4/19/2008

आरक्षण मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय का न्याय

भारतवर्ष में राजनैतिक दलों द्वारा बड़े ही दुर्भाग्यपूर्ण तरींके से धर्म जाति, वर्ग, क्षेत्र तथा भाषा आदि के नाम पर जनता से वोट माँगे जाते हैं। राजनैतिक दल अथवा नेतागण इस बात को भली भाँति समझते हैं कि चूँकि उनके द्वारा विकास एवं प्रगति के नाम पर ऐसा कुछ विशेष नहीं किया गया है जिसकी दुहाई देकर वे मतदाताओं से अपने पक्ष में मतदान करने का निवेदन कर सकें। अत: मतदाताओं को धर्म जाति व सम्प्रदाय जैसे सीमित दायरों में बांधकर तथा उन्हीं सीमित स्वार्थों का वास्ता देकर मत प्राप्त करना इन निकृष्ट नेताओं व राजनैतिक दलों को सुगम प्रतीत होता है। और यही विचार आरक्षण जैसे उस फ़ार्मूले को जन्म देते हैं जोकि शायद ही समाज के किसी भी एक वर्ग का सही ढंग से कल्याण कर पाता हो। परन्तु देश में लागू आरक्षण की वर्तमान नीतियां अनारक्षित वर्ग के लोगों में आरक्षित वर्ग के प्रति वैमनस्य का पर्याय अवश्य बन जाती हैं।

स्वतंत्र भारत में आरक्षण की शुरुआत दलित समाज को अन्य समाज के बराबर खड़ा करने के उद्देश्य से की गई थी। समय गुज़रने के साथ-साथ दलित, आरक्षण तथा आरक्षण की आवश्यकताओं आदि की परिभाषा भी बदलती गई। यदि कुछ लोगों ने विशेषकर आरक्षित वर्ग के सम्पन्न लोगों ने इस आरक्षण नीति के लाभ उठाए हैं तो इसी आरक्षण के विद्वेष स्वरूप हमारा यह शांतिप्रिय देश कई बार आग की लपटों में भी घिर चुका है। मण्डल आयोग की सिंफारिशों को लागू किए जाने को लेकर पूरे देश में छात्रों द्वारा अपने भविष्य के प्रति चिंतित होकर जो आक्रोश व्यक्त किया गया था तथा उस दौरान जिस प्रकार की दर्दनाक घटनाएं सुनने में आई थीं, उन्हें याद कर आज भी दिल दहल जाता है। परन्तु आम जनता सिवाए मूकदर्शक बनी रहने के और कर भी क्या सकती है।


बहरहाल उच्चतम् न्यायालय ने गत् दिनों ओबीसी आरक्षण के विषय में अपना जो ऐतिहासिक निर्णय दिया है उसने वास्तव में नेताओं की आँखें खोल कर रख दी हैं। उच्चतम् न्यायालय की एक 5 सदस्यीय पीठ ने सर्वसम्मति से अपने ऐतिहासिक फैसले में ओ बी सी वर्ग को उच्च शिक्षण संस्थानों में दिए जाने वाले 27 प्रतिशत आरक्षण के दायरे से आरक्षित वर्ग से सम्बद्ध रखने वाले सम्पन्न परिवार (क्रीमी लेयर) के लोगों को अलग रखने का निर्देश दिया है। साथ ही साथ माननीय न्यायालय ने शिक्षण संस्थानों को इस बात की भी हिदायत दी है कि आरक्षित सीटों के लिए अतिरिक्त सीटों का प्रबन्ध किया जाए ताकि सामान्य श्रेणी के छात्रों के हित भी सुरक्षित रह सकें।

माननीय उच्चतम् न्यायालय का यह ऐतिहासिक फैसला एक ऐसा अदालती फैसला है जिसकी प्रतीक्षा गत् 50 वर्षों से देश के बुद्धिजीवी समाज द्वारा की जा रही थी। पूरे देश में इस विषय पर प्राय: बहस होती रहती थी कि आरक्षण का वास्तविक उद्देश्य क्या है तथा आरक्षण का आधार आंखिरकार क्या होना चाहिए। धर्म जाति के नाम पर आरक्षण किया जाना चाहिए अथवा आर्थिक स्थिति के मद्देनज़र आरक्षण की ज़रूरत महसूस की जाए? अब तक देखा भी यही गया है कि आरक्षण तो बेशक दलित अथवा पिछड़े वर्ग के लोगों का उनकी जाति अथवा समुदाय के आधार पर कर दिया जाता था परन्तु उसका लाभ ज़मीनी स्तर पर वास्तविक ज़रूरतमंदों तक बहुत ही कम पहुँच पाता था। आमतौर पर आरक्षित समुदाय से संबंध रखने वाले शक्तिशाली, नेतागण तथा साधन सम्पन्न लोग ही आरक्षण का लाभ उठा पाते थे।


ऐसा होने से निश्चित रूप से आरक्षण दिए जाने का सरकार का वह उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता था जिसके लिए कि आरक्षण नीति लागू की जाती थी। अर्थात् दबे कुचले व अपेक्षित समाज को ऊपर उठाना, उन्हें बराबरी के दर्जे पर लाना तथा इस प्रकार सम्पन्न भारत का निर्माण करना।


उच्चतम् न्यायालय ने पहली बार उच्च शिक्षण संस्थानों में ओ बी सी को दिए जाने वाले 27 प्रतिशत आरक्षण की परिधि से ओबीसी वर्ग के सम्पन्न परिवारों (क्रीमी लेयर) को अलग रखने की हिदायत देकर भविष्य के लिए एक नई एवं सार्थक बहस को निमंत्रण दे दिया है। हालांकि केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान जैसे सम्पन्न घरानों के लोगों को यह बात ज़रूर नागवार गुज़री है तथा इन्होंने सम्पन्न घरानों के आरक्षण की भी वकालत की है। परन्तु पासवान जैसे नेताओं की बातों में केवल स्वार्थ की ही झलक देखने को मिलती है जबकि उच्चतम् न्यायालय का निर्णय पूरी तरह न्यायपूर्ण, राष्ट्रहित में तथा आरक्षण के वास्तविक उद्देश्य की पूर्ति करता हुआ नज़र आता है। आरक्षण का आधार आर्थिक होना चाहिए, जातिगत नहीं। इस बात को लेकर कई दशकों से हमारे देश में अच्छी ख़ासी बहस होती रही है। टेलीविंजन व प्रिंट मीडिया में प्राय: इस विषय पर पत्रकारों व समीक्षकों के विचार आते रहे हैं। यदि मुट्ठी भर आरक्षित जातियों से संबंध रखने वाले नेताओं की बातें छोड़ दें तो आम समाज इसी विचारधारा का पक्षधर नज़र आया है कि सम्पन्न लोगों को आरक्षण क़तई नहीं दिया जाना चाहिए अर्थात् आरक्षण का आधार आर्थिक होना चाहिए जातिगत नहीं।

ऐसा विश्वास किया जाना चाहिए कि उच्चतम् न्यायालय के फैसले से जाति आधारित आरक्षण की माँग करने वाले नेताओं के मुंह बंद होंगे तथा समाज का वास्तविक ज़रूरतमंद वर्ग जोकि आर्थिक रूप से कमंजोर होने की वजह से आरक्षण का हंकदार है, की उम्मीदें जागेंगी। चाहे वह अनारक्षित जाति से संबंध रखने वाला ही क्यों न हो। अभी तक तो आमतौर पर पूरे देश में यही देखा जा रहा है कि जाति आधारित आरक्षण का लाभ अधिकांशतय: पूरे देश में या तो आरक्षित जाति के नेताओं के परिवारों अथवा उनके रिश्तेदारों को प्राप्त हुआ है या आरक्षित जाति के प्रशासनिक अधिकारियों, राजपत्रित अधिकारियों अथवा आर्थिक रूप से सम्पन्न व्यापारी वर्ग के लोगों को इसका लाभ मिल सका है। यह भी देखा जा सकता है कि गत् 50 वर्षों में इसी आरक्षण का लाभ उठाकर किस प्रकार से एक सम्पन्न परिवार और अधिक सम्पन्न, अति सम्पन्न बनता गया जबकि आरक्षण का वास्तविक हक़दार टकटकी लगाए अपनी बारी आने की प्रतीक्षा ही करता रह गया।

इस बात की प्रबल संभावना है कि भारत में बढ़ते जा रहे निजी कम्पनियों के बड़े जाल तथा उनमें रोंजगार की अत्यधिक संभावनाओं के परिणामस्वरूप सम्भवत: निजी क्षेत्र भी आरक्षण की नीतियों के दायरे में यथाशीघ्र आ जाएंगे। यदि ऐसा हुआ तो इस क्षेत्र में भी सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान निर्णय को मद्देनज़र रखा जाना चाहिए। यहां भी यदि आरक्षण लागू हुआ तो प्राथमिकता उन्हीं लोगों को दी जानी चहिए जो आर्थिक रूप से आरक्षण के हक़दार हैं न कि सिफ़ारिशी, सम्पन्न तथा नेताओं के रिश्तेदारों को।

आशा की जानी चाहिए कि उच्चतम् न्यायालय का यह फैसला भविष्य में लागू होने वाले आरक्षणों के लिए तो एक उदाहरण साबित होगा ही, साथ-साथ जो आरक्षण नीतियाँ इस समय शिक्षा अथवा नौकरी के क्षेत्रों में लागू हुई हैं, उन पर भी उच्चतम् न्यायालय के इस निर्णय को लागू करने की व्यवस्था की जाएगी। ताकि आरक्षण का वास्तविक लाभ उसके वास्तविक हक़दार को मिल सके। ऐसी आशा की जाती है कि सर्वोच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक निर्णय से समाज में परस्पर सहयोग व भाईचारा भी बढ़ेगा तथा ज़रूरतमंद को उसके अधिकार भी मिलेंगे एवं ग़रीबों के जीवन स्तर में सुधार आने के परिणामस्वरूप भारत भी सम्पन्नता की ओर आगे बढ़ सकेगा।

निर्मल रानी
163011, महावीर नगर,
अम्बाला शहर,हरियाणा।

1 टिप्पणी:

अतुल ने कहा…

वास्तविक हकदार को मिल जाए तो बहुत बडी बात होगी.