4/08/2006

कला प्रसंग


।। बस्तर की धड़वा कला ।।

- डॉ. श्रीमती रेखा श्रीवास्तव

हिन्दुस्तान के हृदय में स्थित छत्तीसगढ़ (पूर्व म.प्र.) का पूर्वांचल भाग बस्तर ऐतिहासिक दृष्टिकोण से सदियों से महत्वपूर्ण रहा है । आदिमानव के प्रारंभिक विकास से लेकर अर्वाचीन काल तक बस्तर अनेक राजवंशों के उत्थान और पतन से संबंधित घटनाक्रम को आत्मसात किया है । पीढ़ी दर पीढ़ी विकास के साथ बहते हुए घड़वा कला वर्तमान कला के स्तर पर अपनी अभिव्यक्ति पा सकी है । उसका श्रेय घड़वा कला से संबंधित उन शिल्पियों को है जिन्होंने अपने अथक परिश्रम से इसे आकार प्रदान किया है ।

घड़वा शिल्प कला को ढोकरा ढलाई की कला के नाम से भी जाना जाता है । घड़वा कला की शैली न्यूनाधिक वैसी ही है जैसी लास्ट वैक्स प्रोसेस से शिल्प निर्माण की होती है । जो बंगाल उड़ीसा आंध्र अथवा मध्य प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में प्रचलित है । अंतर केवल इतना है कि इस क्षेत्र के लोग ढलाई के समय धातु को गलाने के लिए अथवा मोम की तैयारी के लिए कुछ कार्यों को क्षेत्रीय सुविधा के अनुसार करते है । यहां केवल मधुमक्खी के मोम का प्रयोग किया जाता है । इसी तरह धातु की गंदगी दूर करने के लिए या ढलाई में रुकावट न आने के लिए नमक का प्रयोग करते हैं । यह सब शिल्पियों का स्वयं का प्रयोग है । आश्चर्य की बात तो यह है कि घड़वा कला सम्पूर्णतः शिल्पियों के सिघ्द हस्त तथा उनकी दक्षता, कौशलता और सृजनात्मकता पर निर्भर करती है।
बस्तर के घड़वा जाति का शिल्पी अपनी परम्परागत इस शैली से शिल्प निर्माण में आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल बहुत कम करता है । जहां कहीं हमें इस प्रकार के उदाहरण मिले है सिर्फ धौकनी के स्थान पर ब्लोअर का उपयोग करते पाये गये. ये शिल्पी ढलाई की प्रक्रिया के समय धातु का पिघलना और भट्टी के तापमान का अंदाजा किसी आधुनिक उपकरण से नहीं लगाता बल्कि धातु पात्र के पास से आग की लपटों के बदलते रंग से लगा लेता है । यह सम्पूर्ण प्रक्रिया शिल्पी की दक्षता और कुशलता पर निर्भर करती है ।

तकनीक की दृष्टि से विश्लेषण किया जाय तो यह अनुभव होता है कि यह प्रक्रिया न सिर्फ अत्यंत श्रमसाध्य है, बल्कि समय साध्य भी है। एक शिल्प के निर्माण में कम से कम 15 दिनों की आवश्यकता होती है, साथ ही इस कार्य हेतु कम से कम दो व्यक्तियों की आवश्यकता होती है । घड़वा शिल्पियों के मतानुसार शिल्प निर्माण का कार्य स्त्रियों के लिए वर्जित माना गया है । स्त्रियां इस कार्य की पूर्व तैयारी एवं अन्य आवश्यक कार्यो में सहयोग अवश्य देती हैं, जैसे जंगल से लकडी लाना, शिल्प निर्माण हेतु मिट्टी तैयार करना, मोम छानना इत्यादि ।

बस्तर के ये घड़वा शिल्पी अपनी सहज सरल और स्वाभाविक अभिव्यक्तियों को मूर्त रूप में अपने शिल्पों में आकार प्रदान करते हैं । इन शिल्पों की रचना प्रक्रिया , अभिव्यक्ति के प्रतिमानों को रचने गढ़ने अथवा निर्धारण में सांस्कृतिक , सामाजिक, रचनात्मक, और कलात्मक परिस्थितियां प्रभावित करती हैं । अत: ढोकरा शिल्पों पर क्षेत्रीय रहन सहन, रीति रिवाज और अलंकरणों का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है । इन शिल्पों के विषय भी दैनिक जीवन की घटनाओं , धार्मिक आस्थाओं , रीतिरिवाज और परम्पराओं से उठाए जाते हैं । ढोकरा शिल्प, कला समाज के सामयिक परिवर्तनों के साथ-साथ बदलती एवं विकसित होती गई जिससे यह आज भी जीवंत है और अपनी अलग पहचान बनाए हुए है ।
ढोकरा शिल्पों में मानवाकृतियां तुलनात्मक दृष्टिकोण से कम मिलती हैं, जो शिल्प मानवाकृतियों के रूप में प्राप्त हैं उनमें अधिकांश स्थानीय देवी देवताओं के शिल्प है । इसके अतिरिक्त मारिया मुरिया के मूर्ति शीर्ष मिलते है जो कि सिर पर भैसों के सींग पहने हुए बनाए जाते हैं । इनके बनाए सभी आकृतियों में बस्तर का लोकस्वरूप स्पष्ट दिखाई देता है । अमूर्त भावनाओं के मूर्त अभिव्यक्ति के प्रतीक स्वरूप चेचक माता, राक्षस, बूढादेव, आदि आकारों के निर्माण में भी ये शिल्पी उतने ही सफल रहें हैं जितने अन्य शिल्पों में ।

बस्तर के ये घड़वा शिल्पी अपने परिसर के जानवरों शेर , हाथी, घोडे, हिरण, मोर , चिडिया, कछुआ, बैल आदि को मानवाकृतियों की तुलना में अधिक बनातें हैं। जानवरों की आकृतियों का अंकन दो स्वरूपों में मिलता है - पहला, स्वतंत्र जानवरों के शिल्पों के रूप में और दूसरा, वे मूर्तियां जिन पर किसी देवी-देवता या सवार को आरूढ़ बनाया जाता है । ऐसी दूसरे प्रकार की मूर्तियां देवी-देवता अथवा राजाओं की नैसर्गिक भव्यता लिए हुए होती हैं । इस प्रक्रार के शिल्पों में जानवरों की आकृति को सर्वाधिक अलंकृत बनाया जाता है. जबकि इस पर आरूढ मानवाकृति को स्थूल रूप में बनाया जाता है। जानवरों की आकृतियों को मानवाकृतियों की अपेक्षा अधिक स्वाभाविक व संतुलित बनाई जाती है ।

प्राचीन समय में जानवरों और मानवाकृतियों के अतिरिक्त धातु के पात्रों का निर्माण होता था लेकिन अब केवल आनुष्ठानिक पात्र मांग के आधार पर ही बनाए जाते हैं. इस तरह के शिल्पों में कंघियां और दीपक रचनात्मक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं. इनमें शिल्पी की कलात्मक एवं सृजनात्मकता का अद्भुत परिचय मिलता है । ये लोक शिल्पी अनपढ़ अथवा आर्थिक रूप से पिछडे भले ही हों किन्तु मौलिक सृजन की कसौटी पर अपना स्थान निश्चय ही बना चुके हैं । कुशल शिल्पियों में - जयदेव बघेल , सुखचंद घडवा , मानिक , संग्राम हलाल, नान्हेराम जैसे अनुभवी एवं दक्ष शिल्पी प्रथम पंक्ति में आते हैं । लोक एवं आदिम प्रभावों को लिए हुए ढोकरा शिल्प के उत्कृष्ट नमूने बस्तर के नारायणपुर एवं गढबेंगाल से प्राप्त होते हैं ।

घडवा शिल्पी जैसे-जैसे समकालीन शिल्पियों के साथ प्रदर्शिनियों में भाग लेने लगे हैं , वैसे वैसे वे अपने परम्परागत शिल्प कला शैली में नये-नये प्रयोग करने लगे हैं. कला से संबंधित प्रबुध्द वर्ग इन्हें नये-नये प्रयोग करने को प्रेरित एवं उत्साहित करते हैं. फिर भी यहां की धातु शिल्प कला ने इस क्षेत्र विशेष की कला को अक्षुण्ण बनाए रखा है. घडवा कला लोक कला का प्रतिरूप व प्रतीकात्मक रूप है. जो समयांतर के साथ परिवर्तित शिल्पों में भी दिखाई देता है. प्राचीन समय में निर्मित शिल्पों और वर्तमान के शिल्पों में अलंकरण में विशेष अंतर नही हैं केवल आकारों में परिवर्तन अवश्य हुआ है। तुलनात्मक दृष्टि से अब शिल्प बडे आकारों में बनने लगे हैं ।

घड़वा कला अपने सीमित साधनों , अभावों के बावजूद सतत गतिशील व जीवंत बनी हुई है , इसका मूल कारण लोक जीवन के धार्मिक विश्वास , जादू-टोना , सामाजिक एवं आर्थिक आधार हैं । अपने छोटे आकार , अलंकरण और लोक प्रतीकों से युक्त घड़वा शिल्प बस्तर से बाहर निकल कर राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय कला जगत में अपना स्थान निश्चय ही बना चुका है । घड़वा कला को उत्थान की ओर अग्रसर करने में सहायक प्रबुध्द वर्ग का एवं शासन सहयोग का जिक्र करना भी समीचीन होगा । इसमें जगदलपुर के श्री गुहा जी का उल्लेखनीय योगदान है, जिन्होनें 1962 से इस कला कर्म से संबंधित शिल्पियों को न केवल प्रोत्साहित किया वरन् उन्हें प्रशिक्षण प्रदान करने व उनके द्वारा निर्मित मूर्तियों के क्रय-विक्रय की समुचित व्यवस्था की. इसके साथ ही जगदलपुर में मृगनयनी एम्पोरियम की स्थापना भी की. श्री जगदीश तिवारी जिन्हें यहां के शिल्पी अपना सर्वदाता समझते हैं ने इनकी हर क्षेत्र से सहायता की और शासन का घ्यान इनकी ओर आकृष्ट किया. श्री निरंजन महावर ने इस क्षेत्र का सर्वेक्षण कर इनकी समस्याओं से, शिल्पों से और शिल्पियों से समकालीन कला से जुडी मुख्य संस्थाओं, परिषदों से परिचित करवाने का महत्वपूर्ण कार्य किया. जगदलपूर हस्तशिल्प विकास निगम भी इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. वह आदिवासियों को इस कला का प्रशिक्षण देता है, एवं शिल्पियों को कच्चा माल उपलब्ध करवाता है और तैयार शिल्पों को शासन द्वारा निर्धारित उचित मूल्य पर क्रय भी करता है । जो इन घडवा शिलिपयों के उत्थान में सहायक सिध्द हो रहा है. श्री जयदेव बघेल का इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान रहा । वे स्वयं की मेहनत लगन और परिश्रम से आज अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित कर चुके थे और इस शिल्प कर्म से संबंधित शिल्पियों के उत्थान में प्रयासरत रहे थे. इन्होंने पारम्परिक बस्तर शिल्पी परिवार की स्थापना भी की थी जिसे बाबा साहेब अम्बेडकर पुरस्कार प्राप्त हो चुका है ।

उपरोक्त सफलताओं के अतिरिक्त शासन को इनके प्रति और अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है । कुछ व्यक्ति विशेषों ने व्यक्तिगत लाभ हेतु इन भोले भाले शिल्पियों को व्यवसायिकता की ओर प्रेरित किया है जिनसे ये शिल्पी अपनी शैली में विक्रय की दृष्टि से परिवर्तन करने लगे हैं । वे अपनी परम्परागत आकारों, अलंकरणों को भूलते जा रहें हैं । जो भविष्य में इस कला शैली के लिए खतरनाक सिध्द हो सकता है । वर्तमान में घडवा शिल्प आकार, अलंकरण और लोक प्रतीकों से युक्त बस्तर से बाहर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय जगत में अपनी अभिव्यक्ति पाने में सफल हो चुका है ।

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(लेखिका को बस्तर के लोकधातु शिल्पों पर अध्ययन तथा शोध कार्य के फलस्वरूप डॉक्टरेट की उपाधि से नवाजा जा चुका है । यह महत्वपूर्ण आलेख अंतरजाल में हिन्दी अनुप्रयोग के जाने-माने विशेषज्ञ एवं साहित्यकार श्री रविशंकर श्रीवास्तव जी के सौजन्य से प्राप्त हुआ । हम उनका भी सृजन-सम्मान परिवार की ओर से आभार मानते हैं । संपादक )

1 टिप्पणी:

MAN KI BAAT ने कहा…

अच्छा लेख है। आज ऎसी रचनाओं की आवश्यकता है, महानगरों में रहने वाले बच्चे जिन्होंने कभी गांव ही नहीं देखे,वे ऎसी प्राचीन कला को जान तो पाएं ,जड़ों से जुड़ तो सकें चाहे इंटरनेट के ज़रिए ही सही।
प्रेमलता