8/07/2007

इंटरनेट पर छत्तीसगढ़ी तलाशते हुए

डॉ. सुधीर शर्मा
संपादक,

साहित्य वैभव
रायपुर, छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ी का सामर्थ्य अब अंतरजाल पर भी बोलने लगा है । यह बात अलग है कि वहाँ वह शैशवकाल में है परंतु चंद माह में ही उसकी विश्वसनीय व्याप्ति से मन को तोष मिलता है । एक विश्वास जागता है कि अब वह मुद्रित कागजों को लांघकर वेब-पृष्ठों पर भी अपनी छवि बिखेरने लगी है । यानी वह भी हिंदी के साथ-साथ अन्य संघर्षशील भाषाओं की तरह नये ज़माने की प्रौद्योगिकी - इंटरनेट के साथ चलना शुरू कर चुकी है । कहते हैं प्रौद्योगिकी के साथ जो तालमेल नहीं बैठा पाता वह पिछड़ जाता है । भाषाओं के मायने में भी इसे सच होते हम देखते रहे हैं । छत्तीसगढ़ी वैसे भी देवनागरी लिपि में लिखी-पढ़ी जाती है सो उसे भी हिंदी भाषा की तरह अंतरजाल पर स्वयं को प्रतिष्ठित करने मे कोई दिक्कत नहीं हुई और देखते ही देखते वह वेब-पृष्ठों पर अपनी आमद दर्ज करा चुकी है ।

छत्तीसगढ़ी भाषा के आलोचक छत्तीसगढ़ी के सामर्थ्य को लेकर अक्सर बतंगड बनाते हैं । कोहराम मचा देते हैं । एकबारगी जाने-गुने बिना उसे मनगढंत असमर्थता की परिधि में रखने लगते हैं । ऐसे ही एक दिन मैंने किसी भाषायी कार्यशाला के दरमिया सुना - कोई सज्जन बखाने जा रहे थे – कि और तो और छ्त्तीसगढ़ी के एक भी शब्द इंटरनेट पर नहीं है । कितने पिछड़ी है छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ़िया । मैंने इसकी सच्चाई जानने की जब प्रायोगिक कोशिश की और तब जो तथ्य सामने आया उससे लगा कि वे या तो लफ्फाजी कर रहे थे या फिर स्वयं को उन्नत भाषा व तकनीक में पांरगत सिद्ध करने और साथ ही छत्तीसगढी को हतोत्साहित करने के लिए बेइमानी कर रहे थे ।

बहरहाल हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फारसी क्या ? आप ही देखिए लीजिए कभी अपने कंप्यूटर के पास बैठकर और विश्वजाल खोलकर । भले ही विलंब से पर 16 दिसम्बर 2006 से छत्तीसगढ़ी का पहला पूर्ण वेबसाइट भी आ चुका है । नाम है उसका – www.lokakshar.com । विश्व की पहली छत्तीसगढी वेबसाइट लोकाक्षर डॉट कॉम पूर्णतः साहित्यिक पत्रिका है । जिन्हें प्रिंट माध्यम में छत्तीसगढी में प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका – छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर - का सूचना है वे भली-भाँति उसके संपादक श्री नंदकिशोर तिवारी को भी जानते हैं । अब तक इस त्रैमासिक पत्रिका की सामग्री छत्तीसगढ़ी के साहित्य प्रेमियों तक ही नियमित पहुँचती थी किन्तु श्री तिवारी के उद्यम से अब इसे संपूर्ण विश्व में फैले छ्तीसगढ़िया पाठक नियमित पढ़ रहे हैं । संपूर्णतः छत्तीसगढ़ी में इस एकमात्र और पहली वेबसाइट बनाने वाले युवा ललित निबंधकार जयप्रकाश मानस अब एक जबाब भी हैं कि छत्तीसगढिया भी नयी प्रौद्यगिकी को लेकर सतर्क है, प्रगतिशील है । यदि ऐसा नहीं होता तो उनका 13-14 वर्षीय किशोर पुत्र प्रशांत रथ लोकाक्षर को नेट पर नहीं ला पाता ।

इस वेबसाइट में कविता, कहानी, निबंध, पुस्तक समीक्षा, सांस्कृतिक समाचार आदि पठनीय है । यहाँ छत्तीसगढ़ी के वरिष्ठ गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया, ड़ॉ. विमल कुमार पाठक, डॉ. प्रभंजन शास्त्री, गेंदराम सागर, कृष्ण कुमार भारतीय, संतोष कुमार कश्यप, एस. चन्द्रसेन, अशोक नारायण बंजारा, राघवेन्द्र अग्रवाल, रामफल यादव, रघुवीर अग्रवाल, ठाकुर जीवन सिंह की कविताएं ऑनलाइन उपलब्ध हैं । कहानीकार जो छत्तीसगढ़ी कहानी को सतत् अपनी उर्जा से विकसित कर रहे हैं उनमें यहाँ श्यामलाल चतुर्वेदी, रामलाल निषाद, मंगत रवीन्द्र, भावसिंह हिरवानी, सुशील भोले, सुभदा मिश्र, डॉ. नलिनी श्रीवास्तव, निशीथ पांडेय की विविध कथानकों पर लिखी कहानियाँ पाठकों को बाँधने में समर्थ हैं । यहाँ दुर्गाप्रसाद पारकर और कस्तुरी दिनेश के व्यंग्यों का आनंद भी लिया जा सकता है ।

यहाँ छत्तीसगढी विमर्श को बढावा देने वाले महत्वपूर्ण आलेख भी हैं जिनमें खास हैं- संपादकीय आलेख -छत्तीसगढ़ी भासा : उपेक्छा अउ अपेक्छा - नंदकिशोर तिवारी आलेख/निबंध छत्तीसगढ़ म आधुनिक हिन्दी कहानी के प्रवर्तक बाबू मावली प्रसाद श्रीवास्तव - डॉ. धनंजय वर्मा, छत्तीसगढ़िया मुक्ति - परिमल शुक्ल, डॉ. रामलाल कश्यप के जनप्रिय नाटक श्रीकृष्णार्जुन युद्ध - विद्या भूषण मिश्र, यात्रा-संस्मरन मोर विदेस यात्रा - रामसनेही पांडेय भाषा विमर्स - राज भासा छत्तीसगढ़ी : हमर सपना - रामनाथ साहू, अनिवर्चनीय मिठास हवय छत्तीसगढ़ी भासा म - डॉ.जगमोहन मिश्र, मातृभाषा के महत्ता के कोनो जोड़ नइये - जागेश्वर प्रसाद, छत्तीसगढ़ी विमर्स के विचारनीय बिन्दु - डॉ. हेमचन्द्र पाण्डेय, अपन भासा अपनेच हो थे - प्रो. बांके बिहारी शुक्ल, इंटरनेट -दुनिया भर म बगरे लगे हे छत्तीसगढ़ी साहित्य - राम पटवा, छत्तीसगढ़ के संस्कृति अउ लोक गीदा पंथी - अनिल जांगड़े 'गौंतरिहा', “चतुरा चोर” - मेथ्यू जहानी ‘जर्जर’, विविध- भरथरी के बहाना म - हरिठाकुर, छत्तीसगढ़ के तंत्र पीठ: सिवरीनरायन - प्रो. बांके बिहारी शुक्ल आदि ।

लोकाक्षर डॉट कॉम में छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के वरिष्ठ एवं विद्वान रचनाकार हरिठाकुर का एक साक्षात्कार भी प्रकाशित है जो बहुत पहले लिया गया था । यह साइट केवल छत्तीसगढ या छत्तीसगढी प्रिय पाठकों द्वारा ही देखी-पढ़ी नहीं जाती । इसकी लोकप्रियता का प्रमाण हमें तब पता चला जब हमने वेबपृष्ठ पर एक जगह पढ़ी जिसमें पीटर नामक कोई विदेशी पाठक एक साइट संपादक से पूछ रहा है - छत्तीसगढ़ी आपकी मादरी ज़बान है ? वेब पै छत्तीसगढ़ी में लिखी कहानियाँ मिल सकती हैं कहीं ? मैं पढ़ना चाहूँगा । तब उत्तरदाता बता रहा है – आप www.lokakshar.com पर लॉगऑन करलें बस । यह साइट दो ही अंक में कनाड़ा, युके, अमेरिका, युगांडा, बेल्जियम क्रोटिया जर्मनी, संयुक्त राज अमीरात, नीदरलैंड, पाकिस्तान, जापान, स्वीट्जरलैंड, फ्रांस आदि के पाठकों तक पहुँच चुकी है ।

सर्फिंग और तलाश जारी रखते हुए जरा आगे बढ़ें तो हमें मिलता है http://jrsoni.blogspot.com/ नामक जाल स्थल । यह ब्लॉग पर निर्मित है । यहाँ डॉ. जे. आर. सोनी द्वारा लिखित छत्तीसगढी उपन्यास – चंद्रकला पूरी तरह मौजूद है । यह अब छत्तीसगढी का पहला ऑनलाइन उपन्यास बन चुका है । सृजन-सम्मान नामक सांस्कृतिक संस्था द्वारा संचालित - अंतरजाल पर हिंदी और छत्तीसगढ़ी की प्रतिष्ठा अभियान – पर आस्था रखें तो आने वाले दिनों में हम छत्तीसगढ़ी में लिखी कई किताबों को ऑनलाइन पढ़ सकते हैं ।

छत्तीसगढ़ - छत्तीसगढ़ी – छत्तीसगढ़िया नामक जाल स्थल पहुँचेंगे तो आपको प्रख्यात भाषाविद् डॉ. चितरंजन कर और मेरे द्वारा लिखी किताब – छत्तीसगढी कैसे सीखें नामक किताब पढ़ने को मिलेगी । इसका पता है -(http://chhattisgarhi.blogspot.com/ इस साइट के माध्यम से विश्व में कहीं से भी हिंदी भाषा के ज्ञान के सहारे छत्तीसगढी बोलना एक माह में सीखा जा सकता है ।

धैर्य पूर्वक आप सर्फिग करेंगे तो आपको इस दौरान http://mahanadii.blogspot.com/ नामक एक ब्लॉग मिलेगा । यह छत्तीसगढ़ी रचना संसार का स्थल होगा जहाँ छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य और संस्कृति पर केन्द्रित आलेख, कविता, निबंध और समीक्षा प्रकाशित हुआ करेगी । यह ऐसा मंच होगा जहाँ सभी लोकानुरागी व्यक्ति अपना विचार, मंतव्य आपस में बाँट सकेंगे । वे हर कोई जो छत्तीसगढ़ी को आगे ले जाना चाहते हैं यहाँ अपने स्वागत में हमें पायेंगे । यह भाषा और साहित्य का सहकारी मंच है जहाँ आप हमारे बारे में निःसंकोच अपनी बात रख सकते हैं । महानदी हमारी सबसे प्यारी नदी है । इसकी अनवरत धारा को प्रणाम करते हुए हमने इसका नाम महानदी रखा है । भविष्य में यहाँ ढ़ेर सारी छत्तीसगढ़ी सामग्री पढ़ने को हम पाठकों को मिलेगी ।

जो छत्तीसगढ़ी के रचनाकारों की जानकारी सरसरी नज़र से पढ़ना चाहते हैं उन्हें ज्यादा कोशिश नहीं करनी होगी । चाहे आप भक्तिकालीन साहित्यकारों के बारे में जानना चाहते हैं या फिर वर्तमान के सकिय रचनाकारों के बारे में । सामग्री को विधावार रखा गया है जो नेट पाठकों के लिए भी पढने में सरल है । आप बस किसी भी सर्च इंजन में हिंदी में टाइप कर दीजिए - छत्तीसगढ़ी के रचनाकार । आपके सामने कई साइट की सूची दिखाई देंगी । वस्तुत सभी में एक ही सामग्री है । महत्वपूर्ण और शोध आलेख होने के कारण इसे दुनिया की कई साइट संपादकों ने अपने वेबसाइट में अविकल रखा है । इसमें इंटरनेट विश्वकोश- विकिपीडिया सबसे प्रमुख है । वैसे यह हिंदी वेब विशेषज्ञ जय प्रकाश मानस का मूल लेख है । जो रखा गया है – srijansamman नामक जाल स्थल में । छत्तीसगढी में वेब-पत्रकारिता की शुरूआत www.srijangatha.com से मानी जानी चाहिए जो साहित्य, भाषा, संस्कृति की ऑनलाइन मासिक पत्रिका है । यह छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों को वैश्विक प्रतिष्ठा दिलाने के लिए लगभग एक साल से सचांलित है । यहाँ लोक-आलोक नामक स्तम्भ में नंदकिशोर शुक्ल का भारतेन्दु हरिश्चन्द और ‘निज भाषा’ छत्तीसगढ़ी और सुरेश पर्वद का छत्तीसगढ़ी विवाह और लोकगीत नामक लेख भी है जो छत्तीसगढी भाषा में नहीं किन्तु छत्तीसगढी भाषा की पहुँच और उसकी संस्कृति की मूल बातों से परिचय कराते हैं । लोक-आलोक में मूलतः छत्तीसगढी संस्कृति को व्याख्यायित और प्रसारित करने के लिए डॉ. तृषा शर्मा का स्तंभ भी दिया जा रहा है।

मुझे इतिहास पर भी खास रूचि है सो सर्फिंग करते-करते मेरे मन में प्रश्न उभरा कि छत्तीसगढी या छत्तीसगढ़ के इतिहास पर कुछ है या नहीं । ऐसे में मेरे सामने भारत सरकार का एक वेबसाइट दिखा –
पता है उसका - http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/chgr0045.htm
भाषा साहित्य पर और साहित्य भाषा पर अवलंबित होते है। इसीलिये भाषा और साहित्य साथ-साथ पनपते है। परन्तु हम देखते है कि छत्तीसगढ़ी लिखित साहित्य के विकास अतीत में स्पष्ट रुप में नहीं हुई है। अनेक लेखकों का मत है कि इसका कारण यह है कि अतीत में यहाँ के लेखकों ने संस्कृत भाषा को लेखन का माध्यम बनाया और छत्तीसगढ़ी के प्रति ज़रा उदासीन रहे। इसीलिए छत्तीसगढ़ी भाषा में जो साहित्य रचा गया, वह करीब एक हज़ार साल से हुआ है। इस वेबसाइट में छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य के इतिहास के इस एक हजार वर्ष को साहित्यिक प्रवृत्तियों के अनुसार 3 खंडों में विभाजित किया गया है कि (१) गाथा युग सन् 1000 से 1500 ई. तक (२) भक्ति युग - मध्य काल सन् 1500 से 1900 ई. तक (३) आधुनिक युग सन् 1900 से आज तक
भारत सरकार में बैठे सांस्कृतिक प्रतिनिधियों को धन्यवाद देना होगा कि विभिन्न राज्यों की सांस्कृतिक विरासतों और अस्मिताओं की जानकारियों को संपूर्ण विश्व तक पहुँचाने के लिए इस विशाल और व्यापक जाल-स्थल का संचालन का गुरूत्तर भार स्वीकार किया है । राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ी और उसकी संस्कृति पर क्या राज्य के सांस्कृतिक कर्मों के लिए उत्तरदायी सरकारी संगठनों को इस जाल-स्थल से सीख लेनी चाहिए । पर किसे फूर्सत पड़ी है । बहरहाल..... यहाँ आप छत्तीसगढ़ का इतिहास, भौगोलिक स्थिति, राज्य का पौराणिक और ऐतिहासिक संदर्भ को बड़ी रोचकता के साथ पढ़ सकते हैं । स्वाधीनता संग्राम में छत्तीसगढ़ का योगदान नामक आलेख यद्यपि संपूर्ण नहीं है किन्तु पं. सुंदरलाल शर्मा सहित 7 सेनानियों पर प्रकाश डाला गया है ।
जब तक छत्तीसगढ़ के लोकगीतों और लोकनृत्यों की चर्चा न की जाए सच मानिए तो छत्तीसगढ़ी भाषा की अस्मिता का मर्म भी व्याख्यायित नहीं हो पाता । मन खुश हो उठता है कि यहाँ अनेक लोकगीत को तवज्जो दिया गया है । चाहें तो आप आडियो फारमेट में इन गीतों का सस्वर रस भी ले सकते हैं । भरथरी जैसे विश्व प्रसिद्द लोकगाथा के बारे में भी पर्याप्त जानकारी हैं यहाँ । इसके अलावा यहाँ छत्तीसगढ़ी लोककथाओं, लोकवाद्यो, हाना, लोक उत्सवों, लोक खेलों, लोक आभूषणों, लोक जनजातियों आदि पर व्यापक सामग्री उपलब्ध है ।
यह सच है कि अंतरजाल पर किसी भाषा और संस्कृति की वैश्विक प्रतिष्टा के लिए सरकारी अभिरूचि और सदिच्छा लगभग शून्य है । पश्चिम देशों की भाषा की समृद्धि के पीछे उनका प्रौद्योगिकी के साथ पूर्णतः तालमेल भी है । आप किसी भी विदेशी भाषा और उसके व्यापक संदर्भों पर अद्यतन जानकारी और संदर्भ जब चाहें उनके वेबसाइटों पर देख-पढ़ सकते हैं पर भारतीय सोच के अनुसार यह अभी भारत में संभव नहीं हो सका है । छत्तीसगढ़ी जैसी लोकभाषा की बात छोडिए हिंदी की ही स्थिति को देखेंगे तो अपनी कमजोरियां हमारा मुँह चिढ़ाने लगती हैं । आप भी विश्व की बड़ी भाषा होने के बावजूद इंटरनेट पर उनकी व्याप्ति बहुत पीछे है । हिंदी और लोकभाषाओं को इंटरनेट पर व्यापक उपस्थिति का मतलब अंग्रेजी की सुरसा गति पर रोक भी है । व्यक्तिगत प्रयासों से ही इस दिशा में सफलता अर्जित की जा सकती है । व्यक्तिगत प्रयास की बात चल निकली है तो उस वेब-स्थल का भी जिक्र लाजिमी होगा जिसे छत्तीसगढ के एक पत्रकार दिल्ली से संचालित कर रहे हैं । यह सीजीनेट डॉट इन इसका पता ठिकाना है । वस्तृतः यह हिंदी का साइट है और ग्रामीण पत्रकारिता को गति देने के लिए संचालित है पर छत्तीसगढी में भी कुछ जानकारियाँ, विचारोत्तेजक लेख, घटनाओं पर टिप्पणियाँ यहाँ पढ़ने को मिल सकती हैं ।
गूगल पर हिंदी में – छत्तीसगढ़ी – शब्द लिखकर सर्च करते वक्त एक रोचक तथ्य भी मिलता है । जानते हैं कहाँ ? बीबीसी हिंदी नामक विश्व प्रसिद्ध समाचार केंद्रित जाल स्थल पर । यहाँ छत्तीसगढ़िया-ग़ैर छत्तीसगढ़िया नामक एक रिपोर्टिंग है । इसमें लिखा गया है कि पचास प्रतिशत के लगभग पिछड़ी जाति, 32 प्रतिशत आदिवासियों और 14 अनुसूचित जाति वाले प्रदेश में राज्य बनने के बाद से छत्तीसगढ़िया-ग़ैर छत्तीसगढ़िया का मामला भी ख़ूब उछाला गया और इन चुनावों में इसका ख़ासा असर भी देखा जा रहा है । छत्तीसगढ़ी को राजभाषा को दर्जा दिया जाना भी एक बड़ा चुनावी मुद्दा है । अब यह अलग बात है कि अब तक जितनी भी दलों ने छत्तीसगढियों पर राज किया है किसी ने भी इसे याद नहीं रखा । क्या बीबीसी वालों का यह आंकलन झूठा है या ये सत्ताधारी का वादा और छत्तीसगढ़ी प्रेम । वैसे छत्तीसगढ़ सरकार भी nic के सहयोग से राज्य सरकार की दो-दो जाल-स्थल संचालित कर रही है । http://cg.gov.in/ और www.chhattisgarh.gov.in नाम से । कहने को राज्य का प्रौद्योगिकी प्रमुख को सूचना तकनीकी को विकसित करने के लिए पुरस्कार मिलने का अबाध सिलसिला जारी है पर आश्चर्य होता है कि राज्य सरकार का एक भी ऐसा साइट नहीं है जहाँ छत्तीसगढ़ी में कुछ हो । आप थोड़े ना बिहार, उत्तरप्रदेश या उड़ीसा या बंगाल के निवासी हैं जहाँ की सरकारें भी उनकी मातृभाषाओं में असंख्य पेज अंतरजाल पर रख चुकी हैं जिसका बाकायदा आप लाभ उठा सकते हैं । चाहे लंदन में रहें या वेस्टइंड़ीज में । भाषाओं को विकसित और व्यापक बनाने के कार्य के बारे में अक्सर यही कहा जाता है कि यह कार्य राज्य की विश्वविद्यालयों का है । ठीक भी है । पर जहाँ (छत्तीसगढ़ में) 7-7 विश्वविद्यालयों के लिए जब एक भी छत्तीसगढ़ी भाषी कुलपति के लायक योग्य नज़र नहीं आता, वहाँ छत्तीसगढ़ी भाषा का साइट कैसे बन सकता है । जय हो मोर छत्तीसगढ़ भूईंया ।
महानदी छत्तीसगढ़ी सबसे प्यारी नदी है । इसी नाम से एक और जाल-स्थल विकसित किया जा रहा है जयप्रकाश द्वारा । mahanadi.blogspot.com पर अंकित घोषणा को ध्यान दें तो यह छत्तीसगढ़ी रचना संसार का स्थल होगा जहाँ छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य और संस्कृति पर केन्द्रित आलेख, कविता, निबंध और समीक्षा प्रकाशित हुआ करेगी । यह ऐसा मंच होगा जहाँ सभी लोकानुरागी व्यक्ति अपना विचार, मंतव्य आपस में बाँट सकेंगे । वे हर कोई जो छत्तीसगढ़ी को आगे ले जाना चाहते हैं यहाँ अपने स्वागत में हमें पायेंगे । यह भाषा और साहित्य का सहकारी मंच है जहाँ कोई भी निःसंकोच अपनी बात रख सकता है । वैसे यह ब्लॉग आधारित जाल-स्थल सूना पड़ा है । विश्वास किया जाना चाहिए छत्तीसगढ़ के साहित्यकार और भाषासेवी मिलकर इस जगह को भरने आगे आयेंगे ।
अंतरजाल आज सारी दुनिया में समूह चर्चा के अनेक घरों के की मुफ़्त उपलब्धता के लिए भी बहुप्रयुक्त और लोकप्रिय माध्यम है । कदाचित् वह 21 सदी में मनुष्य द्वारा वैश्विक स्तर पर चर्चा का सबसे प्रभावी मंच भी बन सकता है । हमने उसकी भी जानकारी लेनी चाही । हमें ऑरकुट (www.orkut.com) और रेडिफ जैसे महान साइटों पर भी छत्तीसगढ़ी में लिख कर चर्चा करने वाले ऐसे हजारों लोग मिले जो वास्तव में अंतरजाल पर छत्तीसगढी की लौ को जिंदा करके रखे हुए हैं । इनमें से अधिकांश विदेशों में रोजी-रोटी के लिए रह रहे हैं ।
छत्तीसगढ़ी फिल्मों की तरह ही अंतरजाल पर उनकी उपस्थिति नहीं के बरोबर है । है तो भी आधी अधूरी और लगता है अभी छत्तीसगढ़ी को अंतरजाल पर प्रतिष्ठित देखने की पुलक और ललक जागी नहीं है । ऐसी ही एक नौसिखिया साइट है - http://chhollywood.info/ । यहाँ दो-तीन व्यक्तियों की आवाज में छत्तीसगढ़ी लोकगीत सुने जा सकते हैं । कहने को तो छत्तीसगढ से 30 हजार से अधिक साइट संचालित हैं पर छत्तीसगढी का कही भी अता-पता नहीं है । कहने को हाल ही में दो और जाल-स्थल (प्रिंट माध्यम में इतवारी अखबार और अक्षर पर्व)और तैयार हुए हैं पर इनमें शायद ही छत्तीसगढी की कोई सामग्री हो ।

जब आप छत्तीसगढ़ी भाषा में कुछ पढ़ना चाहेंगे और इंटरनेट के सर्च इंजनों से छत्तीसगढ़ी शब्द टाइप करके खोजने लगेंगे तो आपके समक्ष 503 वेबसाइटों की सूची आ टपकेगी । पर इतनी जगहों पर छत्तीसगढी भाषा के नाम पर वह कुछ नहीं मिलेगा जिसे आप ढूँढना चाहते हैं । यानी कि छत्तीसगढी सामग्री आपको वहाँ नहीं मिलगी । तुलनात्मक रूप से यह अंतरजाल पर छत्तीसगढी प्रेमियों की क्षीण उपस्थिति का भी द्योतक है । अंतरजाल पर छत्तीसगढ़ी कितनी क्षीण है वह इस बात से भी पता लग जाता है कि सर्च इंजनें भोजपुरी के 27900, राजस्थानी के 11100, मराठी के 1,850,000 अवधी के 2490 और हिंदी के 587,000 जाल-स्थलों की सूची हमारे समक्ष रख देती हैं । फिर भी यह कम गौरव की बात नहीं है जो छत्तीसगढ के मूल निवासी और रवि रतलामी पूरी तरह से छत्तीसगढी में संचालित होने वाला आपरेटिंग सिस्टम भी बना लिया है । सुनते हैं उन्होंने इसे अनसमर्थन देने हेतु छत्तीसगढ़ी भाषा के विकास का सिंहनाद करने वाली सरकार के पास भी भेजा था परन्तु सालों बीत गये उन्हें उनके मेल का कोई जबाब तक नहीं मिल सका है । भगवान बचाये ऐसे छत्तीसगढ़िया लोगों से । वैसे इसकी विस्तृत जानकारी जानने और सीड़ी आदि लेने के लिए http://cg-os.blogspot.com/ पर लॉग ऑन किया जा सकता है ।
भविष्य में संचार, सूचना, शिक्षा, ज्ञान, भाषा संरक्षण, उद्योग, व्यापार, जनकल्याणकारी योजनाओं का संचालन आदि का माध्यम इंटरनेट ही है । पश्चिम तो इसे लगभग प्राप्त करने जा रहा है । यह मैं ब्रिटेन और मारीशस में देख चुका हूँ कि कैसे वहाँ अपनी भाषा में घर बैठे ही सारा काम इंटरनेट से संचालित कर लिया जाता है – चाहे वह किसी गृहिणी द्वारा किसी स्टोर से मशाला क्रय करने का कार्य हो या किसी शोध छात्र द्वारा किसी खास विषय पर जानकारी और ज्ञान प्राप्त करने का । विश्वास किया जाना चाहिए छत्तीसगढ़ से भी सांस्कृतिक संगठनें भविष्य में अंतरजाल की ओर मुडेंगी । लेखकगण भी अपनी बात दुनिया भर के लिए अंतरजाल पर रखेंगे । आनलाइन होने की शुरूआत और अधिक गति पायेगी । तब भोजपुरी की तरह छत्तीसगढी भी इंटरनेट में सक्रियता की विश्व स्तर के पुरस्कारों से सम्मानित हो सकेगी ।

2 टिप्‍पणियां:

Sanjeeva Tiwari ने कहा…

जय हो भईया गुनगान बखान बर बधाई, अब येदे महू ह छत्‍तीसगढी म लिखत हौं वो बडबोलवा ल बता दुहू कि इहू जगा छत्‍तीसगढी हे । फेर आपके http://mahanadii.blogspot.com/2006/03/blog-post.html म तो एके ठन पोस्‍ट हे दाउ तभो ले आप के शोध म आ गेहे वईसे मोर ब्‍लाग में घलोक एक ठन ले जियादेच छत्‍तीसगढी मिलही आघू नवा शोध म मोरो नाम ल डारहू भई ।

बरबर ले जम्‍मा लेख मन ला एके दिन छाप देथौ जी बकबका जथन काला पढन काला नई पढन कहि के ओसरी पारी पोस्‍ट करे करव ना गा भाई

बधाई !
“आरंभ” संजीव का हिन्‍दी चिट्ठा

Rahul Singh ने कहा…

aapse isi vyapak drishti ki apeksha sadaiv rahati hai. bahut-bahut badhai