9/28/2007

वैज्ञानिक प्रमाण का मोहताज नहीं है राम का अस्तित्व


तमिलनाडू के मुख्यमंत्री तथा डी एम के प्रमुख एम करुणानिधि ने पिछले दिनों राम के अस्तित्व को चुनौती देकर देश की राजनीति में कोहराम बरपा कर दिया है। अभी इस विषय पर बहस व मंथन चल ही रहा है कि रामसेतु को खंडित कर सेतु समुद्रम परियोजना पूरी की जानी चाहिए अथवा नहीं, इस परियोजना को लागू किए जाने का ज़िम्मेदार कौन है और कौन नहीं तथा इस परियोजना के लागू करने में किसी ऐसे नए मार्ग का चुनाव किया जा सकता है जोकि रामसेतु को खंडित किए बिना सेतु समुद्रम परियोजना को पूरा करने में सहायक सिद्ध हो सके। कि इसी बीच आम भारतीयों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला राम के अस्तित्व संबंधी बयान देकर बुजुर्ग द्रविड़ नेता करुणानिधि ने गोया ठहरे हुए पानी में पत्थर मारने जैसा काम कर दिखाया है। यदि करुणानिधि अपने सबसे पहले दिए गए इस बयान पर भी ख़ामोश रह जाते कि रामसेतु के मानव निर्मित होने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। यदि वे अपने इस बयान को वापस ले लेते अथवा इससे आगे बढ़ते हुए जलती हुई आग में घी डालने जैसा काम न करते तो भी काफ़ी हद तक मामला सुलझ सकता था। परन्तु करुणानिधि ने न केवल उक्त बयान दिया बल्कि इसके बाद उन्होंने भगवान राम के अस्तित्व में आने को भी यह कहकर चुनौती दे डाली कि भगवान राम के होने के कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं हैं। करुणानिधि के इस बयान ने भारतीय रामभक्तों की भावनाओं को तो ठेस पहुँचाई ही है, साथ-साथ उन्होंने भगवान राम को रजनीति का मोहरा बनाने वालों को भी इसी बहाने अपना नाम चमकाने का अवसर प्रदान कर दिया है।

जिस प्रकार मुस्लिम समुदाय की ओर से कई बार ऐसे फ़तवे सुनाई देते थे कि ईश निंदा किए जाने के कारण अथवा हज़रत मोहम्मद का अपमान किए जाने के कारण जो भी अमुक व्यक्ति का सिर क़लम करेगा, उसे भारी भरकम पुरस्कार से नवाज़ा जाएगा। ठीक उसी प्रकार पहली बार हिन्दू समाज की ओर से एक राजनैतिक संत द्वारा करुणानिधि का सिर कलम करने वाले व्यक्ति को सोने से तोले जाने का फ़तवा जारी किया गया है। इसमें कोई शक नहीं कि करुणानिधि ने भगवान राम के अस्तित्व को चुनौती देकर अति निंदनीय कार्य किया है। उनके इस वक्तव्य के चलते कई प्रमुख लोगों द्वारा उन्हें दक्षिण भारत में रहने वाला रावण का वंशज तक कहकर सम्बोधित किया जा रहा है। यह सब कुछ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किया जा रहा है। जैसा कि वामपंथी नेता प्रकाश करात का मानना है कि 'इस देश में कुछ लोग ऐसे हैं जिनकी धार्मिक आस्थाएं हैं। वहीं कुछ लोग हमारी तरह भी हैं, अर्थात् जो धर्म के प्रति आस्थावान नहीं है। ऐसे लोगों को अपनी राय प्रकट करने पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।' निश्चित रूप से करात का यह कथन भी बिल्कुल सही प्रतीत होता है। परन्तु अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विषय को यदि हम इस कथन के साथ तोलें तो मामला साफ़ हो जाता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संबंधी एक उदाहरण के अनुसार किसी भी व्यक्ति को हवा में अपनी छड़ी घुमाने की इजांजत तो ज़रूर है परन्तु उसी सीमा के भीतर जहां से कि उसकी अपनी हद समाप्त होती है तथा दूसरे की हद शुरु होती है। इस कथन से यह बात साफ़ हो जाती है कि किसी व्यक्ति को अपने विचार रखने का अधिकार तो है परन्तु किसी के दिल दुखाने का या किसी की आस्था या विश्वास को ठेस पहुँचाने का अधिकार हरगिज़ नहीं है।

भगवान राम के अस्तित्व की बात लाखों वर्ष पुरानी है। हंजारों वर्षों से शास्त्रों तथा धार्मिक ग्रन्थों के माध्यम से राम कथा के बारे में न केवल भारतवर्ष बल्कि पूरे विश्व में चर्चा होती रही है। दीपावली, दशहरा व राम नवमी जैसे भारत में मनाए जाने वाले कई त्यौहार भगवान राम के अस्तित्व से जुड़े हैं तथा हजारों वर्षों से भारत में मनाए जा रहे हैं। वैसे तो हिन्दू धर्म में 33 करोड़ देवी देवताओं का ज़िक्र किया गया है परन्तु इन सभी में भगवान राम को ही मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम से सम्बोधित किया जाता है। यदि राम का अस्तित्व नहीं था तो सहस्त्राब्दियों से भगवान राम संबंधी उल्लेख शास्त्रों में क्योंकर दर्ज हैं? हिन्दू समाज आख़िर क्योंकर दीपावली व दशहरा जैसे त्यौहार मनाकर राम की पूजा व आराधना करता चला आ रहा है।

रहा प्रश्न वैज्ञानिक प्रमाण होने या न होने का तो करुणानिधि जी तो लाखों वर्ष प्राचीन उस घटना के प्रमाण पूछ रहे हैं जोकि सीधे तौर पर भारतवासियों विशेषकर हिन्दू समाज की भावनाओं तथा विश्वास से जुड़ चुकी है। देश की सबसे बड़ी तीर्थनगरी अयोध्या आज भी राम के नाम से ही जोड़कर देखी जाती है। यदि यह प्रमाण भी करुणानिधि को अपर्याप्त महसूस होते हों तो भी उन्हें विचलित होने की अधिक आवश्यकता इसलिए नहीं होनी चाहिए कि आज के वैज्ञानिक एवं आधुनिक दौर में तमाम ऐसी घटनाएँ घटित होती हैं जिनके कि कोई प्रमाण नहीं होते। इसका अर्थ यह तो क़तई नहीं हुआ कि अमुक घटना घटी ही नहीं। उदाहरण के तौर पर आज भी अनेक लोगों की हत्याएँ होती हैं। मामले पुलिस और अदालत तक जाते हैं। मुंकद्दमा भी चलता है तथा सभी आरोपी बरी भी हो जाते हैं। अर्थात् आज की अति आधुनिक समझी जाने वाली प्रशासनिक व न्यायिक व्यवस्था इस बात को प्रमाणित करने में असहाय नज़र आती है कि अमुक व्यक्ति की हत्या किसने की। तो क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि जब कोई हत्यारा प्रमाणित ही नहीं हो सका तो गोया अमुक व्यक्ति की हत्या ही नहीं हुई। तात्पर्य यह है कि आधुनिकता का दम भरने वाले इस दौर में आज भी जब हम ऐसी तमाम बातों को प्रमाणित नहीं कर सकते तो ऐसे में लाखों वर्ष पुरानी घटना के विषय में प्रमाण की तलाश करना वैज्ञानिक सोच तो नहीं हास्यास्पद एवं नकारात्मक सोच का लक्षण अवश्य कहा जा सकता है।

करुणानिधि के बयान को सीधे-सीधे केवल राम के अस्तित्व के प्रश्न तक ही सीमित रखकर नहीं सोचना चाहिए। उनके इस बयान के पीछे दक्षिण भारत व उत्तर भारत के बीच की वह पारंपरिक नकारात्मक सोच भी परिलक्षित होती है जो अन्य कई स्वरों के रूप में भी विभिन्न दक्षिण भारतीय नेताओं के मुँह से कभी-कभार सुनाई देती है। परन्तु हमें उन विवादों में जाने से कोई लाभ नहीं। मोटे तौर पर हमें यही समझना होगा कि हमारी मातृभाषा व राष्ट्रभाषा का सबसे अधिक विरोध सदैव इन्हीं द्रविड़ व तमिल भाषी क्षेत्रों में किया जाता रहा है। ऐसा भी सुना जाता है कि दक्षिण भारत के इन्हीं राज्यों में कहीं-कहीं रावण की भी पूजा की जाती है। इस क्षेत्र के कुछ इतिहासकार यह भी लिखते हैं कि भगवान राम द्वारा स्रूपनखा की नाक काटने की घटना उत्तर भारत के उच्च जाति के एक राजा द्वारा दक्षिण की एक महिला का किया गया अपमान मात्र था।

बहरहाल इस विशाल धर्म निरपेक्ष भारत में जबकि हम सभी धर्मों व सम्प्रदायों के लोगों को साथ लेकर चलने का दम भरते हैं तथा दुनिया को यह बताते हुए हम नहीं थकते कि अनेकता में एकता की जो मिसाल हमारे देश में देखी जा सकती है वह और कहीं नहीं मिलती। ऐसे में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के अस्तित्व को लेकर हिन्दू धर्म के भीतर छिड़ा आपसी घमासान ही धर्म निरपेक्षता के सभी दावों को मुंह चिढ़ाता है। अत: बेशक करुणानिधि या किसी भी धर्म एवं सम्प्रदाय का कोई अन्य व्यक्ति किसी समुदाय के ईष्ट के प्रति अपनी आस्था रखे या न रखे नि:सन्देह यह उसका अत्यन्त निजी मामला है व उसका अपना अधिकार भी, परन्तु किसी समुदाय के ईष्ट के अस्तित्व को ही चुनौती दे डालने का अधिकार किसी को भी नहीं होना चाहिए। बेहतर होगा कि करुणानिधि भारतीय समाज से अपने विवादित वक्तव्य के लिए क्षमा मांग कर इस मामले पर यहीं विराम लगा दें।

निर्मल रानी

9/26/2007

सत्ता बड़ी या राम

भारात में धार्मिक भावनाओं को भड़का कर राजनीति करने में महारत रखने वाले लोग एक बार फिर अपने असली चेहरे के साथ सक्रिय हो उठे हैं। मज़े की बात तो यह है कि इस बार वे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का आरोप तो भारत की सत्तारूढ़ केन्द्र सरकार पर लगा रहे हैं जबकि अपने इसी आरोप के तहत जनता की धार्मिक भावनाओं को भड़काने के ठेकेदार वे स्वयं बन बैठे हैं। भारतीय राजनीति के इतिहास में दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में साझीदार रह चुकी है। भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि 542 सदस्यों की लोकसभा में 183 सीटें प्राप्त करने का उसका अब तक का सबसे बड़ा कीर्तिमान केवल रामनाम की राजनीति करने की बदौलत ही संभव हो सका है। ज्ञातव्य है कि रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने पूरे देश में यह प्रचार किया था कि सत्ता में आने पर वह रामजन्म भूमि मन्दिर का निर्माण कराएंगे। देश के सीधे-सादे रामभक्तों ने इन्हें इसी आस में देश के सबसे बड़े राजनैतिक दल का दर्जा भी दिला दिया।

अफ़सोस की बात है कि भारतीय जनता पार्टी ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्रीय सत्ता संभालने के बाद अपना भगवा रंग ही बदल डाला और कांग्रेस की राह पर चलते हुए तथाकथित धर्म निरपेक्षता की राजनीति करने लगी। उस समय राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के अन्य सहयोगी दलों ने सरकार बनाने में भारतीय जनता पार्टी का साथ इसी शर्त पर दिया कि वह रामजन्म भूमि, समान आचार संहिता और कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने जैसे अपने प्रथम व अग्रणी मुद्दों को त्याग देगी। भाजपा के 'रामभक्तों' ने ऐसा ही किया। उस समय इनके समक्ष दो विकल्प थे। या तो यह राम को चुनते या सत्ता को। इन धर्म के ठेकेदारों ने उस समय सत्ता का स्वाद लेना अधिक ंजरूरी समझा। क्या इन तथाकथित रामभक्तों को उस समय सत्ता को ठोकर मारकर अन्य राजग सहयोगी दलों के समक्ष यह बात पूरी ंजोर-शोर से नहीं रखनी चाहिए थी कि हम रामभक्तों के लिए पहले हमारे वे एजेन्डे हैं जिनके नाम पर हमें सबसे बड़े राजनैतिक दल की हैसियत हासिल हुई है न कि सत्ता। यदि भाजपा उस समय राम मन्दिर के मुद्दे पर सत्ता को ठुकरा देती तो काफ़ी हद तक यह बात स्वीकार की जा सकती थी कि उनमें राम के प्रति लगाव का वास्तविक जज़्बा है परन्तु मन्दिर निर्माण के बजाए सत्ता से चिपकने में दिलचस्पी दिखाकर इन्होंने यह साबित कर दिया कि इनकी नंजर में सत्ता बड़ी है राम नहीं।
एक बार फिर राम के नाम पर यही लोग वोट माँगने की तैयारी कर रहे हैं। इस बार मुद्दा रामजन्म भूमि को नहीं बल्कि रामसेतु को बनाया जा रहा है। भारत-श्रीलंका के बीच बहने वाले समुद्री जल के मध्य ढाई हंजार करोड़ रुपए की लागत से सेतु समुद्रम शिपिंग चैनल परियोजना का निर्माण कार्य किया जाना प्रस्तावित है। 1860 में भारत में कार्यरत ब्रिटिश कमांडर एडी टेलर द्वारा सर्वप्रथम प्रस्तावित की गई इस परियोजना को 135 वर्षों बाद रचनात्मक रूप देने का प्रयास किया जा रहा है। 12 मीटर गहरे और 300 मीटर चौड़े इस समुद्री मार्ग का निर्माण स्वेंज नहर प्राधिकरण द्वारा किया जाना है। यही प्राधिकरण इसे संचालित भी करेगा तथा इसका रख-रखाव भी करेगा।

भारतीय जनता पार्टी इस परियोजना का विरोध कर रही है। भाजपा का यह विरोध इस बात को लेकर है कि चूंकि सेतु समुद्रम परियोजना में उस सेतु को तोड़ा जाना है जिसे कि रामसेतु के नाम से जाना जाता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार समुद्र के मध्य पुल के रूप में नंजर आने वाली यह आकृति उसी पुल के अवशेष हैं जिसका निर्माण हनुमान जी की वानर सेना द्वारा भगवान राम की मौजूदगी में श्रीलंका पर विजय पाने हेतु किया गया था। नि:सन्देह ऐसी किसी भी विषय वस्तु पर जहां कि किसी भी धर्म विशेष की भावनाओं के आहत होने की संभावना हो, किसी ंकदम को उठाने से पूर्व उस विषय पर गंभीर चिंतन किया जाना चाहिए। ऐसी पूरी कोशिश होनी चाहिए कि किसी भी धर्म विशेष की धार्मिक भावनाएं आहत न होने पाएं। परन्तु भारतीय जनता पार्टी जैसे राजनैतिक दल पर तो क़तई यह बात शोभा नहीं देती कि वह रामसेतु मुद्दे पर आम हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं की संरक्षक, हिमायती अथवा पैरोकार स्वयंभू रूप से बन बैठे।

आज भाजपा द्वारा रामसेतु मुद्दे पर हिन्दुओं की भावनाओं को भड़काने तथा इस परियोजना का ठीकरा वर्तमान संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार विशेषकर कांग्रेस, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सिर पर फोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। आश्चर्य की बात है कि वह भारतीय जनता पार्टी ऐसे आरोप लगा रही है जिसके अपने शासनकाल में केन्द्र सरकार के 4 मंत्रियों अरुण जेटली, शत्रुघ्न सिन्हा, वेद प्रकाश गोयल व एस त्रिवुनवक्कारासू द्वारा सन् 2002 में सेतु समुद्रम परियोजना को प्रारम्भिक दौर में ही पहली मंजूरी दी गई थी। उसके पश्चात जब परियोजना से सम्बद्ध सभी मंत्रालयों से हरी झंडी मिल गई तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा 2 जुलाई 2005 को इस परियोजना की शुरुआत की गई। यहां भाजपा के विरोध को लेकर एक सवाल और यह उठता है कि उसका यह विरोध 2005 से ही अर्थात् परियोजना पर काम शुरु होने के साथ ही क्यों नहीं शुरु हुआ? आज ही इस विरोध की ज़रूरत क्यों महसूस की जा रही है और वह भी इतने बड़े पैमाने पर कि गत् दिनों भोपाल में आयोजित भाजपा कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी को यह घोषणा तक करनी पड़ी कि राम के नाम पर भावनाओं से खिलवाड़ भरतीय जनता पार्टी का चुनावी मुद्दा होगा। क्या दो वर्षों की ख़ामोशी इस बात का सुबूत नहीं है कि भाजपा चुनावों के नज़दीक आने की प्रतीक्षा कर रही थी? इसलिए उसे पिछले दो वर्षों तक इस मुद्दे को हवा देकर अपनी उर्जा नष्ट करने की ज़रूरत नहीं महसूस हुई। भाजपा द्वारा सेतु समुद्रम परियोजना का अब विरोध किए जाने से सांफ जाहिर हो रहा है कि विपक्षी पार्टी के नाते भाजपा इस समय इस परियोजना के काम में न केवल बाधा उत्पन्न करना चाहती है बल्कि इसे अपनी चुनावी रणनीति का एक हिस्सा भी बनाना चाहती है।

आने वाले दिनों में भारतीय जनता पार्टी को उर्जा प्रदान करने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद तथा दक्षिणपंथी विचारधारा के इनके अन्य कई सहयोगी संगठन इस मुद्दे पर राजनीति करने का प्रयास करेंगे। परियोजना को प्राथमिक मंजूरी देने वाली भाजपा इस परियोजना के नाम पर स्वयं को तो रामभक्त तथा रामसेतु का रखवाला प्रमाणित करने का प्रयास कर रही है जबकि परम्परानुसार सत्तारूढ़ दल विशेषकर कांग्रेस व वामपंथी दलों को भगवान राम का विरोधी बताने की कोशिश में लगी है।
उपरोक्त परिस्थितियाँ यह समझ पाने के लिए काफ़ी हैं कि भाजपा कितनी बड़ी रामभक्त है और कितनी सत्ताभक्त। राम के नाम पर वोट मांगने की क़वायद भाजपा के लिए कोई नई बात नहीं है। हां इतना ज़रूर है कि राम के नाम पर वोट माँगने के बाद राम मन्दिर निर्माण के बजाए सत्ता के पाँच वर्ष पूरे कर चुकी भारतीय जनता पार्टी ने भारतीय मतदाताओं के समक्ष अपनी साख को अवश्य समाप्त कर दिया है। लिहाज़ा सेतु समुद्रम परियोजना को लेकर भाजपा भारतीय मतदाताओं की भावनाओं को पुन: भड़का पाने में कितनी सफलता प्राप्त कर सकेगी और कितनी असफलता यह तो आने वाला समय ही बता सकेगा।
- तनवीर जाफ़री

9/23/2007

संतो की धरतीःछत्तीसगढ़



युधिष्ठिर ने यक्ष के प्रश्न-'कौन सा मार्ग मनुष्य को अनुसरण करना चाहिए', के जवाब में कहा 'संतो दिक्' अर्थात् संतो के द्वारा बताये गए मार्ग का अनुसरण मनुष्य को करना चाहिए। वस्तुत: संत ही वे दीप हैं जो मनुष्यों का पथ प्रदर्शन करते हैं। उनके द्वारा बताये गये मार्ग उनके ध्येय प्राप्त करने में सहायता करते हैं। 'आत्मनो मोक्षाय, जगत हिताय च' संत मोक्ष की कामना के साथ समाज उद्धार की कामना भी करते हैं। यद्यपि संतों का सर्वप्रथम प्रेम ईश्वर के प्रति होता है इसके बावजूद यह समाज की भलाई और सर्वजन कल्याण की भावना से ओतप्रोत होता है। संतों में ज्ञान और पराभक्ति दोनों होता है। संतों का ज्ञान परमात्मा के विषय में निजी अनुभवों से संपृक्त होता है। वह जगत में सर्वत्र भगवान को देखता है। उसका प्रेम मंदिर में स्थित मूर्ति तक सीमित नहीं होता बल्कि समस्त विश्व में प्रवाहित है। उसका प्रेम विश्वजनीन है। उसमें सर्वोच्च दर्शन, तीव्र भक्ति और संपूर्ण अहंकार शून्यता अंतर्निहित है।

छत्तीसगढ़ प्रदेश ऐसे अन्यान्य संतों की जन्मस्थली और कार्यस्थली रही है। सतयुग में महर्षि मतंग ऋषि का गुरूकुल आश्रम शिवरीनारायण क्षेत्र में था। यहाँ शबरी निवास करती थी। उनका उद्धार करने के लिए श्रीराम और लक्ष्मण यहाँ आये थे। उनकी स्मृति में शबरीनारायण बसा है। पंडित मालिकराम भोगहा द्वारा रचित श्री शिवरीनारायण माहात्म्य का एक उध्दरण देखिये :-

जो प्रसन्न तुम मो पर रघुवर देहु मोहि वरदान यही
मेरे नाम सहित प्रभु जी के नाम उचारें सकल मही
कमल नयन ! अब मेरे हित तुम रचहु चिता निज रूचि अनुसार पंचभूत तनु जारि भुवन तुव जाऊं सकल पाप करि छारे॥

महानदी की उद्गम स्थल सिहावा में श्रृंगी ऋषि का आश्रम था जहाँ वे अपनी पत्नी शांता के साथ रहते थे :-

चंदमुखी शांता सुख दायिनि पतीभक्ति नित प्रति पारायनि
सेवा करत सुमति हरषाई श्रृंगी ऋषि की कपट बिहाई
(देश) निकट गिरि कंक सुहाई तहां उटज मुनि सुभग बनाई
शांता सहित रहत सुखदाई नृप आदिक पूजत तहं जाईते॥

इसी प्रकार महानदी के किनारे कसडोल के पास स्थित तुरतुरिया में महर्षि बाल्मिकी का आश्रम था जहाँ लव और कुश का जन्म हुआ था। प्रसिद्ध तीर्थ राजिम भी महर्षि मुचुकुंद की तपस्थली था जहाँ महाराजा सगर के हजारों पुत्र भस्म हो गये थे। कांकेर में कंक ऋषि का आश्रम था। सरगुजा की पहाड़ी में कालिदास के रहने की पुष्टि होती है। प्रसिद्ध दार्शनिक और बौध्द धर्म की महायान शाखा के संस्थापक नागार्जुन भी यहीं हुए थे। तभी तो कवि शुकलाल पांडेय छत्तीसगढ़ गौरव में गाते हैं :-

यहीं हुए भवभूति नाम संस्कृत के कविवर
उत्तार रामचरित्र ग्रंथ है जिनका सुंदर
वोपदेव से यहीं हुए हैं वैयाकरणी
है जिनका व्याकरण देवभाषा निधि तरणी
नागार्जुन जैसे दार्शनिक और सुकवि ईशान से
कोशल विदर्भ के मध्य में हुए उदित शशिभान से।
नागार्जुन :-
नागार्जुन को बौध्द धर्म की महायान शाखा का संस्थापक माना जाता है। उन्हें सम्राट कनिष्क और सातवाहन राजवंश के समकालीन माना जाता है। हुएनसांग ने 'भारत भ्रमण वृत्तांत' में नागार्जुन को कोसल निवासी बताया है। उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ को प्राचीन काल में दक्षिण कोसल कहा जाता था। राहुल सांकृत्यायन ने भी 'राहुल यात्रावली' में नागार्जुन को दक्षिण कोसल का निवासी माना है। डॉ. दिनेश चंद्र सरकार और पंडित लोचन प्रसाद पांडेय ने उन्हें छत्तीसगढ़ के श्रीपुर का निवासी माना है। नागार्जुन जिस 'महामयूरी' विद्या के साधक थे, उसका उललेख बस्तर के एक लोकगीत में मिलता है :-

सिरी परवते मयूर डाके, मयूर डाके।
बाई के चलिबो ठोड़िया नाके, ठोड़िया नाके।
गोटे जिया माकू देवी, काय बाई गोटे जिया माकू देवी।
बाई खाये रेखी रेखी काय बाई खाय रेखी रेखी॥

इस लोकगीत में श्री पर्वत मयूर और माकू देवी का उल्लेख है। माकू देवी 'मामकी' का अपभ्रंश है जो रत्नकेतु ध्यानी बुध्द की शक्ति है। मयूर 'महामयूरी' देवी को कहा जाता है। श्रीपर्वत वही स्थान है जहाँ नागार्जुन ने 12 वर्षो तक वट यक्षिणी की साधना करके सिध्दि प्राप्त की थी।श्रीपर्वत (श्रीशैल) बस्तर की सीमा से लगा आंध्र प्रदेश में स्थित है। कदाचित् यह क्षेत्र प्राचीन काल में दक्षिण कोसल अथवा दंडकारण्य का भाग रहा हो। नागार्जुन ने अपने ग्रंथ 'रस रत्नाकर' में इस पर्वत पर सिध्दि प्राप्त करने का उल्लेख किया है :-

श्री शैल पर्वत स्थायी सिध्दो नागार्जुनो महान्।
सर्व सत्वोपकारी च, सर्व भाग्य समन्वित:॥
प्रार्थितो ददते शीघ्र यश्च पश्यति याद्शम्।
दृष्टता त्यागं भोगं च सूतकस्य प्रसादत:॥
सत्वानां भोजनार्थाय सोधिता वट यक्षिणी।
द्वादशानि च वर्षाभि महाक्लेष: कृतोमया॥
तत्कात दृष्ट द्रव्याणं दिव्यावाणी मयाश्रुता।
अदृष्ट प्रार्थिता पश्चात् दृष्टा त्वंभव साम्प्रतम्॥

नागार्जुन एक महान दार्शनिक और प्रखर संत ही नहीं बल्कि रस सिध्दि योगी और आयुर्वेदाचार्य थे। ध्यान के माध्यम से उन्होंने अनेक आध्यात्मिक सिध्दियां प्राप्त की थी। छत्तीसगढ़ में जन्में नागार्जुन को ज्ञान विज्ञान, योग और तंत्र ने अमर बना दिया। उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध धार्मिक नगर शिवरीनारायण प्राचीन काल में प्रसिद्ध तांत्रिक पीठ था।

महाप्रभु बल्लभाचार्य :-
छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध तीर्थ राजिम के उत्तार में 14 कि. मी. पर चम्पारण्य ग्राम स्थित है जहाँ पंचकोशी यात्रा का एक पड़ाव चम्पकेश्वर महादेव का है। महानदी के तट पर मनोरम दृश्य से परिपूर्ण इस ग्राम में महाप्रभु बल्लभाचार्य का जन्म एक दैवीय घटना थी। उत्तार भारत से दक्षिण भारत जाने का मार्ग शिवरीनारायण, राजिम और चम्पारण्य से गुजरता था। श्री लक्ष्मण भट्ट और उनकी गर्भवती पत्नी इल्लमा इस रास्ते से दक्षिण भारत की यात्रा कर रहे थे। तभी उनके गर्भ से बालक बल्लभ का जन्म हुआ। बच्चा निर्जीव प्रतीत हो रहा था। उसे एक पेड़ के नीचे पत्तों पर लिटाकर ईश्वरोपासना में लीन हो गए। प्रात: उन्होंने देखा कि बालक अपने अंगूठे को चूसता हुआ मुस्कुरा रहा था। यही बालक आगे चलकर वैष्णव भक्ति की शुध्दाद्वैत धारा का प्रवर्तक हुआ जिसे आज पुष्टि मार्ग के नाम से जाना जाता है। यही बालक आगे चलकर महाप्रभु बल्लभाचार्य के नाम से विख्यात् हुआ। उन्होंने वेदांत की तर्क संगत सरल व्याख्या की है। उन्हें भगवान विष्णु का अंशावतार माना जाता है। उन्होंने उत्तार भारत में वैष्णव पंरपरा के मार्ग को पुष्ट किया। चम्पारण्य में ''श्रीमद् बल्लभाचार्य धर्म संस्कृति शोध अन्वेषण संस्थान'' की स्थापना पूज्यपाद गोस्वामी मथुरेश्वर द्वारा की गयी है। कवि शुकलाल पांडेय भी गाते हैं :-

जन्मभूमि बल्लभाचार्य की है चम्पाझर
बसे शंभू अभ्यंकर प्रयलंकर शंकर॥

बलभद्रदास :-
रायपुर के दूधाधारी मठ के संस्थापक महात्मा बलभद्र दास थे। चूंकि वे अन्न जल के बजाय केवल दूध ग्रहण किया करते थे अत: उनका नाम 'दूधाधारी' पड़ गया। हालाँकि उनका जन्म राजस्थान के जोधपुर जिलान्तर्गत आनंदपुर (कालू) में पंडित शंभूदयाल गौड़ के पुत्र के रूप में हुआ था, लेकिन उनकी कार्यस्थली छत्तीसगढ़ का रायपुर था। बचपन से ही वे बड़े चमत्कारी थे। वे भ्रमण करते हुए पहले महाराष्ट्र और फिर छत्तीसगढ़ आ गए। उनके चमत्कारों से प्रभावित होकर अनेक राजा-महाराजा उनके शिष्य हो गए। भंडारा जिले के पावनी में महंत गरीबदास द्वारा निर्मित श्रीरामजानकी मंदिर में वे बहुत दिनों तक रहे। यहीं उन्होंने गरीबदास को अपना गुरू बनाया और बालमुकुंद से बलभद्रदास हो गए। उनके पास एक शेर और शेरनी था। शेर का नाम नरसिंह और शेरनी का नाम लक्ष्मी था। 17 वीं शताब्दी के आरंभ में वे रायपुर आ गए। तब यहाँ भोंसलों का शासन था। उनकी चमत्कारी प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें रायपुर में रहने की प्रार्थना भोंसले राजा ने की और एक मठ का निर्माण सन् 1640 में कराया जिसके वे पहले महंत हुए। इस मठ को 'दूधाधारी मठ' कहा जाता है। लोग उनके संपर्क में आते गये और शिष्य बनते गये। आगे चलकर इस मठ में सेठ दीनानाथ अग्रवाल ने श्रीरामजानकी का भव्य मंदिर बनवाया। छत्तीसगढ़ का यह एकलौता मंदिर है जहाँ श्रीरामजानकी के अलावा लक्ष्मण्, भरत, शत्रुघन और हनुमान की भव्य झांकी है। तब से लेकर आज तक इस मठ के क्रमश: बलभद्रदास, सीतारामदास, अर्जुनदास, रामचरणदास, सरजूदास, लक्ष्मणदास, बजरंगदास, और वैष्णवदास महंत हुए और वर्तमान में राजेश्री रामसुदरदास यहाँ के महंत हैं।

अर्जुनदास :-
स्वामी अर्जुनदास जी शिवरीनारायण मठ के ग्यारहवीं पीढ़ी के महंत थे। वे शिवरीनारायण तहसील के आनरेरी बेंच मजिस्ट्रेट भी थे। बिलासपुर जिलान्तर्गत (वर्तमान रायपुर) ग्राम बलौदा में संवत् 1867 में उनका जन्म हुआ। 18 वर्ष की आयु तक विद्याध्ययन किया और फिर वे मठ मंदिर में पुजारी नियुक्त होकर 23 वर्ष की आयु में इस मठ के महंत बने। वे बड़े आस्तिक थे। बचपन से ही नदी से कंकड़, पत्थर लाकर उनकी पूजा किया करते थे। आपको हनुमान जी की बड़ी कृपा मिली थी। श्रीराम की उपासना में सदा दृढ़ रहते हुए रामायणादि और भगवत्कथा के श्रवण में सदा लीन रहते थे। उनके मुख से निकली हुई हर बात सत्य होती थी। उनके आशीर्वाद से संवत् 1927 में अकलतरा के जमींदार श्री सिदारसिंह और लवन के पंडित सुधाराम को पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। तत्पश्चात् स्वामी जी की प्रेरणा से सिदारसिंह ने अपने भाई श्री गरूड़सिंह की सहायता से संवत् 1927 में श्रीराम लक्ष्मण और जानकी जी का मंदिर बनवाया। इसी प्रकार पंडित सुधाराम ने भी मठ परिसर में संवत् 1927 में एक हनुमान जी का मंदिर बनवाया। इसी प्रकार श्री रामनाथ साव ने स्वामी जी की प्रेरणा से चंद्रचूड़ महादेव मंदिर के बगल में संवत् 1927 में एक महादेव जी का मंदिर बनवाया। इस मंदिर में भगवान विष्णु की चतुर्भुजी मूर्ति भी है। आज उनके वंशज श्री मंगलप्रसाद, श्री तीजराम और श्री जगन्नाथ प्रसाद केशरवानी इस मंदिर की देखरेख और पूजा-अर्चना कर रहे हैं। स्वामी जी की प्रेरणा से भटगाँव के जमींदार श्री राजसिंह ने मठ प्रांगण में जगन्नाथ मंदिर की नींव संवत् 1927 में डाली, जिसे उनके पुत्र श्री चंदनसिंह ने पूरा कराया और भोग रागादि की व्यवस्था की। इसी समय भटगाँव के जमींदार ने योगी साधु-संतों के निवासार्थ जोगीडीपा में एक भवन का निर्माण कराया जिसे आज जनकपुर के नाम से जाना जाता है। रथयात्रा में आज भी भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी एक सप्ताह यहाँ विश्राम करते हैं। संवत् 1928 में यहाँ श्री बैजनाथ साव, चक्रधर, बोधराम और अभयराम ने एक हनुमान जी का भव्य मंदिर बनवाया। महंत अर्जुनदास जी यहाँ एक सुंदर बगीचा लगवाया था। वे यहाँ प्रतिदिन आया करते थे। द्वार पर एक शिलालेख है जिसमें हनुमान मंदिर बनाने का उल्लेख है। उन्होंने संवत् 1923 से 1927 तक नारायण मंदिर के चारों ओर पत्थर से पोख्तगी कराकर मंदिर को मजबूती प्रदान कराया। यही नहीं बल्कि इधर उधर बिखरे मूर्तियों को दीवारों में जड़वाकर सुरक्षित करवा दिया। आज यहाँ का मंदिर परिसर जीवित म्यूजियम जैसा प्रतीत होता है। संवत् 1929 में मठ परिसर में पूर्व महंतों की समाधि में छतरी बनवायी। फाल्गुन शुक्ल पंचमी, संवत् 1944 को