4/16/2006

राजीव सारस्वत की दो रचनाएँ


जूझने का हौसला

हारिए अपनी मर्जी से
जीतिए आदत हो जैसे
ऐसा होता है कई बार
कोशिश करके भी बहुत हम नहीं हो पाते सफल
हमारा योग्‍य प्रतिद्वंद्वी प्रयास से पाता है मंजिल

हममें से अधिकांश नहीं होते तैय्यार
धैर्यपूर्वक पराजय को कर सकें स्‍वीकार
सीख लें यदि हम पराजय को सहज स्‍वीकारना
परिपक्‍व व्‍यक्तित्‍वों में तब होगी हमारी गणना

जीत हो या हार, जीवन में हर बार,
होती परिपक्‍ता की दरकार

अंत:शक्ति का विशाल स्रोत हमको दिलाता
असफलता को सहज स्‍वीकारने की क्षमता
फिर से जूझने का हौसला बढ़ाता
और अगली बार हमें विजेता बनाता




आदमी या मशीन : मशीन कि आदमी


आदमी बन गया है चलती फिरती मशीन
अपने ही बनाए यंत्रों के हो गया अधीन

आदमी अपने परिजनों मित्रों संबंधियों को
अब पत्र नहीं लिखता है
कभी कभार फोन करता है
ई-संदेश भेज देता है
या ससस का सहारा लेता है
आदमी हो गया है वक्‍त के अधीन
आदमी बन गया है चलती फिरती मशीन ।

आदमी गाना गुनगुनाना भूल गया है
अब वाद्य नहीं बजाता है
मोबाइल म्‍यूजिक, रिंगटोन सुनाता है
सीडी, कैसेट खरीद लेता है
या संगीत में करतब देखता है
आदमी हो गया है कुछ ज्‍यादा रंगीन
आदमी बन गया है चलती फिरती मशीन ।।
आदमी मिलना-जुलना छोड़ चुका है
ज्‍यादा बोलता – बतियाता नहीं है
खबरें, धारावाहिक देख लेता है
पत्र-पत्रिकाएं पलट लेता है
या खुद में रहता है मस्‍त-व्‍यस्‍त
आदमी हो गया है टीवी का शौकीन
आदमी बन गया है चलती फिरती मशीन ।।

आदमी हंसना–हंसाना भूल रहा है
ठहाके लगाता मुस्‍काता नहीं है
लाफ्टर चैलेंज को देखता है
और बनावटी हँसी हँसता है
क्‍या आदमी हो चला है ज्‍यादा गमगीन
सोचता हूँ मशीनों ने बनाया आदमी या आदमी ने बनाईं मशीन ।।

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(श्री राजीव सारस्वत मुंबई में रहते हैं । केन्द्रीय शासन में कर्मरत हैं । हिन्दी लघुपत्रिका आंदोलन से जुड़े हुए हैं । पिछले दिनों इन्हें सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ़ द्वारा राज्यपाल के हाथों लघुपत्रिका के संपादन कर्म के लिए संपादक श्री से अलंकृत किया गया । संपादक)

2 टिप्‍पणियां:

समीर लाल ने कहा…

बहुत बढियां, राजीव जी, बधाई.
समीर लाल

naresh saraswat ने कहा…

aadmi ya machine
a very realistic poem.
first i felt it is written about my life-style. later on i realised that this is the true situaation of the society.
especially in western country like uk every body is missing the life in everyday-life. this seem to be major mcause of depression etc here in uk.
this sort of poem inspires one to take some initiatives to bring some life in mechnical existence.
well done.