4/05/2006

सप्ताह के गीतकार

कबीरा

सबकी अपनी चाह कबीरा,
अपनी –अपनी राह कबीरा ।

ढाई आखर की बीतों की,
किसको है परवाह कबीरा ?

सबकी आँखें भीगी-भीगी,
अधरों पर है आह कबीरा ।

पीर बहुत है भीतर गहरी,
कैसे पाएं थाह कबीरा ?

कुएँ पर गाडर का रेला,
कौन करे आगाह कबीरा !

भीतर गहरी खामोशी है...
जैसे हो दरगाह कबीरा ।

सबके चेहरों पर आ बैठा,
थका हुआ उत्साह कबीरा ।

निर्धन होती मर्यादाएँ,
कैसे हो निर्वाह कबीरा ।

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तब की बातें


तब की बातें छोड़ो पाठक जी !
अब नेहों का मनुहार बिका करता है ।
खन-खन करते चांदी के टुकड़ों पर,
अब गोरी का सिंगार बिका करता है ।

हाँ ! गाँव-गाँव में राधा रानी है,
और गली-गली में कृष्ण कन्हाई भी ।
लेकिन पनघट पर रार नहीं होता,
अब कुंज, गली में प्यार बिका करता है ।

यह दुनिया एक बाज़ार-सरीखा है,
हर कोई अपना मोल किए बैठा है ।
अपने घर के ही दुश्मन के हाथों,
विश्वसनीय पहरेदार बिका करता है ।

सड़कों पर जैसे इंद्रधनुष चलता,
सतरंगे परिधानों के बादल-सा ।
वैभव के फूहड़ ताने-बाने में,
लिपटा सारा अभिसार बिका करता है ।

हाँ ! देवालय में देव विराजे हैं,
और भक्तों की भरमार दिखा करती है ।
लेकिन श्रद्धा से मुक्त पुजारी हैं,
अब तो सेवा-सत्कार बिका करता है ।
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गाँव

सबको देता ही रहा,
रोटी, पानी, छाँव ।
आज यही याचक बना,
फटेहाल है गाँव ।

बरगद, पीपल काटकर,
गाड़ दिए कुछ पोल ।
बिजली आकर खा गई,
चिड़ियों का किल्लोल।

गाँधी के आदर्श का,
ऐसा हुआ हिसाब ।
गाँव, गली-चौपाल में,
बिकने लगी शराब ।

संक्रामक होने लगा,
लोकतंत्र का रोग ।
जनता का धन खा गए,
जनता के ही लोग ।

मर्यादा मरने लगी,
निर्लज्ज है परिहास ।
बूढ़े-बच्चे बैठकर,
दिन भर खेलें ताश ।
अब तो अपनी धारणा,
बदले भी श्रीमान ।
ना तो अब वह गाँव हैं,
ना ही सरल किसान ।
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0अजय पाठक
लेन – 3, विनोबा नगर,
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

(अजय पाठक छत्तीसगढ़ शासन में वरिष्ठ अधिकारी हैं । इन्होंने ललित कलाओं पर पीएच.डी. की है । अब तक चार गीत संग्रह – यादों के सावन, महुए की डाली पर उतरा बसंत, जीवन एक धुंए का बादल और गीत गाना चाहता हूँ, प्रकाशित हो चुके हैं । इन दिनों 'दशमत' नामक उपन्यास के लेखन कार्य में संलग्न हैं । संपादक)

1 टिप्पणी:

rajeev saraswat ने कहा…

waah paathak ji waah, badhiyaa rachnnayen hain. Badhai.