8/31/2006

नई परम्परा के कवि भवभूति (ललित निबंध )


वाल्मीकि के पश्चात करुण रस को मानवीय करुणा को साहित्य और समाज के सोच के केन्द्र में प्रतिष्ठित कर देने वाले संभवतः भवभूति हैं। उनका कथन है कि एक करुणरस ही है जो विभिन्न राग मुद्रा के संयोग से अनेक रूपों में परिभाषित होता रहता है – पानी के बुलबुले की तरह, तरंग की तरह, भँवर की भाँति, फेन के माफिक –

एको रसः करुण एव निमित्तभेदा
द्भिन्न पृथक पृथगिव श्रयते विवर्तान्।
आवर्त बुदबुदतरङमयान्विकारान्
नम्मो यथा सलिलमेव तु तत्समग्रम्।।
- उत्तर चरित 3/47

कवि की इस प्रस्थापना की तह में जाकर विचार करें तो बड़बोलापन या नई बात कहकर साहित्य जगत को चौंका देने की मंशा नहीं है, अपितु श्रीराम के उत्तर चरित से उपजी संवेदना है – करुणा है। उसी का आवर्त है। परम्परा से रसराज की पदवी श्रृंगार को प्राप्त है। इस परम्परा के आगे बिना प्रश्न चिन्ह लगाये कवि ने करुणा को उसके आगे कर दिया। एक नई सोच दी। रस सोच के ही औरस पुत्र हैं। तरह-तरह की मानवीय चिन्ता – संवेदना साहित्य संसार में रस-राग के आकार-प्रकार में छवि धारणकर प्रकट होते रहते हैं – जलधर की भाँति भिगोने के लिए, तर करने के लिए, मानव होने के लिए। क्रौंचवध से उपजी पीड़ा – सोच ने आदि कवि को तरह-तरह के रस से युक्त आदि महाकाव्य रामायण रचने की प्रेरणा दी। मानों वही करुणा विविध रसों की भंगिमा में काव्यान बन गई। इसी परम्परा को मानों बढ़ाते हुए घनीभूत पीड़ा को भवभूति ने स्मृति से उतारकर ‘उत्तर रामचरितम्’ नाटक में करुण रस वाली नई अवधारणा की है। जैसे घनीभूत वाष्प कभी धारासार वर्षा में तो कभी बादल के फट पड़ने की और उसमें पर्वतों के धसक जाने की स्थिति निर्मित होती है, वैसे ही ‘उत्तररामचरित’ की करुणा - सीता-राम की पीड़ा ने पत्थर तक को अपने संग रोने के लिए – फट पड़ने के लिए विवश-सा कर दिया है – जो शेक्सपियर की त्रासदी नहीं कर सकी। सीता के वियोग से विकल जनस्थान के रोते हुए पत्थर और फटते हुए वज्रहृदय की गहराई को पश्चिमी त्रासदी कदाचित नहीं छू सकी है –

जनस्थाने शून्ये विकलकरणैरार्य चरितै
रपिग्रावा रोदित्यपि दलति वज्रस्य हृदयम्।। 1/28

वास्तव में करुणा यद्यपि दुखात्मक प्रकृति वाली है, परन्तु अन्य मौलिक प्रवृत्तियों की अपेक्षा यह त्वरित प्रतिक्रिया वाली है। यह अन्य प्रवृत्तियों को प्रतिक्रिया के लिए उकसाती है – कभी उत्साह को तो कभी क्रोध को, कभी घृणा को तो कभी शाँति-प्रेम को। करुणा की इसी व्यापक और सुखदुखात्मक प्रकृति को पहचानकर भवभूति ने अपनी प्रतिभा की भूति का प्रमाण दिया है। इसी से प्रभावित होकर उन्होंने आँचल में दूध और आँखों में आँसू समेटे स्त्री समजा के प्रति अपनी सहानुभूति विशेष रूप से अभिव्यक्त की है। सीता के विरह में राम को बार-बार रुलाया है। मूर्च्छित होने दिया है। करुण रस की भट्ठी में तपस्या है – (“पुटपाक प्रतिकाशो रामस्य करुणो रसः”) और उन्हें जन अदालत के कठघरे में खड़ा किया है – अपराध स्वीकारने के लिए। न्यायाधीश के द्वारा अपराधी करार दिये जाने पर अपराधबोध में वह प्रायश्चित का भाव नहीं रहता जो व्यक्ति के द्वारा स्वयं सबके सामने बिना किसी बाहरी दबाव के स्वीकारे जाने पर। राम ने स्वीकारा है कि एक तो रावण वध के बाद अग्नि परीक्षा लेना अन्याय था और उस पर से यह लोकापवाद के भय से निर्वासन दंड दिया जाना तो ‘अपूर्व चाण्डाल कर्म’ है। प्रेम से पाली गई चिड़िया को छल से बहेलिये के हाथ सौंप देना है –

“अपूर्वकर्मचाण्डालमयि मुग्धे विमु़ञ्चमाम्।
श्रितासि चन्दनभ्रान्त्या दुर्विपाकं विषद्रुमम्।।”
– उत्तर चरित 1/46

‘अपूर्वकर्मचाण्डाल’ राम को कहने का साहस या तो स्वयं राम ही कर सकते थे या भवभूति की कलम ही कर सकती थी। उनकी कलम स्त्री विषयक अनेक भ्रान्त धारणाओं और रुढ़ियों पर प्रहार करती है। मालतीमाधव नाटक में परम्परा से हटकर मालती और माधव के प्रेम परिणय के बाधक समाज को एक प्रकार से कालापिक करार दिया गया है। कापालिक अघोरघंट यदि मालती को बलि देने के लिए उद्यत है तो पिता भी मंत्री होकर भी राजा के बूढ़े नर्मसचिव नंदन से उसका ब्याह कर देने की स्वीकृति देकर कापालिक कर तरह बलि देने का ही मानो उपक्रम करते हैं – “निर्व्यूढ़ च निष्करुणतया तातस्य कापालिकत्वम्।” प्रोफेसर राधावल्लभ त्रिपाठी ने ठीक ही कहा है कि “सामंतीय समाज में स्त्री को एक उपभोग की वस्तु बना दिये जाने के विरुद्ध प्रतिक्रिया कालिदास और भवभूति दोनों ने बड़े प्रखर रूप में दी है।... कवि के मन में स्त्री की छवि और समाज में उसकी चिन्त्य स्थिति दोनों को एक साथ विडंबना की शैली में भवभूति ने राम के मुख से व्यक्त किया है”
(दूसरी परम्परा के नाटककार भवभूति पृष्ठ 9) –
“त्यवा जगन्ति पुण्यानि त्वययपुण्या जनोक्तयः
नाथवन्त स्त्वया लोकास्त्वमनाथा विपत्स्यते।।”
– उत्तर चरित 1/43

रचनाकार चाहे जिस वर्ग या संस्कार को लेकर सरस्वती के मंदिर में आये, वह मानवता, समता, समस्त के प्रति प्रेम और सदभाव संजोये रहता है – संतों की तरह। खासकर दबे, दलित, शोषित, पीड़ित के प्रति प्रार्थना, निवेदन लेकर आता है। उसके निवेदन में आक्रोश-आकांक्षा, रीझ-खीझ होते हैं – समष्टि के कल्याण के लिए भवभूति का स्वर जरा ज्यादा ही ऊँचा-तीखा है – कबीर की भाँति। कालिदास तुलसीदास की सामाजिक राजनीतिक नजरिये में बदलाव लाने का प्रयास करते हैं तो भवभूति कबीर की तरह। सड़े-गले मुल्यों एवं समयातीत सोच, परम्पराओं पर दोनों प्रहार करते हैं। स्त्री के लिए राज-समाज को प्रेरित करते हैं। वे व्यक्ति के सम्मान की योग्यता गुण को मानते हैं – जाति, लिंग, वय आदि को नहीं –

“न धर्मवृद्धेषु वयः समीक्षते” – कालिदास कुमारसंभव
“गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङग न च वयः।”
– भवभूति उत्तर चरित 251

ब्याहता स्त्री के परित्याग व प्रसंग शाकुन्तलम् नाटक में भी है और उत्तर रामचरित में भी। दोनों नाटकों में दोनों नाटककारों ने राज-समाज की ओछी मनोवृत्तियों पर टिप्पणी की है, किंतु कालिदास की टिप्पणी उतनी तीखी नहीं है जितनी भवभूति की है। निर्वासन के अनौचित्य पर जनक कहते हैं कि यह तो सीता और मेरा भी अपमान है, तो कुरूपत्नी अरुंधती अग्निपरीक्षा को ही अनुचित ठहराती है। वे सीता को वंदनीय चरित्र मानकर उसे अग्नि से ज्यादा पवित्र मानती हैं।

तरह-तरह से कवि ने रुढ़ियों को तोड़ने की कोशिश की है। जोखिम उठाया है। अपने को घर के भीतर और बाहर भी अवज्ञा का पात्र बनाया है। स्त्री और शूद्र वेद पढ़ने के अधिकारी हैं। आत्रेयी नाम की तापसी वेद पढ़ने के लिए वाल्मीकि आश्रम में अतिथियों के कारण स्वाध्याय में बाधा पड़ते देख अगस्त्य ऋषि के आश्रम में जाती है। ‘मालतीमाधव’ की कामंदकी देवरात के साथ न्याय विद्या पढ़ती थी। देवरात बाद में अपने पुत्र माधव को उसके पास विद्या अध्ययन के लिए भेजता है। इसी तरह जनक जी के वाल्मीकि आश्रम में आगमन पर मधुपर्क कराया जाता है और वशिष्ठ ऋषि के आने पर बेचारी बछिया मारी जाती है। आतिथ्य का यह विधान वहाँ के आश्रमवासी छात्रों को उचित नहीं लगता।
मालती-माधव के प्रेम की मान्यता, धर्म की विकृति के प्रतीक कापालिक अघोरघंट का वध, शम्बूकवध हृदयहीन रूढ़ व्यवस्था के प्रति जनक माता कौसल्या आदि के आक्रोश की अभिव्यंजना भवभूति को क्रांतिकारी कवि प्रमाणित करने के पर्याप्त प्रमाण हैं। उन्होंने रामायणी कथा में बहुत कुछ परिवर्तन करते हुए साहस का परिचय दिया है यह साहस चमत्कार या नवता के व्यामोह में पड़कर नहीं किया गया है, अपितु उनके मन के अंदर उमड़-घुमड़ रही वह विचार वाष्प है जो मानवीय संवेदना के विविध रूपो में नाटकीयता के अनुरूप बरस पड़ती है, फूट पड़ती है – ज्वालामुखी की तरह। अन्तर्दाह से दग्ध होता राम मन भवभूति का पीड़ा तापित मन लगता है, जो श्लोक में परिणत हो गया है, जो अपने राम को न जीने देता है न मरने –

दलति हृदयं गाढोद्वेगं द्विधा तु न मिद्यते
वहर्ति विकलः कायो मोहं न मुञ्जति चेतनाम् ।।
ज्वलयति तनुमन्तर्दाहः करोति न भस्मसात्।
प्रहरति विधिर्मर्मच्छेदी न कृन्तति जीवितम्।।
- उत्तर रामचरित

अर्थात सीता विरह में राम कहते हैं कि गाढ़ोद्वेग हृदय को दल-सा रहा है, तथापि वह दो भागों में फट नहीं रहा है। विकल काया बार-बार मूर्च्छित होकर भी चेतना छोड़ नहीं रही है, अर्थात मूर्च्छा की अवस्था में भी पीड़ा का अहसास चैन नहीं लेने देता। अन्तर्दाह शरीर को जलाकर भस्म नहीं बना रहा है, ताकि दाह से मुक्ति मिले। दैव ने मेरे मर्म पर प्रहार किया है, परन्तु जीवन को समाप्त नहीं किया है, ताकि वह भोगता रहे। त्रासदी के नाटककार शेक्सपियर से तुलना करते हुए डॉ. रामविलास शर्मा ने कहा है – “प्रसार-यथार्थ की विविधता मनोवैज्ञानिक सूझ-बूझ, चरित्र निर्माण की वास्तविकता – में यद्यपि शेक्सपियर आगे हैं, तथा गहराई – शोकानुभूति की तीव्रता, करुण रस ही नहीं, वात्सल्य आदि सुकुमार भावों की पराकाष्ठा – में भवभूति आगे हैं।”

– परम्परा का मूल्यांकन पृष्ठ 43

जैसे यथार्थ से साक्षात्कार प्रसाद भी करते हैं और निराला भी, परन्तु प्रसाद या प्रेमचन्द उस यथार्थ को प्रायः आदर्शोन्मुख बना देते हैं,जबकि निराला करुणोन्मुख वैसे ही कालिदास और भवभूति की काव्यानुभूति है। कालिदास दण्डकारण्य की सीताहरण घटना की स्मृति को रघुवंश में (14/25) सुखात्मक अनुभूति बना देते हैं तो भवभूति उत्तर रामचरित में चित्रदर्शन से उपजी स्मृति को दुखद। यह स्मृति लक्ष्मण को भी कचोटती है, तो राम को भी टीसती है। यह टीस “ते हि नो दिवसा गताः” - के रूप में राम मुख से प्रकट होती है। राम उसे भुला नहीं पाते। यह यथार्थ एक मुहावरा-सा बनकर संस्कृत में प्रचलित हो गया है।

सार्ववर्णिक वेद नाटक को भवभूति सर्वसंवेदना सहानुभूति से करुण बनाते हुए भावात्मक एवं शिल्प शैली के स्तर पर भी नई पम्परा का प्रवर्तन करते हैं। उनके तीनों नाटक विदूषकविहीन हैं। हास्यव्यंग्य पात्रहीन इन नाटकों में धार्मिक सामाजिक विडम्बना और विसंगति पर प्रहार या व्यंग्य संस्कृत का रूढ़ पात्र विदूषक राजा या नायक का मुँहलगा बनकर करता रहा है, हास्य के बहाने करता रहा है, किन्तु भवभूति के नाटकों में यह कार्य बच्चों और छात्रों से कराया गया है। लव और चन्द्रकेतु के बीच अश्वमेघ के घोड़े को रोक लेने के कारण जो संवाद हैं, वह सामंती व्यवस्था पर कड़ा प्रहार है। वासंती का सीधा-सीधा राग विषयक उपालम्भ भी इसके उदाहरण हैं। संभवतः भवभूति की करुणा ने गंभीरता के बीच विदूषकीय हल्कापन को टालने के लिए ऐसा किया हो।

भाषा और भाव दोनों स्तर पर भवभूति नाटकीय द्वन्द्व सृजन में निपुण हैं। एक ही श्लोक में अनेक विरोधी अनुरोधी भावों की व्यंजना जगह-जगह छूती है – बिहारी के दोहे की तरह। नाटकीय द्वन्द्व विधान के लिए कहीं रामायण की कथा में, कहीं भाषा में, रंगमंच की शैली में परिवर्तन किया गया है। डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी का मन्तव्य है कि “सामाजिक शक्तियों की द्वन्द्वात्मकता भवभूति के तीनों नाटकों की अन्तर्वस्तु कही जा सकती है।... महावीर चरित में राम कथा के क्षेत्रों में एक प्रवर्तक नाटक है। भवभूति ने साहस करके राम कथा के रंगमंचीय रूप का जो पैमाना बना दिया, उसका प्रतिरूप लेकर राजशेखर (बालरामायण), मुरारि (अनर्घराघव), जयदेव (प्रसन्नराघव) आदि ने रामायण की विषयवस्तु पर नाटक लिखे।”
– दूसरी पम्परा के नाटककार भवभूति पृष्ठ 13

भवभूति की तरह से अपनी प्रतिभा विभूति के द्वारा परम्परा की रेखाओं को मिटा मिटाये, उनके आगे नई परम्परा की रेखा खींचते हैं। “उन्होंने अपने शास्त्र ज्ञान और पाण्डित्य का खाद की तरह उपयोग करते हुए कविता की अपनी धरती पर उसके अपने दर्शन का पौधा रोपा और खड़ा किया।” (राधावल्लभ त्रिपाठी) कालिदास जो संस्कृत के कृतकृत्यता समृद्ध नाटककार हैं, अपने नाटकों में विवाहेतर प्रेम संबंध को प्रेम के आदर्श से, उसकी सामाजिकता से जोड़ा तो भवभूति ने वैवाहिक जीवन के प्रेम को आदर्श स्थिति का दर्शन रचा है। समन्वित जीवन का दर्शन। अद्वैत का दर्शन। अनन्यता का राग। तारामैत्रकम या चक्षुराग का गाढानुबंध कालिदास का तारामैत्रकम् शकुन्तला दुष्यन्त के प्रेम के रूप में उतनी ऊँचाई पर नहीं पहुँच पाता, जितनी ऊँचाई पर भवभूति के मालती-माधव का। एक के रम्यवीक्षण-श्रवण स्मृतिपटल को ही कुरेदकर चुक जाते हैं तो दूसरे के जोड़ते हैं, राग सूत्र में बाँधते हैं –

रम्याणि वीक्ष्य मधुरांश्च निशम्य शब्दान्
पर्युत्स्की भवति यत्सुखितोsपि जन्तुः।
तच्चनसा स्मरति नूनमबोधपूर्वं
भावस्थिराणि जननान्तर सौहृदानि।।
- कालिदास, शाकुन्तलम

व्यतिषजति पदार्थान्तरः कोsपि हेतु
ने खलु बहुरुपाधीन पर्तयः संश्रयन्ते।
विकसति हि पातङगस्योदये पुण्डरीकं
द्रवति य हिमरश्मावदगते चन्द्रकान्तः।।
- उत्तर रामचरित 6/12

“वेदान्त के ब्रह्म, बौद्धों के शून्य तथा मीमांसकों के अदृष्ट को भवभूति ने अपनी कविता में अन्ततः प्रेम तत्व के द्वारा विस्थापित कर दिया है। प्रेम का एक सर्वव्यापी सत्ता के रूप में उसकी अपार और अप्रत्याशित संभावनाओं के अनुभव के साथ वे जो निर्वचन देते हैं, वह किसी दर्शन के प्रस्थान में परम सत्ता का ही निर्वचन हो सकता है।”

प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, दूसरी परम्परा के नाटककार भवभूति पृष्ठ 25

‘उत्तररामचरितम्’ नाटक भवभूति के विलक्षण प्रतिभा वैभव का विलक्षण प्रसाद है। उनके वेद, उपनिषद, साँख्य आदि दर्शन, ज्ञान, लोक-लगाव और नाटक धर्म से सीधे जुड़ावों का मधु मिश्रण है। उनकी प्रतिभा प्रयोगधर्मी है। वह दर्शन-वर्णन, परम्परा और प्रयोग को नाटकीय अनुरोध की शर्त पर दूध-पानी की तरह घुलाती हैं। परम्परा के आगे नई रेखा खींचती है। पूर्व रंग, नान्दी, रस, भाषा, मंच विधान, कथा-विन्यास, प्रकृति चित्रण प्रेम अभिव्यंजना सभी स्तर पर कवि ने लीक से हटकर नई लीक बनाई है। वाल्मीकि की करुणा को परिपूर्णता दी है। राम भगवान से उतारकर महावीर रूप में अवतरित कराया है। प्रकृति के कोमल-कठोर, सुखद और त्रासद रूपों का एकत्र दर्शन कराकर जीवन के तिक्त, अम्ल-मधुर भावों का रस चरवाया है। लोकजीवन की सच्ची अनुभूति से नाटक को केवल मनोरंजन का माध्यम न बनाकर जागरण का हेतु भी बनाया है। संवेदनाशून्य शास्त्र और नपुंसक परिणामरहित करुणा – ‘आह-ओह’ को नकारा है। इस नकार का प्रतिफलन रामायण कथा के नव साक्षात्कार नाट्य रंग के विधान तथा भाव-भाषा में देखा जा सकता है। निश्चय ही कालिदास के बाद भवभूति संस्कृत की विलक्षण भूति हैं। भारतसावित्री की विभूति हैं। इस स्मरणीय विभूति को बारंबार प्रकट में संजोये रहेगी –

या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरुपेण संस्थिता
नमस्तस्मै नमस्तस्मै नमस्तस्मै नमोनमः।।
- दुर्गा सप्तशती
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0शोभाकांत झा
(लेखक हिंदी के ख्यात ललित निबंधकार हैं )

8/28/2006

यश मालवीय के पाँच गीत

.......................................
कोई चिनगारी तो उछले
.................................................
अपने भीतर आग भरो कुछ
जिस से यह मुद्रा तो बदले ।

इतने ऊँचे तापमान पर
शब्द ठुठुरते हैं तो कैसे,
शायद तुमने बाँध लिया है
ख़ुद को छायाओं के भय से,

इस स्याही पीते जंगल में
कोई चिनगारी तो उछले ।

तुम भूले संगीत स्वयं का
मिमियाते स्वर क्या कर पाते,
जिस सुरंग से गुजर रहे हो
उसमें चमगादड़ बतियाते,

ऐसी राम भैरवी छेड़ो
आ ही जायँ सबेरे उजले ।

तुमने चित्र उकेरे भी तो
सिर्फ़ लकीरें ही रह पायीं,
कोई अर्थ भला क्या देतीं
मन की बात नहीं कह पायीं,
रंग बिखेरो कोई रेखा
अर्थों से बच कर क्यों निकले ?
...............................................
गाँव से घर निकलना है
..............................................
कुछ न होगा तैश से
या सिर्फ़ तेवर से,
चल रही है, प्यास की
बातें समन्दर से ।

रोशनी के काफ़िले भी
भ्रम सिरजते हैं,
स्वर आगर ख़ामोश हो तो
और बजते हैं,

अब निकलना ही पड़ेगा,
गाँव से- घर से

एक सी शुभचिंतकों की
शक्ल लगती है,
रात सोती है
हमारी नींद जगती है,

जानिए तो सत्य
भीतर और बाहर से ।

जोहती है बाट आँखें
घाव बहता है,
हर कथानक आदमी की
बात कहता है,
किसलिए सिर भाटिए
दिन- रात पत्थर से ।
...............................................
फूल हैं हम हाशियों के
...............................................

चित्र हमने हैं उकेरे
आँधियों में भी दियों के,
हमें अनदेखा करो मत
फूल हैं हम हाशियों के ।

करो तो महसूस,
भीनी गंध है फैली हमारी,
हैं हमी में छुपे,
तुलसी – जायसी, मीरा – बिहारी,

हमें चेहरे छल न सकते
धर्म के या जातियों के ।

मंच का अस्तित्व हम से
हम भले नेपथ्य में हैं,
माथे की सलवटों सजते
ज़िंदगी के कथ्य में हैं,

धूप हैं मन की, हमीं हैं,
मेघ नीली बिजलियों के ।

सभ्यता के शिल्प में हैं
सरोकारों से सधे हैं,
कोख में कल की पलें हैं
डोर से सच की बँधे हैं,

इन्द्रधनु के रंग हैं,
हम रंग उड़ती तितलियों के ।

वर्णमाला में सजे हैं
क्षर न होंगे अग्नि-अक्षर,
एक हरियाली लिये हम
बोलते हैं मौन जल पर,

है सरोवर आँख में,
हम स्वप्न तिरती मछलियों के ।

.........................................
ऐसी हवा चले
...........................................

काश तुम्हारी टोपी उछले
ऐसी हवा चले,
धूल नहाएँ कपड़े उजले
ऐसी हवा चले ।

चाल हंस की क्या होगी
जब सब कुछ काला है,
अपने भीतर तुमने
काला कौवा पाला है,

कोई उस कौवे को कुचले
ऐसी हवा चले ।

सिंहासन बत्तीसी वाले
तेवर झूठे हैं,
नींद हुई चिथड़ा, आँखों से
सपने रुठे हैं,

सिंहासन- दुःशासन बदले
ऐसी हवा चले ।

राम भरोसे रह कर तुमने
यह क्या कर डाला,
शब्द उगाये सब के मुँह पर
लटका कर ताला,

चुप्पी भी शब्दों को उगले
ऐसी हवा चले ।

रोटी नहीं पेट में लेकिन
मुँह पर गाली है,
घर में सेंध लगाने की
आई दीवाली है,

रोटी मिले, रोशनी मचले
ऐसी हवा चले ।
.................................
उजियारे के कतरे

......................... ........

लोग कि अपने सिमटेपन में
बिखरे-बिखरे हैं,
राजमार्ग भी, पगडंडी से
ज्यादा संकरे हैं ।

हर उपसर्ग हाथ मलता है
प्रत्यय झूठे हैं,
पता नहीं हैं, औषधियों को
दर्द अनूठे हैं,

आँखें मलते हुए सबेरे
केवल अखरे हैं ।

पेड़ धुएं का लहराता है
अँधियारों जैसा,
है भविष्य भी बीते दिन के
गलियारों जैसा

आँखों निचुड़ रहे से
उजियारों के कतरे हैं ।

उन्हें उठाते
जो जग से उठ जाया करते हैं,
देख मज़ारों को हम
शीश झुकाया करते हैं,

सही बात कहने के सुख के
अपने ख़तरे हैं ।


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परिचय

जन्म- 18 जुलाई 1962 (कानपुर)
शिक्षा- स्नातक (इलाहाबाद से)
प्रकाशित संकलन-
गीत संग्रहः कहो सदाशिव, उड़ान से पहले, राग-बोध के 2 भाग
बाल काव्यः ताक-धिना-धिन
दोहा संग्रहः चिनगारी के बीज
पुरस्कारः
निराला सम्मान (उ.प्र.हिन्दी संस्थान)
बाल साहित्य पुरस्कार (उ.प्र. हिन्दी संस्थान)
अ.भा.युवा श्रेष्ठ कवि (मोदी कला भारती)

उमाकांत साहित्य की विभिन्न विधाओं में रचते रहते हैं । युवा गीतकारों में से एक अच्छे गीतकार के रूप में स्थान बनाते जा रहे हैं । आकाशवाणी व दूरदर्शन से निरंतर प्रसारित हो रहे हैं । स्व. श्री उमाकांत मालवीय के सुपुत्र होने का सौभाग्य ।

यश मालवीय
ए-111, मेंहदौरी कालोनी
इलाहाबाद, उत्तरप्रदेश

8/27/2006

उमाकांत मालवीय के लोकप्रिय गीत

यह अँजोरे पाख की एकादशी


यह अँजोरे पाख की एकादशी

दूध की धोयी, विलोयी-सी हँसी ।

गंधमाती हवा झुरुकी चैत की,

अलस रसभीनी युवा मद की थकी

लतर तरु की बाँह में,

चाँदनी की छाँह में

एक छवि मन में कहीं तिरछी फँसी

गोल लहरें, जुन्हाई अँगिया कसी ।



हर बटोही को टिकोरे टोंकते,

और टेसू, पथ अगोरे रोकते

कमल खिलते ताल में,

बसा कोई ख्याल में

चंद्रमा, श्रृंगार का ज्यों आरसी,

रात, जैसे प्यार के त्यौहार-सी ।



गुनगुनाती पाँत भँवरों की चली,

लाज से दुहरी हुई जाती कली

धना बैठी सोहती,

बाट प्रिय की जोहती

द्वार पर ज्यों सगुन बन्दनवार-सी

रस भिंगोयी सुघर द्वारा चार-सी ।

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झण्डे रह जायँगे, आदमी नहीं,


झण्डे रह जायँगे, आदमी नहीं,

इसलिए हमें सहेज लो, ममी, सही ।



जीवित का तिरस्कार, पुजें मक़बरे,

रीति यह तुम्हारी है, कौन क्या करे ।

ताजमहल, पितृपक्ष, श्राद्ध सिलसिले,

रस्म यह अभी नहीं, कभी थमी नहीं ।



शायद कल मानव की हों न सूरतें

शायद रह जाएँगी, हमी मूरतें ।

आदम के शकलों की यादगार हम,

इसलिए, हमें सहेज लो, डमी सही ।



पिरामिड, अजायबघर, शान हैं हमीं,

हमें देखभाल लो, नहीं ज़रा कमी ।

प्रतिनिधि हम गत-आगत दोनों के हैं,

पथरायी आँखों में है नमी कहीं ?

~*~*~*~*~*~*~*~



गुजर गया एक और दिन

गुजर गया एक और दिन

रोज की तरह ।



चुगली औ’ कोरी तारीफ़,

बस यही किया ।

जोड़े हैं काफिये-रदीफ़

कुछ नहीं किया ।

तौबा कर आज फिर हुई,

झूठ से सुलह ।



याद रहा महज नून-तेल,

और कुछ नहीं

अफसर के सामने दलेल,

नित्य क्रम यही

शब्द बचे, अर्थ खो गये,

ज्यों मिलन-विरह ।



रह गया न कोई अहसास

क्या बुरा-भला

छाँछ पर न कोई विश्वास

दूध का जला


कोल्हू की परिधि फाइलें

मेज की सतह ।



‘ठकुर सुहाती’ जुड़ी जमात,

यहाँ यह मजा ।

मुँहदेखी, यदि न करो बात

तो मिले सजा ।

सिर्फ बधिर, अंधे, गूँगों –

के लिए जगह ।



डरा नहीं, आये तूफान,

उमस क्या करुँ ?

बंधक हैं अहं स्वाभिमान,

घुटूँ औ’ मरूँ

चर्चाएँ नित अभाव की –

शाम औ’ सुबह।



केवल पुंसत्वहीन, क्रोध,

और बेबसी ।

अपनी सीमाओं का बोध

खोखली हँसी

झिड़क दिया बेवा माँ को

उफ्, बिलावजह ।

~*~*~*~*~*~*~*~



पल्लू की कोर दाब दाँत के तले


पल्लू की कोर दाब दाँत के तले

कनखी ने किये बहुत वायदे भले ।



कंगना की खनक

पड़ी हाथ हथकड़ी ।

पाँवों में रिमझिम की बेडियाँ पड़ी ।



सन्नाटे में बैरी बोल ये खले,

हर आहट पहरु बन गीत मन छले ।



नाजों में पले छैल सलोने पिया,

यूँ न हो अधीर,

तनिक धीर धर पिया ।



बँसवारी झुरमुट में साँझ दिन ढले,

आऊँगी मिलने में पिय दिया जले ।

~*~*~*~*~*~*~*~


एक चाय की चुस्की



एक चाय की चुस्की

एक कहकहा

अपना तो इतना सामान ही रहा ।



चुभन और दंशन

पैने यथार्थ के

पग-पग पर घेर रहे

प्रेत स्वार्थ के ।

भीतर ही भीतर

मैं बहुत ही दहा

किंतु कभी भूले से कुछ नहीं कहा ।



एक अदद गंध

एक टेक गीत की

बतरस भीगी संध्या

बातचीत की ।

इन्हीं के भरोसे क्या-क्या नहीं सहा

छू ली है एक नहीं सभी इन्तहा ।



एक कसम जीने की

ढेर उलझने

दोनों गर नहीं रहे

बात क्या बने ।

देखता रहा सब कुछ सामने ढहा

मगर किसी के कभी चरण नहीं गहा ।

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टहनी पर फूल जब खिला



टहनी पर फूल जब खिला

हमसे देखा नहीं गया ।



एक फूल निवेदित किया

गुलदस्ते के हिसाब में

पुस्तक में एक रख दिया

एक पत्र के जवाब में ।

शोख रंग उठे झिलमिला

हमसे देखा नहीं गया ।

प्रतिमा को

औ समाधि को

छिन भर विश्वास के लिये

एक फूल जूड़े को भी

गुनगुनी उसांस के लिये ।

आलिगुंजन गंध सिलसिला

हमसे देखा नहीं गया ।



एक फूल विसर्जित हुआ

मिथ्या सौंदर्य-बोध को

अचकन की शान के लिये

युग के कापुरुष क्रोध को

व्यंग टीस उठी तिलमिला ।

हमसे देखा नहीं गया ।

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8/22/2006

पं. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल नहीं रहे

पं. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल की स्मृतियों की गंध सदियों तक रहेगी

रायपुर, 20 अगस्त ।छत्तीसगढ़ विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष एवं साहित्यकार-चिंतक-समाजसेवी संस्कृति पुरुष पंडित राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल के असामयकि निधन के बाद आज वैभव प्रकाशन परिसर में छत्तीसगढ़ राष्ट्रभाषा प्रचार समिति तथा सृजन-सम्मान संस्था के द्वारा श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया । छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों ने पंडित शुक्ल को आधुनिक छत्तीसगढ़ का साहित्य-संस्कृति का निर्माता बताया । ज्ञातव्य हो कि श्री शुक्ल का 20 अगस्त को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया ।

प्रारंभ में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के सचिव डॉ. सुधीर शर्मा ने पं. शुक्ल का विस्तृत जीवन करिचय दिया । समिति के कार्यकारी अध्यक्ष श्री गिरीश पंकज ने भावविभोर ह&