेख की भाषा और संवेदना के आरपार देखने से यह प्रमाणित हो जाता है कि वह उस शुक की मानिंद सुनी-सुनायी या रटी-रटायी बातें की कह रहा है जो उसके अलावा कुछ भी नहीं जानता और सच तो यह भी है कि तोता जिस भाषा में बोलता है उसका मानवीय आशय भी कभी नहीं बूझ पाता ।


अब बस्तर के आदिवासी ऐसे सुव्यवस्थित प्रचार या संचार तंत्र से संपन्न तो नहीं जो ऐसे लेखकों को यह बता सके कि हे भले मानस, तुमने हमें इतना गया-बीता कैसे मान लिया कि छद्म हिमायती बनकर और अंततः हमारे ही तन, मन और जीवन के शोषक सिद्ध होनेवाले नक्सलियों के ख़िलाफ़ हम एकजूट भी नहीं हो सकते ? आशुतोष जैसे लेखक-पत्रकारों को यह कतई नहीं पता कि सलवा जुडूम उस सलाहकार खरगोश से अपने से दूर रहने की अपीलयुक्त विद्रोह है जो अपने भीतर बाघनखा छुपाकर आदिवासियों के बीच वर्षों से कथित हितैषी बनकर बस्तर की सारी हरियारी को चट कर जाना चाहता था । आशुतोष जैसे लेखकों के मुताबिक असलियत जानकर भी यदि बस्तर के कुछ भागों में आदिवासी नक्सलियों का साथ दे रहा है तो वह उनके आतंक और तानाशाही और बंदूक के डर के कारण ही ऐसा कर रहा है, नेक नीयत से उपजे नक्सलियों के विश्वास के कारण नहीं । जिसे आदिवासी आततायियों से मुक्ति मानता है उसे ही अपने लालचपूर्ण और छद्म स्वप्नों की पूर्ति के लिए किसी विचारधारा का कोई लेखक गलत बताता है या उसे प्रायोजित करार देकर भर्त्सना करता है तो वह आदिवासियों को गालियाँ ही दे रहा होता है ।


यहाँ यह भी बताना लाजिमी होगा कि लेखक को यह भी नहीं पता कि माओवाद या नक्सलवाद के भौतिक जीवन के सिद्धांत और दर्शन से आदिवासियों का मूलतः कोई लेना देना नहीं क्योंकि वह भी तो नहीं जानते कि यह दर्शन उसके विकास का अंतिम और कारगर शास्त्र है । लेखक को यह भी नहीं पता कि सलवा जुडूम उन सीधे-सादे आदिवासियों की शांतिपूर्ण जीवन की आज़ादी की गुहार है, जिसमें तथाकथित विकास एक लघु अवधारणा है । विकास का मतलब आदिवासी के लिए अशांति, हिंसा और दबाब भी कतई नहीं है । वह जल, जंगल और ज़मीन पर निर्द्वंद्व अधिकार भी यदि चाहता है तो किसी नुमाइंदे के घूरते हुए और लगभग क्रूर दिशाबोधों के बीच नहीं ।


यदि यह मान भी लिया जाये कि नक्सलवाद अपने मूल निहितार्थों में आदिवासियों, दलितों, पीड़ितों के लिए सुखद स्वप्नों को साकार करने का संघर्ष था और प्रजातांत्रिक व्यवस्था की ख़ामियों से निपटने के लिए कथित विकल्प भी, जिसके फाँसे में आकर आदिवासियों के भी स्वप्न जाग उठे तो भी उसे हिंसक संघर्ष और अंततः आत्मघातकता में न कभी विश्वास था न कोई जातीय अभिरूचि । जिसे आधुनिक सिद्धांतकार शास्त्रीय मानवीय विकास कहते हैं उस पर तो आदिवासी का कोई लगाव भी नहीं रहा है ।


भूले-भटके और जानलेवा दबाबों के मध्य यदि वह नक्सलियों के साथ है तो यह उसकी विवशता है परिनिष्ठित आस्था और वैचारिक निर्णय तो कदापि नहीं। उसे यह कहाँ पता था कि कभी हित-प्रीत का मोहजाल फैलानेवाला शिकारी उसकी ही बेटी-बहनों की अस्मतें लूटने पर आमादा हो जायेगा । उसके ही अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर देगा । प्रचलित और संभावित विकास के मार्ग पर ही काँटे बिछा देगा । उसके ही धर्म-कर्म और परंपरा के खंडन की शर्त पर विकास का मंत्र रटायेगा । जीवन-लक्ष्यों की ग़लत परिभाषा को सर्वोच्च और अंतिम बनाने पर उतारू होकर उसे जबरन बंदूक थामने को विवश करेगा कि जब तक प्रजातंत्र को नहीं उखाड़ फेंकोगे – तुम्हारे विकास का सूरज उगेगा ही नहीं । पर आदिवासियों का विश्वास कभी नहीं रहा । यह दिल्ली में रहकर नहीं समझा जा सकता । वर्षों बस्तर के आदिवासियों के बीच रहने के बावजूद बैरियर एल्विन भी पूरी तरह से आदिवासियों को नहीं समझ पाये, आशुतोष कैसे समझ गये ?
वैसे भी हिंसा के लिए प्रजातंत्र में कोई जगह नहीं है । हिंसा से प्राप्त लक्ष्य या राज्य व्यवस्था में इसकी कोई गारंटी नहीं कि वह फिर से हिंसक न हो उठे । जो आदिवासी पिछले चार-पाँच दशकों से इस दर्शन पर विश्वास करते रहे हैं वे भी अब जान चुके हैं कि उनके हितैषी बनने का स्वांग भरनेवाले नक्सलियों के पास विकास के नाम पर वर्तमान पीढ़ी के लिए तथाकथित शहीद होने के हसीन सपनों के अतिरिक्त कुछ भी नही है ।


सलवा जुडूम मूलतः उस शोषणकारी साधनों और हिंसा के बल पर आधारित अंध व गैरजनतांत्रिक राजनीतिक दर्शन की जड़मति तंत्र से मुक्ति का आंदोलन है । वहाँ, जैसा कि समझाया जाता रहा है कि वह आदिवासियों के विरूद्ध आदिवासियों का सरकार समर्थित दमनात्मक मुव्हमेंट है, एक सफेद झूठ के अलावा कुछ भी नहीं । सच्चाई यही है कि इसके पूर्व 9 वें दशक में बस्तर में नक्सलियों ख़िलाफ़ आदिवासी एकजूट होकर आंदोलन कर चुके हैं । और सच्चाई यह भी कि तब नक्सलियों के विरूद्ध आदिवासियों का वह आक्रोश उस झूठे समझौते के शब्दजाल पर थमा था जिसमें नक्सलियों द्वारा आदिवासियों के ख़िलाफ़ किसी रणनीति की मनाही की स्वीकृति केंद्र में थी । परन्तु आदिवासियों के गाँव लौटते ही उनके करीब 300 नेताओं की नक्सलियों ने हत्या कर दी थी ।


महत्वपूर्ण यह नहीं कि सलवा जुडूम आदिवासी अपनी अस्मिता के रक्षार्थ क्यों न चलाये और उसे हर जनतांत्रिक सरकारें अपने सुरक्षात्मक घटकों के सहारे क्यों न सहारा दे । महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इस समय आख़िर सलवा जुडूम का विरोध कौन लोग कर रहे हैं ?


सलवा जुडूम का मतलब आदिवासी इलाकों से नक्सवादियों से अलगाव का विनम्र प्रार्थना है । एक शांतिपूर्ण अपील है कि भाई, बस अब बंद करें । हमें ऐसे पहरुए नहीं चाहिए जो हमें हिंसक बनाने पर आमादा है । जो हमें ही अपनी हिंसा का शिकार बना रहा हो । कि हमें ऐसा विकास भी नही चाहिए जिसके मूल में सिर्फ़ और सिर्फ़ हिंसा है या फिर विध्वंस ही विध्वंस है । बस्तर का आदिवासी भी यह भली भाँति जानता है कि वहाँ मारा जानेवाला केवल आदिवासी है । चाहे वह किसी की गोली से मरे ।
सलवा जुडूम का विरोध दरअसल नक्सली ही कर रहे हैं जो नहीं चाहते कि नक्सलियों के गढ़ बस्तर से उन्हें पलायन करना पड़े । यहाँ यह बताना लाजिमी होगा कि अबूझमाड़ आज माओवादी रंगरुटों को प्रशिक्षित करने का एशिया और संभवतः विश्व के सबसे सुरक्षित ट्रेंनिंग सेंटर में से एक है । दरअसल अब तक चाहे जिस किसी भी कारण से हो, आदिवासियों की दबाबपूर्ण सहानुभूति नक्सलवाद पर थी जिसके सहारे नक्सली बस्तर जैसे गरीब और जंगली क्षेत्र में अपने पाँव पसारते रहे । यदि वही आदिवासी उनका विरोध करें, तो यह सिर्फ़ माओवादियों के लिए हानिप्रद है । यह माओवादी तथा उनके समर्थक कैसे बर्दास्त कर सकते हैं ?


सलवा जुडूम को आदिवासियों का दमनकारी सरकारी प्रयास निरूपित करने वाले लेखक अक्सर यह जानबूझ कर छूपा जाते हैं कि आख़िर नक्सलवाद का एकमात्र साधन भी हिंसा, आंतक और आदिवासियों सहित शासकीय तंत्र का दमन और विरोध ही तो है । जो यह कहते हैं कि सलवा जुडूम आदिवासियों के दमन की प्रविधि है वे एक तरह से यह भी कहते होते हैं कि बस्तर के आदिवासी नक्सलियों का विरोध न करें, आम जन को नक्सलियों के ख़िलाफ़ उठ खड़े होने का कोई हक नहीं है, बुद्धिजीवी उनके प्रतिरोध में न लिखें, भले ही वे उनके हाथों लगातार मारे जाते रहें ।


यानी नक्सलियों की कार्यवाही अहिंसक है और आदिवासियों की कार्यवाही हिंसक ! कितना हास्यास्पद तर्क है । ऐसा दोहरा मापदंड कैसे चलेगा ? सलवा जुडूम का विरोध तभी ठीक हो सकता है जब नक्सली हिंसा त्याग दें । वे अहिंसक हुए बिना यदि सलवा जुडूम को हिंसा का साधन कहें तो यह पाँचवी पास वाले विद्यार्थी के गले भी उतरने से रहा । सलवा जुडूम के विरोध का मतलब न केवल आदिवासी प्रतिरोध का दमन है अपितु वह उस उस आदिवासी जनमत का भी विरोध है जिसके सहारे 11-11 विधायक विधान सभा में उनकी आवाज बने हुए हैं। यदि ऐसा न होता तो ऐसे नक्सली कम से कम एक विधायक तो अपनी ओर से आदिवासियों के हित के लिए विधानसभा पहुँचा चुके होते । हम सभी जानते हैं कि वे उस विकास के पक्षधर नहीं है जो निर्वाचित प्रतिनिधि के हाथों संपन्न हो । वे यह भी नहीं चाहते कि चुनाव में आदिवासी अपनी प्रतिभागिता रेखांकित करे । यानी कि सभी प्रजातांत्रिक मूल्यों, तकनीकियों और सहारों से वह दूर रहे । इसका आशय तो यही हुआ कि नक्सलवाद मूलतः प्रजा विरोधी अवधारणा है । प्रजातंत्र विरोधी अवधारणा है ।


यदि नक्सलवाद प्रजातंत्र के विरोध में है तो ऐसा कौन सा शासन तंत्र होगा जो उसके लिए संवेदनशील होगा ? उसे मुख्य धारा में लाने की कोशिश करेगा ? उससे संवाद कायम करेगा ? और ऐसा किस मुँह से कहा जा सकता है कि बंदूक के साथ चर्चा करे सरकार ? बंदूक साथ रखकर चर्चा केवल गुंडे, मवाली, डाकू ही करते हैं । सरकारें नहीं । यदि सरकारें यही करने को बाध्य की जाती है तो वह खुद प्रजातंत्र विरोधी साबित होती है । ऐसी स्थिति में यदि आदिवासियों के प्रजातांत्रिक उपायों को कोई भी सरकार अपना समर्थन नहीं देगी तो वह क्या करेगी। वह दमित लोगों के साथ रहेगी या दमनकारियों के साथ ? वह बहुसंख्यक जनता के साथ रहेगी या अल्पसंख्यक नक्सलवादियों के साथ ?


छत्तीसगढ़ की सरकार और पुलिस यदि हिंसा के साये में जीने के लिए संशकित हो चुके 2 करोड़ से अधिक जनता के लिए जूझ रही है तो एक प्रजातांत्रिक उत्तरदायित्वों के दबाब में । यदि यही तानाशाही है तो उन 50 हजार नक्सली हिंसवादियों की गतिविधियों को क्या कहा जायेगा ? यह भी लेखकों को समझना होगा और तय भी करना होगा कि क्या वे ऐसी व्यवस्था दे सकेंगे जिसमें पुलिस की कोई आवश्यकता न हो इसलिए केवल सलवा जुडूम की आलोचना करना और सलवा जुडूम जैसे गांधीवादी मार्गों के लिए विवश हुए आदिवासियों की ओर से कहने के समय मौन साध जाना प्रजातांत्रिक दृष्टि से नक्सली होना ही है क्योंकि नक्सली यही कर रहे हैं। नक्सली केवल हिंसक होना नहीं हिंसक विचारों का अनुसमर्थन करना भी है । यदि ऐसे लेखक जो सलवा जुडूम को आदिवासियों का दमन निरूपित करते नहीं थकते तो उन्हें एकाध बार यह कहते हुए भी सुना जाना चाहिए कि प्रजातंत्र में हिंसा, दमन, आतंक के सहारे आदिवासियों का कौन सा भला नक्सली करने जा रहे हैं ? ऐसे लेखकों को इसलिए भी नक्सलवादी माना जाना चाहिए क्योंकि वे अपने विचारों से अंततः खूनी संघर्ष को प्रोत्साहित कर रहे हैं । यदि उनकी बौद्धिकता में नौकरी पेशावाले पुलिस द्वारा हिंसक नक्सलियों का दमन ही मानवाधिकार का प्रश्न है और आदिवासियों की निर्मम हत्या और शोषण नक्सलवादियों की राजनीतिक संघर्ष का परिणाम है तो भी ऐसे लेखकों को इसी श्रेणी में रखने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए ।


सच्चा लेखक अंधा नहीं होता । काना नहीं होता । उसे सबकुछ दिखाई देनी चाहिए । यदि वह वही देखता है जिसे किसी खास गुट के द्वारा दिखाया जा रहा हो तो वह निश्चित रूप से अविश्वसनीय है ।
यहाँ एक प्रश्न यह भी उठता है कि सलवा जुडूम का विरोध करने वाले और आदिवासियों के हितचिंतक बने बैठे ऐसे लेखकों ने कभी भी उन मौत के सौदागर बने नक्सलियों का कभी विरोध नहीं किया जो सलवा जुडूम से पहले भी आदिवासियों की जघन्य हत्या के बल और आंतक पर प्रजातंत्र को ध्वस्त करने पर आमादा थे । तब शायद ही किसी ऐसे लेखक ने आदिवासियों के नक्सलियों द्वारा किये जा रहे मानवाधिकारों के हनन का प्रश्न उठाया हो । कभी इसे लेकर दुबले हुए हों । ऐसे लेखक को क्योंकर नक्सलवादी नहीं कहा जा सकता जो पुलिस को इंसान नहीं मानते, जो मौत के घाट उतारे जाने के लिए ही विवश नहीं है । जिस लेखन में नक्सलियो की गोली से मारे जाने वाले पुलिस के लिए कोई जगह न हो किन्तु पुलिस की गोली से मारे जाने वाले दुर्दांत नक्सलियों के लिए आँसूओं का विशाल भूगोल हो उसे नक्सली न माना जाये तो क्या माना जाये ।


यदि लेखक के अनुसार अप्रैल, 2008 में 'सलवा-जुडूम' के सन्दर्भ में छत्तीसगढ़ की सरकार से सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था: 'यह सीधे-सीधे कानून-व्यवस्था का सवाल है। आप किसी भी नागरिक को हथियार थमाकर यह नहीं कह सकते कि जाओ, हत्याएँ करो! आप 'भारतीय दंड संहिता' की धारा 302 के तहत अपराध के उत्प्रेरक ठहराये जायेंगे।' तो इसका लेखक को सर्वोच्च न्यायालय के उस मार्गदर्शी राय का आशय यह भी नहीं लेना चाहिए कि बस्तर में नक्सलवाद से संत्रस्त आदिवासी अपनी आत्मरक्षा भी न करें । उनकी गोलियों के सामने अपने बहु-बेटियों, भाई-बेटों को केवल खड़ा करता चला जाये । यानी चुपचाप नक्सवाद के सामने अपने घुटने टेक दें ।


सर्वोच्च न्यायालय के मार्गदर्शी राय, जिसे न्यायलयीन शब्दावली में आबीटर-डिक्टा कहा जाता है वह जजमेंट नहीं होता और वह प्रकरण अभी भी न्यायालय में विचाराधीन है यह नक्सली तथा उनके समर्थक बुद्धिजीवी तथा लेखक भली-भाँति जानते हैं । इसी प्रकार यह भी झूठा प्रचार किया जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने विनायक सेन को इसलिये bail पर छोड़ दिया गया क्योंकि सेन के खिलाफ़ कोई केस नहीं बनता, जबकि हक़ीक़त यह है कि आज भी सत्र न्यायालय में विनायक सेन के ख़िलाफ़ केस चल रहा है । यह तो कानून पढ़नेवाला विद्यार्थी भी जानता है कि bail देने का तात्पर्य यह नहीं कि केस ही नहीं बनता । यह सब प्रचारित कर माओवादी समर्थक सभी को गुमराह करने में लगे हुए हैं ।


ऐसे न्यायलीन दिशाबोधों में सिर्फ अपने मतलब की सिद्धि से नाच उठने वालों को क्या बस्तर का हितैषी लेखक माना जा सकता है ? आदिवासियों का हितैषी लेखक माना जा सकता है ? मानवता का हितैषी लेखक माना जा सकता है ? प्रजातंत्र का हितैषी माना जा सकता है ? विकास का रास्ता तलाशनेवाला लेखक माना जा सकता है ? प्रजातंत्र की ख़ामियों के बरक्स विकास की कथित नयी दृष्टि देनेवाला लेखक माना जा सकता है ? प्रश्न यह भी कि इसका उत्तर क्या सिर्फ़ सरकारे देंगी, पुलिस ही देगी ? जनता नहीं देगी ? ऐसे लेखक नहीं देंगे? ऐसे मानवाधिकारवादी नहीं देगें ? यदि जनता के तथाकथित सरोकारों से जुड़े ऐसे लेखक सुरदासीय तत्ववेत्ता बने रहने चाहते हैं तो यह भी स्पष्ट है कि वे लेखक नहीं कलंक हैं । जन सरोकारों के समर्थन में उत्तेजित होकर उठ खड़े होने वाली एकांगी प्रतिबद्धता से वास्तविक जनविकास असंभव है । न प्रजातंत्र में, और माओवाद में तो संभव भी नहीं है । यदि ऐसा होता तो माओ लेखकों से यह न कहते किः-


“सभी प्रकार की वस्तुओं पर सूक्ष्म रूप से ध्यान दो, उनका ज्यादा से ज्यादा निरीक्षण करो, और अगर आपने थोड़ा बहुत निरीक्षण किया है, तो उनके बारे में मत लिखो”
असल सवाल सिर्फ यही नहीं है कि क्या किसी संवैधानिक लोकतांत्रिक राज्य को 'सलवा-जुडूम 'जैसा अभियान चलाने का हक़ दिया जा सकता है?असल सवाल यह भी है कि क्या संवैधानिक लोकतांत्रिक राज्य के मूल्यों की निरंतरता में अभियान कौन चलायेगा ? क्या नक्सली छत्तीसगढ़ में ऐसा कर रहे हैं जिनके लिए उन्हें राज्य सरकार द्वारा सम्मानित किया जाना चाहिए और उनकी ऐसी संदिग्ध गतिविधियों को संवैधानिक लोकतंत्र के लिए मान्य किया जाना चाहिए ? यदि लेखकों के पास इसका उत्तर नहीं है तो वे स्वयं समझ सकते हैं कि वे किसके भाड़े पर ऐसा लिख रहे हैं ? और ऐसे लेखन का अंततः प्रभाव प्रजातंत्र में किस ओर हो सकता है ? क्या नक्सलवादी संवैधानिक लोकतांत्रिक राज्य तंत्र को संपुष्ट कर रहे हैं ? यदि वे नहीं कर रहे हैं तो भी क्या नक्सलवादियों के जुल्म से निपटने के लिए आदिवासियों के साथ खड़े नहीं होना चाहिए ? और इस रूप में ऐसे लेखकों उस राज्य सरकारों पर भी विश्वास करना होगा जो संवैधानिक लोकतंत्र की परिधि में रहकर कार्य कर रही है । और वह इसलिए कि वे एकतरफ़ा संवैधानिक लोकतांत्रिक राज्य के मूल्यों, कानूनों, हकों का लाभ नहीं उठा सकते, उसका दंभ भी नहीं भर सकते ।


न केवल विश्वरंजन के मुताबिक़ बल्कि 2 करोड़ जनता की दृष्टि में 'सलवा-जुडूम' के आलोचक वे नक्सली हैं, जिन्होंने तमाम मानवाधिकार संगठनों, गैर-सरकारी संगठनों और जनतांत्रिक आन्दोलनों में घुसपैठ कर ली है। या यदि विशुद्ध हथियारबंद नक्सली नहीं भी हैं, तो उन्हें 'लोजिस्टिक सपोर्ट' देनेवाले हैं। संगी-साथी हैं- जैसे बिनायक सेन। विनायक सेन यदि नक्सलियों के हमदर्द नहीं होते तो उनकी जमानत पर रिहाई में समूचे बस्तर में नक्सलियों द्वारा हर्षोल्लास भरा त्यौहार जैसा माहौल नहीं मनाया जाता । इतना ही नहीं, वे कभी न कभी उन आदिवासियों के लिए भी दो आँसू ज़रूर जुटा लिये होते जिनके वे हितैषी होने का अंतरराष्ट्रीय प्रचार करते रहे हैं ।


'तहलका' (अँग्रेज़ी) के जिस कथित ताज़ा अंक में उन आदिवासी युवतियों के विस्तृत बयान का जिक्र करते हुए लेखक ने उनके साथ 'ख़ास पुलिस अफ़सरों'(एसपीओज़) व आम पुलिस की मदद से नृशंस बलात्कार का सवाल खड़ा किया है । इसके संबंध में लेखक की जानकारी मूलतः एकांगी और अपूर्ण है । एकांगी इसलिए कि संवैधानिक नियमों, कानूनों के तहत लगभग सभी दोषी सिद्ध हुए तत्वों को दंडित करने क प्रक्रिया जारी है । और यह बिजली के किसी स्वीच को दबाने से संभव नहीं है । जहाँ तक ऐसे नृशंस बलात्कार का सवाल है वह नक्सलियों द्वारा किये जा रहे यौन शोषण के सामने कुछ भी नहीं है । ऐसे लेखकों के समक्ष एक घटना का जिक्र करना लाजिमी होगा जिसमें नक्सलियों के यौन शोषण से प्रताड़ित और गर्भवती आदिवासी महिला ने इसलिए अपने बच्चे को जन्म देने से इंकार कर दिया क्योंकि वह अपने बेटे को नक्सली का बेटा नहीं साबित करना चाहती थी । न केवल आदिवासियों बल्कि संपूर्ण मानवता के हिमायती लेखक ऐसी घटनाओं के दौरान कहाँ चले जाते हैं, समझ से परे नहीं हैं ।


लेखक का लगता है किसी भी संवैधानिक तंत्र पर कोई विश्वास नहीं है । और नक्सकलियों की भी नीति है कि किसी भी डेमोक्रेटिक युनिट पर विश्वास न करो किन्तु ज़रूरत और समय की नज़ाकत के मुताबिक उनकी ताकतों का सहारा लो और कमजोरियों पर प्रहार करो । ठीक उसी तरह जिस तरह लेखक ने संवैधानिक तंत्र की दुहाई भी दिया है ठीक दूसरी ओर छत्तीसगढ़ पुलिस और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग' की जाँच टीम को भी प्रश्नांकित किया है । अब नक्सलियो के सिद्धांतो, रणनीतियों के सदृश कोई लेखक भी अपने तर्कों की पुष्टि करे तो उसे क्योंकर नक्सलियों या नक्सलवाद का संरक्षक लेखक नहीं कहा जाना चाहिए ?


अब ऐसे लेखकों के बारे में क्या कहा जाय जो 'फ़ोरम फॉर फैक्ट फाइंडिंग डॉक्युमेंटेशन एंड एडवोकेसी' के उसके अध्ययन की फाईंडिंग को अपने पक्ष में प्रस्तुत करके कहे कि केवल दंतेवाड़ा के दक्षिणी ज़िले में 'सलवा-जुडूम' ने बारह हज़ार नाबालिग़ बच्चों का इस्तेमाल किया है और जो यह जानबूझकर नहीं कहता कि नक्सलियों ने बस्तर, राजनांदगाँव सहित अन्य प्रभावी क्षेत्रों में प्रत्येक परिवार से नाबालिक बच्चों को घर से हकाल कर उनके हाथों बंदूक या एके राइफल थमा दिया है । लेखक को केवल वही वेबसाइट दिखाई देती हैं जो उनके पक्ष में हों, वे उन वेबसाइटों को नहीं देखते जो उनकी धज्जी उड़ाने के लिए काफी हैं । मैं इंटरनेट तकनीकी से पूर्णतः अनभिज्ञ ऐसे लेखक के प्रति क्या कहूँ तो विकीपीडिया को सर्वाधिक प्रमाणित मानते हैं । उन्हें यह नहीं पता कि यह ऐसी साइट है जिसे स्वयं पाठक ही रचता है । बहरहाल, उन्हीं के द्वारा उठाये गये मुद्दों के अनुक्रम में कहें तो 'सलवा-जुडूम' के चलते दहशत में जीनेवाले आदिवासियों की आबादी कम-से-कम डेढ़ लाख है। एक झूठ है । सच तो ऐसे लेखक भी जानते हैं कि उन्हें सलवा जुडूम की स्थिति तक लाचार बनाने नक्सलियों के कारण सारा बस्तर लगभग निर्वासित है, सांसत में है ।


चलें लेखक महोदय के अनुसार मान भी लें कि आदिवासी बड़े पूँजीवादी ताकतों के हाथों अपनी ज़मीन को बिकने से बचाने के लिए लड़ रहे हैं और ऐसे में जब उनकी सहानुभूति अर्जित करने के लिए नक्सली कूद पड़ते हैं तो आदिवासी उनका क्या करें ? यानी कि नक्सलियों के दबाब और पूर्व निर्धारित रणनीति के तहत आदिवासी को उकसाकर और उन्हें आगे रखकर उन्हें हिंसक होने पर उतारू बना दिये जायें । इसका एक मतलब यह भी है कि प्रशासन जब कानून और व्यवस्था को अधिनियमित बनाये रखने के लिए कड़ाई करे तो उसे नक्सली आदिवासियों के दमन और मानवाधिकार का मुद्दा बनाकार भी उछाल सकें । यानी कि नक्सलियों के दोनों हाथों में लड्डू होना चाहिए । उस लेखक की वह मानसिकता और एकांगी जीवन दर्शन भी अमान्य किया जाना चाहिए जिसमें वह राज्य के बरक्स आदिवासियों को हिंसा का सहारा लेने को समुचित करार दे किन्तु यदि आदिवासी ही जब ऐसे नक्सलियों के बंदूक, बम, लैड माईन्स से मरता चला जाये या उनके आंतक, शोषण से त्रस्त होकर सलवा जुडूम के रूप में एकजूट तक न हो सके । क्योंकि उससे आदिवासी की ही हानि है । लेखक का यह कितना हास्यास्पद तर्क है कि गाँधीजी के अनुसार विराट हिंसा के सामने आत्मरक्षा के लिए हिंसा का सहारा लेना पड़े तो अनुचित नहीं । लेखक को यह कब समझ में आयेगा कि नक्सलियों द्वारा निहत्थे आदिवासियों की हत्या, नवजात बच्चों का कत्ल, जवान महिलाओं का यौन शोषण, उन्हें बरगला कर माओवादी बनाना भी एक वही हिंसा है जो गांधीजी के अनुसार अमानवीय है और इस नाते वर्जनीय व निंदनीय भी । लेखक का ध्यान उधर कब तक जानेवाला है समझ से परे है ।


लेखक के ऐसे कुतर्क आश्रित अर्थशास्त्रीय चिंतन को पढ़कर शर्म आना लगता है जिसमें नक्सलियों द्वारा अवैध रूप से की जा रही उगाही, व्यापारियों से नियमित वसूली, आदिवासियों की शारीरिक और आर्थिक शोषण, अवैध तरीकों से खरीदे जा रहे शस्त्रों पर होनेवाले व्यय को खर्च नहीं माना जाता और ऐसे नक्सलियों से स्वयं को बचाने के लिए आदिवासियों द्वारा लगाये जाने वाले गुहार यानी सलवा जूडूम के एसपोज, विशेष सुरक्षा अधिकारी पर होनेवाले व्यय पर आपत्ति जताती जाती है । अर्थात् लेखक को इस बात की तनिक चिंता नहीं कि नक्सली किस तरह वैश्विक चैनलों से जूडकर अवैध अस्त्र-शस्त्र इकट्ठा कर रहा है । ऐसा लेखकीय द्वैध लेखक होने की बुनियादी गरिमा को ही ध्वस्त कर देता है जिसमें लेखक की यह बात समझ से परे है - सरकारी धन के व्यय पर सामाजिक आडिट की व्यवस्था हो पर नक्सलियों द्वारा स्थापित समानांतर अर्थव्यवस्था के ख़िलाफ़ कुछ हो चाहे न हो ।


जो प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान और उसके पदाधिकारियों द्वारा आयोजित (10-11 जुलाई, 2009, रायपुर) राष्ट्रीय आलोचना संगोष्ठी को राज्य सत्ता का आयोजन कहते हैं उन्हें हम यह चेताना चाहेंगे कि वे उन साहित्यकारों का अपमान कर रहे हैं जिनके बारे में वे जानते तक नहीं, और बहुजन हिताय बहुजन सुखाय सृजनरत हैं । लेखक को यह गर्वोत्ति शोभा नहीं देती कि वे ही सरोकारी लेखन से जुड़े हैं शेष सब भोथरे हैं । यह लेखक का बौनापन है कि वे उसकी आलोचना करें जिसके बारे में बके जा रहे हैं उन्हें न तो साम्यवाद से कोई विशेष लेना देना है न ही गांधीवाद से । उन्हें न तो माकपा पर विश्वास है न ही भाजपा या फिर कांग्रेस आदि किसी राजनीतिक विचारधारा से । सिर्फ़ समवाय संस्कृति और साहित्य के लिए । ऐसे आग उगलनेवाले साहित्यकार को कोई अधिकार नहीं कि वे किसी अन्य संस्था पर कीचड़ उछालें । कीचड़ पर पैर डालने से कीचड़ ख़ुद की क़मीज की सुफैदी को भी मैला कर देता है यह भूलाना एक लेखक के लिए कम से कम अधर्म है । अनैतिकता है । अमर्यादित चेष्टा है । शायद ऐसे टेबिल राइटिंग करनेवाले ऐसे पत्रकारनुमा लेखकों को यह भी नहीं पता होता कि उनसे हजारों, सैकड़ो कोसों दूर का साहित्यकार किस मानसिकता का है, किन विचारों का है, किसके पक्ष में है और किसके विरोध में है । जो लोग ऐसा सोचते हैं वे लोग यह भी तय मानते हैं कि लेखन सिर्फ़ विचार है । वह किसी एक वर्ग या समुदाय की हितों के प्रति प्रतिबद्धता है । शेष जाये भाड़ में..... । शेष को हाशिए में रखकर निष्कर्ष देनेवाले को तानाशाह कहा जाता रहा है यह भी कौन याद कराये ऐसे पार्टीलेखकों को ।

यह आशुतोष जैसे दूरदर्शक लेखक का दोष नहीं है जो न तो विश्वरंजन के बारे में जानते हैं न ही बस्तर के बारे में, सलवा जूडूम के बारे में तो कतई नहीं जानते । शायद वे इसीलिए प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के अध्यक्ष (न तो स्वयंभू, न ही राज्य सरकार के किसी किसी विभाग द्वारा बिठाये गये, बल्कि राज्य के लगभग सभी बड़े साहित्यकारों की कार्यकारिणी द्वारा चयनित ) के बारे में अनर्गल प्रलाप करते हुए उन्हें पुलिस महानिदेशक, छत्तीसगढ़ से जोड़ देते हैं । चीज़ों को मिक्सअप करके देखना शायद उनके लिए अपनी बात मनवाने का सरलीकरण जैसा है ।


आशुतोष की यह दोष तो माफ करने योग्य भी है कि वे सलवा जुडूम के रणनीतिकार के बारे में जानते ही नहीं तो क्यों न विश्वरंजन या किसी को भी कुछ भी अनाप शनाप गाली न बक दें । क्योंकि उन्हें नक्सलियों के स्थानीय हितचिंकतों द्वारा जैसा सिखाया-पढ़ाया जा रहा है वह वैसे ही तो बोलेंगे । जो भी हो, आशुतोष जैसे लेखक की इस बात के लिए तारीफ करनी पड़ेगी कि वे कम से कम यह सच तो स्वीकार करते ही हैं कि विश्वरंजन केवल पुलिस अधिकारी नहीं है, एक विचारवान लेखक भी हैं, जिनकी प्रजातंत्र को बचाने के लिए लेखन पर गहरी आस्था भी है । यह तो ठीक है कि किन्तु आशुतोष जैसे दया के पात्र लेखक को जाने क्यों, मुक्तिबोध के परम मित्र और सच्चे अर्थों में उन्हें मुक्तिबोध बनाने वाले आलोचक प्रमोद वर्मा, उनके नाम पर बनने वाले संस्थान, उनके पदाधिकारी साहित्यकारों, अपने पूर्वजों को याद करने के संघर्ष और आस्था और उनके नाम से होनेवाले साहित्यिक आयोजन से एलर्जी है, जो उसकी कुढ़कर निंदारस ले रहे हैं । शायद इसलिए कि वे या उनके मति से जो हो वही साहित्यिक है शेष असाहित्यिक । वे ही मनुष्य और उसकी संस्कृति के संरक्षक हैं शेष अमनुष्य और संस्कृति-भक्षक । यार अपनी दुकान पर विश्वास करो ना, क्यों दूसरे की समृद्धि देखकर अपनी नींद खराब करते हैं । फिर न तो आपको बुलाया गया है न कभी बुलाने के योग्य आप हो पायेंगे, क्योंकि प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के आयोजन में आप जैसे कुंठित और कथित लेखकों के लिए कोई जगह है भी नहीं । हाँ आप चाहें तो जिसको भड़का सकते हैं, भड़काते रहें । हम अशोक बाजपेयी की दिल्ली से यदि दिल्ली दर्प दमन जैसा कोई काम कर रहे हैं तो आपको अपनी दिल्लीवाली किले को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में लगना चाहिए न कि खिसियानी बिल्ली की तरह खम्भा नोंचना चाहिए । यदि आपको माओ भाते हैं तो गाते रहिए । व्यक्तिगत आपेक्ष क्यों लगाते हैं संस्था पर । किसी राज्य पर । किसी राज्य की आस्था पर । लेखकों की निजी अवधारणाओं पर ।


आप अपने सामान्य ज्ञान को जरा दुरुस्त करने के अंहकार से मुक्त हों तो बताऊँ कि महानुभाव, सलवा जुडूम की शुरुआत और विस्तार के समय विश्वरंजन न तो राज्य में पदस्थ थे न ही वे पुलिस महानिदेशक थे । इसलिए वे इसके रणनीतिकार भी नहीं है । जैसे आपको सलवा जूडूम में बुराई दिखती है और विश्वरंजन को अच्छाई तो यह निजी आप लोगों का विचार है । आप बस्तर के निवासी या राज्य के निवासी तो है नहीं कि पूरी तरह जान सकें कि आप जिस गिलास को देख रहे हैं वह आधा खाली है या आधा भरा हुआ । आइये दो चार साल बस्तर या छत्तीसगढ़ का निवासी बनकर देखिए, फिर बस्तर की किसी चीज़ पर बकिये.... । आपको किसी ने दूरवाला ढोल पकड़ा दिया तो उस पर मत जाइये कि वही सुहावन लगेगा ।


यह तो हमें आपसे ही पता चला कि आप जैसे लोग हिन्दी के बड़े कवि-लेखकों को समारोहों में जय-जयकार करने के लिए बुलाते हैं । अब मै आपकी मूर्खता पर क्या कहूँ कि जब आप आयोजन में ही नहीं कि किसने किसके सूर में किसे लांछित करने के लिए सुर मिलायेंगे । लगता है आप माओवादियों से अधिक कुंठित हो चुके हैं जो यह कह रहा है कि विश्वरंजन को अपनी रणनीति की कामयाबी पर गर्व क्यों न होगा! आप ईर्ष्यालु टाइप के इंसान हैं जो हमें यानी कि संस्थान के सभी पदाधिकारियों को मूर्ख और स्वयं को परम विद्वान और परम दृष्टा समझते हैं ।


मूझे आपकी टिप्पणी पर तरस आता है कि साहित्यिक संस्थान के अध्यक्ष के कर्मक्षेत्र में पुलिस प्रमुख हो जाने मात्र हो जाने से संस्थान पुलिस प्रमुख का दलाल हो जाता है । राज्य का दलाल हो जाता है । जिस कोकिया भय से आप दुबले हुए जा रहे हैं। इसका मतलब तो यही हुआ कि यदि आप किसी लेखक संगठन के प्रमुख हों और आपको कोढ़ है तो सभी को कोढ़ हो जायेगा । क्या आप बताना चाहेंगे कि आपके ऐसे कितने मित्र पुलिस या सेना में नहीं है और जो पुलिस या सेना के कथित अत्याचार से अधिक अत्याचार अपने पत्नी, परिवार, समाज, देश के साथ कर रहे हैं । क्या आप यह भी बताना चाहेंगे कि आपके ऐसे कितने मित्र लेखक पुलिस में हैं जिन्हें पुलिस में नहीं होना चाहिए तो क्या आपने उनसे इस्तीफा लिवाया ? या वे इस्तीफा देंगे ।

मित्र औरों पर थूकना छोड़ो, अपना काम देखो, आपका हम साहित्यकारों पर यह इल्जाम किसी भी कोण से फबता नहीं है । फिर आप कब से हमारे विरोधी हो गये जिसकी पाइप लाइन काटने के लिए राज्य के हम साहित्यकार सांस्कृतिक सलवा जूडूम चला रहे हैं । और आपको कैसे पता चल गया कि अमूक हमारा सहयोगी है, इसका मतलब तो यह भी हुआ कि वह आपका विरोधी है । और आपका काम केवल विरोध करना ही है । अपने खोल से बाहर निकलिए, दुनिया को देखिये, दुनिया की गति को देखिये, यदि दुनिया की गति को नहीं देखेंगे तो पिछड़ जायेंगे, क्योंकि यदि आपके जीवन मे गति ही नहीं रह जायेगी तो फिर वहाँ क्या बचेगा । माओवादी के देश में भी गति को पकड़ी जा रही है और आप हैं कि वही पुराना राग अलापे जा रहे है......


आपको संस्थान की ओर से यह भी आगाह कराया जाना आवश्यक है कि आप संस्थान के अध्यक्ष श्री विश्वरंजन पर टिप्पणी करते वक्त उनके पुलिस महानिदेशक होने को लेकर अपनी आपत्ति का घालमेल न करें । उसे आप निजी तौर पर रखें । आपका यह कार्य संस्थान की दृष्टि में आपत्तिजनक भी है । आशा है आप भविष्य में सोच समझकर संस्थान के प्रति टिप्पणी किया करेंगे ।

राम पटवाप्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, छत्तीसगढ़

7/25/2009

नक्सली घटना पर देश भर के लेखक एकमत हुए

देश भर के लेखकों ने की तीव्र भर्त्सना
रायपुर । छत्तीसगढ़ में बढ़ते हुए नक्सली घटना की भर्त्सना करते हुए देश भर के लेखकों ने मदनवाड़ा के नक्सली एंबुश में मारे गये शहीदों के प्रति श्रद्धांजलि दी है ।

प्रख्यात कवि और आलोचक अशोक बाजपेयी ने कहा है कि इस समय नक्सलियों द्वारा कई राज्यों में लगातार जो हिंसा हो रही है उसके बारे में तमाम क्रांति धर्मी लेखक चुप्पी क्यों साधे हुए हैं यह समझ में आना कठिन है । वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति की परंपरा में ही यह चुप्पी है । 20वीं शताब्दी में हम देख आये हैं कि हिंसा और हत्या से सच्ची क्रांती नहीं होती और अगर उसके होने का कुछ देर के लिए भ्रम हो भी जाये तो उसकी परिणति भी देर सवेर हिंसा और हत्या में हीं होती है ।

प्रख्यात कवि चंदकांत देवताले, उज्जैन हिंसा के सभी आयामों पर प्रतिबंध लगाने की अपील करते हुए कहा है कि मौत से प्राप्त की जानेवाले सत्ता का अंत अततः मौत में होती है, वहाँ विकास मायने नहीं रखता । नक्सलवाद की जड़ों में जाकर ही इसका हल निकाला जा सकता है । केवल हिंसक वारदातों से नहीं ।

कोच्चि, केरल के प्रख्यात लेखक ए. अरविंदाक्षन ने मदनवाड़ा की घटना को विकास विरोधी लोगों और संगठित अपराधियों की करतूत निरूपित करते हुए कहा कि सत्ता के लिए जब भी कोई वाद या दल हिंसा का सहारा लेने लगता है वह उसी समय से लक्ष्यच्यूत हो जाता है । लोगों का विश्वास उससे किंचित भी नहीं रह जाता है । आदिवासियों के विकास के बहाने से हिंसा को कभी भी और किसी भी दृष्टि से तवज्जो नहीं दी जानी चाहिए ।

जयपुर के गांधीवादी लेखक नंदकिशोर आचार्य ने नक्सलियों के करतूत को अहिंसा के ख़िलाफ़ और लक्ष्य से भटके हुए ऐसा हितैषी निरूपित किया है जिसे अपने लक्ष्य के अलावा अन्य सभी गतिविधियों पर ही रूचि रह गई है ।

मध्यप्रदेश साहित्य परिषद के प्रमुख और साक्षात्कार के संपादक डॉ. देवेन्द्र दीपक ने नक्सवाद को प्रजा विरोधी अवधारणा बताते हुए विश्व आंतकवाद का एक पहलू बताया है । उन्होंने कहा है कि ऐसे हिंसक तत्वों को अस्त्र शस्त्र पहुंचाने में जिनका हाथ है उनकी भी ख़बर ली जानी चाहिए । ऐसी समस्यायें केवल राज्य, व्यवस्था के लिए ही नहीं समूची मानव जाति के लिए भी अहितकर हैं । विडम्बना कि ऐसे विचारों के प्रति भी कुछ विघ्नसंतोषी मीडियाबाज सहानुभूति रख रहे हैं, अब समय आ गया है कि ऐसे तत्वों की पहचान भी राज्य सरकारें करें ।

धर्मयुग के पूर्व उप संपादक मनमोहन सरल, मुंबई ने कहा है कि छत्तीसगढ़ और साथ ही लालगढ़ की नक्सली हिंसा इस स्वरूप की भर्त्सना करते हुए मैं यह सोचता हूँ कि हमें इस समय की गहराई तक जाना चाहिए । असंतोष के कारणों की मीमांसा करनी चाहिए । केवल दमन से ही समस्या का फौरी हल भले ही हो जाये पर बिना इसके मूल तक जाये इसका स्थायी समाधान नहीं हो सकता । प्रयास इसी दिशा में करने होंगे ।

चर्चित आलोचक द्वय श्री भगवान सिंह,भागलपुर और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राध्यापक कृष्ण मोहन ने नक्सलियों द्वारा मदनवाड़ा में किये हिंसा को मनुष्य समाज के खिलाफ़ एक जघन्य षडयंत्र निरूपित करते हुए उन पर तत्काल कड़ाई से राज्य और केंद्र सरकार को निपटने का आग्रह किया है । ऐसी घटनाओं को हर विचार, हर कोण, हर दृष्टि से निंदनीय ही माना जाना चाहिए । यदि ऐसी घटनाओं को किन्ही उथले विचार के सहारे समर्थन मिलता है तो वह देश, समाज और समय के खिलाफ ही जायेगा ।

प्रख्यात आलोचक और कवि प्रभात त्रिपाठी, रायगढ़ ने अपने विचार रखते हुए कहा है कि प्रजातंत्र का विकल्प कोई भी हिंसक तंत्र नहीं हो सकता अतः नक्सलवाद मूलतः अपने लक्ष्य के साधनों की विश्वसनीयता खो चुका है । ऐसी घटनाओं को अराजक आक्रोश और मानवविरोधी माना जाकर उनका पूर्ण मनोयोग से जनता को जबाव देना ही होगा ।

शिरीष कुमार मौर्य, कवि, नैनीताल ने लिखा है कि मैं ऐसी किसी भी घटना का पुरजोर विरोध करता हूँ। विचार कहीं पीछे छूट रहा है और उसके नाम पर इस तरह का जो कुछ भी घट रहा है वह खेदजनक है। मृतकों को मेरी श्रद्धांजलि ।

प्रख्यात लेखक डॉ। हरि जोशी, इंदौर ने कहा है कि मदनवाड़ा की घटना को मुंबई में हुए आतंकी हमला से कम नहीं समझा जाना चाहिए । राजनांदगाँव के अपराधियों को कठोरता से जल्द से जल्द दंडित किया जाना चाहिए।

रायगढ़ के कवि और आलोचक डॉ. बलदेव ने कहा है कि यह मात्र राज्य सरकार की समस्या नहीं । यह केवल पुलिस की ड्यूटी नहीं कि वह आपके छत्तीसगढ़ को नक्सली विपदाओं से मुक्त बनाये रखे । यह वक्त निर्णय लेने की घड़ी है कि आप किसका वरण करना चाहते है ? माओवादी हिंसक तंत्र का या प्रजातंत्र का । अब पानी सिर से उतर चुका है । हर बच्चा बोले, हर युवक बोले, माँएं बोले, रिक्शावाला बोले, किसान बोले, मज़दूर बोले, अधिकार बोले। बोलें कि बस्स बहुत हो चुका, सिर्फ़ पुलिस ही नहीं लड़ेगी हम लडेंगे भी और नक्सलवादियों के ख़िलाफ़ बोलेंगे भी

सुशील कुमार, साहित्यकार, दुमका, झारखंड का मानना है कि नक्सली अब आंतकी का रूप ले रहे हैं। ये समाज और राष्ट्र के उसी तरह दुश्मन भी बन गये हैं। इनकी न सिर्फ़ भर्त्सना, बल्कि खात्मा के लिये सरकार और जनता, दोनों को आगे आना होगा। नक्सली अब उसी ऐशोआराम में जी रहे हैं जिस प्रकार शोषक वर्ग रहा करते हैं/थे। इनके भी बच्चे अब बड़े स्कूलों में पढ़ते हैं। इनका भी काफ़ी बैंक-बैलेन्स होता है। अत: नक्सलवाद अब जनांदोलन नहीं, पेट पालने का धंधा भी है।अब हमें ये उल्लू नहीं बना सकते।

आचार्य संजीव सलील, संपादक, नर्मदा, जबलपुर का विचार है कि नक्सलवाद वैचारिक रूप से पथ से भटके हिंसावादी हैं, जो किसी नीति-न्याय में विश्वास नहीं करते। शासन और प्रशासन को योजना बनाकर इन्हें समूल नष्ट कर देना चाहिए। ये न तो उत्पीडित हैं, न किन्ही सामाजिक अंतर्विरोधों का प्रतिफल। कुछ बुद्धिजीवी अपनी सहानुभूति देकर इन्हें पनपाते हैं । ये पौराणिक राक्षसों के आधुनिक रूप हैं जो अन्यों के मानवाधिकारों की रोज हत्या करते हैं और जब मरने लगते हैं तो खुद के मानवाधिकार की दुहाई देते हैं। आपनी साथी महिलाओं से बलात्कार करने में इन्हें संकोच नहीं होता। हिंसा पंथी कहीं भी, किसी भी रूप में हों, समूल नष्ट किये जाएँ। इनकी हर गोले का उत्तर सिर्फ और सिर्फ गोली से दिया जाना ज़ुरूरी है। सामान्य न्याय व्यवस्था नियम-कानून का सम्मान करनेवाले भद्रजनों के लिए है। आतंकवादियों को सामान्य कानून का लाभ नहीं देकर तत्काल ही गोले से मार दिया जाना चाहिए ।

देश के प्रख्यात गीतकार स्व. पं. नरेन्द्र शर्मा की बेटी लावण्या शाह, अमेरिका ने कहा है कि जब आदीवासी प्रजा पर अत्याचार होते हैँ तब वहाँ की दूसरी कौम चुप रहती है ? बस्तर के आदिवासियोँ की कोई मदद नहीँ करता ? ऐसा क्यूँ ?

ग़ज़लकार और रचनाकार के संपादक रवि रतलामी ने मदनवाड़ा में हुए नक्सली वारदात को देश का घृणित दुष्कर्म बताया । यह माओवादियों की हताशा से उपजी हिंसा है । राज्य की पुलिस प्रमुख के नेतृत्व में जिस तरह पुलिस प्रशासन इससे जान गँवाकर भी जूझ रही है वह वंदनीय है । माओवादियों के लिए अब माओ माओ नहीं रह गये, वे खाओ, पीओ और जीओ के प्रणेता की तरह लिये जाने लगे हैं । यह प्रजातंत्र के लिए ही नहीं स्वयं नक्सलियों के लिए घातक होगा । जनता को बंदूक से नहीं प्रेम का संदूक सौंपकर ही रिझाया जा सकता है । बस्तर और छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के तथाकथित पक्षधरों का पर्दाफ़ाश हो चुका है अब इनका नाश कऱीब है ।
सभी शहीदों को शत-शत नमन करते हुए अशोक सिंघई, भिलाई ने कहा है कि राज व्यवस्था और नक्सलवादी हिंसक आन्दोलनों के मध्य एक अनंतिम महासमर है जो कि समाप्त होता नहीं दिखता है। छापामार तरीकों से यृद्ध जब भी होता है सदैव चिन्हित व बड़े पक्ष को ही हानि होती है। नक्सली पक्ष जंगों में छिपा और अचिन्हित है अतः कार्यवाही के परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं। जन-संसाधनों का संहार राष्ट्रीयय क्षति व अपराध है। इसका हल प्रशासन के पास नहीं वरन राजनीति के पास ही मिल सकता है। यह राजनीति की दुरभिसंधियाँ ही हैं जो इस समस्या को जीवित रखे हुए हैं क्योंकि राजनीति को इन्हीं सबसे प्राणवायु मिलती है। राजनीति और मीडिया में कुछ प्रश्न पुलिस विभाग की भूमिका को लेकर उछाले जा रहे हैं। माननीय मुख्य मंत्री डा. रमन सिंह के वचन, धैर्य और प्रशासनिक चतुरता के बल पर बहुत कुछ बिखरने और बिगड़ने से अभी भी बचा हुआ है। अभी वक्त पुलिस प्रषासन को नसीहतें देने का नहीं वरन सद्भावनायें, सहानुभूतियाँ और शुभकामनायें देने का है।

डैलास, अमेरिका के रेडियो उद्घोषक और लेखक आदित्य प्रकाश सिंह ने अपनी श्रद्धांजलि मे कहा है कि नक्सलवाद केवल छत्तीसगढ़ की विपदा नहीं है । यह केवल विकास के अभाव से उपजा नहीं है । इसके मूल में है चीन के माओवादी ताकतों का विस्तार । भारत इसके लिए न कभी तैयार हुआ है, न कभी भविष्य में वह प्रजातंत्र के विकल्प में उसे स्वीकार करेगा । देश के गृहमंत्री ठीक ही कहते हैं कि अब तक चूक ही हुई है । अब वक्त आ गया है कि उन्हें जड़ से उख़ाड़ फेंका जाये ।

हिन्दी के चर्चित ब्लॉग लेखक जीत भार्गव ने माना है कि वामपंथियों ने हिन्दी, और हिन्दुस्तान का कबाडा किया है। वास्तविकता यह है कि भारत की अधोगति में इन प्रगतिशीलों को सुकून मिलता है। जनता के नरसंहार को यह जनवादी सही ठहराते हैं ।

कवि और साहित्य-शिल्पी के युवा संपादक राजीव रंजन प्रसाद ने लिखा है कि बस्तर और आदिवासी की समझ नहीं रखने वाले अपनी लफ्फाजियों से ही बाज आ जायें तो बडा परिवर्तन हो जायेगा। माओवादियों के समर्थक साहित्यकारों का बहिष्कार आवश्यक है।

दैनिक हरिभूमि, दैनिक भास्कर और वर्तमान में पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग प्रमुख संजय द्विवेदी ने मदनवाड़ा की जघन्य हत्या को जाबांज पुलिस कर्मियों का विजय बताया है कि उन्होंने उस युद्ध की शुरुआत कर दी है – जान गँवाकर भी कि अब हिंसक तत्वों को किसी भी कीमत में राज्य में पनपने नहीं दिया जायेगा । यह घटना उन्हें श्रद्धांजलि देने के अलावा स्वयं को ऐसी राष्ट्रद्रोही गतिविधियों के प्रति सतर्क रहने की भी सबक है । नक्सलवाद आंतकवाद का घरेलू संस्करण है जिसे बिना आंतकवाद माने निजात नहीं पाया जा सकता है । अब केंद सरकार को भी ऐसी समस्याओं पर बिना राजनीति किये जूझने के लिए तैयार होना होगा । प्रतिपक्ष में खड़े राजनीतिक दल अब तय करें कि माओवादी हिंसक नक्सली उनके भी खिलाफ़ है। हर उस व्यक्ति के खिलाफ हैं जो प्रजातंत्र की वकालत करता है, उस पर श्रद्धा करता है ।

स्वीड़न निवासी रेडियो संचालक और कवि चांद शुक्ला ने माओवादी हिंसा की कटू आलोचना करते हुए इसे प्रजातंत्र के लिए ख़तरा बताया है । उन्होंने कहा है कि नक्सलवाद की समस्या मात्र छत्तीसगढ़ की समस्या नहीं अपितु समूचे भारत की समस्या है, जिससे निपटने के लिए सारे देशवासी को आगे आना पड़ेगा ।

कार्टूनिस्ट अजय सक्सेना, अजय श्रीवास्तव ने कहा है कि हिंसा पर उतारू नक्सलियों को सबक सिखाने का अंतिम समय आ चुका है, उनसे अब किसी प्रकार की बातचीत की संभावना क्षीण हो चुकी है ।

मदनवाड़ा नक्सली हिंसा की निंदा करने वालों में अन्य प्रमुख लेखक हैं – शिवकुमार मिश्र, खगेन्द्र ठाकुर, प्रभाकर श्रोत्रिय, गंगाप्रसाद बरसैंया, रमेश दवे, अशोक माहेश्वरी, ओम भारती, एकांत श्रीवास्तव, मुक्ता, रंजना अरगड़े, अरूण शीतांश, डॉ. बृजबाला सिंह, नंदकिशोर तिवारी, राजेन्द्र परदेसी, डॉ. नैना डेलीवाला, राजुरकर राज, नवल जायसवाल, सुशील त्रिवेदी, आनंद कृष्ण, संतोष रंजन, राम पटवा, जयप्रकाश मानस, अशोक सिंघई, मुमताज, रवि श्रीवास्तव, बी. एल. पॉल, कमलेश्वर, सुरेश तिवारी, तपेश जैन, कुमेश जैन, हीरामन सिंह ठाकुर, संजीव ठाकुर, डॉ. राजेन्द्र सोनी, डॉ. चित्तरंजन कर, श्रीमती माधुरी कर, गौतम पटेल, डॉ. जे. आर. सोनी, राम शरण टंडन, डॉ. अजय पाठक, एस. अहमद, वंदना केंगरानी, चेतन भारती, भारती बंधु ।

7/22/2009

दिल्ली दर्प दमन


एक सहचर की याद
अशोक वाजपेयी

वे गजानन माधव मुक्तिबोध और हरिशंकर परसाई के सहचर थे । किसी हद तक श्रीकांत वर्मा के भी । मुक्तिबोध को उनके जीवनकाल में यह जताने वाले कि वे एक बड़े लेखक हैं। जो छह सात लोग थे उनमें से वे एक थे । परसाईजी के भी अभिन्न थे और उनकी कई बार सक्त आलोचना की परसाई जी इज्जत करते थे- सारी दुनिया को खरी-खोटी सुनाने वाले केा ख़ुद को खरी खोटी सुनाने वाला भी आख़िर चाहिए ही था । यह दावा करना अनुचित न होगा कि प्रमोद वर्मा की इन दोनों लेखकों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका रही है । लगभग 9 वर्ष पहले वे देहावसन के बाद उन्हें याद करते हुए एक बड़ा मानवीय गरमाहट और बौद्धिक ऊर्जा भरा आयोजन रायपुर में पिछले सप्ताह हुआ । अनेक दृष्टियों के लेखक आदि एकत्र हुए प्रमोद वर्मा के अवदान पर और उस बहाने आज की आलोचना पर व्यापक और खुला विचार हुआ । इस अवसर पर राधाकृष्ण प्रकाशन ने चार खंडों में उनका समग्र भी विश्वरंजन के स्नेह और आदरयुक्त संपादन में प्रकाशित किया । सामग्री जुटाने और व्यवस्थित कर छपाई के लिए देने के बाद पता चला कि लगभग पाँच सौ पृष्ठों की सामग्री और है जिसे बाद में शामिल किया जा सकेगा।
प्रमोद वर्मा की आस्था सामान्य तौर पर वामपंथी थी । लेकिन किसी तरह की कट्टरता से वे मुक्त थे । उन दिनों यानी सत्तर अस्सी के दशक में वे अज्ञेय और मुक्तिबोध के समान रूप से प्रशंसक थे । यह एक बड़ा कारण है कि प्रगतिशील आलोचकों की सूची में उनका नामोल्लेख नहीं होता है । इसे रेखांकित करते हुए नंदकिशोर आचार्य ने यह भी कहा कि प्रमोद जी के लिए स्वतंत्रता परम मूल्य थी और वे उसे किसी प्रतिबद्धता के दबाव में तजने के तैयार नहीं थे ।

इस अवसर पर प्रमोदजी पर निबंधों का एक संचयन न होना प्रमोद वर्मा का यश पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित किया गया है और एक स्मारिका भी निकाली है । उसमें प्रमोजी के इन कथनों की ओर ध्यान जाता हैः-


‘‘जब संसार की कागद की पुड़िया है तो उस पर लिखे शब्द तैरकर पार उतर जायेंगे ऐसा मैं अपने सबसे कमज़ोर और आत्ममुग्ध क्षणों में भी नहीं सोचता । मुझे ये सिर्फ़ इतना जताती है कि इन्हें रचते हुए मैंने अपने आप को किस तरह नष्ट या हासिल किया है ।


‘‘कवि शब्द की दुनिया में स्वयं को खोजा करता है । कवि अपने देश और काल को नहीं लिखता। वस्तुतः वह अपने अनुभवों और सपनों को शब्द देता है । पाब्लो नेरूदा की प्रेम कविताएँ मुझे अच्छी लगतीं हैं उन्हें पढ़ते हुए मुझे रसखान की याद आती है ।


‘‘जन साधारण की बात चित्रपट के माध्यम से लोकरंजन करने वालों पर छोड़ देनी चाहिए । साहित्य सहृदय और गुणी जनों की रूचि का विषय है ।


‘‘प्रगतिशील लेखक मछली पकड़ने के लिए तो जाल का उपयोग कर सकता है लेकिन कलावादियों की तरह कुहरा पकड़ने के लिए नहीं।


सच में सबसे बड़े कवि हर भाषा में अज्ञात नाम-कुल-शील असंख्य कवि जन ही हुआ करते हैं । जैसे क्रांति के वास्तविक नायक असंख्य इत्यादि जन हैं ।


सत्य का संधान होता है और सौंदर्य का सृजन । ख़तरा तब होता है जब हम सत्य का सृजन करते हैं और और सौंदर्य का संधान । प्रेम करना गैरकानूनी नहीं है। हिंसा बेहक गैरकानूनी है ।

छत्तीसगढ़ ने अपने एक लेखक को ऐसे उत्साह समझ और जतन से याद किया यह बड़ी बात है । ख़ासकर आज के स्मृति और कृतज्ञता वंचित परिवेश में । इस अवसर पर श्री भगवान सिंह और कृष्णमोहन को प्रमोद वर्मा पुरस्कार भी प्रदान किए गए । महानगरों से दूर जो सृजन और आलोचना सशक्त रूप से सक्रिय है उसका यह उचित ही स्वीकार है । किसी हद तक दिल्ली दर्प दमन भी । पता चला है कि कुछ लेखक स्वीकृति देकर इसलिए नहीं आये कि छत्त्तीसगढ़ में नक्सलियों का राज्य सत्ता जनसंहार कर रही है । दुर्योगवश समारोह समापन के अगले दिन नक्सलियों ने एक पुलिस अधीक्षक और लगभग चालीस पुलिस कर्मियों की हत्या कर दी । इस समय नक्सलियों द्वारा कई राज्यों में लगातार जो हिंसा हो रही है। उसके बारे में तमाम क्रांति धर्मी लेखक चुप्पी क्यों साधे हुए हैं यह समझ में आना कठिन है । वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति की परंपरा में ही यह चुप्पी है । 20वीं शताब्दी में हम देख आये हैं कि हिंसा और हत्या से सच्ची क्रांती नहीं होती और अगर उसके होने का कुछ देर के लिए भ्रम हो भी जाये तो उसकी परिणति भी देर सवेर हिंसा और हत्या में हीं होती है ।

प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान भी स्थापित किया गया है उसकी एक महत्वाकांक्षी योजना है । छत्तीसगढ़ में दुर्भाग्य से राज्य शासन ने संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक संस्थागत उपाय नहीं किए हैं । साहित्य, संगीत नाटक और ललित कला की राज्य अकादमियाँ अब तक गठित नहीं हुईं हैं । जिस अंचल में हाल ही में मुक्तिबोध, श्रीकांत वर्मा, प्रमोद वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल, प्रभात त्रिपाठी आदि लेखक हुए हैं वहाँ ऐसी उदासीनता और निष्क्रियता संवेदनशीलता और जिम्मेदारी से बचने के बराबर है । स्वयं इस आयोजन में यह प्रकट हुआ कि बख्शी पीठ पर रहकर प्रमोद जी के छत्तीसगढ़ की युवा पीढ़ी को रूपायित करने में कितनी बड़ी भूमिका निभाई । यह पीठ पहले की राज्य सरकार द्वारा स्थापित है । नया संस्थान कवि विश्वरंजन के नेतृत्व में इस शून्य को भर सकता है । ऐसे कम लोग बचे हैं (और प्रशासन में प्रायः बिल्कुल नहीं) जो साहित्य से ऐसा अनुराग रखे और जो अपने पूर्वज लेखकों के प्रति सामाजिक कृतज्ञता ज्ञापन के लिए ऐसे प्रयत्न करे जैसे कि विश्वरंजन और उनके सहयोगी कर रहे हैं ।
(कभी-कभार, जनसत्ता, १९ जुलाई, २००९ दिल्ली)

7/16/2009

कविता लिखनेवाला अधिक लड़ता है


डॉ. बलदेव
मुख्यमंत्री डॉ। रमन सिंह बहुत ठीक कहते हैं कि राज्य में कविता और लड़ाई साथ चलेगी। यह सिर्फ़ विश्वरंजन से मतलब नहीं सधनेवाले विरोधियों को दिया गया जबाव नहीं अपितु उन सारे बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, मीडियाकरों को भी चेतावनी है कि भाई, जिस तरह से आपने हिंसक और अराजक माओवादी और भ्रामक और पक्षपातपूर्ण तरीक़े से मानवाधिकार की वकालत की है उससे जुझ़ने के लिए केवल पुलिस को ही नहीं सभी को कविता और लड़ाई साथ-साथ करनी होगी । क्योंकि तिल को ताड़ बनाना सिर्फ़ आप ही नहीं जानते, हमारी जनता, सरकार और सारे सरकारी लोग भी उसका मुँहतोड़ जबाव देना जानते हैं।

साहित्य एक युद्ध ही तो है, जिसमें बाहर की लड़ाई भीतर लड़ी जाती है । लड़ाई के पीछे भी कहीं ना कहीं साहित्य क्रियाशील रहता है, जो उसके औचित्य-अनौचित्य को सिद्ध करता है । साहित्य मूलतः युद्ध की मनाही पर ज़ोर देता है, उसके स्थानापन्न विकल्पों की तलाश करता है और युद्ध अंततः साहित्य बनकर इतिहास के पन्नों में रेखांकित होकर सुनहरे भविष्य के विकल्पों का अभिज्ञान कराता रहता है । समय का मार्गदर्शन करता है । साहित्य और युद्ध दो पूरक क्रियायें हैं । आख़िर दोनों का लक्ष्य आत्मरक्षा होता है । साहित्यकार बाहर की लड़ाई को अधिनियमित करते हुए भीतर ही भीतर लड़ता है और योद्धा बाहर लड़ता है और भीतर की लड़ाई की दिशा तय करता है ।

चाहे वह कोई भी समय रहा हो, राज्य नामक व्यवस्था में दोनों ही सदैव प्रासंगिक और अपरिहार्य रहे हैं । राजशाही से लेकर वर्तमान गणतंत्र तक, हर व्यवस्था में साहित्यकार और योद्धा साथ-साथ सम्मान अर्जित करते रहे हैं । यदि छत्तीसगढ़ का पुलिस-मुखिया विश्वरंजन भीतर-बाहर दोनों लड़ाई में पारंगत हैं तो यह अयोग्यता नहीं अपितु सौभाग्य का विषय होना चाहिए । यह शुष्क पुलिस तंत्र की असंवेदनशीलता के विरूद्ध एक उत्तेजक और प्रेरक जन्मघूँटी भी है, जो लगातार असहिष्णुता की सीमा लांघते समय और परिस्थिति में अपरिहार्य है । जनता की भावनाओं, स्वप्नों और आकांक्षाओं को सिर्फ़ लाठी, बंदूक पकड़कर नहीं, शब्द और क़लम पर भी विश्वास रखकर अधिक सुगमता से फलीभूत किया जा सकता है । और यदि ऐसा विश्वरंजन करते हैं तो यह किस तरह आपत्तिजनक है, समझ से परे है ?

विगत 12 जुलाई को जब मदनवाड़ा में गणतंत्र के दुश्मनों के ख़िलाफ़ हमारे जांबाज और अदम्य पराक्रमी बी। के चौबे, गुप्ता और उनके साथी शौर्य का स्वर्णिम इतिहास रच रहे थे तब व्याकुलता और चिंता के साथ उनका पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन ही मार्गदर्शन कर रहे थे । जो यह कहते नहीं थक रहे कि वे उस समय साहित्य रस ले रहे थे, वे सिर्फ़ पूर्वाग्रही हैं, झूठे हैं । जो लोग 10-11 जुलाई को आयोजित साहित्य समारोह के बहाने डीजीपी विश्वरंजन की खामी निकाल रहे हैं यह न भूलें कि उनमें से ही कुछ अतिवादी किस्म के साहित्यकार और बुद्धिजीवी ठीक तब कविता पाठ के साथ-रसगुल्ला का स्वाद चख रहे थे जब हमारे राज्य के अनेकों बहादुर सिपाहियों के साथ छत्तीसगढ़ के माटी के सपूत और पुलिस अधीक्षक श्री चौबे के शहीद होने की ख़बर उनके टेबिल तक पहुँच चुकी थी ।

हम प्रमोद वर्मा पर केंद्रित आयोजन के परिप्रेक्ष्य में यह भी नहीं भूलें कि यह कार्य यहाँ के राजनेता, प्रबुद्ध वर्ग, साहित्यिक उत्थान का दंभ भरनेवाले तथाकथित जनतांत्रिक संगठनों और जनता का था जिसे उन्होंने एकसिरे से बिसार दिया था और जिसे एक पुलिस अधिकारी ने कर दिखाया। प्रमोद वर्मा मार्क्सवादी सौंदर्य चेतना में विश्वास करते हुए भी देशीय राग के हिमायती और हिंसात्मक विध्वंस के ख़िलाफ़ थे । वे समाजवादी प्रजातंत्र के हिमायती थे । उनके नज़रों में जनता से बड़ा कोई नहीं था । सत्ता भी नहीं । चाहे वह मार्क्सवादियों की हो या फिर माओवादियों की । जो लोग इस आयोजन से स्वयं को बौना पा रहे हैं वे इस समय अपनी लेखों और विज्ञप्तियों में अपनी भड़ास उतार रहे हैं । यह सभी जानते हैं कि ऐसे बुद्धिजीवियों या साहित्यिक संगठनों के अगुमा किस तक तक लिटरेरी डेमोक्रेसी और कितनी पवित्रता से क्या क्या करते रहे हैं ? उनके समझाइस या बडबोलेपन से लेकर इस राज्य का ना तो कभी सांस्कृतिक विकास हुआ है ना ही प्रजातांत्रिक ।

क्या इस सम्मेलन में राज्य के मुख्यमंत्री और महामहिम की भी भागीदारी नहीं थी ? ऐसे में क्या उन्हें भी मना कर दिया जाये कि वे ऐसे साहित्यिक आयोजनों से परहेज करें और ऐसा करना जनता और राज्य के हित में नहीं है । हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह आयोजन इसलिए भी महत्वपूर्ण साबित हुआ है, क्योंकि हमारे राज्य के मुखिया ने देश भर के बुद्धिजीवियों, आलोचकों, साहित्यकारों को छत्तीसगढ़ की महाविपदा माओवादी हिंसा को लेकर भी संबोधित किया और महामहिम राज्यपाल ने शासकीय अधिकारियों द्वारा अपने कर्तव्यों की औपचारिकता के बाद समाज के लिए किये जानेवाले कार्यों को समाज और देशसेवा करार दिया । और यह भी हमें नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी हर वक्त सिर्फ़ कर्तव्य पर ही नहीं जुटा होता । न मैं, न आप और न ही दुनिया का कोई। वह अपने जैविक, सांस्कृतिक, मौलिक और सामाजिक अधिकारों के प्रति भी सचेत रहता है और यही उसके कर्तव्यों को बल प्रदान करता है ।

जिन्होंने विश्वरंजन को 12-13 जुलाई को मानपुर-मदनवाड़ा के रास्ते में सैनिक वर्दी में देखा है वे बखूबी समझ सकते हैं कि उस समय एक कवि सेनापति किस तरह द्वंद्व और पीड़ा से गुज़र रहे थे। अपने बहादुर और शौर्यवान् नायकों को खोने का ग़म सिर्फ़ परिजन, नेता या जनता को नहीं उस सेनापति को भी होता है जिसके बल पर वह राज्य की शांति और सुरक्षा के लिए नेतृत्व भी करता है। स्वस्थ माँग, जायज आरोप और नैतिक टिप्पणी प्रजातंत्र को मज़बूत बनाती हैं किन्तु उसका भी समय होता है । असमय और आकारज टिप्पणी से तंत्र हतोत्साहित होता है । उसे अपनी उदात्त जनसेवा के उत्तर में मूर्खतापूर्ण आरोप से निराशा होती है । ऐसी घटनाओं का हल राजनीतिक चश्मे से कभी भी नहीं दिखा है। यह कितनी विडम्बना की बात है कि छत्तीसगढ़ में सक्रिय अनेक राजनीतिक घटक आज भी माओवादी हिंसा को प्रजातंत्र के विरूद्ध नहीं मानते हुए उसे मात्र सिर्फ़ सरकार की ग़रज बताते हैं । यह हमारे प्रदेश की अबौद्धिकता और निहायत अलाली नहीं तो और क्या है कि अब तक किसी भी तथाकथित सांस्कृतिक गरिमावाले लेखक, साहित्यकार, विचारक, शिक्षाविद की तरफ़ से मदनवाड़ा में हुए शहीद के प्रति न तो श्रद्धांजलि स्वरूप कोई टिप्पणी आयी है न ही कोई पहल । क्या हम अपने राज्य को ऐसी मौन अभिव्यक्ति का पाठ पढ़ाना चाहते हैं ? यदि हाँ, तो हमें उस मुक्तिबोध की दुहाई देने का कोई अधिकार नहीं बनता जिसके कहा था – तोड़ने ही होंगे मठ, उठाने ही होंगे अभिव्यक्ति के ख़तरे । मनुष्य नहीं कहेगा तो और कौन बोलेगा ।

किसी साहित्यकार को यह कहना कि वह साहित्य से सर्वथा दूर रहे ठीक उस तरह होगा कि वह साँस न ले । भोजन न करे । वह पुलिस की नौकरी करता है अतः वह सिर्फ़ लाठी चौबीसों घंटे पकड़कर गली-गली भटकता रहे और जनता चैन की नींद सोती रहे । यदि हम समाज को ऐसे ही देखना चाहते हैं भगवान बचाये ऐसे लोगों से । तब तो कोई यह भी कहेगा कि गुरूजी दिन के अलावा रात भर स्कूल खोलें रखे । न्यायाधीश चौबीसों घंटे कोर्ट में बैठें । सीमा के प्रहरी घर भी न लौंटे। पायलेट हवाई जहाज से उतरे हीं नहीं । नेता मंत्रालय में ही बैठे रहें । प्रतिपक्ष सिर्फ़ धरना, आंदोलन ही करते रहें । क्या छत्तीसगढ़ की जनता इतनी निंरकुश और इतनी पलायनवादी हो चुकी है ।

आप भी बोलिए कि यह मात्र राज्य सरकार की समस्या नहीं । यह केवल पुलिस की ड्यूटी नहीं कि वह आपके छत्तीसगढ़ को नक्सली विपदाओं से मुक्त बनाये रखे । यह वक्त निर्णय लेने की घड़ी है कि आप किसका वरण करना चाहते है ? माओवादी हिंसक तंत्र का या प्रजातंत्र का । अब पानी सिर से उतर चुका है । हर बच्चा बोले, हर युवक बोले, माँएं बोले, रिक्शावाला बोले, किसान बोले, मज़दूर बोले, अधिकार बोले । बोलें कि बस्स बहुत हो चुका, सिर्फ़ पुलिस ही नहीं लड़ेगी हम लडेंगे भी और नक्सलवादियों के ख़िलाफ़ बोलेंगे भी । (लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं )

7/07/2009

प्रमोद वर्मा सम्मान का मतलब


विश्वरंजन
प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान एक पंजीकृत संस्थान है जिसका गठन छत्तीसगढ़ में जन्मे एक महत्वपूर्ण कवि, लेखक, आलोचक, नाटककार और शिक्षाविद प्रमोद वर्माजी के मूल्यनिष्ठ कार्यों को जिन्दा रखने एवं प्रदेश की सांस्कृतिक चेतना को संपूर्ण देश में प्रतिष्ठा दिलाने के लिए किया गया है। पं. माधवराव सप्रे, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, मुक्तिबोध, श्रीकांत वर्मा तथा प्रमोद वर्मा इत्यादि ने न केवल छत्तीसगढ़ की ज़मीन अपितु समूचे राष्ट्र में आधुनिक संवेदनाओं को विस्तार दिया है । सच्चे अर्थों में वे छत्तीसगढ़ के ऐसे आइकॉन रहे हैं जिनसे यह राज्य अखिल भारतीय स्तर पर बौद्धिकों में शुमार होता है । ऐसे लोगों का सम्मान सांस्कृतिक राज्य छत्तीसगढ़ का सम्मान है ।

मुझे इस संस्थान का अध्यक्ष पुलिस महानिदेशक की हैसियत से नहीं बल्कि प्रमोद वर्मा के मित्र और शिष्य होने की हैसियत से बनाया गया है । उनकी साहित्यिक समझ को विकसित करने में, उसमें त्वरा या तेज़ी लाने में छत्तीसगढ़ के प्रमोद वर्मा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है । जो प्रमोद वर्मा को जानते हैं, उन्हें बखूबी मालूम है कि प्रमोद वर्मा की नज़र में नेता, अभिनेता, अधिकारी का कोई महत्व नहीं था जब तक उसमें गहरी संवेदना परिलक्षित नहीं होती । प्रमोद वर्मा एक साहित्यिकार होने के नाते एक ऐसी शख्सियत थे जिन्होंने परिस्थितियों के साथ कभी समझौता नहीं किया ।

इधर कुछ लोग उन पर होने वाले दो दिवसीय अखिल भारतीय आयोजन को लेकर तरह-तरह की टिप्पणी कर रहे हैं । ज़ाहिर है ये वो लोग हैं जो न प्रमोद वर्मा को जानते हैं, न ही साहित्य-संस्कृति की धरोहर को बरक़रार रखने में उनकी कोई दिलचस्पी है । उनकी सांस्कृतिक समझ नगद-नारायण की पूजा तक सीमित है जिससे वे दुनिया खरीदना चाहते हैं । वे नहीं जानते कि प्रमोद वर्मा वह शख्स हैं जिनके नाम पर पूरे हिन्दुस्तान में जो सांस्कृतिक और साहित्य की समझ रखनेवाले लोग हैं वे तन-मन-धन और कर्म से आगे आ जायेंगे । ये ऐसे लोग हैं जिनके लिए किसी का सिर्फ पुलिस महानिदेशक होना सामान्य विषय है ।

छत्तीसगढ़ को पहचान दिलानेवाले ऐसे संस्कृति रचयिता के ऐसे विरोधियों को प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के उद्देश्य और स्वप्न से परिचित होना भी आवश्यक है ताकि वे अपनी गिरेबां में झांकने की कोशिश कर सकें कि राज्य की पहचान सिर्फ़ सड़क, पानी, बिजली और उद्योग ही नहीं होते उसकी निजी अस्मिता भी होती है । मनुष्य का बौद्धिक और सांस्कृतिक विकास भी होता है । प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के उद्देश्यों में प्रमुख है –

प्रमोद वर्मा समग्र का प्रकाशन -

रचना शिविर-प्रदेश के विशेष कर दूरस्थ अंचलों के नवोदित,संभावनाशील युवा लेखकों की रचनात्मकता के दिशाबद्ध प्रोत्साहन के लिए प्रत्येक वर्ष निःशुल्क लेखन शिविर का आयोजन किया जायेगा जिसमें देश के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार, भाषाविद्, संस्कृति कर्मी, कलाकार मार्गदर्शन देंगे। इन शिविरों में पिछड़े, आदिवासी, दलित जाति के उभरते हुए रचनाकारों को विशेष प्राथमिकता दी जायेगी । कला, साहित्य, संस्कृति एवं वैचारिकी का एक राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन किया जायेगा।

राष्ट्रीय आलोचना सम्मान - वर्ष-2009 से प्रमोद वर्मा की स्मृति में दो सम्मान प्रारंभ किये जा चुके है जिसमें देश के दो आलोचकों को प्रत्येक वर्ष प्रमोद वर्मा राष्ट्रीय आलोचना सम्मान दिया जा रहा है । इसमें से एक सम्मान युवा वर्ग हेतु सुरक्षित रखा गया है । सम्मान स्वरूप 21 एवं 11 हज़ार रुपये की नगद राशि, प्रतीक चिन्ह, प्रशस्ति पत्र, शॉल श्री फल एवं प्रमोद वर्मा समग्र की प्रति भेंट की जायेगी । वर्ष 2009 के लिए चर्चित आलोचक श्रीभगवान सिंह, भागलपुर एवं युवा आलोचक श्री कृष्णमोहन, वाराणसी को प्रदान किया जा रहा है ।

व्याख्यानमाला - संस्थान द्वारा प्रमोद वर्मा स्मृति व्याख्यानमाला की श्रृंखला शुरू की जायेगी, इस दिशा में वर्ष में नियमित रूप से चार व्याख्यान आयोजित किये जायेंगे, जिसमें देश के महत्वपूर्ण रचनाकारों, विचारकों, आलोचकों को सुना जायेगा ।

प्रमोद वर्मा स्मृति संग्रहालय - प्रमोद वर्मा की स्मृति को जीवंत बनाये रखने, उन पर शोध कार्य करने वालों को प्रोत्साहित करने वाले विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने के लिए बिलासपुर में प्रमोद वर्मा स्मृति संग्रहालय की स्थापना की जायेगी जो एक उन्नत लायब्रेरी के रूप में भी विकसित होगी ।

शिष्य-वृति - प्रमोद वर्मा द्वारा विकसित किये गये जीवन-मूल्यों तथा स्वयं उनके द्वारा लिखित साहित्य पर शोध करने वाले छात्रों को प्रति वर्ष शिष्य-वृति प्रदान की जायेगी । इस रूप में चयनित शोधार्थियों को प्रतिवर्ष प्रतिमाह 5 हज़ार रुपये की राशि प्रदान की जायेगी ।

कृति प्रकाशन - प्रत्येक वर्ष आलोचना, कविता एवं नाटक पर केंद्रित 3 महत्वपूर्ण पांडुलिपियाँ आमंत्रित कर उनका प्रकाशन संस्थान द्वारा किया जायेगा । इस महती योजना में अप्रकाशित रचनाकारों लेखकों को वरीयता दी जायेगी जिनकी पांडुलिपियों का चयन एक संपादक मंडल द्वारा किया जायेगा ।

परिसंवाद- कला, संस्कृति, सभ्यता और आधुनिक जीवन से जुड़े मुद्दों पर वैचारिक विमर्श हेतु परिसंवाद, परिचर्चा का आयोजन वर्ष भर किया जायेगा जिसमें विभिन्न अनुशासनों के विद्वानों की प्रतिभागिता रेखांकित होगी। इन आयोजनों से नवागत पीढ़ी सहित समाज के विभिन्न वर्गों का संवेदनीकरण किया जायेगा।

प्रतियोगिताओं का आयोजन - समकालीन कला, साहित्य, संस्कृति के विभिन्न विधाओं और उनके युवा रचनाकारों सहित विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जायेगा और उन्हें सामाजिक स्वीकृति दिलाने के पुरस्कृत किया जायेगा । इसमें लुप्तप्राय विधाओं और उसके रचनाकारों को प्रमुखता दी जायेगी ।

स्मरण - मूल्यांकन - भूलने वाले इस दौर में देश के ऐसे महत्वपूर्ण रचनाकारों की कृतित्व के मूल्याँकन हेतु राष्ट्रीय स्तर पर संगोष्ठी, विमर्श आदि का आयोजन तथा प्रकाशन किया जायेगा, जिनका योगदान हिन्दी संस्कृति में विशिष्ट है । जिसमें देश भर के संपादकों, समीक्षकों, आलोचकों एवं वरिष्ठ साहित्यकारों को जोड़ा जायेगा ।

प्रमोद वर्मा स्मृति हिन्दी भवन - राज्य शासन की मदद से राजधानी में प्रमोद वर्मा स्मृति हिन्दी भवन का निर्माण कराया जायेगा । इससे विभिन्न सांस्कृतिक संस्थाओं के आयोजन, राजधानी में ठहरने वाले साहित्यकर्मियों को प्रश्रय मिलेगा और राजधानी में नियमित सांस्कृतिक सम्मिलन को गति मिल सकेगी ।

वेबसाइट का संचालन - प्रमोद वर्मा जी के साहित्य, विचार को वैश्विक बनाने के लिए एक वेबसाइट (www.pramodverma.com) का संचालन किया जा रहा है ।

राज्य स्तरीय साहित्यकर्मी डायरेक्टरी प्रकाशन-राज्य के सभी जिलों और विशेष कर दूरदराज के संस्कृतिकर्मियों, लेखकों के नाम-पते और उनकी विधाओं की जानकारी एक साथ संग्रहीत कर प्रकाशन करना।

इसमें जनता भी सहयोग कर रही है और हम शासन से भी सहयोग की अपेक्षा करते हैं क्योंकि यह एक पंजीकृत संस्थान है । इमसें केदारनाथ सिंह, दिल्ली, डॉ. विजय बहादुर सिंह, कोलकाता, डॉ. विश्वनाथ तिवारी, गोरखपुर, डॉ. धनंजय वर्मा, भोपाल आदि जैसे राष्ट्रीय ख्याति के साहित्यकार संरक्षक हैं । संस्थान के संस्थापक सदस्यों में राज्य के वरिष्ठ बुद्धिजीवी, शिक्षाविद् एवं साहित्यकार सम्मिलित हैं । संस्थान के अपने नियम-कायदे बायलाज है जिसके अनुसार सारी गतिविधियों का संचालन हो रहा है । संस्थान का समस्त समस्त लेखा-जोखा पारदर्शी रखा गया है जिसे कोई भी किसी समय आकर अपनी आँखों से देख सकता है । जो लोग इस संस्था में आर्थिक सहयोग कर पा रहे हैं उन्हें बकायदा संस्थान द्वारा रसीद-दिया गया है ।


राज्य हित में सक्रिय और ऐसे पारदर्शी संस्थानों के विकास की न सोचकर उन पर प्रश्नचिन्ह लगानेवालों को यह भी समझने की कोशिश करनी चाहिए कि देश के किसी शासकीय अधिकारी को संविधान के नियमों द्वारा कला, साहित्य, संस्कृति और विज्ञान के क्षेत्र में काम करने को अनुचित नहीं ठहराया गया है ।

ऐसे मिथ्या आरोपों, कुप्रचारों, कुंठाओं और छूछे निरंकुशता से संस्थान को कोई हानि नहीं होनेवाली है और न ही संस्थान अपनी गतिविधियों पर विराम लगानेवाली......

विश्वरंजन
अध्यक्ष, प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान
रायपुर, छत्तीसगढ़

7/03/2009

राष्ट्रीय ब्लॉग संगोष्ठी रायपुर में

राष्ट्रीय ब्लॉग संगोष्ठी : छपास पीड़ा का इलाज मात्र हैं ब्लॉग?
रायपुर, छत्तीसगढ़
दिनांक 10 जुलाई, २००९

मित्रों,
पिछले दिनों हिन्दी के एक ब्लॉग में पुष्पा भारती के कथन पर गंभीर चर्चा चली थी। पुष्पा भारती ने हिन्दी ब्लॉगों को यह कह कर खारिज कर दिया था कि यहाँ तो भाषाएँ भी बड़ी अजीब है - ब्लॉगर ‘टेंशनात्मक’ लिख रहे हैं – तो ये टेंशनात्मक क्या है? इससे पहले नामवर सिंह जैसे दिग्गज इसे खारिज कर चुके हैं। अलबत्ता राजेंद्र यादव सरीखे कुछ विशिष्ट भविष्यदृष्टा की नजरों में ब्लॉगों के जरिए सृजनात्मकता की असीम संभावनाएँ भी झलकती हैं।

पांच साल के हिन्दी ब्लॉग इतिहास में सृजनात्मकता के लिहाज से क्या कुछ हासिल हुआ और भविष्य का पट क्या कहता है?

क्या ब्लॉग सिर्फ और सिर्फ छपास पीड़ा को जड़ से मारने का इलाज मात्र है या फिर इंटरनेट का यह मल्टीमीडिया युक्त सुगम सरल प्रकाशन सुविधा भविष्य में प्रेमचंद या देवकीनंदन खत्री जैसे लेखकों को पैदा करने की ताक़त रखता है? क्या यहाँ सिर्फ अनर्गल और पानठेलों-पर-की-जाने-वाली-बहस नुमा चीजें छापी जाती हैं या फिर इसमें स्तरीय सामग्री भी आती हैं?

इन तमाम मुद्दों पर गर्मागर्म बहस के लिए एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन दिनांक 10 जुलाई, 2009 को 2 बजे से 3 बजे तक रायपुर, निंरजन धर्मशाला में सुनिश्चित किया गया है। यह संगोष्ठी प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह के आयोजन के तहत आयोजित किया जा रहा है। इस संगोष्ठी के मुख्य अतिथि रहेंगे देश के महत्वपूर्ण आलोचक एवं भारतीय ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक डॉ। प्रभाकर तथा विशिष्ट अतिथि होंगे – वरिष्ठ कवि एवं आलोचक श्री प्रभात त्रिपाठी, रायगढ़ एवं ए. अरविंदाक्षन, कालीकट तथा इसकी अध्यक्षता करेंगे - प्रसिद्ध ब्लॉगर रविशंकर श्रीवास्तव (रविरतलामी) ।

भागीदारी हेतु आप भी सादर आमंत्रित हैं। प्रतिभागी ब्लॉगर्स के भोजन, आवास की व्यवस्था संस्थान द्वारी की गई है तथा इसके अलावा राष्ट्रीय आलोचना संगोष्ठी में भी भाग ले सकते हैं जिसमें देश के 50 से अधिक वरिष्ठ आलोचक उपस्थित हो रहे हैं ।

संगोष्ठी संयोजक
जयप्रकाश मानस
मोबाइल – 94241-82664
ई-मेल – srijangatha@gmail.com

6/25/2009

फ़िराक़ की शायरी पर व्याख्यान आज


रायपुर । प्रदेश की बहुयायामी सांस्कृतिक संस्था सृजन-सम्मान द्वारा देश की विभूतियों का स्मरण के अनुक्रम में दिनांक 25 जून, 2005 को ठीक 4 बजे दोपहर स्थानीय प्रेस क्लब, मोतीबाग़ में “फ़िराक़ की शायरी” विषय पर एक आत्मीय एवं सरल व्याख्यान का आयोजन किया गया है । व्याख्यान देंगे – देश के प्रख्यात आलोचक एवं सागर विश्वविद्यालय, मध्यप्रदेश के पूर्व कुलपति डॉ। धनंजय वर्मा। कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे – श्री नंदकिशोर तिवारी, संपादक, लोकाक्षर, बिलासपुर ।

विशिष्ट अतिथि के तौर पर उपस्थित रहेंगे – कवि एवं पुलिस महानिदेशक, फ़िराक गोरखपुरी उर्फ़ रघुपति सहाय के नाती श्री विश्वरंजन, आलोचक, पूर्व केंद्र निदेशक आकाशवाणी श्री हसन खान, शायर एवं कवि श्री मुमताज़/श्री अशोक सिंघई भिलाई, प्रेस क्लब के अध्यक्ष श्री अनिल पुसदकर व पत्रकार श्री राजकुमार सोनी। परिचयात्मक वक्तव्य देंगे – श्लोक के संपादक श्री रज़ा हैदरी ।

6/23/2009

राष्ट्रीय रेखाचित्र प्रतियोगिता एवं प्रदर्शनी का आयोजन

रायपुर । मुक्तिबोध, हरिशंकर परसाई, श्रीकांत वर्मा के मित्र-साहित्यकार एवं देश के प्रतिष्ठित आलोचक-कवि-नाटककार श्री प्रमोद वर्मा की स्मृति में स्थापित एवं “प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, छत्तीसगढ़” द्वारा आगामी 10-11 जुलाई, 2009 को रायपुर (स्थल-निरंजन धर्मशाला, माना एयरपोर्ट मार्ग) में दो दिवसीय राष्ट्रीय रेखाचित्र-रेखांकन प्रतियोगिता-प्रदर्शनी का आयोजन किया गया है ।

देश के महत्वपूर्ण कलाकारों को व्यापक तौर पर प्रोत्साहित और प्रतिष्ठित करने के लिए विशेष तौर पर राष्ट्रीय रेखाचित्र प्रतियोगिता-प्रदर्शनी का दो दिवसीय आयोजन भी किया गया है जिसमें चयनित 3 कलाकारों को संस्थान की ओर से राष्ट्रीय स्तर पर प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान से सम्मानित किया जायेगा ।
सम्मान स्वरूप प्रथम 3 कलाकारों को 7, 5, 3 हजार नगद, प्रतीक चिन्ह, प्रशस्ति पत्र, शाल एवं श्री फल से 11 जुलाई, 2009 को पुरस्कृत किया जायेगा । कोई भी कलाकार अपने चुनिंदे 25 रेखाचित्रों के साथ उक्त प्रतियोगिता-प्रदर्शनी में भाग लेने हेतु सादर आमंत्रित हैं । प्रतिभागी कलाकार के आवास, भोजन, स्वल्पाहार की समुचित व्यवस्था संस्थान द्वारा की गई है । प्रतियोगिता पूर्णतः निःशुल्क है । सम्मान हेतु योग्य कलाकारों का चयन 3 विशेषज्ञों द्वारा किया जायेगा । प्रतियोगिता में सम्मिलित होने की सूचना 8 जुलाई, 2009 के पूर्व देना होगा । प्रतियोगी को अपना रेखाचित्र कार्यक्रम स्थल पर प्रदर्शित करना होगा । उसे दिनांक 9 जुलाई, 2009 तक रायपुर अवश्य पहुँचना होगा ताकि प्रदर्शनी की तैयारी की जा सके ।

इस अवसर पर प्रमुख देश के प्रमुख साहित्यकार – श्री अशोक बाजपेयी-दिल्ली, श्री प्रभाकर श्रोत्रिय, गाजियाबाद, श्री अरविंदाक्षन-कालीकट, श्री केदारनाथ सिंह-दिल्ली, श्री विनोद कुमार शुक्ल, रायपुर, प्रभात त्रिपाठी-रायगढ़, श्री नंदकिशोर आचार्य-जयपुर, श्री विजय बहादुर सिंह-कोलकाता, श्री विश्वनाथ प्रसाद तिवारी-गोरखपुर, श्री अरुण कमल-पटना, एकान्त श्रीवास्तव-कोलकाता, श्री खगेन्द्र ठाकुर-पटना, किशन कालजयी-दिल्ली, श्री कर्मेन्दु शिशिर-पटना, डॉ। धनंजय वर्मा-भोपाल, श्री रमेश दवे-भोपाल, श्री कमला प्रसाद-भोपाल, पंकज चतुर्वेदी-कानपुर, रमेश दत्त दुबे-सागर, डॉ. श्रीराम परिहार-खंडवा, श्री राजेश जोशी-भोपाल, श्री भगवान सिंह-भागलपुर, श्री कृष्णमोहन-वाराणसी, श्री मिथिलेश्वर-आरा, श्री उदय प्रकाश-गाजियाबाद, श्री कैलाश बाजपेयी-दिल्ली, शिवकुमार मिश्र-आनंद, मधुरेश-कानपुर, अष्टभुजा शुक्ल-बस्ती, देवेन्द्र दीपक-भोपाल, मुक्ता, वाराणसी, अशोक माहेश्वरी-दिल्ली, राजुरकर राज-भोपाल, विजय देव-भोपाल एवं छत्तीसगढ़ से रमाकांत श्रीवास्तव, गिरीश पंकज, सुशील त्रिवेदी, राजेन्द्र मिश्र, रमैश नैयर, ललित सुरजन, अशोक सिंघई, कमलेश्वर, नासिर अहमद सिंकदर, बी.एल.पाल, हरप्रसाद, डॉ. बलदेव, डॉ. चित्तरंजन कर, डॉ. बिहारीलाल साहू, शरद कोकास, रजत कृष्ण, विजय सिंह, विजय गुप्त, आनंद बहादुर सिंह, आनंद हर्षुल, नंदकिशोर तिवारी आदि उपस्थित होकर रेखाचित्रकारों का संबंल बढ़ायेंगे ।
किसी भी जानकारी के लिए ९४२४१-८२६६४ पर संपर्क किया जा सकता है ।

6/16/2009

श्रीभगवान सिंह और कृष्ण मोहन को राष्ट्रीय सम्मान

-प्रमोद वर्मा स्मृति आलोचना सम्मान की घोषणा-
रायपुर । प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा स्थापित प्रथम आलोचना सम्मान भागलपुर के डॉ श्री भगवान सिंह को दिया जायेगा । इसी तरह युवा आलोचना सम्मान बनारस के युवा आलोचक श्री कृष्ण मोहन को दिया जायेगा । श्री सिंह हमारे समय के उन सुप्रतिष्ठित और चर्चित आलोचकों में से है जिन्होंने अपने आलोचनात्मक लेखन से समकालीन साहित्यिक आलोचना और परिदृश्य पर एक अलग लक़ीर खींची है । लगभग सांप्रदायिक और विचाररूढ़ हो उठी आलोचना के बरक्स श्री भगवान सिंह एक स्वतंत्र वैचारिक आधार और जातीय दृष्टि लेकर आये हैं। ख़ास तौर से गतिशील राष्ट्रीय जीवन-प्रवाह और गांधी युग के मूल्यों को केंद्र में रखकर उन्होंने जो एक स्वाधीन आलोचनात्मक तेवर प्रदर्शित और रेखांकित किया है ।

डॉ. कृष्ण मोहन की आलोचना में पिछली आलोचना की मध्यमवर्गीय चेतना की तुलना में एक उदग्र लोकतांत्रिकता और वैचारिक ऊष्मा है । वे हमारे समय के एक संभावनाशील आलोचक हैं ।

वर्तमान में श्री भगवान सिंह तिलका माँझी, भागलपुर, बिहार में हिन्दी विभागाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं एवं श्री मोहन विश्वविद्यालय बीएचयू, वाराणसी में रीडर, हिन्दी के पद पर कार्यरत हैं ।

ज्ञातव्य हो कि इस चयन समिति में कवि केदारनाथ सिंह, दिल्ली, डॉ. धनंजय वर्मा, भोपाल, डॉ. विजय बहादुर सिंह, कोलकाता, डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, गोरखपुर, विश्वरंजन एवं जयप्रकाश मानस थे ।

यह सम्मान उन्हें 10-11 जुलाई को रायपुर में आयोजित दो दिवसीय प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह में प्रदान किया जायेगा । सम्मान स्वरूप आलोचक द्वयों को क्रमशः 21 एवं 11 हजार रुपयों सहित प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह, शाल एवं श्रीफल से विभूषित किया जायेगा ।

6/01/2009

मानवाधिकार बनाम नक्सलवाद से प्रेम

डॉ. बलदेव

बार-बार कहा गया लिजलिजा झूठ भी ठौस और बेलौस सच में तब्दील हो जाता है, इतना नहीं तो उसे सामान्य मति के लोग सच की मानिंद समझने लगते हैं । देश और विदेश में विनायक सेन की रिहाई की माँग इसी फ़ार्मूले से की जा रही थी । माओवादियों और नक्सलियों की रणनीतियों की ठोड़ी-सी भी समझ रखने वाले यह बखूबी समझ सकते हैं कि किस तरह ऐसे तत्व सरकार, व्यवस्था, पुलिस की छोटी-छोटी-सी कमज़ोरी को जनता के लिए दमनात्मक बताते हुए मानवाधिकार का प्रश्न बना देते हैं किन्तु इसके ठीक विपरीत वे अपनी क्रांतिकारी लक्ष्यों के लिए निर्दोष आदिवासियों, महिलाओं, बच्चों और सरकारी कारिंदों की हत्या, शोषण पर शुतुरमूर्गी अंदाज में अपना मुँह छुपा लेते हैं ।

पिछले दिनों डॉ. विनायक सेन की रिहाई को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह वितंड़ावाद खड़ा किया जा रहा है उसमें माओवादियों, नक्सलियों के प्रति प्रायोजकीय हमदर्दी की बदबू को भी महसूसा जा सकता है । द्वंद्व से भरे और व्यापार की शक्ल धारण कर चुके मानवाधिकारवादी संगठनों को 120 करोड़ से अधिक आबादी वाले भारत और नक्सली हत्याओं से ग्रस्त राज्य छत्तीसगढ़ में केवल एक ऐसे तथाकथित समाजसेवी, चिकित्सक के मानवाधिकार की याद जाती नहीं जिस पर भारतीय संविधान और प्रजातंत्र के विरूद्ध जाने वाले संगठनों यानी नक्सलवादियों को सहयोग करते रहने का आरोप है तथा जिन्हें जिलाकोर्ट, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी जमानत देने से साफ़ मना कर दिया था और बमुश्किल कुछ ही दिन पहले जमानत मिली है । ताज्जूब है कि ऐसी जमानत को भी वे सरकार और व्यवस्था की हार के रूप में देख रहे हैं ।

डॉ. विनायक सेन की रिहाई में लगे कथित मानवाधिकारवादियों की चेतना के पीछे की वास्तविकता को जानने के लिए यह ज़रूरी है कि मानवाधिकारवादियों की एजेंडो, रणनीतियों, कार्यवाहियों की नैतिकता और संवेदना को परखा जाये । एक सच यह भी है कि मानवाधिकारवादियों की आँखें छत्तीसगढ़ सहित भारत के 17 से अधिक राज्यों में नक्सली हिंसा में मारे जा रहे निर्दोषों आदिवासियों के शव, रोते-कलपते परिजनों का चेहरा नहीं देख पातीं । नक्सलियों द्वारा बच्चों को बंदूकें पकड़ाने की नक्सली हरकतें चिंताजनक नहीं लगतीं । महिलाओं को नक्सली हवस का शिकार बनते वक्त जंगलों में गूँजती चीख भी शायद नहीं सुनाई देती । इतना ही नहीं गाँव के गाँव आग के हवाले फूँक दिये जाते हैं, करोड़ों-अरबों की सामाजिक संपत्ति दिन दहाड़े तहस-नहस कर दी जाती है । समूची बस्ती नक्सली आंतक से पलायन को विवश हो उठते हैं, अपनी मिट्टी, अपनी हवा, अपना पानी की याद करते करते वे विस्थापित हो जाते हैं, यह भी किसी मानवाधिकारवादी को नहीं दिखाई देता । क्या मानवाधिकार का इससे बड़ा मुद्दा समूचे विश्व में कहीं है ? कदाचित् नहीं । ऐसे में यह प्रश्न क्या स्वाभाविक नहीं कि इन्हें आख़िर क्योंकर मानवाधिकार के अंतरराष्ट्रीय सचेतक अपने एजेंडों से दूर रखते हैं ? साफ़ जाहिर है कि या तो उन्हें ऐसी आंतककारी और व्यवस्था विरोधी गतिविधियों से कोई वास्ता नहीं या फिर ऐसी माओवादी क्रियाकलापों से उन्हें कोई गुरेज नहीं । ऐसे में यह शंका उठती है कि कहीं ऐसे मानवाधिकारवादी माओवादी हिंसा के पक्षधर तो नहीं । यदि ऐसा है तो इसमें कोई दो मत नहीं कि वे नक्सलियों के हितचिंतक, परामर्शक, सहयोगी भूमिका में भी हों। हो तो यह भी सकता है कि मानवाधिकार की आवाज़ सिर्फ़ बड़े-बड़े महादेशों के भारी भरकम अनुदान से एनजीओ चलाने वालों के लिए ही उठायी जाती है । अन्यथा जिस देश में आये दिन लाखों गरीबों, असहायों और पीडितों के मानवाधिकार का हनन हो रहा है वहाँ केवल एक समाजसेवी चिकित्सक के किसी आरोप में जेल में निरूद्ध होना इतना ध्यानाकर्षणी नहीं हो उठता । यह दीगर बात है कि जेल में निरूद्ध आरोपी का भी मानवाधिकार होता है और उसकी निगरानी भी होनी चाहिए तथा संविधान सम्मत वे सारी सुविधायें मिलनी चाहिए जो उन्हें ज़रूरत थीं ।

मानवाधिकार एक सार्वजनिक माँग है और इसके लिए सभी को अपने हृदय में जगह रखनी होगी । इसे केवल सुविधाभोगी, सुशिक्षित विकसित लोगों के संरक्षण का तर्क नहीं माना जा सकता । यदि हम किसी एक ही व्यक्ति मानवाधिकार के लिए अंतराष्ट्रीय संघर्ष करें, बार-बार समूची न्यायप्रणाली को धता बतायें तो इसे बेईमानी या कारस्तानी की श्रेणी में ही रखा जायेगा । ऐसे उद्यमों में मानवीय नहीं राजनीतिक गंध आने लगेगी । डॉ. विनायक सेन की रिहाई को लेकर तथाकथित मानवाधिकारवादियों, बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों द्वारा किये गये आंदोलन, धरना, ज्ञापनबाजी और अखबारबाजी के पीछे मानवीयता का तकाज़ा कम राजनीति अधिक है, अन्यथा उस विनायक सेन के उन जीवन-उद्देश्यों की याद भी ऐसे तत्वों को आती, जिसमें वे आदिवासियों, गऱीब, दीन-दुखियों की चिकित्सा के लिए कटिबद्ध थे, उन्हें जागृत कर रहे थे । यदि ऐसे मानवाधिकारवादियों को बस्तर के भोले-भाले आदिवासियों की पीड़ा की पहचान नहीं है तो इसका एक ही निहितार्थ है कि वे व्यक्ति पर विश्वास करते हैं समष्टि पर कदापि नहीं, और उन्हें शायद इसीलिए डॉ. विनायक सेन के अलावा समूचे बस्तर में एक भी आदिवासी दुखी, संत्रस्त, दयनीय नजर नहीं आता । दरअसल उनका लक्ष्य डॉ. विनायक सेन की रिहाई के रूप में ऐसे बुद्धिजीवी, समाजसेवी और एक्टिविस्ट की रिहाई है जो छत्तीसगढ़ में उनके निहित उद्देश्यों और विचारों की ज़मीन को मजबूत करता रहे । उनका लक्ष्य यदि आम आदमी के मानवाधिकारों के प्रति संघर्ष होता तो शायद उनके एजेंडे में निहत्थे और निर्दोष आदिवासियों की परवशता भी अवश्य शामिल होती, जैसा कि है ही नहीं । अतः यह क्यों नहीं कहा जा सकता है कि मानवाधिकारवादियों की एजेंडो, रणनीतियों, कार्यवाहियों का नैतिकता और संवेदना से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है । यदि कोई रिश्ता है तो उसकी झलक मानवाधिकारवादियों, तथाकथित बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों को दिखानी होगी, अन्यथा पढ़ी-लिखी जनता और अनपढ़, सीधे-सादे आदिजन भी ऐसी हरकतों के रहस्यों को मन ही मन अनावृत करना जानते हैं ।

जहाँ तक डॉ. विनायक सेन की समाजसेविता और मानवाधिकारवादिता का प्रश्न है उसमें तब तक किसी को आपत्ति नहीं है जब तक उसमें शुचिता हो, सांवैधानिक और व्यवस्थागत मूल्यों से द्वंद्वात्मक रिश्ता न हो । ऐसे कार्यों से न तो किसी राजनीतिक पार्टी को आपत्ति हो सकती है न ही तंत्र या पुलिस को । उन्हें साम्राज्यवाद के खिलाफ एक सशक्त कार्यकर्ता बताया जाता है । आम भारतीय और खासकर छत्तीसगढ़ की जनता भी साम्राज्यवाद के विरोध में है, क्योंकि प्रजातंत्र का भी यही लक्ष्य है । किन्तु प्रजातंत्र के वृत में रहकर ही ऐसे सुलक्ष्यों की प्राप्ति शोभनीय है । यदि साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष में आम और गऱीब आदमी को ही हत्या और दमन का शिकार बना दिया जाये तो ऐसे साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष का समर्थन भारतीय जनता किस मूँह से करेगी ? भारतीय व्यवस्था में साम्राज्यवादी ताकतों के बरक्स समाजवादी मूल्यों को तरजीह दी गई है । किन्तु सिर्फ इसी के नाम पर हिंसा, आंतक, अमानवीयता और विकास विरोधी कार्यवाहियों के तर्ज पर नहीं अपितु एक स्वस्थ और प्रजात्रांतिक प्रावधानों के तहत और इसके लिए चुनाव जैसा उच्चतम प्रावधान भी संकेतित है । भारतीय कानून में समाजसेवा की तो छूट है किन्तु पूर्व समाजसेवा का वास्ता देकर भावुक स्वप्न के तहत किसी संविधान या व्यवस्था को ही ध्वस्त करने वाले अपराध में संदिग्धता की छूट नहीं है । साधु यदि हत्या कर दे तो उसे भी भारतीय कानून के तहत कटघरे में खड़ा होना पड़ता है । यदि साधु यह समझ बैठे कि उसकी पूर्व में की गई साधुता के बल पर उसके किसी अपराध को ही बिसार कर माफ़ कर दिया जाय तो यह कैसे संभव है ? ऐसे लोगों को साधु की श्रेणी में भी रखा जाना मूर्खता होगी, क्योंकि या तो वह पहले साधु नहीं था और यदि था तो उसे साधु विरोधी कामों में हाथ नहीं डालना चाहिए ।

डॉ. विनायक सेन पर छत्तीसगढ़ पुलिस का स्पष्ट आरोप है कि उनके द्वारा जेल में निरूद्ध नक्सली एवं जेल से बाहर रह रहे नक्सलियों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करने में लिप्त होना पाया गया है । उनका प्रकरण चालानी कार्यवाही के बाद सक्षम न्यायालय में जारी है । वास्तविकता यही है कि उनपर छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा कानून अधिनियम 2005 की धारा 2 ख, घ, 8-1, 2, 3, 5 एवं विधि विरूद्ध क्रियाकलाप निवारण अधिनियम 1967 धारा 10ए, 1,3, 20,21,38,39 तथा भारतीय दंड विधान की धारा 120 बी, 121 क, 124 क के तहत गिरफ़्तार किया गया था ।

मानवाधिकारवादी यह भलीभाँति जानते थे कि उनकी रिहाई सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने पर ही होगी, और सुप्रीम कोर्ट पिछले एक साल से नकार नकारता रहा कि उन्हें जमानत पर रिहाई नहीं दी जा सकती । इस बीच जिस तरह से श्री सेन के हमदर्द मानवाधिकारवादियों ने देश और विदेश में हल्ला मचाया वह भी क्या सुप्रीम कोर्ट की अवमानना की श्रेणी में नहीं आता । ऐसे समय में जो मानवाधिकार वादी या संगठन ऐसे कानून को ही धता बता रहे थे, संबंधित न्यायाधीश पर छत्तीसगढ़ सरकार से मिली भगत का आरोप लगा रहे थे तब वे एक तरह से केवल अपनी ही हाँके जा रहे थे जो कपोल कल्पित और अवैधानिक भी था । झूठ तो था ही – बिलकुल सफेद झूठ । यदि सफेद झूठ नहीं था तो उन्हें अब ऐसे पूर्व आरोपों के लिए भारतीय न्यायप्रणाली पर आस्था और सद्भावना प्रकट करनी चाहिए जैसा कि वे करेंगे ही नहीं । उनके समझ में यह क्यों नहीं आता है कि भारत में कानून के अनुसार ही न्याय मिलता है । उसके सम्मुख भारत का हर नागरिक बराबर है । भारतीय कानून में प्रतिभा, विद्वता, बौद्धिकता, समाजसेवा का वांछित सम्मान है किन्तु उससे चूक कर अपराध कारित करने वालों के लिए अपमान भी सन्निहित है । ऐसे में यदि कोई प्रकरण यदि जमानत हेतु विचाराधीन हो, न्यायालय में मामला जारी हो, उसके खिलाफ, धरना, प्रदर्शन, आंदोलन करने से यह बात साफ़ प्रमाणित हो गई है कि ऐसे तत्वों को भारतीय संविधान, कानून, मूल्यों, चरित्रो के प्रति कोई विश्वास नहीं । और ऐसे में इन गतिविधियों को क्या अराजक नहीं माना जाना चाहिए ?
ठंडे दिमाग़ से विचार करने पर ऐसी मानवाधिकारवादी गतिविधियाँ नक्सलवाद या माओवाद की अनुषांगिक कार्यवाहियाँ दिखाई देती हैं । यह श्री सेने की रिहाई के बाद की घटनाओं से भी प्रमाणित दिखाई देती है । पिछले दिनों जिस तरह से नक्सलियों द्वारा उनकी रिहाई का आनंद मनाया गया । गाँव-गाँव में पर्चे बाँटे गये वह श्री सेन के प्रति नक्सलियों की मात्र आभासी हमदर्दी नहीं प्रमाणित हमदर्दी है जो वे अब छत्तीसगढ़ के जेलों में बंद अन्य नक्सलियों की रिहाई के लिए तेज आंदोलन की माँग कर रहे हैं । राज्य के समाचार पत्रों के दफ्तरों को प्रेषित नक्सली नेता गुड़सा उसेंडी की प्रेस-विज्ञप्तियाँ यही तो साबित करती हैं जो वे श्री सेन उनके हितचिंतक हों ना हों, नक्सली उनके हितचिन्तक अवश्य हैं । हो यह भी सकता है कि वे व्यवस्था को प्रश्नांकित करने के लिए ही उनकी रिहाई के बहाने जलसा कर रहे हैं ।

दरअसल छत्तीसगढ़ में नक्सली विरोधी और प्रजातांत्रिक पुलिस कार्यवाहियों से नक्सलवाद के सचेतक, संचालक और सहयोगी सकते में आ चुके हैं क्योंकि इस बीच सुरक्षात्मक कार्यवाहियों से नक्सलियों का किला छत्तीसगढ़ में पूर्णतः असुरक्षित हो चुका है । जैसा कि विनायक सेन के पास से जब्त सामग्रियों की पड़ताल से पुलिस को यह विश्वास है कि वे बस्तर के उस नक्सलवाद के बौद्धिक संचालकों में से हैं जिनके तार सारे देश और विदेश के माओवादी संगठनों से जुड़ते हैं । ऐसे में नक्लसवाद के खात्मे से देश-विदेश के माओवादी चिंतित क्यों नहीं होंगे ! सच तो यह भी हो सकता है कि डॉ.विनायक सेन वह टूल्स हैं जिनकी रिहाई के मुद्दे को बार-बार उठाकर माओवादी विचारधारा के बुद्धिजीवी प्रजातांत्रिक व्यवस्था को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहे थे । उनकी मति में इसका एक निहितार्थ यह भी है कि नक्सलवाद ही प्रजातंत्र का विकल्प है, जिस पर भारतीय समाज दिग्भ्रमित हो सके और उसके असंतोष का फायदा नक्सलवाद की गति को बढ़ाने में भी उठाया जा सके । यदि ऐसा न होता और मानवाधिकार वादी सचमुच अहिंसक विचारों के पक्षधर होते तो वे सलवा जुडूम की शांतिपूर्ण कार्यवाही को भी अपने एजेंडे में शामिल किये होते, कम से कम अपनी साख बढ़ाने के नाम पर । पर ऐसा उनके लिए संभव नहीं है क्योंकि वे अपने सुनियोजित उद्देश्य के तहत ही आगे (?) बढ़ रहे हैं जिसमें केवल और केवल प्रजातंत्र का ध्वस्तीकरण है और लालकिले में माओवादी लाल झंडे की प्रतिष्ठा । पर भारत नेपाल नहीं है । यहाँ राजतंत्र नहीं है । यहाँ समूचे जनमानस को प्रजातंत्र पर असीम आस्था है । भारतीय जनता के रहते कोई प्रजातंत्र को बूरी नजरों से नहीं देख सकता ।
(लेखक वरिष्ठ आलोचक एवं शिक्षाविद् हैं)