4/16/2007

सम्मोहित करने वाली आवाज




महान साहित्यकार-पत्रकार कमलेश्वर जी की अब स्मृति शेष है। उनसे मेरी पहली मुलाकात ‘गंगा’ के कार्यालय में हुई थी। तब मैंने उनसे साहित्य-संस्कृति और मीडिया के बदलते तेवर पर कुछ बातें की थी। इस साक्षात्कार को मैंने ‘नवभारत’ में प्रकाशित भी किया था। साक्षात्कार की कटिंग भेजने के बाद कमलेश्वर जी का बड़ा प्यारा-सा खत आया था। उन्होंने साक्षात्कार की भाषा एवं उसकी प्रस्तुति की प्रशंसा करते हुए कहा था कि “जैसा मैंने कहा, तुमने बिल्कुल वैसा ही लिखा । वरना कई बार साक्षात्कार कुछ और बातें कह जाते है।” फिर उन्होंने साम्प्रदायिकता पर चिंता व्यक्त करते हुए लिखा था कि “लेखकों को आगे आना होगा।” कुछ समय के बाद कमलेश्वर जी रायपुर आए । तब मैंने ‘दूरदर्शन’ रायपुर के लिए उनसे बातचीत की । यह डेढ़ दशक पहले की बात है इतनी बड़ी शख्तियत से विजुअल मीडिया के लिए साक्षात्कार लेना था। भीतर से डरा हुआ था। मैंने कमलेश्वर जी से अनुरोध किया था कि मेरे पास बहुत अधिक प्रश्न नहीं हैं इसलिए आपसे आग्रह है कि आप मेरे प्रश्नों के लम्बे उत्तर दें ताकि आधे घंटे की बातचीत हो जाए। कमलेश्वर जी ने मुसकराते हुए मेरा कंधा थपथपाया और कहा “चिंता मत करो। जैसा चाहते हो, वैसा होगा।” कमलेश्वर जी के स्पर्श में पता नहीं क्या जादू था कि मैंने पूरे आत्मविश्वास के साथ उनसे बातचीत की। आज मैं सोचता हूं तो अभिभूत हो जाता हूँ कि एक बड़े लेखक ने नए लेखक को किस आत्मीयता के साथ प्रोत्साहित किया था। अब ऐसे लोग दुर्लभ हो गए हैं।

कमलेश्वर की एक कहानी बड़ी मशहूर हुई है-‘दिल्ली में एक मौत’। वर्षों पहले लिखी गई यह कहानी आज भी ताजा लगती है । महानगरीय व्यस्तताओं के चलते आदमी की संवेदनाएं मरती जा रही हैं। यंत्र सरीखा हो गया है आदमी । कोई मरे या जिए कोई खास सरोकार नहीं । बस रस्म अदायगी करनी है। कमलेश्वर की एक यही कहानी उन्हें अमर करने के लिए पर्याप्त है।

कमलेश्वर की कहानियों का दृश्य बंध पाठकों को जैसे दर्शक में तब्दील कर देता है । उनकी सारी कहानियाँ सामने घटती हुई घटना लगती हैं । चाहे वह मानवीय संबंधों की कहानियाँ हों चाहे अन्य विषयों पर केन्द्रित, हर कहानी दृश्य में तब्दील होती चली जाती है । वे अपनी इस विशेषता को जानते थे इसीलिए उन्होंने अपनी इस प्रतिभा का टीवी और फिल्मी दुनिया में भरपूर इस्तेमाल किया । सौ से ज्यादा फिल्में लिखने वाले वे हिंदी के इकलौते साहित्यकार थे ।

कमलेश्वर जब ‘सारिका’ का संपादन कर रहे थे, तब हम लोग बड़ी बेसब्री से ‘सारिका’ की प्रतीक्षा करते थे। साहित्य के केन्द्र में ‘आम आदमी’ की चर्चा और उसे आंदोलन में तब्दील करने वाले कमलेश्वर ही थे। उनके संपादक में ‘सारिका’ साहित्यकारों की पहली पसंद बन चुकी था । लेकीन कमलेश्वर जी कहीं टिक कर नहीं बैठे । वैचारिक मतभेद भी इसके कारण थे। समझौता परस्त अफसरनुमा लेखक नहीं थे कि तमाम अपमानों के बावजूद नौकरी करते रहें। वे तो स्वतंत्रचेता रचनाकार थे। इसलिए जब कभी उन्हें महसूस हुआ कि यहाँ बंधन कुछ ज्यादा कसा जा रहा है, तो वे हाथ जोड़कर विदा हो जाते थे । आर्थिक संकट की परवाह ही नहीं करते थे । वे छोटे कद के बड़े लेखक थे । उन्हें अपना हुनर पता था । उनमें लेखन-प्रतिभा कूट-कूट कर भरी हुई थी इसलिए फाकामस्ती की नौबत नहीं आने पाती थी ।

कमलेश्वर साहित्य और पत्रकारिता के बीच संतुलन बनाए रखने वाले लेखक थे । उनेक लिए दोनों विधाएं अछूती नहीं थी । दो साल पहले भिलाई में ‘बहुमत’ के कार्यक्रम में पधारे थे । तब साहित्य और पत्रकारिता के अंतर्संबंधों पर एक विचार गोष्ठी हुई थी । इसका संचालन मुझे ही करना था । मैंने यह कहा था कि आजादी के दौर में साहित्य और पत्रकारिता एक ही सिक्के के दो अलग-अलग पहलू हुआ करते थे। कमलेश्वर जी ने मेरी बातों का समर्थन करते हुए कहा था कि यह सचमुच दुर्भाग्यजनक बात है कि आजकल के पत्रकार साहित्य से दूर भागते हैं जबकि साहित्य उनकी पत्रकारिता की धार को और ज्यादा पैना कर सकती है । उन्होंने यह भी कही था कि पत्रकारिता में आने वाले पत्रकार को अगर पत्रकारिता के क्षेत्र में सफल होना है तो उसे समकालीन साहित्य का भी अध्ययन करना चाहिए ।

कमलेश्वर की आवाज में जादू था । जैसा उनकी लेखनी में है । वे कहानियाँ लिखें, कोई कार्यक्रम प्रस्तुत करें या व्याख्यान दें, लोग उनकी गुरु गंभीर कड़क आवाज सुनकर मंत्रमुग्ध हो जाते थे । इसलिए एक-दो बार ऐसा भी हुआ कि साहित्यिक आयोजकों ने निमंत्रण नहीं भेजा तो भी कमलेश्वर जी को सुनने हम लोग पहूँच जाया करते थे और बहुत कुछ सीखकर ही लौटते थे ।

कमलेश्वर नए लोगों को प्रोत्साहित करने से पीछे नहीं रहते थे । बड़े लेखक थे लेकिन नए लेखकों से मिलकर उन्हें खुशी होती थी । भोपाल के भाई राजुरकर राज के दुष्यंतकुमार स्मृति संग्रहालय के लिए उन्होंने पूरा सहयोग किया । संग्रहालय के बारे में लिखा भी । फिर संग्रहालय के संरक्षक भी बन गए । भोपाल से मिलने वाले आयोजन के लिए हरदम तैयार रहते थे । इसी बहाने भोपाल जाना तो होगा । महान साहित्यकार दुष्यंतकुमार उनके समधी थे । समधी से पहले अंतरंग दोस्त थे । दुष्यंतकुमार को राष्ट्रव्यापी लोकप्रियता दिलाने के पीछे ‘सारिका’ और कमलेश्वर के यागदान को भुलाया नहीं जा सकता । उस दौर में ‘सारिका’ में छपना मतलब रचनाकार होने का प्रमाण हुआ करता था । कमलेश्वर ने हिन्दी के अनेक लेखकों की कहानी पहली बार छापी और वे लोग स्थापित लेखक बन गए । कमलेश्वर जी ने अखबारो के लिए लिखा । खूब लिखा । कुछ अखबारों में काम भी किया । लेकिन उनकी खुद्दारी ने उन्हें एक जगह टिकने ही नहीं दिया । मीडिया से जुड़े़ सारे लोगों को पता है कि कैसे किसी बात पर विवाद होने पर कमलेश्वर ने एक समाचार पत्र के प्रबंधन को अंगूठा दिखा दिया और अपने अनेक साथियों के साथ अखबार के साथ विदा ले ली । कमलेश्वर के साथ अखबार छोड़ने वाले पत्रकारों ने रत्ती भर न सोचा कि हमारा क्या होगा ।

दरअसल सच्चे कबीरी तेवर के साथ जोने वाले कमलेश्वर उर्फ कमलेश्वर वैचारिक किस्म की युवा पीढ़ी को अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम थे । उनकी कहानियों और फिल्मों ने पूरे देश का ध्यान केन्द्रित किया । ‘चन्द्रकांता संतति’ ने तो कमाल ही कर दिया था । ‘आंधी’ की सफलता जग-जाहिर है । एक कार्यक्रम में जब कमलेश्वर ने इंदिरा गांधी को अपना परिचय दिया कि “आपने ‘आंधी’ देखी है । मैं उसी कृति का लेखक हूँ ।” तब इंदिरा जी ने मुस्कराते हुए कहा था - “मैं आपको जानती हूँ ।”

‘अखबार में छपने वाले उनके स्तंभों’ को पढ़कर समझ में आता था कि उन्होंने कितनी गहराई के साथ लेख लिखा है । लेख के संदर्भों आदि से यह बात भी प्रमाणित होती थी कि किसी भी लेख को लिखने से पहले वे कितना गहन अध्ययन करते थे । उनकी कलम बेबाकी के साथ चलती थी । उनके लिखे को मालिक जी भी नहीं काट सकता था । अब कमलेश्वर नहीं है । साहित्य और पत्रकारिता के संगम में डुबकी लगाने वाला सच्चा लेखक चला गया । डेढ़ साल पहले जब छिहत्तर वर्ष की आयु में निर्मल वर्मा की मृत्यु हुई थी तब कमलेश्वर ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि यह भी कोई जाने की उम्र है । अब जब पचहत्तर वर्ष में खुद कमलेश्वर जी चले गए तो उनका ही कथन दुहराना पड़ता है कि यह भी कोई उम्र थी उनके जाने की । ‘कितने पाकिस्तान’ जैसा उपन्यास लिखने वाले कमलेश्वर के जाने से पत्रकारिता और साहित्य का आँगन सूना-सूना-सा लग रहा है । लेकिन एक बात का संतोष है कि वे हमारे बीच अपनी तमाम कृतियों के कारण सदैव जीवित रहेंगे ।

उनकी भारी-भरकम मगर सम्मोहित करने वाली आवाज वर्षों तक अनुगुंजित होती रहेगी । उनकी कालजयी कहानियाँ भी उनके होने का अहसास कराती रहेंगी । और जब-जब उनकी लिखी गई फिल्में चैनलों के माध्यम से विराट दर्शक वर्ग तक पहुँचेगी तो भी उनकी मौजूदगी को हम लोग शिद्दत के साथ महसूस करेंगे ।


गिरीश पंकज

जी-31, नया पंचशील नगर, रायपुर (छ.ग)

3 टिप्‍पणियां:

Srijan Shilpi ने कहा…

गिरीश पंकज जी, आपने बहुत सुन्दर शब्दों में कमलेश्वर जी को श्रद्धांजलि देते हुए साहित्य, पत्रकारिता और फिल्म आदि विधाओं में उनके अमूल्य अवदान को सराहा है। साधुवाद!

प्रियंकर ने कहा…

आपकी श्रद्धांजलि सच में श्रद्धा से ओतप्रोत सच्ची श्रद्धांजलि है . गिरिश भाई! आपसे जयपुर के प्रेस क्लब में हुए लघु पत्रिकाओं के सम्पादकों के राष्ट्रीय सम्मेलन में मुलाकात की कुछ उलझी हुई यादें हैं दिमाग में. अगर मेरी स्मृति धोखा नहीं दे रही है तो .

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

श्रद्धा का प्रतीक है आप का लेख..और यही है सच्ची श्रद्धांजलि.

नमन.