6/21/2007

नक्सली हिंसा या सलवा जुड़ुम बंद किया जाए ?

आखिर आप क्या सोचते हैं?
रायशुमारी हेतु विचार आमंत्रित

रायपुर। नक्सली हिंसा के खिलाफ चल रहे आदिवासियों के स्वः स्फूर्त सत्याग्रह “सलवा जुड़ुम” के खिलाफत कर इसे बंद करने की मांग लगातार की जा रही है। जबकि बस्तर में नक्सली हिंसा के चलते निरीह निर्दोष आदिवासी लोग बैमौत मारे जा रहे हैं।
ऐसे समय में अभिव्यक्ति की आजादी के हिमायती समय-समय पर सलवा जुड़ुम को बंद करने की मांग पता नहीं किससे करते हैं ? इसमें देश के बड़े-बड़े तथाकथित समाजसेवी, संगठन, बुद्धिजीवी भी हैं जो इन दिनों दिल्ली, मुंबई, कोलकाता से रायपुर आकर मानव अधिकार के नाम से हो हल्ला मचा कर एक तरह से नकस्लवाद को हवा दे रहे हैं । अगर वे सरकारों से मांग कर रहे हैं तो मुगालते में है क्योंकि ये आंदोलन 5 जून 2005 को फरसगढ़ थाना के अंबेली गांव से स्वः स्फूर्त शुरु हुआ है और इससे नक्सलादियों का असली चेहरा सामने आ गया है।
उधर जनता की मान्यता है कि आदिवासियों के हक के लिए शुरू हुई सहस्त्र क्रांति का चरित्र ही बदल गया है। असहाय आदिवासी और निर्दोष ही मारे जा रहे हैं । सारे राज्य में एक अदृश्य आतंक छाया हुआ है । सबसे बड़ी बात की आदिवासी ही इस हिंसा के शिकार हो रहे हैं । ऐसे समय में जन सरोकार के मुद्दों से जुड़ी संस्था लोकमान्य सद्भावना समिति एवं मिनीमाता फाउंडेशन ने इस मुद्दे पर जनता की राय आमंत्रित की है।


संस्था के अध्यक्ष तपेश जैन एवं रामशरण टंड़न ने सभी वर्गों से “नक्सली हिंसा या सलवा जुड़ुम बंद किया जाए ?” विषय पर उनका अभिमत अधिकतम 300 शब्दों तक 30 जून 207 तक आमंत्रित किया है। इसके साथ ही पासपोर्ट साईज फोटो एवं पूरा पता भी संलग्न किया जाना होगा ।
प्राप्त विचारों को पुस्तक के रुप में प्रकाशित कर आम लोगों को और देश भर में अवगत कराया जायेगा।
विचार इस पते पर भेज सकते हैं-
लोकमान्य सद्भावना समिति, जैन बाड़ा बैजनाथपारा रायपुर (छ.ग.) ।
ई-मेलः filmkar@gmail.com


रामशरण टंडन

6/18/2007

नेता उवाच-वचन जाए प्राण न जाए

भारतीय राजनीति

भारतीय लोकतंत्र के समक्ष जब कभी भी चुनावों से रूबरू होने का समय आता है, उस समय इस विशाल लोकतंत्र के खेवनहार समझे जाने वाले 'राजनेता' जनता के समक्ष एक-दूसरे नेताओं पर तरह-तरह के आरोप लगाते, उनपर कटाक्ष करते तथा जनता से तरह-तरह के वायदे करते दिखाई देते हैं।

जहां इन नेताओं द्वारा अपने प्रतिद्वन्दी नेताओं को अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती, वहीं इनके द्वारा अनेकों प्रकार के सुनहरे सपने भी मतदाताओं को दिखाए जाते हैं। सत्ता में आने पर राम राज्य स्थापित करने जैसी बातें की जाने लगती हैं। केवल आश्वासन के दम पर वोट झटकने में महारत रखने वाले यह नेता मतदाताओं को यह समझाने की पूरी कोशिश करते हैं कि यदि राजा हरिशचन्द्र के बाद कोई सत्यवादी है तो वह केवल स्वयं वही हैं। अत: वह उस समय जो भी कह रहे हैं, वही सत्य है तथा वे जो भी वायदा कर रहे हैं, उसे वे ंजरूर पूरा करेंगे। परन्तु सच्चाई तो कुछ और ही है। आरोप-प्रत्यारोप, वचन, वायदे, घोषणाएं आदि महंज अस्थायी एवं सामयिक बातें ही मात्र रह जाती हैं। अब तो हालत यह हो चली है कि यदि किसी नेता ने अपना कथन पूरा कर दिया अथवा उसपर कायम रहा तो मानो उसमें नेता जैसे सम्पूर्ण गुणों का ही अभाव है। यह नेता कहते कुछ और हैं तथा करते कुछ और। 'कथनी और करनी में अन्तर' होने जैसी कहावत तो मानो इन्हीं नेताओं के लिए ही निर्धारित होकर रह गई हो। सिद्धान्त नाम की कोई चीज इनमें नंजर नहीं आती। अनर्गल और अनाप-शनाप बयानबाजियां करने में तो यह नेता इस हद तक आगे बढ़ चुके हैं कि प्राय: इनके पास अपनी ही कही बातों का कोई जवाब नहीं होता और यह अपने ही रचे शब्द जाल में खुद ही फंसकर रह जाते हैं।

उदाहरण के तौर पर वर्तमान यू.पी.ए. सरकार के गठन के समय भारतीय जनता पार्टी द्वारा कांग्रेस व डी.एम.के साथ गठबंधन के मामले को लेकर कांग्रेस को कठघरे में खड़ा किया गया था। भाजपा का कहना था कि जब कांग्रेस पार्टी डी.एम.के. पर राजीव गांधी की हत्या की सांजिश में शामिल होने का आरोप लगा रही थी फिर उसे नैतिक आधार पर डी.एम.के. से चुनावपूर्व गठबंधन नहीं करना चाहिए था। भाजपा इसे कांग्रेस का अवसरवाद बता रही थी। कांग्रेस पार्टी प्रत्युत्तर में कानूनी जवाब देते हुए यह कहकर अपने व डी.एम.के. के नऐ रिश्ते को उचित ठहरा रही थी कि जब जैन कमीशन की रिपोर्ट में डी.एम.के. को क्लीन चिट दे दी गई है तो आयोग की रिपोर्ट का आदर करते हुए डी.एम.के. से गठबंधन करना कोई अनैतिक कदम नहीं है। इस आरोप प्रत्यारोप के मध्य एक प्रश्न भारतीय जनता पार्टी के लिए यह ंजरूर खड़ा होता है कि जैन कमीशन की रिपोर्ट आने से पूर्व इसी डी.एम.के. को भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सम्मानित घटक के रूप में आंखिर क्यों रखा था जबकि उस समय डी.एम.के. संदेह के घेरे में थी तथा राजीव गांधी की हत्या की सांजिश के लिए कांग्रेस उस पर उंगली उठा रही थी। परन्तु भाजपा इस विषय पर अपने गिरेबान में झांकने के बजाए कांग्रेस पर उंगली उठाना ज्यादा उचित समझती है।

इसी प्रकार भाजपा प्रवक्ता सुषमा स्वराज जिन्होंने कि देवगौड़ा की गठबंधन सरकार को कभी भानुमति का कुनबा कहा था परन्तु अपना समय आने पर वही स्वयं उसी भनुमति के कुनबे अर्थात् गठबंधन सरकार की ंजरूरत को देश की आवश्यकता बताने लगी थीं। उन्होंने कुछ वर्ष पूर्व अपने शब्द जाल के तर्कश से एक तीर छोड़ा था कि 'सोनिया गांधी को राजनीति की ए.बी.सी.डी. का भी पता नहीं है।' यदि सुषमा स्वराज की इस बात को ठीक मान लिया जाए तो क्या यह नहीं मानना पड़ेगा कि सुषमा स्वराज के अनुसार राजनीति से पूरी तरह अनभिज्ञ उसी महिला अर्थात् सोनिया गांधी ने बेल्लारी से अपने को राजनीति का पंडित समझने वाली सुषमा स्वराज को आंखिर किन परिस्थितियों में चुनाव हरा दिया था? क्या इससे सुषमा स्वराज की अपनी राजनैतिक हैसियत का पर्दांफाश नहीं होता कि वह उन्हीं के अनुसार उस महिला से चुनाव हार चुकी हैं जिसे कि राजनीति की ए.बी.सी.डी. भी नहीं आती? गलत बयानबांजी का एक और उदाहरण भारतीय जनता पार्टी में ही उस दौरान देखने को मिला था जबकि भाजपा ने उतावलेपन में आकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाहुबली डी.पी. यादव को पार्टी में शामिल कर लिया था। वैसे तो 1998 में भाजपा सम्भल संसदीय क्षेत्र से डी.पी. यादव को अपना समर्थन पहले भी दे चुकी है परन्तु गत् संसदीय चुनावों के दौरान चूंकि मीडिया, आम जनता, चुनाव आयोग, पत्रकारों व लेखकों तथा राष्ट्र के दूसरे तमाम हितैषी संगठनों ने देश में होने वाले चुनावों तथा राजनैतिक दलों द्वारा चुनाव जीतने के लिए अपनाए जाने वाले हथकंडों पर अपनी पैनी नंजर रखी हुई थी इसलिए भाजपा के एक प्रवक्ता ने डी.पी. यादव को पार्टी में शामिल करते हुए ही इस आश्चर्यजनक कथन का प्रयोग भाजपा के पक्ष में किया कि- 'भारतीय जनता पार्टी एक समुद्र है तथा इसमें जो भी आकर मिलता है वह भी पवित्र हो जाता है।' अपने इस कथन के ठीक चार दिन बाद डी.पी. यादव को पार्टी से तब अलग कर दिया गया जबकि मीडिया द्वारा भारतीय जनता पार्टी पर राजनीति का अपराधीकरण करने का खुला आरोप लगाया गया। इस परिस्थिति में भाजपा के उसी प्रवक्ता को क्या पुन: इस प्रकरण को लेकर अपने कथन पर रौशनी नहीं डालनी चाहिए थी कि जब डी.पी. यादव भाजपा रूपी कथित समुद्र में शामिल होकर पवित्र हो चुके थे फिर आंखिर उन्हें क्यों उस कथित समुद्र से बाहर निकलना पड़ा? क्या भाजपा के प्रवक्ता के कथन की वास्तविकता यहां समाप्त नहीं हो जाती। क्या इससे यह बात जाहिर नहीं होती कि भाजपा रूपी कथित समुद्र में किसी अपवित्र चींज को पवित्र करने की क्षमता नहीं है? ऐसा नहीं है कि अपने पक्ष में की जाने वाली ऐसी अनाप-शनाप बातें करना केवल भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की ही विशेषता हो। वास्तविकता तो यह है कि पूरे देश की अधिकांश पार्टियों के अधिकतर नेता इसी प्रकार की अनर्गल और बेसिर पैर की बातों पर विश्वास करने लगे हैं। वे जब जनता के समक्ष अपना मुंह खोलते हैं तो उनकी आंखें बंद हो जाती हैं। पूरे देश ने सुना कि बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने भाजपा व कांग्रेस दोनों के लिए कहा कि इनमें एक सांपनाथ है तो दूसरा नागनाथ। परन्तु उन्होंने यह नहीं स्पष्ट किया कि कौन सांपनाथ है और कौन नागनाथ। इसके कुछ ही दिन बाद इन्हीं माया बहन ने एक और बयान दिया जिसमें उन्होंने कहा कि मैं अटल बिहारी वाजपेयी की दूसरी बेटी हूं। अब मायावती के इस बयान के बाद स्वाभाविक रूप से एक प्रश्न जन्म लेता है कि यदि वह वाजपेयी जी की दूसरी बेटी हैं तो या तो वह सांपनाथ की बेटी हैं अथवा नागनाथ की। अब यहां यह बताने की जरूरत तो नहीं रह जाती है कि सांपनाथ या नागनाथ की बेटी स्वयं क्या हो सकती है। तांजातरीन राजनैतिक घटनाक्रम में यही माया बहन कांग्रेस से अपने नए रिश्ते स्थापित करने में जुटी हैं। शायद यही वर्तमान राजनीति का तकाजा हो। अब फिलहाल न तो यह कांग्रेस उन्हें नाग नंजर आ रही है, न ही सांप। यह सब नेताओं द्वारा प्रयोग किए गए ऐसे ही शब्द जाल हैं जिनका प्रयोग तो वे यह सोचकर कर देते हैं कि वह जो कुछ भी बोल रहे हैं वह लोक लुभावन है परन्तु वह यह भूल जाते हैं कि कहीं ऐसा न हो कि वह स्वयं अपने ही बुने इन्हीं शब्द जालों में खुद ही फंस जाएं। कल्याण सिंह द्वारा वाजपेयी के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करना भी सभी ने देखा है। उसके बाद कल्याण सिंह ने ही कितनी बेहयाई के साथ मीडिया के इस प्रश् का उत्तर दिया कि 'कल तक आप वाजपेयी पर उंगली उठा रहे थे आंखिर आज अचानक यह परिवर्तन कैसा?' इस पर कल्याण सिंह ने कहा था कि 'कल तक मैं वाजपेयी पर एक उंगली उठाता था तो आज पांचों उंगलियों से उन्हें लड्डू भी खिला दिया है।' इस वाक्य को नैतिकता, सिद्धांत या आदर्श की कसौटी पर यदि परखा जाए तो इसमें फरेब, छलावा, स्वार्थ और मक्कारी के सिवा कोई रचनात्मक तर्क नंजर नहीं आता। इसी प्रकार तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष वैंकैया नायडू साहब ने गत संसदीय चुनावों से पूर्व ंफरमाया था कि 'गुजरात जैसा राजनैतिक माहौल पूरे देश में बनाया जाएगा।'

उपरोक्त तथा इस जैसी तमाम बाते ऐसी हैं जिनसे सांफ ंजाहिर होता है कि किसी पार्टी का कोई भी नेता कब क्या बोल रहा है और कब अपनी ही किस बात का खंडन करने लगेगा, उसके सिद्धांत आज क्या हैं और कल के आदर्श क्या होंगे किसी को इस बारे में कुछ पता नहीं रहता। यही वजह है कि नेताओं व राजनैतिक दलों के साथ-साथ चुनाव प्रक्रिया से भी लोगों का मोह भंग होता जा रहा है। जनता का विश्वास दिन-प्रतिदिन इस बात पर पक्का होता जा रहा है कि नेताओं की कथनी और करनी में कांफी अन्तर है तथा इनकी बातों व इनके द्वारा उठाए गए किसी भी राजनैतिक कदम का कोई भरोसा नहीं किया जा सकता।


0निर्मल रानी
1630/11, महावीर नगर
अम्बाला शहर, हरियाणा

अमेरिकन रेडियो से मानस का सीधा प्रसारण




भारत के चौंथे साहित्यकार बने जयप्रकाश



रायपुर । 18 जून । छत्तीसगढ़ के युवा साहित्यकार और हिंदी इंटरनेट में सक्रिय शिक्षाविद् जयप्रकाश मानस को आज अमेरिका की सुप्रसिद्ध आकाशवाणी चैनल ‘रेडियो सलाम नमस्ते’ ने प्रसारित किया । डेलास शहर से संचालित और 24 घंटे निरंतर प्रसारण के लिए विख्यात इस अंतरराष्ट्रीय चैनल से सीधा प्रसारित होने वाले श्री मानस चौंथें साहित्यकार हैं । अब तक केवल 3 साहित्यकार एवं हिंदी सेवियों का सीधा प्रसारण चर्चित और अमेरिका में लोकप्रिय कार्यक्रम ‘काव्यांजलि ’में हुआ है । श्री मानस चौंथे साहित्यकार हैं जिनसे रेडियो सलाम नमस्ते ने हिदीं के वर्तमान, वैश्वीकरण के प्रभाव, हिंदी शिक्षा, इंटरनेट और हिंदी का बढ़ता प्रभाव, विदेशों में विशेष रूप से चर्चित वेब पत्रिका सृजनगाथा डॉट कॉम व ऑनलाइन एवं इंटरनेट प्रौद्योगिकी पर विस्तृत चर्चा की और इसका सीधा प्रसारण किया।

ज्ञातव्य हो कि यह ऑनलाइन प्रसारण आज भारतीय समय अनुसार प्रातः 7.30 बजे से 8.00 बजे तक किया गया । रेडियो सलाम नमस्ते अंग्रेजी के अलावा कई भारतीय भाषाओं में प्रसारित होता है । यह रेडियो 104.9 एफ.एम पर प्रसारित होता है जिसे इंटरनेट पर भी http://www.radiasalaamnamste.com/ पर भी नियमित रूप से ऑनलाइन प्रसारित किया जाता है । रेडियो स्टूडियो में श्री मानस से साक्षात्कार हेतु अमेरिका के जाने-माने हिंदी विशेषज्ञ श्री आदित्य प्रताप सिंह व तकनीक विशेषज्ञ डॉ. नंदलाल सिंह विशेष रूप से उपस्थित थे । इस महत्वपूर्ण प्रसारण को संबंधित वेबसाइट पर यथासमय दोबारा सुना जा सकता है ।
श्री राम पटवा ने अपनी विज्ञप्ति में बताया है कि हिंदी साहित्य एवं भाषा तता छत्तीसगढ़ की साहित्यिक और सांस्कृतिक वैभव को अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर प्रतिष्ठित करने के उद्यम में लगे श्री मानस की इस उपलब्धि पर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, मीडिया कांग्रेस, सृजन-सम्मान, वैभव प्रकाशन, लोकमान्य सद्भावना समिति मिनी माता फाउंडेशन, गुरुघासी दास साहित्य अकादमी आदि के सभी सदस्यों ने उन्हें बधाई दी है ।


0राम पटवा
प्रकाशन अधिकारी
संस्कृति विभाग छत्तीसगढ़ शासन
रायपुर, छत्तीसगढ़

मीडिया विमर्श नेटस्केप द्वारा उत्तम वेबसाइट घोषित

छत्तीसगढ़ की वेबपत्रकारिता बढ़ा सम्मान

रायपुर । 18 जून । अंतरजाल एवं प्रिंट माध्यम दोनों से प्रकाशित ऑनलाइन पत्रिका मीडिया विमर्श डॉट कॉम को अमेरिकन वेबब्राउजर कंपनी नेटस्केप ने उत्तम वेबसाइट घोषित करते हुए प्रशस्ति पत्र दिया गया है । यह प्रशस्ति पत्र सामग्री चयन व प्रकाशन की विषवस्‍तु व वेब पब्लिशिंग तकनीक के आधार पर डी मोज निर्देशिका द्वारा उत्‍तम प्रकाशन के लिए दिया गया है ।
नेटस्केप द्वारा मीडिया विमर्श को मीडिया के सभी प्रकल्पों पर पड़ताल करने वाली एक मात्र त्रैमासिक पत्रिका का माना गया है ।

नेटस्केप द्वारा खुली वेब डायरेक्टरी प्रोजेक्ट के अंतर्गत डीमोज (dmoz.com) द्वारा विश्व के सभी भाषाओं को पंजीबद्ध और उनका रेंक प्रदान किया जाता है । इसके तहत मीडिया विमर्श डॉट कॉम के दो अंकों से ही उसे यह उपलब्धि हासिल हुई है । नेटस्केप खुली निर्दिशिका में सामग्री एवं साइट की तकनीकी उत्कृष्टता, एवं विश्व मानक नियमों के तहत परीक्षण कर विश्व की समाचार प्रधान हिंदी वेबसाइट में अब तक केवल चार वेबसाइटों को यह गौरव मिल चुका है । पाँचवी उत्तम वेबसाइट होने की लिखित सूचना परियोजना संपादक द्वारा विगत दिनों मीडिया विमर्श के संपादक को प्राप्त हुई है । इससे पहले विश्व हिंदी/कला/साहित्य वर्ग में छत्तीसगढ़ की प्रथम वेबसाइट सृजनगाथा डॉट कॉम को प्रमुख स्थान दिया गया है । ज्ञातव्य हो कि ये दोनों साइटें छत्तीसगढ़ से संचालित की जा रही हैं जिसका तकनीकी पक्ष किशोर छात्र प्रशांत रथ द्वारा नियंत्रित एवं संचालित किया जाता है । मीडिया विमर्श को विश्व की महत्वपूर्ण वेब ब्राउजर कंपनी द्वारा इस सम्मान पर मीडिया विमर्श के संपादक श्रीकांत सिह, प्रकाशक भूमिका द्विवेदी, संजय द्विवेदी सहित संपादकीय परिवार को सृजन-सम्मान, राष्ट्र भाषा प्रचार समिति, वैभव प्रकाशन, लोकमान्य सद्भावना समिति मिनीमाता फाउंडेशन के सदस्यों आदि ने बधाई दी है ।

राम पटवा

6/17/2007

अंतरराष्ट्रीय बाजा़र की हिन्दी

विश्व हिंदी सम्मेलन पर विशेष


पिछले चार दशकों से विश्व एक बाजा़र की तरह दिखाई दे रहा है । विश्व का इंसान अब ग्राहक की परिशक्ल में तब्दील हो चुका है । वैश्वीकरण अर्थात् ग्लोबलाइजेशन की लहर ने पूंजीवाद के चेहरे पर नया नकाब गढ़ा है । वैश्वीकरण की इस आँधी से संस्कृति, भाषा, राजनीति और विविध क्रिया-क्षेत्र प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रभावित हुए हैं । विश्व की नज़र में भारत एक बहुत बड़ा बाजा़र है और भारतीय सबसे भोले-भाले ग्राहक ।

भारतीय ग्राहक की सबसे बड़ी कमजोरी उस की मातृभाषा है । उस के सहारे उन के दिलों पर राज किया जा सकता है । ऐसा हो भी रहा है । वैश्वीकरण के इस दौर में प्रचलित नियम-कायदे और परंपराएँ तेज़ी से बदल रही हैं । हिन्दी इस से कैसे अछूती रह सकती है ? बाजा़र ने विज्ञापन और विविध प्रयोजनों के माध्यम से हिन्दी को ग्लोबल-उपकरणों से आभूषित किया है । साहित्य, पाठ्यक्रम, ग्राम-बोलचाल की सौम्य एवं अनुशासित भाषा से हिन्दी एक अलग ही तेवर में प्रयुक्त होने लगी है । प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया ने इस में अहम भूमिका निभाई है ।

भारतीय बाजा़र में आज हिन्दी विज्ञापनों के माध्यम से भारतीय ग्राहकों की क्रयशक्ति में भीतर-ही-भीतर वृद्धि कर रही है । वह किसी वस्तु के लिए अनावश्यक माँग पैदा करने में प्रेरक का कार्य कर रही है । आज विज्ञापन का मूल धर्म कुछ और ही है । व्यक्ति के दोहरेपन को उभार कर उस के तर्कहीन पक्ष पर किसी बात, वस्तु या कर्म की छाप अंकित करना ही विज्ञापन का धर्म है । रेर्मेड विलियंस कहते हैं- “विज्ञापन केवल वस्तुओं को बेचने को ही कहा नहीं है, यह एक दिग्भ्रिमित समाज की संस्कृति का सच्चा अंग है ।”

वैश्वीकरण और नई बाजा़र-व्वस्था का आधार नई टेक्नालॉजी है । इस नई टेक्नालॉजी ने हिन्दी को भी नई टेक्नालॉजी दी है । वह इन क्षेत्रों में तेजी से अँग्रेज़ी का विकल्प बनते जा रही है । कंप्यूटर, टेलीविज़न, इंटरनेट, चैनल, इत्यादि क्षेत्रों में हिन्दी का प्रयोग तेज़ी से बढ़ रहा है । यह इन क्षेत्रों की विवशता है कि बिना हिंदी की प्रभुसत्ता को आत्मसात् किए वे अपना विस्तृत फैलाव नहीं कर सकते । संचार-क्रांति के इस युग में संचार माध्यम वैश्वीकरण और बाजा़रवाद के प्रमुख साधन हैं। हिन्दी चूँकि भारत की नस-नस में बसी है इसलिए इस क्रांति के तार उन नसों तक होकर के जाना एक मज़बूरी है ।

बहरहाल हम हिन्दी को प्रयोजनमूलकता के उस बेहतर पक्ष पर विमर्श करना चाहते हैं जिस से हिन्दी के प्रयोग-क्षेत्र में विस्तार हुआ है । अनेक उदाहरणों से पुष्ट किया जा सकता है कि बिना भाषा के कोई बाजा़र खड़ा नहीं हो सकता । व्यापार के लिए हिन्दी की अनिवार्यता का एहसास बहुराष्ट्रीय कंपनियों को चार-पाँच वर्ष पूर्व ही हुआ है । शहरों में जब वस्तु-विशेष के ग्राहक कम होने लगे तब ऐसी कंपनियों ने विस्तार चाहा, भारतीय गाँव इस विस्तार के कारक बने । इसी विस्तार ने हिन्दी को अंतरराष्ट्रीय बाजा़र की भाषा बनाने विवश किया है ।

डॉ. सुधीर शर्मा
पी.एच.डी (भाषा विज्ञान)
संपादक, साहित्य-वैभव
रायपुर, छत्तीसगढ़
ई.डब्ल्यू.एस-280, सेक्टर-4,
दीनदयाल नगर, डंगनिया,
रायपुर,छत्तीसगढ

वैश्विक हिन्दी कविता की दिशा

विश्व हिंदी सम्मेलन पर विशेष


जिस तरह हिन्दी भाषा ने अंतरराष्ट्रीय क्षितिज का स्पर्श किया उसी तरह हिन्दी कविता ने भी अपनी वैश्विक चेतना के साथ विश्व रंगमंच पर अपनी अस्मिता को एक विशिष्ट पहचान दी है । न केवल भारवंशियों वरन् विदेशी मूल के हिन्दी प्रेमियों हिन्दी और हिन्दी कविता के लिए अपनी प्रतिबद्धता दर्शायी है । फिर वह चाहे चेकोस्लोवाकिया के ओदोलेन स्मेकल हों या फिर ब्रिटेन के रूपर्ट स्लैन । बुल्गारिया के डॉ. फादर कामिल बुल्के हों या फिर हंगरी का मारिया न्येंजेशी । इनके जैसे अस्ख्य विदेशी महानुभाव हैं “जिनको हिन्दी भाषा ने अपनी ओर आकर्षित किया और आज इनके कारण हिन्दी ने वैशअविक हिन्दी स्वरुप ग्रहण कर लिया है । कविताओं में हम वैश्विक चैतना के साथ भारतीय संस्कृति का ‘नास्टेल्जिया’ देख सकते हैं । भारत के गाँव, लोग एवं परम्पराओं की स्मृतियाँ सती कुमार की कविताओं के केंद्रीय विषय बन जाते हैं । गाय जैसे प्रतीकों के माध्यम से वह शोषण पर कविता लिखते हैं ।

वैश्विक हिन्दी कविता के उन्नयन में आज अनेक भारतीय कवि पूरी दुनिया में सक्रिय हैं । ये लोग परदेस में रहते हुए भी अपने देश से, अपनी स्मृतियों से, अपनी परम्परा- संस्कृति से दूर नहीं हो सके हैं । इनके अंतम में माटी के प्रति गहरी रागात्मक अनुभूतियाँ विद्यमान हैं, जो समय-समय पर रचना के माध्यम से प्रकट होती रहती हैं। अनुवाद के माध्यम से विदेशी मूल के हिन्दी सेवियों ने भी भारतीय साहित्य को वैश्विक रूप प्रदान करके हिन्दी के प्रति आदर भाव ही प्रकट किया है। रामचरित मानस हो या श्रीमद् भागवत गीता, इन सब का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में किया गया। हम कह सकते हैं कि इन कालजयी रचनाओं ने भी वैश्विक हिन्दी कविता की विदेश में नींव रखी। डॉ. ओदोलेन की सशक्त हिन्दी कविताएँ किसी भी हिन्दी कवि के समकक्ष रखी जा सकती हैं। जापान के साईजी माकीतो ने वर्षों तक शांति निकेतन में रहकर हिन्दी में अनेक महत्वपूर्ण कृतियाँ दी हैं। हंगरी के प्रो. टुमरै बैघा ने महाकवि धनानंद पर केंद्रित ग्रंथ “सनेह को मारग” के माध्यम से हिन्दी कविता को विश्वजनीन बना दिया । लंदन के रूपर्ट स्नैल के ब्रजभाषा में लिखे गए छंदों को पढ़ने का सौभाग्य मुझे भी मिला है। उन्होंने नई कविता के दौर में भी ब्रजभाषा में छंदिक कविताएं रचकर हिन्दी कविता की छंद परम्परा को वैश्विक ऊँचाई देकर इतिहास बना दिया है। प्रो. रुपर्ट की हिन्दी कविता और उस पर छंदानुराग हिन्दी को तथाकथित आधुनिक कवियों के लिए आत्म-मंथन का कारण बनना चाहिए। रूस के प्रो. वर्रान्निकोव की अनेक कविताएँ, ग्रन्थ भी हिन्दी के साहित्यकारों के लिए प्रेरणा का काम कर सकती हैं।

नेपाल के साहित्यकार धूस्वां सायमि के बारे में सुनना-पढ़ना भी अच्छा लगता है। उन्होंने तीन हजार से ज्यादा हिन्दी कविताएँ लिखी हैं। केदारनाथ मान के भी तीन-चार संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। डॉ. ओदोलेन ने ‘गोदान’ का चेक भाषा में अनुवाद तो किया ही था, “हमारा हरित नीम” नामक काव्य संग्रह भी प्रकाशित करवाया था जिसमें भारतीय अस्मिता की झलक देखी जा सकती है। भारतवंशियों ने त्रिनिडाड, सूरीनाम, अमरीका, ब्रिटेन, मारीशस आदि देशों में न केवल हिन्दी की अलख जगाया वरन साहित्यक सर्जना में उस देश के मूल निवासियों को भी प्रवृत्त किया।
आज अगर हम वैश्विक हिन्दी कविता पर विमर्श करें तो यह जानकर सुखद लगेगा कि विश्व के लगभग एक सौ तिरपन (153 विश्वविद्यालयों में हिन्दी का अध्यापन हो रहा है, तो यह जानकर भी खुशी होगी कि भारतवंशियों का एक बड़ा कुनबा पूरी दुनिया में हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाने में लगा हुआ है। जिसे पढ़ने, सराहने और भारत में सम्मानित करने की जरूरत है।

गिरीश पंकज
संपादक, सद्भावना दर्पण,
संपर्कः जी-31, नया पंचशील नगर,
रायपुर-492001,



कितना उचित है उपजाऊ भूमि पर उद्योग लगाना