6/01/2009

मानवाधिकार बनाम नक्सलवाद से प्रेम

डॉ. बलदेव

बार-बार कहा गया लिजलिजा झूठ भी ठौस और बेलौस सच में तब्दील हो जाता है, इतना नहीं तो उसे सामान्य मति के लोग सच की मानिंद समझने लगते हैं । देश और विदेश में विनायक सेन की रिहाई की माँग इसी फ़ार्मूले से की जा रही थी । माओवादियों और नक्सलियों की रणनीतियों की ठोड़ी-सी भी समझ रखने वाले यह बखूबी समझ सकते हैं कि किस तरह ऐसे तत्व सरकार, व्यवस्था, पुलिस की छोटी-छोटी-सी कमज़ोरी को जनता के लिए दमनात्मक बताते हुए मानवाधिकार का प्रश्न बना देते हैं किन्तु इसके ठीक विपरीत वे अपनी क्रांतिकारी लक्ष्यों के लिए निर्दोष आदिवासियों, महिलाओं, बच्चों और सरकारी कारिंदों की हत्या, शोषण पर शुतुरमूर्गी अंदाज में अपना मुँह छुपा लेते हैं ।

पिछले दिनों डॉ. विनायक सेन की रिहाई को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह वितंड़ावाद खड़ा किया जा रहा है उसमें माओवादियों, नक्सलियों के प्रति प्रायोजकीय हमदर्दी की बदबू को भी महसूसा जा सकता है । द्वंद्व से भरे और व्यापार की शक्ल धारण कर चुके मानवाधिकारवादी संगठनों को 120 करोड़ से अधिक आबादी वाले भारत और नक्सली हत्याओं से ग्रस्त राज्य छत्तीसगढ़ में केवल एक ऐसे तथाकथित समाजसेवी, चिकित्सक के मानवाधिकार की याद जाती नहीं जिस पर भारतीय संविधान और प्रजातंत्र के विरूद्ध जाने वाले संगठनों यानी नक्सलवादियों को सहयोग करते रहने का आरोप है तथा जिन्हें जिलाकोर्ट, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी जमानत देने से साफ़ मना कर दिया था और बमुश्किल कुछ ही दिन पहले जमानत मिली है । ताज्जूब है कि ऐसी जमानत को भी वे सरकार और व्यवस्था की हार के रूप में देख रहे हैं ।

डॉ. विनायक सेन की रिहाई में लगे कथित मानवाधिकारवादियों की चेतना के पीछे की वास्तविकता को जानने के लिए यह ज़रूरी है कि मानवाधिकारवादियों की एजेंडो, रणनीतियों, कार्यवाहियों की नैतिकता और संवेदना को परखा जाये । एक सच यह भी है कि मानवाधिकारवादियों की आँखें छत्तीसगढ़ सहित भारत के 17 से अधिक राज्यों में नक्सली हिंसा में मारे जा रहे निर्दोषों आदिवासियों के शव, रोते-कलपते परिजनों का चेहरा नहीं देख पातीं । नक्सलियों द्वारा बच्चों को बंदूकें पकड़ाने की नक्सली हरकतें चिंताजनक नहीं लगतीं । महिलाओं को नक्सली हवस का शिकार बनते वक्त जंगलों में गूँजती चीख भी शायद नहीं सुनाई देती । इतना ही नहीं गाँव के गाँव आग के हवाले फूँक दिये जाते हैं, करोड़ों-अरबों की सामाजिक संपत्ति दिन दहाड़े तहस-नहस कर दी जाती है । समूची बस्ती नक्सली आंतक से पलायन को विवश हो उठते हैं, अपनी मिट्टी, अपनी हवा, अपना पानी की याद करते करते वे विस्थापित हो जाते हैं, यह भी किसी मानवाधिकारवादी को नहीं दिखाई देता । क्या मानवाधिकार का इससे बड़ा मुद्दा समूचे विश्व में कहीं है ? कदाचित् नहीं । ऐसे में यह प्रश्न क्या स्वाभाविक नहीं कि इन्हें आख़िर क्योंकर मानवाधिकार के अंतरराष्ट्रीय सचेतक अपने एजेंडों से दूर रखते हैं ? साफ़ जाहिर है कि या तो उन्हें ऐसी आंतककारी और व्यवस्था विरोधी गतिविधियों से कोई वास्ता नहीं या फिर ऐसी माओवादी क्रियाकलापों से उन्हें कोई गुरेज नहीं । ऐसे में यह शंका उठती है कि कहीं ऐसे मानवाधिकारवादी माओवादी हिंसा के पक्षधर तो नहीं । यदि ऐसा है तो इसमें कोई दो मत नहीं कि वे नक्सलियों के हितचिंतक, परामर्शक, सहयोगी भूमिका में भी हों। हो तो यह भी सकता है कि मानवाधिकार की आवाज़ सिर्फ़ बड़े-बड़े महादेशों के भारी भरकम अनुदान से एनजीओ चलाने वालों के लिए ही उठायी जाती है । अन्यथा जिस देश में आये दिन लाखों गरीबों, असहायों और पीडितों के मानवाधिकार का हनन हो रहा है वहाँ केवल एक समाजसेवी चिकित्सक के किसी आरोप में जेल में निरूद्ध होना इतना ध्यानाकर्षणी नहीं हो उठता । यह दीगर बात है कि जेल में निरूद्ध आरोपी का भी मानवाधिकार होता है और उसकी निगरानी भी होनी चाहिए तथा संविधान सम्मत वे सारी सुविधायें मिलनी चाहिए जो उन्हें ज़रूरत थीं ।

मानवाधिकार एक सार्वजनिक माँग है और इसके लिए सभी को अपने हृदय में जगह रखनी होगी । इसे केवल सुविधाभोगी, सुशिक्षित विकसित लोगों के संरक्षण का तर्क नहीं माना जा सकता । यदि हम किसी एक ही व्यक्ति मानवाधिकार के लिए अंतराष्ट्रीय संघर्ष करें, बार-बार समूची न्यायप्रणाली को धता बतायें तो इसे बेईमानी या कारस्तानी की श्रेणी में ही रखा जायेगा । ऐसे उद्यमों में मानवीय नहीं राजनीतिक गंध आने लगेगी । डॉ. विनायक सेन की रिहाई को लेकर तथाकथित मानवाधिकारवादियों, बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों द्वारा किये गये आंदोलन, धरना, ज्ञापनबाजी और अखबारबाजी के पीछे मानवीयता का तकाज़ा कम राजनीति अधिक है, अन्यथा उस विनायक सेन के उन जीवन-उद्देश्यों की याद भी ऐसे तत्वों को आती, जिसमें वे आदिवासियों, गऱीब, दीन-दुखियों की चिकित्सा के लिए कटिबद्ध थे, उन्हें जागृत कर रहे थे । यदि ऐसे मानवाधिकारवादियों को बस्तर के भोले-भाले आदिवासियों की पीड़ा की पहचान नहीं है तो इसका एक ही निहितार्थ है कि वे व्यक्ति पर विश्वास करते हैं समष्टि पर कदापि नहीं, और उन्हें शायद इसीलिए डॉ. विनायक सेन के अलावा समूचे बस्तर में एक भी आदिवासी दुखी, संत्रस्त, दयनीय नजर नहीं आता । दरअसल उनका लक्ष्य डॉ. विनायक सेन की रिहाई के रूप में ऐसे बुद्धिजीवी, समाजसेवी और एक्टिविस्ट की रिहाई है जो छत्तीसगढ़ में उनके निहित उद्देश्यों और विचारों की ज़मीन को मजबूत करता रहे । उनका लक्ष्य यदि आम आदमी के मानवाधिकारों के प्रति संघर्ष होता तो शायद उनके एजेंडे में निहत्थे और निर्दोष आदिवासियों की परवशता भी अवश्य शामिल होती, जैसा कि है ही नहीं । अतः यह क्यों नहीं कहा जा सकता है कि मानवाधिकारवादियों की एजेंडो, रणनीतियों, कार्यवाहियों का नैतिकता और संवेदना से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है । यदि कोई रिश्ता है तो उसकी झलक मानवाधिकारवादियों, तथाकथित बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों को दिखानी होगी, अन्यथा पढ़ी-लिखी जनता और अनपढ़, सीधे-सादे आदिजन भी ऐसी हरकतों के रहस्यों को मन ही मन अनावृत करना जानते हैं ।

जहाँ तक डॉ. विनायक सेन की समाजसेविता और मानवाधिकारवादिता का प्रश्न है उसमें तब तक किसी को आपत्ति नहीं है जब तक उसमें शुचिता हो, सांवैधानिक और व्यवस्थागत मूल्यों से द्वंद्वात्मक रिश्ता न हो । ऐसे कार्यों से न तो किसी राजनीतिक पार्टी को आपत्ति हो सकती है न ही तंत्र या पुलिस को । उन्हें साम्राज्यवाद के खिलाफ एक सशक्त कार्यकर्ता बताया जाता है । आम भारतीय और खासकर छत्तीसगढ़ की जनता भी साम्राज्यवाद के विरोध में है, क्योंकि प्रजातंत्र का भी यही लक्ष्य है । किन्तु प्रजातंत्र के वृत में रहकर ही ऐसे सुलक्ष्यों की प्राप्ति शोभनीय है । यदि साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष में आम और गऱीब आदमी को ही हत्या और दमन का शिकार बना दिया जाये तो ऐसे साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष का समर्थन भारतीय जनता किस मूँह से करेगी ? भारतीय व्यवस्था में साम्राज्यवादी ताकतों के बरक्स समाजवादी मूल्यों को तरजीह दी गई है । किन्तु सिर्फ इसी के नाम पर हिंसा, आंतक, अमानवीयता और विकास विरोधी कार्यवाहियों के तर्ज पर नहीं अपितु एक स्वस्थ और प्रजात्रांतिक प्रावधानों के तहत और इसके लिए चुनाव जैसा उच्चतम प्रावधान भी संकेतित है । भारतीय कानून में समाजसेवा की तो छूट है किन्तु पूर्व समाजसेवा का वास्ता देकर भावुक स्वप्न के तहत किसी संविधान या व्यवस्था को ही ध्वस्त करने वाले अपराध में संदिग्धता की छूट नहीं है । साधु यदि हत्या कर दे तो उसे भी भारतीय कानून के तहत कटघरे में खड़ा होना पड़ता है । यदि साधु यह समझ बैठे कि उसकी पूर्व में की गई साधुता के बल पर उसके किसी अपराध को ही बिसार कर माफ़ कर दिया जाय तो यह कैसे संभव है ? ऐसे लोगों को साधु की श्रेणी में भी रखा जाना मूर्खता होगी, क्योंकि या तो वह पहले साधु नहीं था और यदि था तो उसे साधु विरोधी कामों में हाथ नहीं डालना चाहिए ।

डॉ. विनायक सेन पर छत्तीसगढ़ पुलिस का स्पष्ट आरोप है कि उनके द्वारा जेल में निरूद्ध नक्सली एवं जेल से बाहर रह रहे नक्सलियों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करने में लिप्त होना पाया गया है । उनका प्रकरण चालानी कार्यवाही के बाद सक्षम न्यायालय में जारी है । वास्तविकता यही है कि उनपर छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा कानून अधिनियम 2005 की धारा 2 ख, घ, 8-1, 2, 3, 5 एवं विधि विरूद्ध क्रियाकलाप निवारण अधिनियम 1967 धारा 10ए, 1,3, 20,21,38,39 तथा भारतीय दंड विधान की धारा 120 बी, 121 क, 124 क के तहत गिरफ़्तार किया गया था ।

मानवाधिकारवादी यह भलीभाँति जानते थे कि उनकी रिहाई सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने पर ही होगी, और सुप्रीम कोर्ट पिछले एक साल से नकार नकारता रहा कि उन्हें जमानत पर रिहाई नहीं दी जा सकती । इस बीच जिस तरह से श्री सेन के हमदर्द मानवाधिकारवादियों ने देश और विदेश में हल्ला मचाया वह भी क्या सुप्रीम कोर्ट की अवमानना की श्रेणी में नहीं आता । ऐसे समय में जो मानवाधिकार वादी या संगठन ऐसे कानून को ही धता बता रहे थे, संबंधित न्यायाधीश पर छत्तीसगढ़ सरकार से मिली भगत का आरोप लगा रहे थे तब वे एक तरह से केवल अपनी ही हाँके जा रहे थे जो कपोल कल्पित और अवैधानिक भी था । झूठ तो था ही – बिलकुल सफेद झूठ । यदि सफेद झूठ नहीं था तो उन्हें अब ऐसे पूर्व आरोपों के लिए भारतीय न्यायप्रणाली पर आस्था और सद्भावना प्रकट करनी चाहिए जैसा कि वे करेंगे ही नहीं । उनके समझ में यह क्यों नहीं आता है कि भारत में कानून के अनुसार ही न्याय मिलता है । उसके सम्मुख भारत का हर नागरिक बराबर है । भारतीय कानून में प्रतिभा, विद्वता, बौद्धिकता, समाजसेवा का वांछित सम्मान है किन्तु उससे चूक कर अपराध कारित करने वालों के लिए अपमान भी सन्निहित है । ऐसे में यदि कोई प्रकरण यदि जमानत हेतु विचाराधीन हो, न्यायालय में मामला जारी हो, उसके खिलाफ, धरना, प्रदर्शन, आंदोलन करने से यह बात साफ़ प्रमाणित हो गई है कि ऐसे तत्वों को भारतीय संविधान, कानून, मूल्यों, चरित्रो के प्रति कोई विश्वास नहीं । और ऐसे में इन गतिविधियों को क्या अराजक नहीं माना जाना चाहिए ?
ठंडे दिमाग़ से विचार करने पर ऐसी मानवाधिकारवादी गतिविधियाँ नक्सलवाद या माओवाद की अनुषांगिक कार्यवाहियाँ दिखाई देती हैं । यह श्री सेने की रिहाई के बाद की घटनाओं से भी प्रमाणित दिखाई देती है । पिछले दिनों जिस तरह से नक्सलियों द्वारा उनकी रिहाई का आनंद मनाया गया । गाँव-गाँव में पर्चे बाँटे गये वह श्री सेन के प्रति नक्सलियों की मात्र आभासी हमदर्दी नहीं प्रमाणित हमदर्दी है जो वे अब छत्तीसगढ़ के जेलों में बंद अन्य नक्सलियों की रिहाई के लिए तेज आंदोलन की माँग कर रहे हैं । राज्य के समाचार पत्रों के दफ्तरों को प्रेषित नक्सली नेता गुड़सा उसेंडी की प्रेस-विज्ञप्तियाँ यही तो साबित करती हैं जो वे श्री सेन उनके हितचिंतक हों ना हों, नक्सली उनके हितचिन्तक अवश्य हैं । हो यह भी सकता है कि वे व्यवस्था को प्रश्नांकित करने के लिए ही उनकी रिहाई के बहाने जलसा कर रहे हैं ।

दरअसल छत्तीसगढ़ में नक्सली विरोधी और प्रजातांत्रिक पुलिस कार्यवाहियों से नक्सलवाद के सचेतक, संचालक और सहयोगी सकते में आ चुके हैं क्योंकि इस बीच सुरक्षात्मक कार्यवाहियों से नक्सलियों का किला छत्तीसगढ़ में पूर्णतः असुरक्षित हो चुका है । जैसा कि विनायक सेन के पास से जब्त सामग्रियों की पड़ताल से पुलिस को यह विश्वास है कि वे बस्तर के उस नक्सलवाद के बौद्धिक संचालकों में से हैं जिनके तार सारे देश और विदेश के माओवादी संगठनों से जुड़ते हैं । ऐसे में नक्लसवाद के खात्मे से देश-विदेश के माओवादी चिंतित क्यों नहीं होंगे ! सच तो यह भी हो सकता है कि डॉ.विनायक सेन वह टूल्स हैं जिनकी रिहाई के मुद्दे को बार-बार उठाकर माओवादी विचारधारा के बुद्धिजीवी प्रजातांत्रिक व्यवस्था को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहे थे । उनकी मति में इसका एक निहितार्थ यह भी है कि नक्सलवाद ही प्रजातंत्र का विकल्प है, जिस पर भारतीय समाज दिग्भ्रमित हो सके और उसके असंतोष का फायदा नक्सलवाद की गति को बढ़ाने में भी उठाया जा सके । यदि ऐसा न होता और मानवाधिकार वादी सचमुच अहिंसक विचारों के पक्षधर होते तो वे सलवा जुडूम की शांतिपूर्ण कार्यवाही को भी अपने एजेंडे में शामिल किये होते, कम से कम अपनी साख बढ़ाने के नाम पर । पर ऐसा उनके लिए संभव नहीं है क्योंकि वे अपने सुनियोजित उद्देश्य के तहत ही आगे (?) बढ़ रहे हैं जिसमें केवल और केवल प्रजातंत्र का ध्वस्तीकरण है और लालकिले में माओवादी लाल झंडे की प्रतिष्ठा । पर भारत नेपाल नहीं है । यहाँ राजतंत्र नहीं है । यहाँ समूचे जनमानस को प्रजातंत्र पर असीम आस्था है । भारतीय जनता के रहते कोई प्रजातंत्र को बूरी नजरों से नहीं देख सकता ।
(लेखक वरिष्ठ आलोचक एवं शिक्षाविद् हैं)

2 टिप्‍पणियां:

राजीव रंजन प्रसाद ने कहा…

"सच तो यह भी हो सकता है कि डॉ.विनायक सेन वह टूल्स हैं जिनकी रिहाई के मुद्दे को बार-बार उठाकर माओवादी विचारधारा के बुद्धिजीवी प्रजातांत्रिक व्यवस्था को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहे थे । उनकी मति में इसका एक निहितार्थ यह भी है कि नक्सलवाद ही प्रजातंत्र का विकल्प है, जिस पर भारतीय समाज दिग्भ्रमित हो सके और उसके असंतोष का फायदा नक्सलवाद की गति को बढ़ाने में भी उठाया जा सके । यदि ऐसा न होता और मानवाधिकार वादी सचमुच अहिंसक विचारों के पक्षधर होते तो वे सलवा जुडूम की शांतिपूर्ण कार्यवाही को भी अपने एजेंडे में शामिल किये होते, कम से कम अपनी साख बढ़ाने के नाम पर । पर ऐसा उनके लिए संभव नहीं है क्योंकि वे अपने सुनियोजित उद्देश्य के तहत ही आगे (?) बढ़ रहे हैं जिसमें केवल और केवल प्रजातंत्र का ध्वस्तीकरण है और लालकिले में माओवादी लाल झंडे की प्रतिष्ठा । पर भारत नेपाल नहीं है । यहाँ राजतंत्र नहीं है । यहाँ समूचे जनमानस को प्रजातंत्र पर असीम आस्था है।"

बेबाक सच्चाई है। आलेख का धन्यवाद।

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

... प्रसंशनीय व प्रभावशाली अभिव्यक्ति है, डा. सेन पर टिप्पणी उचित प्रतीत नही जान पडती है क्योंकि अभी प्रकरण न्यायालय मे विचाराधीन है।