5/20/2006

साहित्य के एकांगी प्रवक्ता और उत्सुक पीढ़ी का असमंजस

आलेख

साहित्य के एकांगी प्रवक्ता और उत्सुक पीढ़ी का असमंजस

*विजय कुमार देव

आज असमंजस में वे हैं जो साहित्य को जानना चाहते हैं, जिन्होंने जान लिया उनकी मान्यताएं भी रुढ़ और दृढ़-सी हो गई हैं । साहित्य क्या है ? इस पर बहुत कुछ, लिखा कहा गया है ।

‘कविता क्या है ?’ निबंध में आचार्य रामचंद्र शुक्ल बहुत गहराई तक विवेचन करते हैं। हमारे यहां काव्य को ही साहित्य कहा गया है। मोटे तौर पर इसी मान्यता के आसपास जब साहित्य-जगत में प्रवेश के लिए उत्सुक पीढ़ी अपने समय के लेखकों के पास जाती है और यह सवाल पूछती है कि परिवर्तन के साथ साहित्य के मापदंड भी बदलते हैं या नहीं ? बदलते हैं, तो आज साहित्य की कोई प्रतिनिधि या लगभग आदर्श परिभाषा उसके पास होनी चाहिये ।

हमारे अग्रज आखिरकार हमें फिर संस्कृत आचार्यो की साहित्य के बारे में दी गई मान्यताओं के पास ले जाते हैं जहां पर कोई शब्द को काव्य कहते हैं, कोई अर्थ को और कोई आनंद देने वाली कृति को । जब अपने समय के लेखकों की मान्यताओं का वह परीक्षण करती है तो पाती है कि स्थिति बहुत आगे नहीं है । जैसे संस्कृत आचार्य एक छोर पकड़कर कह रहे थे, प्रकारान्तर से चालाकी से ये भी वही कह रहे हैं । पूरा सच कोई भी नहीं बता पा रहा है । सब आपस में टकरा रहे हैं । भटकन यहीं से शुरू होती है और उत्सुक पीढ़ी पाश्चात्य शास्त्र अध्ययन की ओर उन्मुख होती है ।

वहाँ उसे पता चलता है कि जो कुछ अंश तक उन्हें परोसा गया उसमें आधा संस्कृत आचार्य का और आधा पाश्चात्य से उधार लिया हुआ था । पाश्चात्य शास्त्र भी उसे पूरा सच नहीं बता पाते । वहां कोई कला, कला के लिए या कला जीवन के लिए जैसे द्वन्द्व में हैं । अपने देश, काल के संदर्भ में साहित्य के प्रसंग में उसकी समस्या का मौलिक समाधान उसे नहीं मिल पाता । इस स्थिति का जानकार होने के बाद उसे लगने लगता है कि जैसे हमारे अग्रज कभी कला, सौंदर्य, आधुनिकता, वैज्ञानिकता, प्रकृति, ईश्वर, प्रगतिशीलता, भौतिकता में से किसी एक को पकड़कर जीवन की अभिव्यक्ति का कमाल करते रहे हैं, तो किसी एक को उन्हें भी अब पकड़ लेना चाहिए । शायद इसी से साहित्य का सच सामने आ जाए । अंततः एक स्थिति में यह पीढ़ी भी किश्त-दर-किश्त उसी जड़ता की गुहा में प्रविष्ट करती हुई एक समय पर साहित्य की एकांगी प्रवक्ता हो जाती है ।

आखिर पूरा सच क्या है ? इस सच को कौन रचता है ? इसकी परिधि क्या है, आयाम क्या है ? इस प्रश्न का समुचित उत्तर जाने बिना न तो साहित्य का सच प्रकट होता है, न साहित्य की आलोचना का । विद्वानों से क्षमा सहित मुझे यह कहना है कि उत्सुकजनों के सामने साहित्य के नाम पर पहले पाठ्यक्रम आते हैं फिर आता है बाज़ार ! जो कुछ हासिल होता है उसमें एक तो चिकने पृष्ठों पर सस्ती फिसलन भरी कृतियां जो मनोरंजन करती हैं, मनोरंजन साहित्य की एकक विशेषता हो सकती है लेकिन सिर्फ मनोरंजन साहित्य की एक विशेषता हो सकती है लेकिन सिर्फ मनोरंजन साहित्य नहीं हो सकता । इसके सर्वाधिक पाठक मिलते हैं, यानी सिर्फ पाठक संख्या भी साहित्य की कसौटी नहीं हो सकती । इससे ऊबा हुआ वर्ग उन लेखकों की किताबों के पास पहुंचता है, जो शिष्ट ढंग से आनंदित करती हैं, एक तरह से उनमें पाठक का मन रमता है लेकिन सिर्फ तात्कालिक आनंद के उसमें स्थायी उपलब्धि नहीं होती ।

क्या कोरा आनंद साहित्य है ? पाठक फिर यथास्थिति के वर्णन वाली पत्रकारिता की विधा के आसपास लिखी किताबें ढूंढ़ता है, लेकिन यहाँ सिर्फ यथास्थिति का वर्णन मिलता है और सिर्फ यथास्थिति का रूप भी साहित्य नही है। चिंतन और विचार की तलाश में पाठक कुछ भारी किताबें उठाता है और उसमें सिर्फ एक खास विचार का प्रतिपादन दृष्टिगोचर होता है । इन सबमें किसी में भाषा का किसी में कथ्य का और किसी में शिल्प का प्रभाव मिलता है ।

मित्रों, इतनी लंबी यात्रा में एक जिंदगी कम पड़ती है । थका हुआ पाठक तब भी यह निष्कर्ष नहीं निकाल पाता कि साहित्य क्या है ? क्या मनोरंजन, आनंद, यथास्थिति चित्रण, विचार या भाषा, कथ्य, शिल्प में से किसी एक की उपस्थिति भी साहित्य हो सकता है ? क्या जीवन को सिर्फ मनुष्य के संदर्भ में ही स्वीकार किया जाएगा ? यहीं से साहित्य में दार्शनिक जिज्ञासाओं का जन्म होता है और किसी विचार को जन्म लेने में एक शताब्दी भी कम पड़ जाती है । तो मित्रों, जब मनुष्य अपने में पूर्ण नहीं है तो साहित्य कैसे पूर्णता को प्राप्त कर सकता है लेकिन लगभग आदर्श या प्रतिनिधि मान्यता का अभाव मौलिक चिन्तन की दरिद्रता का परिचायक है।

साहित्य के विधायक त्तवों की अनुपस्थिति वाला तथाकथित साहित्य दीर्घकालीन नहीं हो सकता । यदि साहित्य में विचार आवश्यक है तो उसकी एक लय भी जरूरी है जिसमें उसे गुना-बूना जा सके । त्याज्य का यदि खंडन आवश्यक है तो मंडित योग्य का तर्क भी आवश्यक है । न तो सिर्फ विद्रोह और न ही अंधभावुकता की अभिव्यिक्ति साहित्य है । साहित्य में जो सहित का भाव है वह संवेदन, अनुभूति अनुभव से गुजरकर समष्टि के धरातल पर अभिव्यक्त होकर सम्प्रेषित होने पर ही सार्थकता पाता है। कोरी शब्द क्रीड़ा, अर्थ विलासिता मात्र भावुक विद्रोह है । जिसका संसार जितना छोटा होगा उसका साहित्य उससे बड़ा भला कैसे होगा।

संसार में हर चीज़ बदलती है और इस बदलाव के बावजूद एक सनातन सत्य, समष्टि का रहस्य निरन्तर जीवित रहता हैं । इसी की खोज में अपने अंगो-उपांगो के साथ साहित्य प्रयत्नशील रहता है । अपने-अपने समय में इस रहस्य को खोजने के लिए प्रयोग होते रहते हैं, लेकिन अंतिम सत्य आज भी रहस्यमय है । जब तक सत्य छिपा हुआ है, साहित्य चलता रहेगा। चूंकि साहित्य का दूसरा, स्रष्टा मनुष्य है इसलिए यह आरोप बेबुनियाद नहीं कि उसने अधिकांश अभिव्यक्तियां स्वकेंद्रित या स्व के आसपास की है । ‘स्व’ से मुक्त होने पर साहित्य समष्टि का मार्ग अपनाता है । इसीलिए आम पाठक की भी यात्रा की शुरुआत ‘स्व’ से रुबरु होते हुए होती है। इसका भटकाव अस्वाभाविक नहीं है । सवाल फिर वहीं छुट गया देश, काल के सन्दर्भ में साहित्य को परिभाषित होना चाहिए या नहीं होना चाहिए ?
जब साहित्य दार्शनिक प्रश्नों से जूझता है तो ये बातें गौण हो जाती हैं । देश, काल का अतिक्रमण करते हुए वैश्विक स्तर पर साहित्य के प्रतिमानों में परिवर्तन अवश्यंभावी है । सौंदर्य का प्रतिमान यदि दक्षिण अफ्रीका में ‘ब्लैक इज ब्यूटी’ है तो गोरों के देश में इसके विपरीत और अन्यथा होना अस्वाभाविक तो नहीं है । समष्टि के धरातल पर पहुंचा सर्जक, विश्वदृष्टा वैश्विक साहित्य सर्जन के पूर्व ‘स्व’ की घेरेबन्दी से निकलकर ‘आत्मा’ के एकरुप सौंदर्य का प्रतिमान रचता है, परमतत्व के साक्षात्कार की प्रक्रिया से गुजरता है । महान साहित्य इस सूक्ष्म आध्यात्मिक साधना की परिणति होता हैं, साहित्य की सर्वसमावेशिता और सार्वभौमिकता इसी बिन्दु पर सिद्ध होती है जहाँ शब्द समाप्त नहीं होते और अनुभूत सम्पूर्ण आन्द अपने पूरे वेग से अभिव्यक्त होना चाहता है । ‘गीतांजलि’ में रवीन्द्रनाथ ठाकुर कहते हैं –

जन्म भर अपने गीतों द्वारा मैं अपने अन्तः करण व जगत् के
दिशा-दिशान्तर में तेरी खोज करता रहा हूं ।
मेरे गीत मुझे घर-घर द्वार-द्वार ले जाते रहे ।
इन गीतों द्वारा मैंने कितनी ही बार इस भुवन में
तेरा संदेश दिया, कितने ही गुप्त
रहस्यों का उद्घाटन किया, कितनी सीख मिली,
हृदय-गगन के कितने ही / तारों से मेरा परिचय हुआ ।
नानाविध सुख-दुख भरे प्रदेशों में मेरे गीतों ने भ्रमण किया
और अन्त में,
संध्या वेला में ये गीत अनेकों रहस्यलोकों से मुझे
न जाने किस भवन में ले आये हैं ।

दिशा दिशान्तर में साहित्य के माध्यम से परमतत्व की खोज का कार्य सर्जक करता है । जिस भी देश के, जिस भी युग में, साहित्य की साधना इस उद्देश्य को लेकर हुई, वह साहित्य काल को अत्क्रमित करता हुआ महान और शाश्वत बना रहा।

समष्टिगत अभिव्यक्ति के सार्थक समुच्चय रचते हुए सर्जक भौतिकता के द्वन्द्व से निःसृत सार्थ क अनुभवों को पिरोता है । समष्टिगत अभिव्यक्ति का तात्पर्य कल्पित अलौकिक अनुभूति की सरलीकृत प्रस्तुति नहीं है । यह एक अनुभव से दुसरे बहुआयामी अनुभव में सर्जकीय रूपांतरण की अविराम यात्रा है। यह महानुभव की महाभिव्यक्ति की दूर्लभ स्थिति है, जहां पहुंचकर साहित्य सर्वत्र अपेक्षाकृत दीर्घजीवी होने की संभावनाओं को जन्म देता है ।

मित्रों,इतनी लम्बी है साहित्य की यात्रा ! उत्सुकरजनों को शीघ्र निराश नहीं होना चाहिए । जो है उससे स्वस्थ और बेहतर की समावेशी दृष्टि अंततः अपनी चरम स्थिति में इसी महानुभूति को छूती हुई सृजन का अप्रतिम सुख पाती है । साहित्य का लगभग सत्य यही है ।
*****
(विजय कुमार देव हिन्दी की प्रख्यात पत्रिका 'अक्षरा' के संपादक हैं । भोपाल में रहते हैं । उन्हें देश के कई संस्थानों द्वारा संपादन कार्य हेतु सम्मानित किया जा चुक है । वे अब 'सृजन-गाथा' के लिए लगातार लिखते रहेंगे । संपादक)

1 टिप्पणी:

Pratik ने कहा…

विजय कुमार जी का हृदय से धन्यवाद। उन्होंने इस लेख में साहित्य के वास्तविक अर्थ से जुड़े नए आयामों को उद्घाटित किया है। आज 'साहित्य' दुर्दशा-ग्रस्त है और संकीर्ण अर्थों व उसी तरह की चिन्तन-प्रवृत्ति में जकड़ा हुआ है। आत्मा से उद्भूत समष्टिपरक साहित्य न केवल साहित्यिक जगत् को, बल्कि पूरी संस्कृति को आगे ले जाने का कार्य करेगा। अत: इस तरह का साहित्य आज समय की आवश्यकता है।