9/10/2007

मैं सत्ता और पत्रकारिता की दोस्ती नहीं चाहता


-साक्षात्कार-


युवा पत्रकार एवं दैनिक हरिभूमि-रायपुर के स्थानीय संपादक संजय द्विवेदी से चंदना घटक की बातचीत




संजय द्विवेदी ने कम समय में ही पत्रकारिता के क्षेत्र में एक गंभीर राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषक के रूप में अपनी पहचान बना ली है। दैनिक भास्कर, स्वदेश, नवभारत, इन्फो इंडिया डॉट कॉम और हरिभूमि जैसे संस्थानों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य करते हुए पत्रकारिता के विविध संदर्भों पर पांच पुस्तकें प्रकाशित। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर में रीडर रह चुके श्री द्विवेदी संप्रति छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण हिन्दी दैनिक समाचार पत्र हरिभूमि के स्थानीय संपादक हैं। साथ ही इंडियन मीडिया कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में भी इनकी अलग पहचान है। प्रस्तुत है मीडिया के सामयिक संदर्भों पर उनसे खास बातचीत :-
प्रश्न : आपने लिखना कब शुरू किया और पत्रकारिता की ओर रूचि कैसे बनी?
उत्तर : मेरे पूज्य पिताजी डा। परमात्मानाथ द्विवेदी, हिंदी के प्राध्यापक हैं, सो घर में पढ़ने-पढ़ाने का रूझान था। साहित्य में मेरी गति बहुत नहीं है किंतु इन्हीं संस्कारों के नाते पत्रकारिता में जरूर आ गया। अब आ गया तो कोशिश है कि पत्रकारिता में आम आदमी की आवाज बनकर काम करूं। उन मूल्यों के साथ जीने की कोशिश करूं जो आज बहुत प्रासंगिक तो नहीं रहे लेकिन मनुष्य की मुक्ति के लिए जरूरी हैं।


प्रश्न: राजनीति और पत्रकारिता के रिश्तों पर आप क्या सोचते हैं?
उत्तर: एक लोकतांत्रिक समाज में रहते हुए राजनीति को छोड़कर चल या सोच पाना कठिन है। बावजूद इसके मैं पत्रकारिता और सत्ता की दोस्ती के पक्ष में नहीं हूं। सत्ता के साथ पत्रकारिता का रिश्ता आलोचनात्मक विमर्श का होना चाहिए। पत्रकारिता एक सामाजिक दंडशक्ति के रूप में काम करे, यही सपना पत्रकारिता के महानायकों ने देखा था। हमारी पीढ़ी इस सपने के साथ बहुत न्याय नहीं कर पा रही है। इसके कई कारण हैं जिनकी व्याख्या समय-समय पर होती रहती है।


प्रश्न : पत्रकारिता में आज संपादक का वह महत्व नहीं रहा, वह अपनी शक्ति खोता जा रहा है?
उत्तर: हर समय अपने नायक तलाशता है। अब शायद हमारे लिए विष्णुराव पराड़कर, माधवराव सप्रे, गणेशशंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी जैसे संपादकों की जरूरत नहीं है। सो वे हमारे पास नहीं हैं। पर आजादी के बहुत बाद के दौर में भी हमने राजेन्द्र माथुर, धर्मवीर भारती,गिरिलाल जैन, अरूण शौरी,शामलाल, अज्ञेय, रघुवीर सहाय, कमलेश्वर,राहुल बारपुते, प्रभाष जोशी, विनोद मेहता जैसे तमाम संपादकों को पाया। इसलिए मैं बहुत निराश नहीं हूं। देश को जब भी नायकों की जरूरत होगी, वह हर क्षेत्र से अपने नायक तलाश लेगा। राजनीति भी नेहरूजी, शास्त्री जी के बिना चल रही है, सो पत्रकारिता में भी कुछ बौनापन आया है। समाज जीवन के हर क्षेत्र की तरह पत्रकारिता में भी थोड़ी गिरावट आयी है। वह गिरावट भी प्रसार,कटेंट,विचार, समाचार के स्तर और प्रस्तुतिकरण में नहीं, मूल्यों के स्तर पर ज्यादा है।


प्रश्न : आज देश के किन संपादकों को आप आशा से देखते हैं?
उत्तर : देखिए, नाम गिनाना तो बहुत मुश्किल में डालता है और विवाद में भी। सूची कैसी भी बने वह अधूरी रह जाती है। आज की पत्रकारिता मुंबई ,दिल्ली या कलकत्ता केंद्रित नहीं रही, उसका छोटे-छोटे केंद्रों में विस्तार हुआ है। इन बेहद छोटे स्थानों से बहुत महत्वपूर्ण अखबार निकल रहे हैं। जिनकी चर्चा प्राय: नहीं होती। इसी तरह हिंदी,अंग्रेजी के अलावा क्षेत्रीय भाषाओं की पत्रकारिता में भारी प्रसार संख्या वाले महत्वपूर्ण अखबार निकल रहे हैं। ये अखबार तकनीक, प्रभाव, खबरों और अपनी प्रस्तुति के लिहाज से हिदी और अंग्रेजी के तमाम अखबारों पर भारी पड़ते हैं। इनके संपादकों का अपने क्षेत्र में व्यापक प्रभाव और सामाजिक प्रतिष्ठा है। रांची का प्रभात खबर, भोपाल का दैनिक भास्कर, राजस्थान का राजस्थान पत्रिका, कानपुर का दैनिक जागरण, आगरा का अमर उजाला आज हिंदी क्षेत्र में एक क्रांति के प्रतीक हैं। बहुत छोटे स्थानों से निकले ये अखबार आज भारत जैसे महादेश को अपनी भाषा में ही संबोधित कर रहे हैं।


प्रश्न : प्रिंट मीडिया पर इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रभाव को आप किस तरह महसूस करते हैं?
उत्तर -प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में कथ्य के स्तर पर एक समय में भारी अंतर दिखता था। लेकिन आत्मविश्वास से हीन संपादक अब इलेक्ट्रानिक मीडिया से होड लेने पर आमादा हैं। प्रिंट मीडिया जो पहले अपने दैहिक विमर्शों के लिए ''प्लेबाय'' या ''डेबोनियर'' तक सीमित था। अब दैनिक अखबारों से लेकर हर पत्र पत्रिका में अपनी जगह बना चुका है। अखबारों में ग्लैमर वर्ल्ड के कालम ही नहीं, खबरों के पृष्ठों पर भी लगभग निर्वसन विषकन्याओं का कैटवॉग खासी जगह घेर रहा है। यह पूरा हल्लाबोल चौबीस घंटे के चैनलों के कोलाहल और सुबह के अखबारों के माध्यम से दैनिक होकर जिंदगी में अपनी जगह बना चुका है।


प्रश्न : इस पूरे परिदृश्य का सामाजिक जीवन पर क्या प्रभाव पड रहा है?
उत्तर -मुझे लगता है कि इस पूरे बाजारवादी षडयंत्र के केंद्र में भारतीय स्त्री है। इन शक्तियों का उद्देश्य भारतीय स्त्री की शुचिता का अपहरण है। सेक्स सांस्कृतिक विनिमय की पहली सीढ़ी है। शायद इसीलिए जब कोई भी हमलावर किसी भी जातीय अस्मिता पर हमला बोलता है तो निशाने पर सबसे पहले उसकी औरतें होती हैं। यह बाजारवाद अब भारतीय अस्मिता के अपहरण में लगा हुआ है। निशाना भारतीय औरतें हैं। भारतीय स्त्री के सौंदर्य पर विश्व का अचानक मुग्ध हो जाना, देश में मिस यूनिवर्स, मिस वर्ल्ड की कतार लग जाना, खतरे का ही संकेतक था। हम उस षडयंत्र को भांप नहीं पाये। अमरीकी बाजार का यह अश्वमेघ हमारी अस्मिता का अपहरण कर ले गया। इसके सामाजिक प्रभाव यह हैं कि इतिहास की इस घड़ी में हमारे पास साइबर कैफे हैं, जो इलेक्ट्रानिक चकलाघरों में तब्दील हो गये हैं। हमारे बेटे-बेटियां यहां अपने साइबर फ्रैंड्स से चर्चाओं में मशगूल हैं। कण्डोम के रास्ते गुजरकर आता हुआ प्रेम है। अब सुंदरता परिधानों में नहीं उन्हें उतारने में है। कुछ साल पहले स्त्री को सबके सामने छूते समय हाथकांपते थे अब उसे चूमे बिना बात नहीं बनती। कलंक अब पब्लिसिटी के काम आते हैं। जीवनशैली, लाइफ स्टाइल में बदल गई है। मेगा माल्स, ऊंची-ऊंची इमारतें, डिजाईनर कपड़ों के विशाल शो-रूम, रातभर चलने वाली मादक पार्टियां और बल्लियों उछलता नशीला उत्साह। यह वर्तमान का चेहरा है। इससे विद्रूप अगर कुछ हो सकता है तो वह भी सामने आएगा। इस दुनिया को ऐसा बनाने में हम सब भी शामिल हैं, ऐसा ना चाहते हुए भी।
प्रश्न : आपके विश्लेषण के मुताबिक तो चित्र बहुत भयावह है फिर मीडिया की प्राथमिकताएं बदलती क्यों नहीं?
उत्तर -मीडिया अब किसी सामाजिक उत्तरदायित्व के दबाव में नहीं बल्कि बाजार के दबाव में हैं। यही कारण है कि महानगरों में लोगों की सेक्स हैबिट्स को लेकर भी मुद्रित माध्यमों में सर्वेक्षण छापने की होड़ है। वे छापते हैं 8 0 प्रतिशत महिलाएं शादी के पूर्व सेक्स के लिए सहमत हैं। दरअसल यह छापा गया सबसे बड़ा झूठ है। ये पत्र-पत्रिकाओं के व्यापार और पूंजी गांठने का एक नापाक गठजोड़ और तंत्र है। सेक्स को बार-बार कवर स्टोरी का विषय बनाकर ये उसे रोजमर्रा की चीज बना देना चाहते हैं। इस षडयंत्र में शामिल मीडिया बाजार की बाधाएं हटा रहा है। फिल्मों की जो गंदगी कही जाती थी वह शायद उतना नुकसान न कर पाए जैसा धमाल इन दिनों मुद्रित माध्यम मचा रहे हैं। कामोत्तेजक वातावरण को बनाने और बेचने की यह होड़ कम होती नहीं दिखती। मीडिया का हर माध्यम एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में है। यह होड़ है नंगई की। उसका विमर्श है - देह। 'जहर', 'मर्डर,' 'कलियुग', 'गेंगस्टर', 'ख्वाहिश', 'जिस्म' जैसी तमाम फिल्मों ने बाजार में एक नई हिंदुस्तानी औरत उतार दी है। जिसे देखकर समाज चमत्कृत है। कपडे उतारने पर आमादा इस स्त्री के दर्शन ने मीडिया प्रबंधकों के आत्मविश्वास को हिलाकर रख दिया है। एड्स की बीमारी ने पूंजी के ताकतों के लक्ष्य संधान को और आसान कर दिया है। अब सवाल रिश्तों की शुचिता का नहीं, विश्वास का नहीं, साथी से वफादारी का नहीं - कंडोम का है। कंडोम ने असुरक्षित यौन के खतरे को एक ऐसे खतरनाक विमर्श में बदल दिया है, जहां व्यवसायिकता की हदें शुरू हो जाती हैं। अब इस मीडिया को कैसे और कितना संभाला जा सकता है इसका उत्तर तो समाज ही तलाशेगा।


प्रश्न : आपकी नजर में इस समय मीडिया में सबसे लोकप्रिय विमर्श क्या है?
उत्तर -औरत की देह इस समय मीडिया का सबसे लोकप्रिय विमर्श है। सेक्स और मीडिया के समन्वय से जो अर्थशास्त्र बनता है उसने सारे मूल्यों को शीर्षासन करवा दिया है। शायद इसीलिए इंटरनेट के माध्यम से चलने वाला ग्लोबल सेक्स बाजार करीब 6 0 अरब डॉलर तक जा पहुंचा है। मोबाइल के नए प्रयोगों ने इस कारोबार को शक्ति दी है। एक आंकडे क़े मुताबिक मोबाइल पर अश्लीलता का कारोबार भी पांच सालों में 5 अरब डालर तक जा पहुंचेगा। इस पूरे वातावरण को इलेक्ट्रानिक टीवी चैनलों ने आंधी में बदल दिया है। प्रिंट मीडिया अब इससे होड़ ले रहा है। इंटरनेट ने सही रूप में अपने व्यापक लाभों के बावजूद सबसे ज्यादा फायदा सेक्स कारोबार को पहुंचाया। पूंजी की ताकतें सेक्सुएलिटी को पारदर्शी बनाने में जुटी हैं। मीडिया इसमें उनका सहयोगी बना है। अश्लीलता और सेक्स के कारोबार को मीडिया किस तरह ग्लोबल बना रहा है इसका उदाहरण पिछले दिनों हुआ विश्वकप फुटबाल है। मीडिया रिपोर्ट्स से ही हमें पता चला कि जर्मनी के तमाम वेश्यालय इसके लिए तैयार हैं और दुनिया भर से वेश्याएं वहां पहुंच रही हैं। कुछ विज्ञापन विश्व कप के इस पूरे उत्साह को इस तरह व्यक्त करते हैं 'मैच के लिए नहीं, मौज के लिए आइए'। जाहिर है मीडिया ने हर मामले को ग्लोबल बना दिया है। हमारे 'गोपन विमर्शों' को 'ओपन' करने में मीडिया का एक खास रोल है। शायद इसीलिए मीडिया के कंधों पर सवार यह सेक्स कारोबार तेजी से ग्लोबल हो रहा है।


प्रश्न : मीडिया की इतनी प्रभावकारी भूमिका के बावजूद उसके व्यापक दुरूपयोग की ओर आपने इशारा किया, क्या इस माध्यम पर नैतिक नियंत्रण नहीं लगाये जा सकते?
उत्तर -पिछले कुछ समय में जिस तरह मीडिया का सर्वव्यापी और सर्वग्रासी विस्तार हुआ है उससे समाज और मानस स्तंभित है। सर्वव्यापी शब्द पर जिस तरह प्रसन्नता के भाव उपजेंगे उसी तरह सर्वग्रासी शब्द पर चिंता की लकीरें भी उठना स्वाभाविक है। लेकिन इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि इधर कुछ वर्षों में मीडिया ने हमारे जीवन को काफी हद तक प्रभावित किया है। हमारा चिंतन, हमारा रहन-सहन, हमारे विचार, हमारी संस्कृति यहां तक कि हमारी निहायत व्यक्तिगत जिंदगी को भी मीडिया ने बदलने की भरपूर कोशिश की है। बहुत हद तक मीडिया इसमें सफल भी रहा है। पहले मीडिया की भूमिका सूचनाओं और समाचारों के संप्रेषण मात्र में हुआ करती थी। साथ ही ज्ञान का प्रसार करना और समाज को मनोरंजन प्रदान करना भी मीडिया के दायित्वों में शुमार था। आज स्थिति इससे बिल्कुल अलग है। आज मीडिया सूचनाओं और समाचारों के संप्रेषण तक सीमित नहीं है। मीडिया उनका भागीदार भी है और कारक भी। प्रतिस्पर्धा के इस दौर में उसके जनक बनने की भी संभावना पर्याप्त नजर आती है। मीडिया सिर्फ ज्ञान के प्रसार तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ज्ञान की खोज और ज्ञान के भंडार के रूप में भी मीडिया आज हमारे सामने है। मनोरंजन का तो पूरा उद्योग ही मीडिया के जरिए स्थापित है, जिसे आज सिर्फ मन बहलाने का शगल मानकर दरकिनार नहीं किया जा सकता। इस माध्यम में सबकुछ बुरा-बुरा ही है, ऐसा कहना ठीक नहीं। बावजूद इसके मुख्यधारा का मीडिया निश्चय ही सामाजिक उत्तरदायित्व को भूल रहा है। शायद इसी के चलते उसकी आलोचना का स्वर इतना तीखा है। आलोचना उसी की होती है जिससे उम्मीद होती है। आज जबकि भारत जैसे देश में हम तीनों संवैधानिक तंत्रों से निराश हो चले हैं तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया से हमारी अपेक्षाएं बहुत बढ़ गई हैं। वह भी जब अपेक्षाओं को पूरा करता नहीं दिखता या अपने सामाजिक उत्तरदायित्व से विमुख होता है तो आलोचना स्वाभाविक है।

प्रश्न : आज की नई पत्रकार पीढ़ी के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
उत्तर- मैं अभी संदेश देने की स्थिति में नहीं हूं पर इतना कहना चाहता हूं कि हमारे दायित्वों का खाता अभी भरा नहीं है। मूल्यों की बात बहुत दूर लगने लगी है। हमारा वर्चस्व और सामाजिक सम्मान तो बढ़ा है लेकिन हम अपने दायित्व बोध से पीछे हटे हैं। जाहिर है ऐसे में पत्रकारिता एवं पत्रकारों के प्रति जनता की राय बिगड़ते देर नहीं लगेगी। आज हमें अगर लोग बहुत उम्मीदों से देखते हैं तो हमें भी उनकी उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए बेचैन होना और दिखना चाहिए। तकनीकी और बाजार के अपने मूल्य हैं लेकिन उसने हमें अपार अवसर भी उपलब्ध कराए हैं। सूचनाओं के इतने मंच और इतने फोरम हैं कि कोई भी खबर अब दबाई या छिपाई नहीं जा सकती। बावजूद इसके बहुत सारी खबरें लोगों तक नहीं पहुंच पाती। निश्चय ही यह हमारी पीढ़ी की काहिली और एक नाजायज किस्म का ओढ़ा हुआ दबाव है जिससे मुक्त होना ही होगा। संवाद की दुनिया में प्रिंट, इलेक्ट्रानिक, इंटरनेट और इंटरनेट पर भी ब्लॉग्स के माध्यम से सूचना का लोकतंत्र आ रहा है। सवाल यह है कि क्या हम इन साधनों का इस्तेमाल कर आखिरी आदमी के चेहरे पर खुशी लाना चाहते हैं?

1 टिप्पणी:

आशीष ने कहा…

हमारे जेसे युवा पत्रकारों के लिए यह इन्टरव्यू काफी काम का हैं