1/31/2006

डॉ. बल्देव की कविताएँ

एकः कविता

दरअसल कविता आँख है
जिसमें भीतर की दुनिया
बाहर दिखाई देती है

दरअसल कविता हथियार है
जिसमें बाहर की लडाई
भीतर लडी जाती है

दरअसल कविता क्या है
कविता न आँख है न हथियार है
दरअसल कविता
एक नन्हीं-सी गौरेया है
जिसकी चोंच में
सारा आकाश होता है

दोः प्रार्थना

दिग्काल लांघता यातनाओं का सूरज चला गया
प्रार्थनाओं का आकाश में
देखता ही देखता रह गया
थी बूँद भर की प्यास
किन्तु सिन्धु को टेरता ही रह गया
तीनः अनुभव

उथला बह जाता है
गहरा रह जाता है
बाढ का उथला जल
बहा ले जाता है
बह जाता है
गहरा जल बहता हुआ भी
रह जाता है

चारः रोको

रोको
रोको उस आग में नहाती हुई को
रोको उस तेजाब पीते हुए को
रोको
सब कुछ खत्म होने से पहले
इस स्वर्ग-सी
धरती को
नर्क होती धरती को

पाँचः बाँसुरी


छुपाकर यहीं कहीं रक्खी तो थी
बाँसुरी को
नहीं मिल रही है
शायद ले गयी वो
अपने सीने में छुपाए

छहः शून्य

सुख और दुख से परे
सत्य का अनुभव
निराकार होता है
विवेक शून्य में नहीं
वृहत्तर जीवन में जागता है
इसीलिए तो आस्था जरूरी है
इसके बिना
आनंद
निराधार होता है

सातः आसाढ सा प्रथम दिन से

धरती के उतप्त तवे पर
छम-छम नाच रहीं बूँदे
भींज रहा मैं
बाहर-भीतर
एक बीज
आँखें मूँदें

आठः कामना

इसके पूर्व कि लोहा ठंडा हो
हथौडे की चोट से
समय की चाक पर चढा दो
इसके पूर्व कि सूर्य ठंडा हो
पृथ्वी की कोख से
हजारों सूर्य पैदा हों

नौः मृग आखेटक

मृग आखेटक मृग आखेटक
एक न झाडी
एक न जंगल
पथराई आँखें
तप्त मरूस्थल
एकटक
देख रही एकटक

दसः उर्ध्वमुखी-नदी

अजगर जैसे
मुँह को खोले
सरक रही है
काले पहाड पर
नदी आग की
सिंह-शावक इस पार
उस पार मृग-शावक के
त्राण चाहती
इस पर मृगी
उस पार सिंहनी
चकित देखती
नदी आग की
जड-चेतन पर
पसर रही है
लावा जैसी
नदी आग की

(
डॉ. बल्देव हिन्दी व छत्तीसगढी के वरिष्ठ आलोचक हैं । उन्होंने मैथिलीशरण गुप्त से लेकर अभी हाल के महत्वपूर्ण हिन्दी कवि अरूण कमल तक की रचनाओं की ललित निबंध की शैली में समीक्षा की है । किताबें- कविता-वृक्ष में तब्दील हो गई औरत, खिलना भूलकर, सूर्य किरण की छाँव में, धरती सबके महतारी, आलोचना- ढाई आखर, छायावाद और मुकुटधर पांडेय, विश्ववोध, छायावाद एवं अन्य श्रेष्ठ निबंध। संपादक)

1/27/2006

खंडकाव्यः संकटमोचन

प्रथम सर्ग

मंद-मंद स्वच्छंद सुगंधित मलय-पवन
तन-मन के सारे तापों का करे शमन
चारों ओर वृक्ष-पौधों से प्रमुदित वन
मानो ऋतुपति ने पाया चिर आमंत्रण
खगकुल-कल कूजन, भौरों का मधु गुंजन
और सिद्ध-ऋषि-मुनियों का मंत्रोच्चारण
सदा अलौकिक आभा-मंडित वन-प्रांगण
तीर्थ प्रभास जिसे कहते थे ज्ञानी जन

वन-प्रांतर था, सारा वन रजधानी थी
राजा थे केसरी, अंजना रानी थी
क्या ने देवोपम थे, अथवा नर थे वे
कामरूप इच्छाधारी वानर थे वे

यहीं पास ही भरद्वाज का आश्रम था
नदी-स्नान का प्रतिदिन का जिन का क्रम था
धवल नाम का हाथी एक क्षुधातुर था
उसे क्या पता, पीछे राजबहादुर था
ज्यों ही झपटा मुनि पर, राजा हुए विकल
टूट पडे वे तत्क्षण, आहत हुआ धवल
प्राणों की रक्षा से हर्षित थे मुनिवर
कहा केसरी से- “प्रिय, मुझ से माँगो वर”

विद्या-बल-वैभव से आँचल पूरा था
रानी का मातृत्व परंतु अधूरा था
“एक पुत्र ऐसा माँगूँ, जो हो अनन्य”
“एवमस्तु” सुन कर राजा हो गए धन्य

शिव की उपासना में थी अंजना उधर
सब कुछ न्याछावर करने को भी तत्पर
पति-पत्नी जब दृढ निश्चय कर लेते हैं
स्वयं ईश भी आग्रह से वर देते हैं

पुत्र-रूप में रूद्र स्वयं गर्भस्थ हुए
रूद्रवतार से सुर-मुनि आश्वस्त हुए
“विद्या-बुद्धि-शक्ति का अद्भूत समीकरण
सदाचार-सेवा का होगा उदाहरण
चिरंजीव होगा सुत पाएगा वंदन
परहित धर्म निभाएगा संकटमोटन ”

अंतर्धान हुए शिव दे कर दान महा
श्रद्धा से सब सुलभ, किसी ने ठीक कहा

तीन रानियाँ थीं कोसलपति दशरथ के
निष्फल कभी न होते राही सत्पथ के
संसृति के सार-रूप की परिणति है
संतति की चिंता से राजा थे विह्वल
उन के पास नहीं था उस का समुचित हल
गुरु वसिष्ठ ने किया यज्ञ-का आयोजन
“अग्निदेव का दान ग्रहण कर लो राजन् ”
चार प्रतापी पुत्रों के तुम अधिकारी
रह जाएगी और न कोई लाचारी ”
कौसल्या –कैकयी के हिस्से दे कर
ज्यों ही उए सुमित्र को देने तत्पर
क्षीर की जगह चंचु आ गया दोने में
क्षण भर लगा चील को ओझल होने में
क्षीर वस्तुतः और किसी को मिलना था
शिव-पसाद से भाग्य किसी का खिलना था
छूटा दोना, चील-चंचु से गिरा वहाँ
अंजलि खोले तपोनिरत अंजना जहाँ
पवनदेव ने कहा-“शुभे, यह ग्रहण करो
यह चरु शिव का पत्र-प्राप्ति-वर वरण करों ”
चैत्र शुक्ल का एकादश था मंगलवार
जिस दिन मेरा हुआ इस धरा प अवतार
मिला अंजना माता को यह धन अमूल्य
पटरानी का सुख-वैभव भी था अतुल्य
हुआ असाधारण उत्सव का आयोजन
सिद्ध-साधकों, तपस्वियों का शुभागमन
दिया सभी ने मुझ को वह आशीर्वचन
जिस को पा कर धन्य हुआ मेरा जीवन
जिस के स्मरण-मात्र से खिल जाता है मन
सचमुच कितना प्यारा होता है बचपन
जहाँ न कोई सीमा और नहीं बंधन
सचमुच बचपन वही, वही सचमुच बचपन
चंचल बच्चों को कपि कहने का प्रचलन
कपि के बचपन का अनुपम है उदाहरण
भूख लगी, देखा मैं ने घर सूना है
माँ न अगर हो घर में, तो दुख दूना है
पिता केसरी नहीं, बढ गया सूनापन
तीव्र भूख से व्याकुल तन था, व्याकुल मन
फल की इच्छा से देखा जब इधर-उधर
पत्तों से भी थे विहीन सारे तरुवर
पतझर थी, पर भूख भूख ही होती है
तभी लाल गोलाकृति-सा फल दीख पडा
मन में हलचल मची, नहीं रह सका खडा
पवन-वेग से उडने लगा खाद्य की ओर
पता नहीं था, वह इतना होगा अछोर
बढता जाता नभ-पथ में आगे-आगे
लगता मानो वह फल भी भागे-भागे
क्षण भर को मन खिन्न हुआ, पर थका नहीं
ऐसी इच्छा क्या, जिस को पा सका नहीं
ज्यों ही आगे बढा, प्रतनु हो गया समीर
लगा तैरने स्वयं हवा में सूक्ष्म शरीर
कुछ क्षण बाद लगा, यह तन जल जाएगा
फल का जो इच्छुक, वह क्या फल पाएगा
वह फल नहीं, सूर्य था, उस दिन सूर्यग्रहण
अंधकार से ग्रसित हो गया धरावरण
राहु इस तरह भी उत्पात मचाता है
कभी न देखा, जाने कौन बचाता है
इंद्रदेव की ओर सभी का ध्यान गया
अभिमानी से कहाँ अभिमान गया
उसने छोडा वज्रवाण, मैं क्षुबब्ध हुआ
हुआ पर्वताकार, सूर्यमंडल के पास
लोगों ने सोचा- यह कोई महाग्रास
ज्योंही भूतल पर मैं लौटा संज्ञाहीन
मता-पिता तुरंत हो गए सेवालीन
माँ को स्नेह-स्पर्श दे गया नवजीवन
पिता भवन का भी मझ को संरक्षण
लगता है अभिशाप, मिला वरदान मुझे
वज्र-अंग, “बजरंग” मिली पहचान मुझे
“हनूमान” यह नाम तभी से प्रचलन में
मैं ही “शंकरसुवन” “ केसरीनंदन” मैं
“आंजनेय”, “मारुति”, आदिक नामों का सार
स्वतः सिद्ध करता है नामों का आधार
नाम-रूप का द्वंद्व सदा भटकाता है
इसीलिए मुझ को कुरूप भी भाता है

वानर जाति, स्वभाव सदा है उच्छृंखल
यज्ञ आदि कर्मों में निरत तपस्वीदल
मैं शिशु, मुझ को ज्ञान-ध्यान से क्या मतलब
घर या बाहर, मुझ को लगें बराबर सब
खेल-खेल में वृक्ष उखाडा करता था
आश्रम-यज्ञस्थली उजाडा करता था
ऋषि-मुनि-तापस सब मुझ से संत्रस्त हुए
विस्मृति को अभिशाप दिया, आश्वस्त हुए

रूप-शक्ति को अगर याद करता रहता
मद का घडा अभी तक क्या भरता रहता
अहंकार के रहते क्या प्रभु मिल पाते
होंठ राम गुण गाने का क्या हिल पाते

(डॉ. चित्तरंजन कर देश के प्रख्यात भाषाविद् हैं । वर्तमान में पं. रविशंकर विश्वविद्यालय में अध्यक्ष, साहित्य एवं भाषा अध्ययनशाला के पद पर कार्यरत हैं । अभी तक इनकी भाषाविज्ञान की 10 साहित्य-समीक्षा की 14 पुस्तकें एवं 51 शोध पत्र राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं । इनके निर्देशन में 16 छात्रों ने पी-एच. डी. एवं 100 छात्रों ने अम.फिल किया है । छत्तीसगढी गीत, हिन्दी बालगीत एवं समकालीन कविता के क्षेत्र में इन्हें विशेष रूप से जाना जाता है । संगीत से गहरी अभिरूचि है इन्हें । हाल ही में उनका एक खंडकाव्य “ संकटमोचन” नाम से प्रकाशित हुआ है जिसमें हनूमान के चरित्र को नये आयाम से उभारा गया है । हिन्दी साहित्य की दृष्टि से इसे महत्वपूर्ण कृति मानी जा रही है । इस खंडकाव्य में कुल 11 सर्ग हैं जिसे हम क्रमशः सृजन-सम्मान की ओर से हमारे पाठकों के लिए प्रकाशित कर रहे हैं । प्रस्तुत है प्रथम सर्ग । हम अपने पाठकों की राय का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं । संपादक )

1/26/2006

शंभूलाल शर्मा वसंत की 10 बाल कविताएँ

सूरज दादा

सूरज दादा करवा लो तुम
जल्दी से उपचार ।

तेज बुखार चढा है तुमको
कुछ तो करो विचार ।

उचित नहीं है इस हालत में
करना कुछ भी काम ।

कम से कम दोपहरी में तुम
करो तनिक विश्राम ।

चंदामामा

मत देखो जी घूर-घूर,
इक तो रहते दूर-दूर ।

तारों के संग बढिया-से
पर बेचारी बुढिया से ।

चरखा नित कतवाते हो,
उस पर तरस न खाते हो ।

रूप बदल नित आते हो,
बादल से घबराते हो।

मामाजी कहलाते हो,
फिर काहे शरमाते हो।

अभिमानी बादल

बादल ये कितने अभिमानी,
जब चाहे करते मनमानी ।

बिन मौसम चौमास रचाकर,
करते हैं कितनी शैतानी ।

खेत-खार के फसल सडाकर
तोडे कितने छप्पर-छानी ।

सर पर हाथ धरे रह जाते
कृषकों को होती हैरानी

रंग-भंग कर देते कितने
बरसा जाते जमकर पानी ।

सागर की छोरी


रिमझिम गाती लोरी है,
सागर की वह छोरी है ।

तेवर जब दिखलाती है,
जमकर शोर मचाती है ।

तड-तड बिजली चमकाती,
बाढ भयंकर ले आती ।

सूरज भी इससे डरता,
जो जग को रोशन करता ।

जीवन सबका पानी है,
देती बरखा रानी है ।

कर देंगे हंगामा


मामा, सुन लो ध्यान से ,
एक दिन अपने यान से ।

चन्द्रलोक में आयेंगे,
तुमसे हम बतियायेंगे ।

और तुम्हारी बस्ती में,
झूम-झूमकर मस्ती में ।

तनिक सुधा रस पी लेंगे,
तारों के संग फिर खेलेंगे ।

नील गगन में हंगामा,
कर देंगे चन्दामामा ।

कोयल रानी


बात करो नहीं जोर से,
उड जाती है शोर से ।

पेड लदे हैं बौर से,
देखना उसको गौर से ।

इक सुन्दर वह प्राणी है,
मीठी उसकी वाणी है ।

अमराई में आती है,
कुहू-कुहू वह गाती है ।

लगती बडी सुहानी है,
वह तो कोयल रानी है ।

जंगल


हैं बंदर, भालू, शेर,
तोते हैं, मोर, बटेर ।

ये हरे-भरे हैं पेड,
इनको तू कभी न छेड ।

हैं कंद-मूल-फल भरे,
गाय और बकरियां चरें ।

यदि काटे कोई पेड,
तो जाकर उसे खदेड ।

हो जंगल का विस्तार,
करना है उससे प्यार ।

पर्वत


गले लगते हैं नभ से,
अडिग खडे हैं ये कब से ।

लगते सीधे-सादे हैं,
इनके नेक इरादे हैं ।

मेघों से बतियाते हैं,
वर्षा खूब कराते हैं ।

तूफाँ-आँधी आते हैं,
इनसे टकरा जाते हैं ।

कभी न शीश झुकाते हैं,
ये पर्वत कहलाते हैं ।

मेरा गाँव

प्यारा-प्यारा मेरा गाँव,
अजब निराला मेरा गाँव ।

चहुँ दिशाएँ पेड घनेरे,
देते सबको ठंडी छाँव ।

पशु-पक्षी के मन हर लेते,
बाग-बगीचे ठाँव-ठाँव ।

श्रम के बल पर लोग यहाँ के,
धरें उन्नति-पथ पर पाँव ।

सह लेते मौसम के तेवर,
पर न खोते अपने दाँव ।

तोता


छेडो मत गुस्साता है,
पुचकारों तो गाता है ।

चोंच नुकीली लाली है,
इसकी बात निराली है ।

कितनी मीठी वाणी है,
हरे रंग का प्राणी है ।

बागों में भी जाता है,
मीठे फल वह खाता है ।

पालो पर स्वच्छंद रखो,
पिंजडे में मत बंद रखो ।

(शंभूलाल शर्मा वसंत समकालीन बाल साहित्य के वरिष्ठ स्तम्भ हैं । पेशे से शिक्षक हैं । अब तक इनकी 400 बाल कविता, शिशुगीत हिन्दी की महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी हैं । कई पुरस्कारों से सम्मानित हैं वे । उनकी कृतियों में -मामी जी की अमराई, सतरंगी कलियाँ, चंदामामा के आँगन में, मेरा रोबोट आदि काफी लोकप्रिय हुईं हैं । प्रकृति और पर्यावरण को लेकर लिखने वाले बाल साहित्यकारों में उनकी विशिष्ट छवि है । शहर से दूर गाँव में उनका डेरा है । वैसे हम उनका पता बताये देते हैं- श्री शंभूलाल शर्मा वसंत, शिव कुटीर, मुकाम-करमागढ, पो.आ. हमीरपुर, व्हाया तमनार, जिला रायगढ(छत्तीसगढ), 496106 । संपादक)

1/25/2006

प्रेमचंद-कुछ यादें, कुछ छोटी-बडी बातें


प्रेमचंदः कुछ यादें
धनपत राय उर्फ नवाब राय यानी प्रेमचंद नाम है उस अजीम शख्सियत का जिसने कथा-साहित्य के क्षेत्र में हिन्दी तथा उर्दू भाषा-भाषियों के बीच अपनी अमिट छाप छोडी है। तुलसी के बाद यदि भारत में कोई सर्वाधिक लोकप्रिय साहित्यकार हुआ है तो वह निर्विवाद रूप से प्रेमचंद ही हैं जिनके उपन्यासों तथा कहानियों ने हिन्दी और उर्दू भाषा-भाषी राज्यों के घर-घर और जन-जन के बीच तो अपनी पैठ बनायी ही है, अहिन्दी भाषा-भाषी राज्यों और विदेशों में भी जिनकी कालजयी रचनाओं के अनुवादों ने पाठकों का मन मोह लिया है ।
प्रेमचंद की रचनाओं में जो ताजगी और प्रासंगिकता अपने रचना-काल के समय थी वह आज भी कायम है और संभवतः आने वाले समय में भी लम्बे समय तक यथास्थिति बनी रहेगी । इतना जरूर है कि पिछले छःसात दशकों में देश की राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में बदलाव आ जाने के कारण कुछ रचनाओं को उस समय के परिदृश्य और परिस्थितियो को ध्यान में रखकर पढना होगा ।
प्रेमचंद की दूर-दृष्टि विलक्षण थी । उनका यथार्थवादी साहित्य अपने समय के समाज, घटनाक्रमों तथा परिस्थितियों का आईना तो है ही, सुदूर भविष्य के बारे में भी उनके विचार और दृष्टिकोण सत्य की कसौटी पर शत-प्रतिशत खरे उतर रहे हैं । बीसवीं शताब्दी के आरम्भ से चौंथे दशक तक की तमाम ज्वलंत सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं, यथा विदेशी शासकों द्वारा किया जा रहा शोषण और अत्याचार, प्रशासन तंत्र की जडों तक समाया भ्रष्ट्राचार, जमींदारों का जुल्म, दलितों और गरीबों का उत्पीडन, बाल-विवाह, विधवा-विवाह जाति एवं वर्ग भेद, दहेज की कुप्रथा, नारी की व्यथा आदि विविध विषयों पर तो उन्होंने पुरजोर तरीके से कलम चलायी ही है, जनसंख्या विस्फोट और परिवार नियोजन जैसी ज्वलंत समस्या, जिसकी आज से सात-आठ दशक पहले न कहीं चर्चा थी और न कभी किसी बुद्धिजीवी ने इस विषय पर चिन्तन ही किया था, उन्होंने अपने कथा-पात्रों के माध्यम से गंभीर परिणाम की चेतावनी दे डाली थी जो आज सत्य की कसौटी पर कितनी सही साबित हो रही है यह किसी से छिपा नहीं ।
प्रेमचंद के कृतित्त्व पर, उसकी प्रासंगिकता पर अब तक काफी चर्चा हो चुकी है, बहुत कुछ लिखा जा चुका है तथा उसका पर्याप्त मंथन, समीक्षा, आलोचना एवं समालोचना हो चुकी है और अभी आगे भी होती रहेगी । देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में अब तक चार सौ से अधिक शोधार्थियों द्वारा प्रेमचंद पर शोध-प्रबन्ध प्रस्तुत किये जा चुके हैं जिनपर उन्हें डाक्टरेट की उपाधियां प्रदान की गयी हैं, परन्तु प्रेमचंद की निजी जिन्दगी के अनेकानेक ऐसे अछूते प्रसंग है जिनसे उनकी लेखन के प्रति प्रतिबद्धता, तन्मयता, विनोद-प्रियता, वाक्-पटुता, सरल और निश्छल स्वभाव तथा सीधी-सादी आडम्बर-रहित जिन्दगी पर प्रकाश पडता है । प्रेमचंद परिवार के वरिष्ठतम जीवित सदस्य के रूप में आज मैं यहां ऐसे ही रोचक और प्रेरक प्रसंगों का उल्लेख करना चाहता हूँ जिनके सम्बन्ध में पारिवारिक दायरे के बाहर शायद अभी कम ही लोगों को जानकारी होगी ।
प्रेमचंद बडे ही स्वाभिमानी व्यक्ति थे और सम्मानपूर्ण जिन्दगी जीने तथा बाल-बच्चों की परवरिश के लिए उन्हें सतत संघर्षरत रहना पडा । प्रारंभिक वर्षों में वह सरकारी शिक्षा विभाग में नौकरी करते रहे और बाद को अपना स्वयं का प्रेस तथा प्रकाशन व्यवसाय सँभालते रहे । कुछ वर्षों तक तो उन्हें इस कार्य में अपने अनुज महताब राय का सक्रिय सहयोग प्राप्त रहा, किन्तु पारिवारिक कारणों से बाद में इसमें टूटन आ गयी और सारा भार अकेले उन्हीं के कन्धों पर आ पडा । इस प्रकार उनका दिनभर का समय तो नौकरी करने और बाद को अपने व्यवसाय की देखरेख में गुजर जाता था । अपना समस्त लेखन कार्य वह प्रातःकाल तथा रात्रि के समय लैम्प की रोशनी में किया करते थे, वह भी ऐसे समय में जब न तो आमतौर पर फाउन्टेन-पेन का प्रचलन था और न डॉट-पेन का अस्तित्व । फाउन्टेन-पेन तो उस समय विलासिता की वस्तु समझी जाती थी और उसका उपयोग सम्पन्न लोगों तक ही सीमित था । सामन्यतः लोग लिखने का काम निब वाली कलम से बार-बार स्याही में डुबोकर किया करते थे । प्रेमचंद ने अपने जीवन-काल में जितना कुछ हिन्दी में लिखा है, उससे कहीं अधिक उर्दू में भी लिखा है । दोनों ही भाषाओं में उनकी रचनाएँ अपना मौलिक स्वरूप लिए हुए हैं । उन्होने पर्याप्त अनुवाद-कार्य भी किया है और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है । आंग्ल भाषा के भी वह अच्छे ज्ञाता थे और अँग्रेजी तथा उर्दू कथा साहित्य का उन्होने गहन अध्ययन किया था । चाहे उर्दू से हिन्दी में, हिन्दी से उर्दू में अथवा अँग्रेजी से हिन्दी –उर्दू में अनुवाद हो, अनूदित रचनाओं को भी मौलिकता का जामा पहिनाना उनकी विशेषता थी । यही कारण है कि पं. जवाहर लाल नेहरु ने आचार्य नरेन्द्र देव के माध्यम से प्रेमचंद से विशेष रूप से अनुरोध करके अपनी पुत्री(इंदिरा) के नाम जेल से लिखे गये अपने अति मार्मिक एवं शिक्षाप्रद पत्रों का हिन्दी और उर्दू भाषाओं में अनुवाद उन्हीं से कराया था । नेहरु जी की ओर से प्रस्ताव के बवजूद प्रेमचंद ने इस कार्य के लिए कोई पारिश्रमिक लेना स्वीकार नहीं किया । उक्त पत्रों के संकलन तीनों ही भाषाओं में पुस्तकाकार प्रकाशित हुए हैं । उत्कृष्ट अनुवाद के लिए नेहरु जी ने प्रमचंद के प्रति विशेष रूप से आभार व्यक्त किया था । इस प्रकार देखा जाय तो अपने मात्र 55 वर्ष के जीवन-काल में प्रेमचंद के अत्यन्त संघर्षपूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए इतना अधिक लेखन कार्य किया है कि उसकी कल्पना भी सामान्य जन द्वारा नहीं की जा सकती । इसीलिए तो सुप्रसिद्ध रचनाकार एवं प्रेमचंद के यशस्वी पुत्र अमृत राय ने उन्हें “कलम का सिपाही” माना है, हांलाकि बहुचर्चित समीक्षक एवं शोघकर्मी, अलीगढ विश्वविद्यालय के जनाब जैदी साहब ने उन्हें “कलम का सौदागर” तक कह डाला है । उस कलम के फनकार को कलम का जादूगर तो कहा जा सकता है किन्तु उसे कलम का सौदागर कहना उसके साथ सरासर अन्याय होगा क्योंकि सभी जानते हैं कि उस जमाने में उनका बेजोड साहित्य कौडियों के मोल बिकता रहा जो आज आज अनमोल रत्न बन चुका है ।

तन्मयता और प्रतिबद्धता
लेखन कार्य के प्रति प्रेमचंद की तन्मयता और प्रतिबद्धता के सम्बन्ध में एक प्रेरक प्रसंग पाठकों की जानकारी के लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ। बात वर्ष 1922-23 की है । मेरे पिता तथा प्रेमचंद के एकमात्र अनुज स्व. महताब राय उन दिनों काशी से प्रकाशित प्रसिद्ध हिन्दी दैनिक “आज” के प्रेस-व्यवस्थापक थे । एक दिन प्रेस से छुट्टी मिलने पर वह अपने अभिन्न मित्र तथा “आज ” परिवार के ही वरिष्ठ सहयोगी पण्डित छबिनाथ पांडेय के साथ उनके घर चले गये । वहाँ खाते-पीते रात के दस बज गये । जब महताब राय उस समय की खस्ताहाल सडक पर साइकिल चलाते लमही ग्राम स्थित अपने घर लौटे तो रात के 11 बज चुके थे । उन्होंने आहिस्ता से दरवाजे की कुण्डी खटखटायी, किन्तु घर में प्रतीक्षारत बैठी मेरी माता जी के दरवाजा खोलने से पहले ही ऊपर की मंजिल में सोये प्रेमचंद की श्वान-निद्रा भंग हो गयी और वह खिडकी से झाँक कर बोले, “बडी देक कर दी छोटक” वह अपने अनुज को छोटक कहकर सम्बोधित करते थे । छोटक बिना कोई उत्तर दिये चुपचाप अन्दर चले गये, क्योंकि घर लौटने में देर तो हो ही गयी थी । जब वह सोकर उठे और लोटे में पानी लेकर शौच के लिए खेत की ओर जाने लगे तो बाहर चबूतरे पर बैठे प्रेमचंद दातुन-कुल्ला कर रहे थे । छोटक को देखकर बोले, “छोटक, रात जब तुम लौटे तो कोई तीन बज रहा होगा । इतनी रात तक कहाँ रूक गये थे ?”
छोटक अपने से उम्र में 14 वर्ष बडे भाई का पिता के समान आदर और सम्मान करते थे।सिर नीचा किये दबी जबान से उत्तर दिया, “नहीं भैय्या, उस समय 11 बजे थे । प्रेस से उठा तो छविनाथ जी अपने साथ लिवाते गये । वहीं खाते-पीते 10 बजे गये थे।”
प्रेमचंद मुस्कराते हुए बोले, “मैंने तो समझा कि सबेरा होने को है । सो तभी से बैठा लिख रहा था । समय का अन्दाज ही नहीं रहा ।”
भैया की बातें सुनकर छोटक न केवल आश्चर्यचकित रह गये बल्कि मन ही मन अपराध-बोध का अनुभव करते हुए सोचने लगे कि उनके कारण नाहक भैया की नींद उचट गयी और वह सारी रात सो नहीं सके । परन्तु प्रेमचंद के चेहरे पर उस समय भी थकान का नामो-निशान न था और वह तरो-ताजा दिख रहे थे ।
8 अक्टूबर 1959 को प्रेमचंद की 23 वीं पुण्यतिथि के अवसर पर जब देश के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ.राजेन्द्र प्रसाद लमही ग्राम में प्रेमचंद स्मारक का शिलान्यास करने आये हुए थे, उस समय अपने स्वागत-भाषण में भी महताब राय ने उक्त घटना का उल्लेख अश्रुपुरित नेत्रों से किया था । ऐसी थी प्रेमचंद की तन्मयता कि लिखते समय उन्हें समय की सुधि-बुधि नहीं रहती थी । शायद उनकी विलक्षण सृजन-क्षमता का राज भी यही था । रात के समय उनके कमरे में मिट्टी के तेल से जलने वाला लैम्प कभी बुझाया नहीं जाता था । लेटते समय वह लैम्प की बत्ती थोडी नीची कर दिया करते थे ताकि यदि रात में कोई नई थीम या विचार उनके दिमाग में आये तो वह तुरन्त लैम्प की बत्ती उसका कर अपने विचारों को लिपिबद्ध कर सकें ।
एक बार की बात है कि प्रेमचंद अपने मकान के सामने पत्थर के चबुतरे पर बैठे नाई से हजामत बनवा रहे थे । दाढी बनाने के बाद नाई ने अपनी चमडे की पिटारी से नहरनी निकाली और प्रेमचंद के हाथ की उँगलियों के नाखून काटने लगा । हर उँगली का नाखून वह पाँच-छः प्रयास में छोटे-छोटे टुकडों में कुतर-कुतर कर निकाल रहा था । प्रेमचंद से देखा न गया । मजाकिया लहजे में बोले, “क्यों जी नियामत(गाँव का हज्जाम), एक लखनऊ के हज्जाम होते हैं जो उँगली के एक सिरे पर नहरनी लगाते हैं और एक ही बार में आहिस्ता से दूज के चाँद जैसा नाखून का खूबसूरत टुकडा तराश कर रख देते हैं, एक तुम हो कि एक-एक नाखून पाँच-छः हुचक्कों में कुतर रहे हो ।” इतना कह कर वह ठहाका लगा कर हँस पडे । नाई को बेहद शर्मिन्दगी महसूस हुई ।
एक समय था जब प्रेमचंद की विशिष्ट पहचान उनके सेब जैसी गुलाबी गालों, लम्बी-घनी काली मूँछों और स्वच्छंद अट्टहास से हुआ करती थी । वह कोई चुटीली बात कहकर इतने जोर का ठहाका लगाते थे कि कमरा हिल उठता था और घर के बाहर तक उनका मुक्त हास सुनायी पडता था । कालान्तर में धीरे-धीरे उदर रोग ने उनके चेहरे की कान्ति फीकी कर दी और बडी-बडी गुच्छेदार मूँछों के स्थान पर वह होठों के बराबर छोटी मूँछें रखने लगे थे ।

तोहसे नाहीं देख जात हौ का ?
एक दिन प्रेमचंद के मकान से सटे पक्के कुएँ पर अन्तू महतो का पुरवट चल रहा था । दोपहर के समय प्रेमचंद नहाने के लिए वहाँ पहुँचे । अन्तू अपनी खरी-खोटी बातों और कडक-मिजाजी के लिए कुख्यात था । यद्यपि गाँव के रिश्ते के नाते वह प्रेमचंद को चच्चा कहकर सम्बोधित करता था और उम्र में भी उनसे छोटा ही था, फिर भी अपने तीखे स्वभाव के अनुरुप उसने प्रेमचंद से एक बतुका प्रश्न दाग ही दिया, “कहो चच्चा, आजकल तूँ कुछ करत-धरत नाहीं हौ अ, देखीला दिनवा भर घर ही में घुसुरल रहै ल--। खेतो-बारी थोडिकै है और उहो अधिया पर उठल हौ । आखिर तोहार खरचा-खोराकी कैसे चलैला ।” प्रेमचंद पहले तो अन्तू के प्रश्न पर खूब हँसे और फिर नहले पर दहला रखते हुए बोले, “अरे अन्तू तू काहे के पेरशान हौअ...। आजतक कभों तोहसे त कुछ माँगे नाहीं गइली । केहू क .... चैन से घरे बइठलो तोहसे नाहीं देख जात हौ का ।” इस करारे उत्तर पर अन्तु महतो अपना सा मुँह लेकर रह गये । अपनी मोटी कृषक बुद्धि के कारण उन्हें क्या पता था कि एक बुद्धिजीवी घर में बैठकर भी अपनी सृजनशीलता और बुद्धिबल से कलम घिसकर कमायी कर सकता है । वह तो काम धन्धे का मतलब किसी नौकरी-चाकरी या व्यवसाय को ही मानता था ।
प्रेमचंद के तमाचे की याद
प्रेमचंद का मकान गाँव के बिल्कुल उत्तरी छोर पर स्थित था । उसके बाद आमों का बाग, बाँसों के झुरमुट और फिर खेत-खलिहान थे । एक दिन की बात है कि उनके घर के उत्तर स्थित बाग में गाँव के कुछ लडकों के साथ मैं भी आम के पेड पर ढेलेबाजी कर रहा था । हम लोगों का लक्ष्य था आम की उँची टहनी पर लटक रहा चार पके आमों का गुच्छा । काफी प्रयास के बाद भी हम लोगों को आम का वह गुच्छा गिराने में कामयाबी नहीं मिली । खूब शोर-शराबा मचा रखा था हम लोगों ने । प्रेमचंद अपने कमरे में बैठे कुछ लिख रहे थे । शायद हम लोगों के हल्ले-गुल्ले से उनकी एकाग्रता भंग हो रही थी । वह कमरे से बाहर निकले और हम लोगों की कल्पना के विपरीत डाँटने के बजाय मुस्कराते हुए बोले, “तुम लोग कब से ढेलेबाजी कर रहे हो और आम का एक गुच्छा भी मार कर नहीं गिरा सके । लाओं, एक ढेला मुझे दो, मैं देखता हूँ ।” उन्होंने एक ढेला लेकर पके आम के गुच्छे को लक्ष्य कर ऐसा निशाना लगाया कि एक ही बार में चारों पके आम जमीन पर गिर कर बिखर गये । उन्होंने हम बच्चों को आम बाँटते हुए कहा, “अच्छा, अब यहाँ से रफ्फूचक्कर हो जाओ । मुझे फिर शोर नहीं सुनायी पडना चाहिए ।”हम लोग आम चूसते हुए चुपचाप वहाँ से खिसक गये । उसके बाद कई दिनों तक बच्चों की वहाँ आने की हिम्मत नहीं हुई ।
15-20 दिनों बाद अचानक फिर कुछ बच्चे खेलते हुए उसी बाग में आ पहुँचे । उ