8/21/2007

बाढ़ का कहर और देश का विकास



प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी देश के कई राज्य भयंकर बाढ़ की चपेट में रहे। इनमें सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित राज्य पहले की तरह बिहार राज्य ही चिन्हित किया गया। यहाँ एक करोड़ से अधिक लोगों के जनजीवन को बाढ़ ने प्रभावित किया। सैकड़ों लोग इस प्रलयकारी बाढ़ की भेंट चढ़ गए। हजारों मवेशी मारे गए। लाखों एकड़ फसल तबाह हो गई। जब बाढ़ और बारिश का सिलसिला थमा तो बाढ़ के उपरान्त फैलने वाली बीमारियों ने बाढ़ पीड़ित लोगों के जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया। परन्तु इसमें भी कोई शक नहीं कि बाढ़ की मार झेलने को ही अपनी नियति मान बैठने वाली बिहार की बहादुर व अति सहनशील जनता पुन: अपने दैनिक जीवन की व्यस्तताओं में पूर्ववत जुट गई। और शायद अब यही जनता करने लगी होगी प्रतीक्षा अगले वर्ष आने वाली संभावित बाढ़ की।

अभी मात्र कुछ माह पूर्व की ही तो बात है जबकि भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री ए पी जे अब्दुल कलाम ने बड़े उत्साहवर्धक वातावरण में इसी वर्ष जनवरी महीने में पटना में अनिवासी भारतीयों के एक सम्मेलन को संबोधित किया था। इस सम्मेलन में कलाम साहब ने उम्मीद जताई थी कि 2015 तक बिहार राज्य को देश के सबसे विकसित राज्य के रूप में पहचाना जाएगा। तत्कालीन राष्ट्रपति महोदय यह भी कह चुके हैं कि हरित क्रांति की शुरुआत अब बिहार राज्य से किए जाने की ज़रूरत है। प्रश् यह है कि क्या बाढ़ में डूबे हुए बिहार को देखकर इस बात की कल्पना भी की जा सकती है कि यही राज्य वह राज्य है जिसके बारे में भारत के महान स्वप्दर्शी राष्ट्रपति ने देश के सबसे विकसित राज्य बनाए जाने का सपना देख रखा था? क्या इस प्रलयकारी बाढ़ के दृश्य देखने के पश्चात किसी अनिवासी भारतीय व्यवसायी से यह उम्मीद की जा सकती है कि वह ऐसी प्राकृतिक विपदाओं को देखने के बावजूद बिहार में पूंजी निवेश भी करेगा?

इस वर्ष बिहार में आई बाढ़ के परिणामस्वरूप जहाँ प्रकृति के तबाही के दृश्य अत्यन्त भयानक व दयनीय थे वहीं इस बार बिहार से जुड़े राजनेताओं ने भी एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप करने तथा एक दूसरे को नीचा दिखाने का कोई अवसर गँवाना नहीं चाहा। सबसे बड़ी गैर जिम्मेदारी का काम तो स्वयं मुख्यमंत्री नीतिश कुमार द्वारा किया गया। वे बिहार में बाढ़ आने की चेतावनी सुनने के बावजूद अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार विदेश दौरे पर चले गए तथा विदेश में पांच सितारा वातावरण में बैठकर बाढ़ की त्रासदी झेल रही बिहार की जनता के विषय में जानकारी प्राप्त करते रहे। उन्होंने अपने विदेश दौरे को न्यायसंगत बताते हुए यह कहने में भी कोई हिचकिचाहट महसूस नहीं की कि उनका दौरा तो बिहारवासियों के लिए गर्व की बात है। नीतीश कुमार के विरोधी नेताओं ने भी बाढ़ प्रभावितों की सहायता किए जाने पर तो कम ध्यान दिया जबकि मुख्यमंत्री के मॉरिशस दौरे की आलोचना में अधिक समय गँवाया। नीतीश कुमार सरकार के सहयोगी दल भारतीय जनता पार्टी के नेता व राज्य के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने तो लालू यादव को निशाना बनाते हुए कहा कि यदि लालू जी बिहार की समस्त रेलगाड़ियों को समय पर नियमित रूप से चलवा दें तो बाढ़ पीड़ितों को उपयुक्त सहायता समय पर पहुंचाई जा सकती है। जाहिर है मोदी का यह वक्तव्य केवल व्यंग्य मात्र ही था। क्योंकि बाढ़ में डूबी हुई रेललाईनों पर समय से व नियमित रूप से रेलगाड़ी चलाए जाने की कल्पना आंखिर कैसे की जा सकती है। तो क्या सुशील मोदी को लालू यादव पर व्यंग्य कसने का यही एक अवसर मिला था?

इसमें कोई शक नहीं कि भारतवर्ष इस समय जिन भीषण त्रासदियों के दौर से गुजर रहा है उनमें सूखा व बाढ़ जैसी प्राकृतिक विपदाएं भी शामिल हैं। यह न सिर्फ़ भारी आर्थिक क्षति का कारण बनती हैं बल्कि इनसे जान व माल की भी बड़ी तबाही होती है। यह ऐसी प्राकृतिक त्रासदी है जो गरीबी को जन्म देती है। और आगे चलकर यही गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा और अराजकता की राह तय करती है। यहाँ फिर यही प्रश्न उठता है कि क्या बिहार सहित अन्य बाढ़ प्रभावित राज्यों की जनता इसे अपनी नियति मानकर ही ख़ामोश बैठ जाए और हमेशा बाढ़ के दिनों में अपनी तबाही का मंजर अपनी ही आँखों से देखने के लिए विवश रहे। क्या यही बाढ़ जहाँ प्रभावित लोगों की तबाही के दृश्य प्रस्तुत करे वहीं यही बाढ़ राजनेताओं द्वारा किए जाने वाले हवाई सर्वेक्षण के रूप में उनके व उनके परिवारजनों के मनोरंजन का साधन मात्र बनकर रह जाए?

जी नहीं। भारत को 2020 तक विकसित राष्ट्र बनाए जाने का संकल्प करने वाले जनता के राष्ट्रपति डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम ने देश के विकास हेतु जो खाका तैयार किया है तथा उनमें जिन प्रमुख योजनाओं को लागू किए जाने की ज़रूरत महसूस की है उन्हीं में से एक प्रमुख योजना है सभी भारतीय नदियों को आपस में जोड़ा जाना। हालांकि गत् 10 वर्षों से इस विषय पर सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर चर्चाएं होती रही हैं। परन्तु इस दिशा में प्रगति के कोई संकेत अभी तक नज़र नहीं आ रहे हैं। हाँ इतना ज़रूर है कि इस अति विशाल परियोजना से असहमति रखने वाले कुछ राज्यों ने इस परियोजना की आलोचना करने वाले अपने विरोधी स्वर ज़रूर बुलंद किए हैं। निश्चित रूप से नदियों को जोड़ने वाली परियोजना बहुत बड़ी व ख़र्चीली योजना है। परन्तु इसमें कोई शक नहीं कि इस विशाल परियोजना के पूरा होने के बाद न सिर्फ़ अनचाही बाढ़ से देशवासियों को राहत मिल सकेगी बल्कि बाढ़ का यही पानी सूखी पड़ी नदियों में जाकर सूखाग्रस्त क्षेत्रों में सिंचाई हेतु भी प्रयोग में लाया जा सकेगा।


परन्तु राजनीति प्रधान इस देश में जहाँ समस्याओं को ही राजनीति का केंद्र बिंदु माना जाता है, क्या इस बात की उम्मीद की जा सकती है कि बाढ़ व सूखे जैसी विकराल समस्या से निपटने हेतु राजनेताओं द्वारा नदियों को जोड़े जाने जैसे गंभीर विषय को लेकर कोई रचनात्मक कदम उठाया जा सकेगा? न सिर्फ़ बिहार सरकार बल्कि और भी कई राज्यों में छिछली नदियों के आसपास की आबादी को बाढ़ के प्रकोप से बचाने हेतु बड़े-बड़े बांध बनाने का कार्य किया जाता है। बाढ़ रोकने के इस काम चलाऊ उपाय से हालांकि जनता को कुछ समय के लिए राहत जरूर मिल जाती है परन्तु प्राय: यही बांध टूटते या दरार पड़ते भी देखे जाते हैं जिनसे बाढ़ जैसी तबाही पुन: आ जाती है। तमाम स्थान तो ऐसे हैं जहाँ बांध बनाने का कार्य चलते रहने के दौरान ही बाढ़ आ जाती है तथा बांध बनाने हेतु की जाने वाली सारी शुरुआती कोशिशें व इन पर होने वाला भारी ख़र्च सब कुछ बाढ़ की भेंट चढ़ जाता है। राजनीतिज्ञों की इच्छा के अनुरूप इसी प्रकार यही 'सिलसिला' अगले वर्ष फिर नए सिरे से शुरु हो जाता है।

भारत भले ही विकसित राष्ट्र बनने की दौड़ में शामिल हो गया हो परन्तु आर्थिक रूप से अभी भी भारत एक गरीब देश ही है। यहाँ प्रत्येक वर्ष पानी में बह जाने वाली लघुकालीन एवं अस्थाई राहत योजनाओं के बजाए उन दीर्घकालीन एवं स्थाई योजनाओं को लागू किए जाने व उनपर अमल किए जाने की ज़रूरत है जो देशवासियों को स्थाई रूप से राहत पहुंचा सके। भारत के समस्त राजनैतिक दलों, उनके नेताओं व समस्त भारतवासियों को कलाम साहब के उन शब्दों को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि जब तक समस्त भारतवासियों के चेहरे पर मुस्कान नहीं आती तब तक भारत को खुशहाल राष्ट्र नहीं कहा जा सकता।

अत: आज ज़रूरत है ऐसी ही दीर्घकालीन योजनाओं की जोकि समस्त भारतवासियों के चेहरे पर मुस्कान लाने का कारण बन सकें। भारतीय नदियों को आपस में जोड़े जाने की परियोजना भी एक ऐसी ही परियोजना है जो देशवासियों को बाढ़ व सूखे जैसी त्रासदी से तो निजात दिलाएगी ही साथ-साथ देश को विकसित राष्ट्र बनाए जाने की दिशा में भी मील का पत्थर साबित होगी। ज़रूरत है इसे तत्काल लागू किए जाने व इसे तत्काल कार्यान्वित किए जाने की।

-तनवीर जाफ़री
(सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी)
22402, नाहन हाऊस
अम्बाला शहर। हरियाणा

8/19/2007

चुनौतीपूर्ण है तालिबानों का पुन: संगठित होना


अफगानिस्तान में कट्टरपंथी इस्लाम का प्रतिनिधित्व करने वाले तालिबानी पुन: सक्रिय हो उठे हैं। तालिबानों ने अफगानिस्तान में अपनी माँगें पूरी करवाने हेतु इन दिनों अपहरण का साम्राज्य स्थापित कर रखा है। अफगानिस्तान की सरकार के सदस्य हों या वहाँ के विकास हेतु काम करने वाले विदेशी संस्थानों के लोग, पत्रकार हों या स्वयं सेवी संगठनों के सदस्य सभी इनके निशाने पर हैं। तालिबनों द्वारा इन लोगों का अपहरण कर इन्हें मानव ढाल के रूप में प्रयोग किया जा रहा है तथा इनके दम पर अपनी माँगें पूरी कराने की कोशिश की जा रही है। इस प्रकार के अपहरण के पश्चात तालिबानी लड़ाके आमतौर पर अपने गिरंफ्तार किए गए तालिबानी विद्रोहियों को रिहा किए जाने की शर्त रखते हैं। इनका हौसला उस समय और बढ़ गया जबकि इनके द्वारा एक इतालवी पत्रकार को उसके ड्राईवर के साथ गत् 6 मार्च को हेलमंद नामक स्थान से अपहृत किया गया तथा अपने 5 सहयोगी तालिबानों की रिहाई के बदले में इतालवी पत्रकार को रिहा कर दिया गया। इसी पत्रकार के साथ अजमल नक्शबंदी नामक एक अफगानिस्तानी पत्रकार का भी अपहरण किया गया था। परन्तु चूंकि सरकार ने अजमल की रिहाई के बदले में तालिबानी विद्रोहियों को रिहा नहीं किया इसलिए अजमल को तालिबानों द्वारा मार डाला गया।

क्रूर तालिबानों द्वारा अपनी माँगें मानवाए जाने हेतु अपहरण किए जाने जैसा गैर इस्लामी व गैर मानवीय सिलसिला लगातार जारी है। गत् 19 जुलाई को तालिबानों द्वारा 23 दक्षिण कोरियाई ईसाई सहायता कर्मियों का अपहरण कर लिया गया था जिनमें अधिकांश औरतें व बच्चे शामिल हैं। अभी तक इनमें से दो कोरियाई नागरिकों 42 वर्षीय पादरी वे ह्वूग कू तथा 29 वर्षीय सिम शंगु मिन की निर्मम हत्या की जा चुकी है। इन अपहृत कोरियाई नागरिकों की रिहाई के बदले में तालिबानों द्वारा अपने 8 सहयोगी लड़ाकुओं की रिहाई की मांग की जा रही है। इसके पूर्व निमरोंज प्रान्त में 2 फ्रांसीसी राहतकर्मियों का अपहरण कर लिया गया था। यह फ्रांसीसी अफगानिस्तान में शिक्षा से संबंधित एक गैर सरकारी संस्था में कार्य कर रहे थे।

दक्षिण कोरियाई स्वयं सेवकों के अपहरण के ठीक अगले दिन यानि 20 जुलाई को अफगानिस्तान के 4 न्यायाधीशों का अपहरण कर लिया गया था। बाद में इन चारों बंधक न्यायाधीशों की लाशें ग़जनी प्रांत के देहमाक जिले से प्राप्त हुईं। इनकी हत्या की जिम्मेदारी भी तालिबानी विद्रोहियों द्वारा स्वीकार की गई। इसी प्रकार गत् माह दक्षिण अफगानिस्तान के कंधार प्रांत के पंजवई जिले में तालिबानी विद्रोहियों द्वारा जस्टिस क़ाजी नेमतुल्ला की गोली मारकर हत्या कर दी गई। तालिबानी लड़ाकुओं द्वारा क्रूरता एवं अमानवीयता की हदें यहीं समाप्त नहीं होतीं। इन्होंने अपने ही लिए काम करने वाले तथा मूल रूप से पाकिस्तान के रहने वाले एक तालिबानी गुलाम नबी की गला रेतकर हत्या कर डाली। तालिबानी लड़ाकुओं को संदेह था कि गुलाम नबी तालिबानों के साथ रहकर अमेरिकी सेनाओं को तालिबान के कमांडरों के बारे में महत्वपूर्ण एवं गोपनीय सूचनाएं दे रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि तालिबानों द्वारा गुलाम नबी का गला काटने के लिए 12 वर्षीय मासूम बच्चे का प्रयोग किया गया जिसके हाथों में तलवार देकर गुलाम नबी की गला रेतकर हत्या कराई गई। तालिबानों द्वारा इस वीभत्स घटना का वीडियो टेप भी जारी किया गया था।

दिन-प्रतिदिन अफगानिस्तान में बिगड़ते जा रहे इन हालात से न केवल अमेरिका या अफगानिस्तान की हामिद क़रंजई सरकार चिंतित है बल्कि तालिबानियों का क्रूरतापूर्ण व इस्लाम विरोधी व्यवहार पूरे मुस्लिम जगत के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। तालिबानों का मत है कि अफगानिस्तान व इराक पर अमेरिका अपना कब्जा जमाए हुए है जिसे वे कभी बर्दाश्त नहीं कर सकते। उनका कहना है कि जब तक विदेशी सेनाएं यहाँ मौजूद रहेंगी तब तक उनका खूनी संघर्ष इसी प्रकार जारी रहेगा। तालिबानों के अनुसार अमेरिकी सेना अथवा अमेरिका के इशारों पर चलने वाली अफगान सरकार के लिए काम करने वाले सभी लोग तालिबानों के दुश्मन हैं। यहाँ तक कि तालिबानी लड़ाके पड़ोसी देश पाकिस्तान की परवेज़ मुशर्रफ़ सरकार के विरुद्ध भी जेहाद का उदघोष कर चुके हैं। तालिबानों का मत है कि जनरल मुशर्रफ़ पाकिस्तान व पाकिस्तान से लगे क़बाईली क्षेत्र में अमेरिकी नीतियाँ लागू करने का जबरदस्त प्रयास कर रहे हैं जिसे वे सहन नहीं करेंगे।

दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश तक के लिए तालिबानी लड़ाकुओं का पुन: संगठित होना चिंता का विषय बना हुआ है। एक अनुमान के अनुसार इन हथियारबंद तालिबानों की संख्या लाखों में पहुंच गई है। राष्ट्रपति जार्ज बुश ने अफगानिस्तान के तांजातरीन बिगड़ते हुए हालात पर चर्चा करने हेतु गत् दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति की आरामगाह कैंप डेविड में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद क़रंजई से मुलाकात की। बुश पहले ही यह कह चुके हैं कि अमेरिका आतंकवादियों को ढूँढने में आकाश व पाताल दोनों एक कर देगा। बुश यह चेतावनी भी दे चुके हैं कि यदि आवश्यकता पड़ी तो अमेरिकी सेना पाकिस्तान के संदिग्ध आंतरिक क्षेत्रों में सैन्य कार्रवाई करने से भी नहीं चूकेगी।

तालिबानी लड़ाकों की अमानवीय हरकतों के बीच कुछ परस्पर विरोधी बातें भी सामने आ रही हैं। उदाहरण के तौर पर तालिबानों व अमेरिकी नेतृत्व के मध्य जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ फंसे दिखाई दे रहे हैं। अर्थात् तालिबानों द्वारा मुशर्रफ़ को तो अमेरिका के पिट्ठु के रूप में देखा जा रहा है तथा उनके विरुद्ध भी जेहाद का नारा बुलन्द किया जा चुका है। जबकि अमेरिका द्वारा मुशर्रफ़ पर तालिबानों के प्रति नरमी व हमदर्दी बरतने का आरोप लगाया जा रहा है। इसी प्रकार राष्ट्रपति बुश व क़रंजई की मुलाकात में हामिद करंजई ने तो यह स्वीकार किया है कि ईरान अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने में अफगान सरकार के साथ एक अच्छे सहयोगी की भूमिका अदा कर रहा है जबकि अमेरिका अफगानिस्तान के इस मत का विरोधी है। बुश प्रशासन का आरोप है कि ईरान अफगानिस्तान में अस्थिरता पैदा करने हेतु तालिबानी विद्रोहियों की सहायता कर रहा है। इसी प्रकार दक्षिण कोरियाई नागरिकों के अपहरण को लेकर दक्षिण कोरिया में तरह-तरह के मत व्यक्त किए जा रहे हैं। जहां अपहरण हेतु तालिबानी विद्रोहियों की समग्र निंदा की जा रही है वहीं एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो कोरियाई नागरिकों के अपहरण के लिए अमेरिका व उसकी नीतियों को ही जिम्मेदार मान रहा है। इस मत के पक्षधर कोरियाई नागरिकों का मानना है कि संकट की इस घड़ी में अमेरिका को ही सबसे आगे आना चाहिए तथा दक्षिण कोरियाई नागरिकों की रिहाई सुनिश्चित करनी चाहिए।

हालांकि अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान को इस वर्ष दस अरब डॉलर की सहायता दी जा रही है। जिसका उद्देश्य अफगानिस्तान में सुरक्षा उपायों व सुरक्षातंत्रों को और अधिक सुदृढ़ करना है। परन्तु इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि अफगानिस्तान में चरमपंथी हमलों की संख्या में भी दिन प्रतिदिन बढ़ोत्तरी होती जा रही है। निर्दोष लोगों की मृत्यु दर भी लगातार बढ़ रही है। परन्तु इसके बावजूद सुखद समाचार यह आ रहे हैं कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम जगत में तालिबानों, इस्लामी आतंकवादियों, अलंकायदा आदि के प्रति आम मुसलमानों की हमदर्दी व समर्थन में असाधारण कमी आती जा रही है। पाकिस्तान के हाल के लाल मस्जिद घटनक्रम में भी यह देखा गया कि वहाँ कट्टरपंथी नेटवर्क से जुड़े सक्रिय रूढ़ीवादी लोगों द्वारा तो लाल मस्जिद पर पाकिस्तानी सैन्य कार्रवाई का विरोध किया गया जबकि आम पाकिस्तानी नागरिक इस आतंकवाद विरोधी कार्रवाई को देखता रहा।

वास्तव में यदि दुनिया में मानवता, शांति व सद्भाव को कायम रखना है, वास्तविक इस्लाम को जिंदा रखना है तो हथियारबंद लड़ाकों के हाथों में इस्लाम की बागडोर को जाने से हरगिज रोकना होगा। तालिबानी विचारधारा या तालिबानों के क्रूरतापूर्ण कृत्य तंजीदियत या शैतानियत के तो प्रतिनिधि हो सकते हैं, सच्चे इस्लाम के प्रतिनिधि हरगिज नहीं।

तनवीर जाफ़री
(सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी)
22402, नाहन हाऊस
अम्बाला शहर। हरियाणा

8/07/2007

अब छत्तीसगढ़ी मे बोलेगा कंप्यूटर

(हरिभूमि में प्रकाशित टिप्पणी)


जी हाँ । यह सौ फीसदी सही है । कभी हम हिदीं का एक शब्द कंप्यूटर पर टाइप नही कर पाते थे । इंटरनेट पर हिदीं का एक शब्द देखने को तरस जाते थे । अब न केवल हमारा कंप्यूटर हिदीं में बोलने लगा है, इंटरनेट पर हिदीं के लाखों-करोड़ों पेज उपलब्ध हो चुके हैं । इतना ही नहीं, अब तो कंप्यूटर का पूरा का पूरा आपरेटिंग सिस्टम भी छत्तीसगढ़ी भाषा में बोलने वाला है । और इसे किसी विदेशी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट के इंजीनियरों ने नहीं बल्कि हमारे अपने छत्तीसगढ़ के रवि रतलामी ने सही साबित कर दिखाया है । जो धनाभाव में अटका पड़ा है ।

रवि रतलामी मूलतः धमतरी जिले के निवासी हैं जो मध्यप्रदेश से ऐच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर इन दिनों रतलाम में रहते हैं । उन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा काम करने वाला पूरा आपरेटिंग सिस्टम बनाने का गुर हासिल कर लिया है, जो किसी प्रोत्साहन और धनाभाव के कारण बाजार में आने से वंचित है । ऐसा नहीं है कि उन्होंने छत्तीसगढी का राग अलापने वाली सरकार के समक्ष अपना प्रस्ताव नहीं रखा । वे बताते हैं – मैंने कई बार राज्य के आईटी विभाग को ई-मेल किया परन्तु जैसा कि हम जानते हैं राजकाज तो फाइलों में होता है, आज तक कोई निर्णय या आश्वासन उन्हें नहीं मिल सका है । उनके अनुसार पत्राचार को लगभग 3-4 साल व्यतीत हो चुके हैं ।

यदि यह सुविधा छत्तीसगढ़ के आम उपयोगकर्ताओं को उपलब्ध हो सके तो वे अंग्रेजी ज्ञान के बिना भी कंप्यूटर का संचालन कर सकेगें । रवि अपने महत्वाकांक्षी परियोजना के बारे में कहते हैं - मैं जन्म से छत्तीसगढ़िया हूँ । यहाँ की मिट्टी की महक सदैव मुझे आकर्षित करती है । मेरा सपना है कि छत्तीसगढ़ी भाषा में ऑपरेटिंग सिस्टम (http://cg-os.blogspot.com ) हो, उसमें कार्य करने को अनुप्रयोग हों । गनोम 2.1 डेस्कटॉप युक्त छत्तीसगढ़ी लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम वर्ष भर की मेहनत से तैयार हो सकता है । हमारे पास तमाम तकनीकी कौशल इसके लिए है । हमने हिन्दी के लिए कार्य किया ही है । इस कार्य के लिए कुछ आर्थिक संबल की आवश्यकता है। देखते हैं कब यह सपना पूरा होता है।

रवि दो करोड़ लोगों द्वारा प्रयुक्त और भारत के नवोदित राज्य छत्तीसगढ़ की प्रमुख भाषा-छत्तीसगढ़ी में आपरेटिंग सिस्टम बनाने वाले प्रथम टेक्नोक्रेट हैं, इस नाते छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ के विकास में ऐतिहासिक योगदान देने वाले भी । कुछ दिनों पहले ही उन्हें विश्व की सबसे बड़ी साफ्टवेर कंपनी माइक्रोसाफ्ट द्वारा माइक्रोसॉफ्ट मोस्ट वेल्युबल प्रोफेशनल्स का पुरस्कार 2007 से नवाजा जा चुका है । इतना ही नहीं उन्हें माइक्रोसॉफ्ट द्वारा गत वर्ष का सर्वेश्रेष्ठ ब्लागर्स का एवार्ड भी मिल चुका है ।

छत्तीसगढ़ी भाषा में आपरेटिंग सिस्टम लांच करने पर हानि ही हानि ही है क्योंकि इसका बाजार छत्तीसगढ़ में लगभग शून्य है पर छत्तीसगढ़ी भाषा प्रेम और माटी की पुकार ने उन्हें छत्तीसगढ़ी भाषा में आपरेटिंग सिस्टम बनाने के लिए प्रेरित किया । विश्व की कोई ऐसी कंप्यूटर कंपनी नहीं है जो कभी छत्तीसगढ़ी में आपरेटिंग सिस्टम तैयार करायेगी । क्योंकि इसके लिए कोई बाजार ही नहीं है । छत्तीसगढ़ में यूँ भी लोग-बाग ओपन सोर्स द्वारा उपलब्ध सॉफ्टवेर उपयोग में लाते हैं । उनमें साफ्टवेयर खरीदने की क्रयशक्ति भी नहीं है । आम छत्तीसगढ़िया अग्रेजी भी नहीं जानता और इस तरह से वह कंप्यूटर के उपयोग करने से वंचित हो जाता है । छत्तीसगढी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है और छत्तीसगढ़ी भी हिंदी समूह की भाषा है । छत्तीसगढ़ी में कंप्यूटर तैयार होने से कंप्यूटर के प्रति ललक और उपयोग करने के विश्वास की संभावना को लेकर रवि रतलामी काम कर रहे हैं तो यह छत्तीसगढ़ की सरकार और समाज के लिए भी गौरव की बात है और इसका स्वागत किया ही जाना चाहिए । 2 करोड़ की आबादी वाले राज्य और हजारों करोड़ रूपयों वाली सरकार के रहते यदि उन्हें प्रोत्साहन नहीं मिल सका तो शायद यह छत्तीसगढ़ी भाषा और भाषियों का दुर्भाग्य भी होगा ।

जहाँ तक लागत का प्रश्न है छत्तीसगढ़ी आपरेटिंग सिस्टम प्रोजेक्ट के तहत सेटअप और बुनियादी कार्य रवि द्वारा पूर्व में ही किया जा चुका है । अब इस कार्य में लगभग 5000 डालर की आवश्यकता होगी जो मूलतः कंप्यूटर में भाषायी स्थानीयकरण पर खर्च होगा, और जिसके लिए वह सक्षम भी नहीं है । इसमें अनुवादको, टायपिस्टों, भाषाविदों की सेवाओं पर भारी राशि खर्च होगी । । ऐसा नहीं है कि रवि रतलामी ने इसके लिए सार्वजनिक प्रयास नहीं किया । माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों ने इस सॉफ्टवेयर को लेकर बाजार की स्थिति का जायजा लेकर इससे मुँह बिचका दिया । रतलामी ने इंटरनेट और अखबारों के माध्यम से 1-1 डालर की सहायता का आव्हान भी किया था । ताकि अधूरी परियोजना का पूर्ण कर आम उपभोक्ता को आपरेटिंग सिस्टम का सॉफ्टवेयर मुफ्त में उपलब्ध कराया जा सके । किन्तु कोई खास उपलब्धि नहीं हासिल नहीं हुआ । विश्वास किया जाना चाहिए कि राज्य का कोई विश्वविद्यालय, कोई अकादमी, संस्कृति विभाग या राज्य सरकार का आईटी विभाग रवि रतलामी की ईजाद पर विचार करेगा । यदि ऐसा संभव हो सका तो 10 के भीतर छत्तीसगढ़ी भाषा का राग अलापने वाले राजनीतिज्ञों के राज्य का हर व्यक्ति छत्तीसगढ़ी भाषा वाला कंप्यूटर चला सकेगा ।

इंटरनेट पर छत्तीसगढ़ी तलाशते हुए

डॉ. सुधीर शर्मा
संपादक,

साहित्य वैभव

रायपुर, छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ी का सामर्थ्य अब अंतरजाल पर भी बोलने लगा है । यह बात अलग है कि वहाँ वह शैशवकाल में है परंतु चंद माह में ही उसकी विश्वसनीय व्याप्ति से मन को तोष मिलता है । एक विश्वास जागता है कि अब वह मुद्रित कागजों को लांघकर वेब-पृष्ठों पर भी अपनी छवि बिखेरने लगी है । यानी वह भी हिंदी के साथ-साथ अन्य संघर्षशील भाषाओं की तरह नये ज़माने की प्रौद्योगिकी - इंटरनेट के साथ चलना शुरू कर चुकी है । कहते हैं प्रौद्योगिकी के साथ जो तालमेल नहीं बैठा पाता वह पिछड़ जाता है । भाषाओं के मायने में भी इसे सच होते हम देखते रहे हैं । छत्तीसगढ़ी वैसे भी देवनागरी लिपि में लिखी-पढ़ी जाती है सो उसे भी हिंदी भाषा की तरह अंतरजाल पर स्वयं को प्रतिष्ठित करने मे कोई दिक्कत नहीं हुई और देखते ही देखते वह वेब-पृष्ठों पर अपनी आमद दर्ज करा चुकी है ।

छत्तीसगढ़ी भाषा के आलोचक छत्तीसगढ़ी के सामर्थ्य को लेकर अक्सर बतंगड बनाते हैं । कोहराम मचा देते हैं । एकबारगी जाने-गुने बिना उसे मनगढंत असमर्थता की परिधि में रखने लगते हैं । ऐसे ही एक दिन मैंने किसी भाषायी कार्यशाला के दरमिया सुना - कोई सज्जन बखाने जा रहे थे – कि और तो और छ्त्तीसगढ़ी के एक भी शब्द इंटरनेट पर नहीं है । कितने पिछड़ी है छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ़िया । मैंने इसकी सच्चाई जानने की जब प्रायोगिक कोशिश की और तब जो तथ्य सामने आया उससे लगा कि वे या तो लफ्फाजी कर रहे थे या फिर स्वयं को उन्नत भाषा व तकनीक में पांरगत सिद्ध करने और साथ ही छत्तीसगढी को हतोत्साहित करने के लिए बेइमानी कर रहे थे ।

बहरहाल हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फारसी क्या ? आप ही देखिए लीजिए कभी अपने कंप्यूटर के पास बैठकर और विश्वजाल खोलकर । भले ही विलंब से पर 16 दिसम्बर 2006 से छत्तीसगढ़ी का पहला पूर्ण वेबसाइट भी आ चुका है । नाम है उसका – www.lokakshar.com । विश्व की पहली छत्तीसगढी वेबसाइट लोकाक्षर डॉट कॉम पूर्णतः साहित्यिक पत्रिका है । जिन्हें प्रिंट माध्यम में छत्तीसगढी में प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका – छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर - का सूचना है वे भली-भाँति उसके संपादक श्री नंदकिशोर तिवारी को भी जानते हैं । अब तक इस त्रैमासिक पत्रिका की सामग्री छत्तीसगढ़ी के साहित्य प्रेमियों तक ही नियमित पहुँचती थी किन्तु श्री तिवारी के उद्यम से अब इसे संपूर्ण विश्व में फैले छ्तीसगढ़िया पाठक नियमित पढ़ रहे हैं । संपूर्णतः छत्तीसगढ़ी में इस एकमात्र और पहली वेबसाइट बनाने वाले युवा ललित निबंधकार जयप्रकाश मानस अब एक जबाब भी हैं कि छत्तीसगढिया भी नयी प्रौद्यगिकी को लेकर सतर्क है, प्रगतिशील है । यदि ऐसा नहीं होता तो उनका 13-14 वर्षीय किशोर पुत्र प्रशांत रथ लोकाक्षर को नेट पर नहीं ला पाता ।

इस वेबसाइट में कविता, कहानी, निबंध, पुस्तक समीक्षा, सांस्कृतिक समाचार आदि पठनीय है । यहाँ छत्तीसगढ़ी के वरिष्ठ गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया, ड़ॉ. विमल कुमार पाठक, डॉ. प्रभंजन शास्त्री, गेंदराम सागर, कृष्ण कुमार भारतीय, संतोष कुमार कश्यप, एस. चन्द्रसेन, अशोक नारायण बंजारा, राघवेन्द्र अग्रवाल, रामफल यादव, रघुवीर अग्रवाल, ठाकुर जीवन सिंह की कविताएं ऑनलाइन उपलब्ध हैं । कहानीकार जो छत्तीसगढ़ी कहानी को सतत् अपनी उर्जा से विकसित कर रहे हैं उनमें यहाँ श्यामलाल चतुर्वेदी, रामलाल निषाद, मंगत रवीन्द्र, भावसिंह हिरवानी, सुशील भोले, सुभदा मिश्र, डॉ. नलिनी श्रीवास्तव, निशीथ पांडेय की विविध कथानकों पर लिखी कहानियाँ पाठकों को बाँधने में समर्थ हैं । यहाँ दुर्गाप्रसाद पारकर और कस्तुरी दिनेश के व्यंग्यों का आनंद भी लिया जा सकता है ।

यहाँ छत्तीसगढी विमर्श को बढावा देने वाले महत्वपूर्ण आलेख भी हैं