5/11/2008

पिक्चर अभी बाकी है

पिक्चर अभी बाकी है यही बॉलीवुड का आज का सच है। वर्ष-2007 का फिल्मी सफर इसी सच के साथ साल भर आबाद रहा। हालांकि बॉलीवुड कभी रामगोपाल वर्मा की आग में झुलसा तो कभी इसकी चुनरी में दाग भी लगा, मगर एक चालीस की लास्ट लोकल में ओम शान्ति ओम करते हुए आंखिरकार इसने चक दे इण्डिया कर ही दिया।


इसमें दो राय नहीं कि बॉलीवुड आज एक बड़े उद्योग के रूप में स्थापित हो चुका है। संख्या की दृष्टि से देखें तो हर साल यहां सैकड़ों फिल्में रिलीज होती हैं। आंकड़े बताते हैं कि इनमें से बमुश्किल बीस प्रतिशत फिल्में ही सफलता की सीढ़ी चढ़ पाती हैं। इस सबके बावजूद भारतीय फिल्म-उद्योग भली-भांति फल-फूल रहा है। समय, काल, परिस्थिति कैसी भी हो, फिल्मों की सफलता का पैमाना है - दर्शकों की स्वीकृति। जिस फिल्म को दर्र्शकों की सराहना मिल जाए वह इतिहास बना देती है और जिसे दर्शकों ने नकार दिया उसे बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरने से कोई नहीं रोक सकता- न उम्दा संगीत, न बढ़िया लोकेशन्स, न महंगे सेट्स और न ही बड़ी स्टारकास्ट।


दर्शकों की पसंद का अनुमान लगा पाना यकीनन मुश्किल है, फिर भी निर्माता-निर्देशक उनकी रूचि को ध्यान में रखते हुए ही नए फिल्म निर्माण की कल्पना करते हैं। कभी तो यह कल्पना ब्लाकबस्टर के रूप में साकार होती है और कभी फ्लॉप फिल्मों के रूप में तब्दील हो जाती है। जो भी हो कोशिश हमेशा जारी है। इस वर्ष का फिल्मी माहौल भी कुछ इसी तरह रहा।


साल की शुरूआत हुई अभिषेक-ऐश्वर्या अभिनीत गुरू से। इसने अच्छा कारोबार कर सभी को खुश कर दिया। मणिरत्नम की इस फिल्म में हर फ्रंट पर दर्शकों का मनोरंजन किया। धीरू भाई अंबानी के जीवन से प्रभावित इस फिल्म की खासियत रही बेहतरीन सिनेमेटोग्राफी, उम्दा स्टारकास्ट और ए।आर.रहमान का मधुर संगीत। गुरू की सफलता के बाद लगभग दो महीनों तक लगातार कई फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस का दरवाजा खटखटाया, मगर ना तो सलमान खान की सलाम-ए-इश्क बेहतर कर पायी और ना ही अमिताभ की नि:शब्द। एक नए कॉन्सेप्ट पर बनी फिल्म हनीमून ट्रेवल्स् प्राइवेट लिमिटेड भी कई कलाकारों की उपस्थिति के बावजूद औसत कारोबार ही कर पायी। अरैंज मैरिज पर आज के युवा वर्ग की सोच दर्शाती जस्ट मैरिड भी कुशल निर्देशन की अनुपस्थिति में फ्लॉप साबित हुई।


ट्रैफिक लाइट पर भीख मांगते बच्चे-बड़ों की वास्तविकता ंजाहिर करती फिल्म ट्रैफिक सिग्नल हालांकि बॉक्स ऑफिस पर खरी नहीं उतरी, मगर दर्र्शकों और आलोचकों के बीच काफी सराही गयी। दीपा मेहता की विवादास्पद फिल्म वाटर भी साल के शुरूआत में ही सिनेमाघरों तक पहुँची मगर अपने ही देश में इसे स्वीकृति नहीं मिली। भारत में विधवाओं की स्थिति पर रोशनी डालती इस फिल्म को अनिवासी भारतीयों ने बहुत सराहा।


इस बीच छोटी-बड़ी कई फिल्में रिलींज हुई मगर दूसरी बड़ी सफलता मिली मार्च में रिलीज नमस्ते लंदन के रूप में। पंजाब के एक छोटे से गांव के मुंडे की लंदन स्थित एक एनआरआई कुड़ी से विवाह की आड़ में देशी-विदेशी संस्कारों की तकरार का अनोखा चित्रण इस फिल्म में देखने को मिलता है जिसे दर्शकों ने खुले दिल से स्वीकार किया। झुम्पा लाहिरी के उपन्यास पर आधारित, मीरा नायर निर्देशित फिल्म नेमसेक भी अपने अनोखे विषय को लेकर इस वर्ष काफी चर्चा में रही। एक बंगाली परिवार के अमेरिका में बसने की दास्तान को मीरा नायर ने बखूबी पर्दे पर उतारा है। हालांकि अपने देश में यह दर्शकों को आकर्र्षित नहीं कर सकी मगर विदेशों में और आलोचकों के बीच इसकी लोकप्रियता आज भी बरकरार है। एक पंजाबी लड़की किरणजीत आहलुवालिया के संघर्ष की सच्ची दास्तान पर आधारित फिल्म प्रोवोक्ड भी आलोचकों को बहुत रास आयी। किरणजीत के किरदार में ऐश्वर्या रॉय ने भी काफी प्रशंसा बटोरी, मगर कारोबार के लिहांज से बॉक्स ऑफिस यह भी कोई खंास कमाल नहीं दिखा सकी। इस साल का पूर्वार्द्ध फिल्मों के लिए कोई खास नहीं रहा, मगर हाइली लो बजट कॉमेडी फिल्म भेजा फ्राई ने बॉलीवुड को सफलता का एक नया पाठ पढाया। नए कान्सेप्ट, नई कहानी, नए ट्रीटमेंट, अनोखी अदाकारी और एक बेहद नये अंदांज में सिर्फ एक कमरे के अन्दर फिल्मांकित इस कहानी ने कई दिनों तक सिनेमाघरों में राज किया।
ऐक्टिंग, म्युंजिक, स्टारकास्ट, फिल्मांकन, स्टोरी लाइन, डायलॉग्स् और डायरेक्शन के लिहांज से एक फिल्म जिसने सही मायने में लोगों का मनोरंजन किया वह है लाईफ इन ए मेट्रो। अनुराग बासु की टीम ने छ: अलग-अलग कहानियों को, अलग अलग समस्याओं और मुद्दों से जूझते हुए दस लोगों की ंजिन्दगियों बड़े आकर्षक अंदांज में एक साथ जिस तरह से सिल्वर स्क्रीन पर उकेरा वह काबिले तारीफ है। उस पर प्रीतम के संगीत ने फिल्म में चार चांद लगा दिए।
लाइफ इन ए मेट्रो से शुरू हुआ सफल फिल्मों का सिलसिला साल के अन्त तक बदस्तूर जारी रहा। साल की सबसे अधिक हिंसक फिल्म रही शूट आउट एट लोखण्डवाला। निर्माता एकता कपूर और संजय गुप्ता के बेनर तले बनी इस फिल्म ने बॉलीवुड के सभी बड़े सितारों मसलन अमिताभ बच्चन, संजय दत्त, सुनील सेठी, विवेक ऑबराय आदि की फौज तैयार उतार दी। इस फिल्म में मुम्बई के एक इलाके में हुए वास्तविक एन्काउन्टर का वीभत्स चित्रण है। इतनी हिंसा के बावजूद इस फिल्म को लोगों ने पसन्द किया और इसे हिट की श्रेणी में खड़ा कर दिया।


अपने संगीत से लोगों का दिल जीत चुके हिमेष रेशमिया को भी उनके नये रूप में दर्शकों की स्वीकृति इस वर्र्ष मिली। उनके संगीत, आवाज और अदाकारी से भरपूर फिल्म आपका सुरूर का सुरूर युवा दिलों पर छाया रहा। इस साल की सबसे बड़ी पारिवारिक फिल्म रही अपने। इस फिल्म में पर्दे पर पहली बार धर्मेंद्र अपने दोनों बेटों सन्नी देओल और बॉबी देओल के साथ अभिनय करते दिखे। अपने ने ना सिर्फ भारत में बल्कि विदेशों में बसे भारतीयों का भी दिल जीत लिया। इस बीच अमिताभ बच्चन और तब्बू की अनोखी जोड़ी के साथ सिनेमाघराें में पहुँची चीनी कम दर्शकों के कौतूहल का विषय बनी रही। 64 साल के एक आदमी की 34 साल की एक युवती के साथ की यह प्रेम कहानी दर्र्शकों के बीच बहुत पसंद की गयी और इसने औसत से अच्छा कारोबार भी किया। साल के मध्य में रिलीज झूम बराबर झूम के संगीत ने संगीत प्रेमियों को झूमने पर तो मजबूर कर दिया मगर सिने प्रेमियों को इससे निराशा ही हाथ लगी। अभिषेक-प्रीति की जोड़ी, शंकर-अहसान-लॉय का संगीत और यशराज फिल्म्स का बैनर भी इसे लड़खड़ाने से नहीं रोक सका। किसिंग किंग इमरान हाशमी ने अपनी किसिंग इमेज से निकल कर आवारापन के रूप में कुछ नया करने की कोशिश की मगर दर्शकों को उनका यह नया रूप रास ना आया और आवारापन आवारा हवा बन कर उड़ गयी।


महात्मा गांधी और उनके बड़े बेटे हरिलाल गांधी के संबंधों की खटास पर आधारित फिल्म गांधी माई फादर को भी दर्शकों ने स्वीकार नहीं किया। हालांकि फिल्म में गांधी का किरदार निभा रहे कांति गांधी और हरिलाल की भूमिका में अक्षय खन्ना के अभिनय को काफी सराहना मिली मगर कमंजोर निर्देशन के कारण फिल्म फ्लॉप साबित हुई।
इस साल का उत्तरार्द्ध फिल्मी कारोबार की दृष्टि से अच्छा रहा। अक्षय कुमार, विद्या बालन और फरदीन खान अभिनीत हे बेबी ने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। इस फिल्म के टाइटल सांग पर आज भी लोग जम कर झूमते हैं। हालांकि इसे हॉलीवुड फिल्म ए बेबी एण्ड थ्री मेन की नकल होने का आरोप भी झेलना पडा। इन सबके बावजूद यह फिल्म सुपरहिट साबित हुई। साल की सबसे ज्यादा डिमांडिंग फिल्म रामगोपाल वर्मा की आग अपनी ही आग में झुलस कर रह गयी। शोले की रीमेक बनाते बनाते रामगोपाल वर्मा ने इस फिल्म के साथ इतने ज्यादा प्रयोग कर डाले कि फाइनल प्रोडक्ट दर्शकों की समझ के पार चला गया। गब्बर के रूप में अमिताभ बच्चन और अमिताभ के रूप में नवोदित कलाकार प्रशान्त राज को दर्शक स्वीकार नहीं कर सके। जय-वीरू की उस सुपरहिट जोड़ी को राज-हीरू की यह नई जोड़ी कोई टक्कर नहीं दे सकी।

कुछ ऐसा ही हाल रहा यशराज फिल्म के बेनर तले बनी महत्वाकांक्षी फिल्म लागा चुनरी में दाग का। इस फिल्म से निर्माता-निर्देशकों को ही नहीं बल्कि दर्र्शकों और आलोचकों को भी बहुत उम्मीदें थी मगर वास्तविकता यही है कि लागा चुनरी में दाग को लोग स्वीकार नहीं कर सके। रानी मुखर्जी की एक और बेहतरीन अदाकारी से भरपूर इस फिल्म की कहानी शायद लोगों के जंज्बात को छू नहीं सकी। वैसे इस फिल्म को किसी भी दृष्टि से कमंजोर नहीं कहा जा सकता है। कोंकणा सेन, अभिशेक बच्चन और कुणाल कपूर की अदाकारी भी ंकाबिले तारीफ है, मगर दर्र्शकों के मूड का कोई भरोसा नहीं, इस फिल्म की असफलता यही साबित करती है। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि विषय या कान्सेप्ट चाहे कुछ भी हो, किसी फिल्म का भविष्य उसके दर्शक ही तय कर सकते हैं। साल भर आबाद यह फिल्मी सफर अन्त में यही कहता है पिक्चर अभी बाकी है।


ब्लॉक बस्ट्र्स का कमाल
पर्दे पर पहली बार गोविन्दा के पार्टनर बनकर आए सलमान खान ने साल की पहली ब्लॉकबस्टर दी। पार्टनर में दर्शकों को कॉमेडी, धमाकेदार संगीत और बेहतरीन अदाकारी का संगम देखने को मिला। गोविन्दा और डेविड धवन की जोड़ी तो हमेशा से हिट रही है, इसमें सलमान का स्टाइल और कैटरीना कैफ की मोहक अदा के शामिल हो जाने से फिल्म पर हुआ असर सामने है। यह सुपरहिट ब्लॉकबस्टर पार्टनर आज भी कई सिनेमाघरों में भीड़ जुटाने में सक्षम है। साल की दूसरी ब्लॉकबस्टर रही भारत के राष्ट्रीय खेल पर आधारित फिल्म चक दे इण्डिया। इसमें कोई शक नहीं कि क्रिकेट से भारतीयों को प्यार है मगर चक दे इण्डिया ने इस प्यार पर क्रिकेट के एक मात्र कब्जे को बांटकर रख दिया है। निर्देशक शिमित अमीन और निर्माता आदित्य चोपड़ा की इस बेमिसाल पेशकश ने सभी देशवासियों को चक दे इण्डिया करने पर मंजबूर कर दिया। कबीर खान के रूप में शाहरूख खान ने पहली बार सुपर स्टार का चोला उतार हॉकी कोच का दामन ओढ़ा और बेशक इस किरदार के साथ पूरा इंसाफ भी किया। भारतीय महिला हॉकी टीम के विश्व कप जीतने की इस रोमांचक कहानी में देश प्रेम और हॉकी प्रेम का जज्बा प्रत्येक भारतीय में जगाया, जिसकी जीती जागती मिसाल है हर खेल में लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रही इण्डियन टीम। यकीनन चक दे इण्डिया की पूरी टीम प्रशंसा की हकदार है।

कुछ सुपरहिट फिल्में
भूत-प्रेत पर भरोसा हो या ना हो, अलौकिक शक्तियों पर आधारित फिल्में लोगों को हमेशा पसंद आती हैं। भूल-भूलैया भी एक ऐसी ही सफलता है। मानसिक विकृति के एक रहस्यमयी रूप पर बनी इस फिल्म में सस्पेंस के साथ-साथ कॉमेडी भी है। प्रियदर्र्शन की इस फिल्म के साथ सभी कलाकारों ने न्याय किया है। अक्षय, शाइनी और विद्या बालन का अभिनय और प्रीतम के सुपरहिट संगीत ने भूल-भूलैया में दर्शकों को भटकने पर मंजबूर कर दिया। प्रेम कहानियां फिल्म निर्माताओं के लिए हमेषा से पसंदीदा विषय रही हैं। शाहिद-करीना की जब वी मेट भी प्रेम कहानी पर आधारित एक ऐसी ही फिल्म है जिसकी तांजातरीन प्रस्तुति ने इसे सुपरहिट फिल्म की श्रेणी में डाल दिया है। प्रेम कहानी होने के बावजूद इसकी सारी बातें अलग और नयी लगती हैं। यही कारण है कि जब वी मेट को सभी वर्ग की सराहना मिल रही है और यह आज भी सिनेमाघरों में भीड़ जुटा रही है।
साल की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर रही अत्यन्त महात्वाकांक्षी और बहुप्रतिक्षित फिल्म ओम शान्ति ओम। यह पूरी तरह से पैसा वसूल मसाला मिक्स फिल्म के रूप में सबके दिलों पर राज कर रही है। ओम शान्ति ओम कई दृष्टियों से साल की बेहतरीन फिल्म मानी जा सकती है। अदाकारी में शाहरूख खान, दीपिका पादुकोण, श्रेयस तलपडे अौर अर्जुन रामपाल का जवाब नहीं जबकि विशाल -शेखर के संगीत ने अपनी रिलीज से ही सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले। जावेद अख्तर के बोल आज हर किसी की ंजुबान पर हैं। डायरेक्टर फराह खान की दूसरी ही फिल्म ने सफलता के पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए , साथ ही शाहरूख का सिक्स पैक एब्स भी इस फिल्म का मुख्य आकर्षण बनी रही। भारतीय सिने इतिहास में पहली बार लगभग 32 कलाकार एक साथ, एक सेट पर, इसी फिल्म में देखने को मिले। पुनर्जन्म पर आधारित इस फिल्म ने यशराज फिल्म्स की पिछली सभी असफलताओं को बहुत पीछे छोड़ दिया।

नए कलाकारों का पहला फिल्मी सफर
यह वर्ष हिन्दी फिल्म जगत में इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि अपने समय के तीन बड़े सुपर स्टार्स के बच्चों ने पहली बार सुनहरे पर्दे पर अपनी कोशिश आजमाई। अपने अभिनय से सबको आकर्षित कर देने वाले कलाकार नसीरूद्दीन शाह के बेटे ईमाद शाह की पहली फिल्म दिल दोस्ती एट्सैट्रा ने इस साल सिनेमाघरों का रूख तो किया मगर दर्शकों ने इसे एक सुर में नकार दिया। अपने पिता की उम्दा अदाकारी के आगे ईमाद को दर्शकों की प्रशंसा नहीं मिल सकी। दूसरी तरफ ऋ षि कपूर के बेटे रणबीर कपूर और अनिल कपूर की बेटी सोनम कपूर की अति महत्वाकांक्षी फिल्म सांवरिया भी दर्शकों को रास नहीं आयी। संजय लीला भंसाली का निर्देशन, सलमान खान की उपस्थिति और माेंटी शर्मा के बेहतरीन संगीत के बावजूद सांवरिया दर्शकों का भी इकट्ठा करने में कामयाब नहीं हो सकी। रणबीर सोनम की जोड़ी को आलोचकाें की सराहना तो मिली मगर फिल्म ने सबको निराश ही किया।

आजा नच ले
इस वर्ष यशराज फिल्म्स की कुल पांच फिल्म रिलीज हुई और इनमें से दो को छोड़ दें तो शेष तीन ने बहुत अच्छा व्यवसाय किया। साल के अंत में 30 नवंबर को सिनेमाघर पहुंची माधुरी दीक्षित की फिल्म आजा नच ले। देवदास से फिल्मों को बाय बाय कह चुकी माधुरी दीक्षित की यह फिल्म कई मायनों में बालीवुड के लिए महत्वपूर्ण है। इंडियन फिल्म इंडस्ट्री में माधुरी के टक्कर की डांसर आज तक नहीं हुई और निकट भविष्य में इसकी कम ही गुंजाइश है। डांस की पृष्टभूमि पर बनी यह फिल्म बाक्स आफिस पर कुछ खास कमाल नहीं कर पाई मगर माधुरी के चाहने वालों से सिनेमाघर कभी खाली हाथ नहीं जा सकता। अगले कुछ दिनों तक यही हाल रहा तो आजा नच ले के साथ ताल मिलाने से सिनेप्रेमियों को कोई नहीं रोक सकता।

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1 टिप्पणी:

विचार ने कहा…

टाइम्स ऑफ़ इंडिया से हो क्या सब फिल्मों के नाम ले दिए पर साल की सबसे हित फ़िल्म तारे ज़मीं पर का नम तक नहीं लिया जैसे गुनाह हो