5/23/2008

लोककला से छेड़छाड़ घातक – दीपक चंद्राकर



कलाएं अपने स्वाभाविक क्रम से हर युग में अपना स्वरुप बदलती हैं और क्रमशः विकसित होती जाती है। इसलिए लोककला के विकास के लिए हमें अपने प्रयास लादने से बचना चाहिए- इन खुले विचारों के साथ लोककला की सेवा में निष्ठा से जुड़े एक मौलिक कलाकार हैं. दीपक चन्द्राकर जो लगभग बचपन से ही लोकनाट्य से जुड़े हैं। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वे कहते हैं- लोककला के मूलरूप से छेड़छाड़ घातक है। उसे जमाने के प्रवाह के साथ अपने-आप बदलने या विकसित होने देना चाहिए क्योंकि लोक कलाएं इसी तरह से विकसित हुई हैं। दुर्ग जिले के ग्राम अर्जुन्दा में जन्मे दीपक चन्द्राकर ने अपने पिता उजियारिसंह चंद्राकर की छत्रछाया में बढ़ते हुए कला एव सामाजिक के संस्कार ग्रहण किए और लोककला अभिनय की बारीकियों को अपने गुरु की देन रामहृदय तिवारी के सानिध्य में रहकर सीखा। वे कहते हैं- यह पिता एवं गुरु की देन है, आज उनमें मंचीय अनुशासन एवं समर्पण भरा है जिससे मुझमें आत्मविश्वास एवं मंचीय जिम्मेदारी का पूरा-पूरा अहसास है।

यूं तो ग्राम अरजुन्दा इन्हीं चंद्राकर परिवार के कारण सास्कृतिक संस्कारों से ओत-प्रोत है। उस पर दीपक चंद्राकर ने छत्तीसगढ़ी लोक सांस्कृतिक कला मंच ‘लोकरंग’ की स्थापना कर उसे पूरा संरक्षण भी दे रहे हैं और इसके निर्देशन पक्ष में वे सशक्त हस्ताक्षर के रुप में उभर रहे हैं। लोककला की जीवंतता विशेषकर समग्र प्रबंधन देखना हो तो ग्राम अर्जुन्दा आकर लोककला तीर्थ का पुण्य कमाया जा सकता है। दीपक चंद्राकर ने लोकरंग के कलाकारों के लिए आवास, रिहर्सल, प्रदर्शन के लिए यहाँ लगभग एक ग्रामीण अकादमी की संरचना की । वे बताते हैं- छत्तीसगढ़ी लोक सांस्कृतिक कला मंच ‘लोकरंग’ के माध्यम से छत्तीसगढ़ भर में तथा छत्तीसगढ़ से बाहर भी छत्तीसगढी संस्कृति, अस्मिता, स्वाभिमान, पर्व, परंपराएं, तीज-त्यौहार, नृत्यु, गीत-संगीत से परिपूर्ण अभिव्यक्ति देने के लिए प्रयासरत हैं। वे बताते हैं- सन 1992 से लेकर अब तक लोकरंग (अर्जुन्दा) के माध्यम से अब तक सौ से भी अधिक प्रदर्शन छत्तीसगढ़ तथा महाराष्ट्र, भोपाल अमेठी, दिल्ली में कर चुके हैं। लोकरंग के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत सोनहा बिहान, लोकरंजनी, लोरिक चंदा तथा हरेली ने काफी प्रसिद्धि पाई है। छत्तीसगढ़ में लोक कलाकार के रुप में सुस्थापित दीपक चन्द्रकार ने सन 1977 से 1982 तक प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी लोक सांस्कृतिक संस्था सोनहा बिहान में लोक कलाकार के रुप में सक्रिय भागीदारी निभाते हुए सन 1973 से अब तक लगभग 6 सौ प्रतिभाओं को लोक कलाकार एवं लोक नर्तक के रूप में प्रशिक्षित किया है और यह स्वयं में एक रिकॉर्ड है। लोककला के क्षेत्र में इतनी लंबी एवं सशक्त यात्रा के चलते दीपक चन्द्राकर ने सन 1984-85 में राष्ट्रीय विज्ञान मंड़ई (अंजोरा) में सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी निभाई है। यही वजह है कि सन 1996 में छत्तीसगढी लोककला महोत्सव भिलाई में दीपक चंद्राकर को लोककला के अभिनेता, नर्तक एवं निर्देशन तथा लोकरंग संस्था के सर्जक के रुप में सम्मानित होने का गौरव प्राप्त है। जो बिरले लोक कलाकारों को मिल पाता है। लोकनाट्य संस्था लोकरंग के माध्यम से दीपक चन्द्राकर ने छत्तीसगढ़ी गीतों के आडियो कैसेट भी तैयार किया है जो पर्रा भर लाई, लोकरंग के संग, रिमझिम, चिरइया तथा तेल हरदी शीर्षक से कैसेट समूचे छत्तीसगढ़ में धूम मचा रहे हैं।

दीपक चन्द्राकर ने लोकरंग के मंच से छत्तीसगढ़ के महिमा गीत, खड़े साज के गीत, सुवा, ददरिया, सोहर गीत, सावनाही गीत, श्रम गीत, आदि छत्तीसगढी गीतों को भी संयोजित किया है, जिन्हें पर्याप्त प्रसिद्धि मिली है। वे बताते हैं- लोकरंग में चालीस लोक कलाकारों का जत्था है, जिन्होंने नए छत्तीसगढ राज्य के अभ्युदय के समय पहली नवंबर 2000 को सराहनीय प्रदर्शन रायपुर दूरदर्शन के माध्यम से किया था। दीपक चंद्राकर छत्तीसगढ़ी फिल्मों का सैलाब आने के बावजूद किंचित भी चिंतित नहीं है, वे मानते है- छत्तीसगढ़ी लोककला का भविष्य बहुत ही उज्जवल है। शर्त केवल यही है फिल्में अपनी मिट्टी, अपनी जड़ों से पूरी आत्मीयता से जुड़ी रहें और अपनी ग्रामीण माटी की आकुल पुकार अनसुनी न करें।

दीपक चंद्राकर इन दिनों चर्चित लोक अमर प्रेमकथा- लोरिकचंदा पर फिल्म निर्माण की परियोजना पर काम कर रहे हैं। वे इसके निर्माता होंगे लक्ष्मण चंद्राकर के साथ, जबकि प्रेम साइमन की कहानी को बड़े परदे पर निर्देशित करने की जिम्मेदारी रामहृदय तिवारी पर है।
0आसिफ़ इकबाल
वरिष्ठ पत्रकार, रायपुर

1 टिप्पणी:

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

लोक कला के आधार स्तंभ दीपक भाई के संबंध में जानकारी देने के लिये धन्यवाद ।