1/13/2006

मन हो जाता है उन्मन


कभी-कभी मन हो जाता है उन्मन

कभी-कभी मन हो जाता है उन्मन
सूखे पत्तों से भर जाता है सूना आँगन...

गीत-गजल सब फीके लगते
सन्नाटा मन में भर जाता .
यादों की पुरवाई चलती
घाव पुराना रिस-रिस जाता.
कभी-कभी हँसते-हँसते करता रोने को ये मन...

आतप की ज्वाला में जलते
पेडों में फिर भी हरियाली.
हम पर वक्त कठिन जो आता
काली हो जाती दीवाली.
कभी-कभी बिन बरसे चल देता है सावन...

कब तक खुद से बात करें हम
डर लगता सच के दर्पण से.
मुर्दे फिर जीवित हो जाते
कितना शान्त करें तर्पण से.
कभी-कभी जड हो जाता है चेतन...
0 संतोष रंजन
रायपुर, छत्तीसगढ

1 टिप्पणी:

गरिमा मल्होत्रा, पेरिस ने कहा…

रचनाकार को बहुत-बहुत बधाई । इसे मैं एक बडे रचनाकार का गीत मानता हूँ और श्री संतोष जी से निवेदन करता हूँ कि आप हमें लगातार ऐसे गीत पढने का मौका दिलाते रहें । मन की वेदना को शब्दायित कर दिया है आपने । कृपया अपना पता या मेल जरूर देवें । अगली बार ,,,,, आमीन...