2/28/2006

लोककाव्य


महादेव-ब्याह का रचना तंत्र
“महादेव का ब्याह” लोक गाथा है। कथात्मकता, गेयता और अनुष्ठानिकता, परम्परा से प्राप्त गाथा (तन्त्र) के तीनों आवश्यक तत्त्वों का इसमें समावेश है। इसमें शिव पार्वती विवाह की कथा है। नाथपन्थी गायक जोगी इसे विशेष वाद्यों पर भक्त की मनौती और उद्देश्य पूर्ति के लिए गाते हैं। ‘महादेव ब्याह’ शिवरात्रि, चतुर्दशी या सोमवार को ही गाया जा सकता है और रात्रि के प्रहरों में ही यह गाया जा सकता है। सोमवार के दिन के प्रमाण में उपलब्ध हुआ है मराठी लोकगीत –
“गिजा बाई चं लगीन लागलं दिस होता सोमवार
लंगीन झालं साडं झालं वेडा अवतार”1

अर्थात् गिरजा का विवाह हुआ उस दिन सोमवार का दिन था। ‘शंकरा चं लगीन’ नाम से उपलब्ध इस गीत में शिवजी की बरात और साली सलहजों के मनोरंजन का ‘महादेव ब्याह’ से मिलता-जुलता वर्णन है।
गाथा के तीनों आवश्यक तत्त्वों से संयुक्त होने पर भी ‘महादेव-विवाह’ रचना तन्त्र ब्रज की अन्य लोक गाथाओं ‘जगदेव का पँवारा’, ‘जाहरपीर और गुरुगुग्गा’ ठोला और आल्हा या राजस्थान की ‘भारत’ (भारत नवरात्रों में गाये जाते हैं और ये भी शैव शाक्त परम्परा में हैं) नामक गाथाओं जैसा अनेकायामी कथाभिप्रायों से युक्त नहीं है। जटिल नहीं है। राजस्थान का ‘देवनारायण रो भारत’2 तो कथाभिप्रायों (motif) का सागर ही है। चन्दबरदायी कृत ‘पृथ्वीराज रासो’ और जायसी के ‘पदमावत’ को छोड़कर इतने कथाभिप्राय और कथान रुढ़ियों का समावेश अन्य किसी महाकाव्य और लोकगाथा में प्राप्य नहीं। यहाँ तक कि ‘सात खण्ड रामायण तो चौदह खण्ड लोरिकायन’ कहलाते अहीरों के जातीय काव्य ‘चनैनी’ या ‘लोरिकायन’ में भी नहीं।
लोकवार्ता में किसी भी लोक गाथा के रचना तन्त्र में कथा अनुष्ठानिक तत्त्व में ग्रथित अभिप्राय (motif) ही उसका आधार बीज होता है। जिसे मैंने रचनातन्त्र का केद्रीय बिम्ब3 कहा है। कथा, कहानी, गाथा में यही वह तत्त्व है जो परम्परा के प्रवाह में सनातन बने रहने की शक्ति रखता है। इसी में वह क्षमता है जो किसी भी जातीय स्मृति को संग्रथित रख सकती है। यह हमारा कल या आधुनिक शब्दावली में कहूँ तो आधुनिकता है। रचनातन्त्र का शैलीगत शिल्प-विन्यास हमारा वर्तमान और आज होता है।यह मनोवैज्ञानिक, धार्मिक और सामाजिक धरातलों पर परिवर्तनशील है।
अभिप्राय की दृष्टि से महादेव के ब्याह का रचनातन्त्र इकहरा है। यह मंगल गाथा ‘जगदेव का पँवारा’ या आल्हा के सदृश्य घटना प्रधान न होकर कथा एवं वर्णन प्रधान है। इसमें आनुसंगिक कथा प्रसंगों की योजना भी नहीं है। इसका मूल अभिप्राय या केन्द्रीय बिम्ब वर-वधू के रूप में शिव पार्वती की उपयुक्तता है। यह मोटिफ लोकवार्ता में अत्यन्त व्यापक और बहुआयामी कथाभिप्राय4 है। यद्यपि ब्याह का शिल्पविन्यास लचीला और परिवर्तनशील है पर केन्द्रीय बिम्ब से उसके सूत्र अच्छी तरह से जुड़े हैं । वैसे भी लोक गाथाओं, विशेषतः मंगल गाथाओं में परम्परा के प्रति अनुष्ठानिक आस्था और भय, मूल कथाक्रम में परिवर्तन के सुरक्षा कवच हो रहते हैं। गायकों का आशुकवित्व, प्रतिभा का योगदान, श्रोताओं की इच्छा, सराहना भी उसमें परिवर्तन नहीं कर पाते।
फिर भी, गुरु शिष्य परम्परा होने पर भी, मौखिक होने के कारण गाथाएँ भारतभर में व्याप्त हैं। एक ही गाथा का शिल्प-विन्यास की दृष्टि से अन्तर लिये होना स्वाभाविक है। अतः लम्बी-लम्बी गेय गाथाओं के किसी एक और सर्वसम्मत पाठ का निर्धारण कदाचित ही सम्भव हो। एक और भी पक्ष, यदि ऐसा कोई प्रयास किया भी गया तो लोकगाथा जड़ हो जायेगी। उसमें विविध अंचलों के रंग और सुगन्धें न रहेंगी। गायकों का मौलिक योगदान भी पकड़ में न आ सकेगा और मूल कथाभिप्राय के विकास को भी नहीं समझा जा सकेगा। जबकि वर्तमान स्थिति, शोध और अध्ययन के अधिक अवसर और मूल तक पहुँचने के अधिक रास्ते रखती है।
प्रारम्भ में मैंने उपर्युक्त दृष्टि से प्रयास किया। कुरु प्रदेश और बुन्देलखण्ड के शिव ब्याहुलों की बानगी ली। ब्रज के मुथुरा-आगरा जिलों के चार गाँवों के गायकों से, गौरी जन्म से सगाई-प्रस्ताव तक का अंश, अलग-अलग पाठों में लिपिबद्ध किया। तुलना के उपरान्त ज्ञात हुआ कि हर गाँव और मण्डली के गायन में कथाक्रम वहीं है, तथ्य भई वहीं है, पंक्ति में कहीं कोई शब्द अलग पड़ जाता है या एकाध व्याख्यापरक पंक्ति जुड़ जाती है। छूट भी जाती है। यहाँ अवलोकनीय है – गौरी के शंकर से वचन पाने के बाद अन्तर्ध्यान होने का अंश –
जब बाई सिला पै पैदा कीन्ही
बाई सिला भसमंत करी
उड़यौ हंस काया कुम्हिलाइ गयी
(जब) है मंचल धर सुरतिधरी
- जोगी नत्थी नाथ, राया
अब बाई सिला पै पैदा कीन्ही
बाई सिला ना पैदा भयी
अब हैमाचल धर सुरतिधरी
- जोगी सूखानाथ, अछनेरा
जब बाई सिला पै पैदा कीन्ही
बाई सिला भसमंत करी
उड़यौ हंस काया कुम्हिलानी
पड़ी रही माटी ढेरी
जब हैंमंचल घर सुरतिधरी
- जोगी पंचमनाथ, मिढ़ाकुर
जब बाई सिला पै पैदा कीन्ही
बाई सिला भसमंत करी
उटिगिया पंछी बोलनहारा
मिल गयी माटी में माटी
जब हैमांचल की सुरतिधरी
- जोगी मुन्नानाथ, गढ़ी गोहनपुर
लेकिन रात्रि जागरणों में भक्त जिजमान की इच्छानुसार या वक्त देखकर, गायकों द्वारा ब्याह के विवरणात्मक या व्याख्यापरक अंशों का विस्तार और संकुचन प्राप्त होता है। ब्याह में कुछ कुछ प्रसंग और वर्ण्य-विषय हैं। पार्वती के नामकरण प्रसंग में चारों वेदों के पन्नों के बाँचे का उल्लेख कुछ गायक करते हैं, कुछ नहीं करते। नामकरण में नाम बताते वक्त, नामों की संख्या, घटा-बढ़ा देते हैं किन्तु पार्वती का भविष्य सब, एक ही बताते हैं जोगी से ब्याह होना।
इसी क्रम में, जब बेटी के जोगी से ब्याह की बात पर हिमाचल क्रोधित होकर ब्राह्मण को दण्ड देने को तत्पर होता है और रानी मैनादे, ब्रह्महत्या से कुल नाश की बात कर, ब्रह्मण को दक्षिणा दिला बिदा कराती है तब चलते वक्त ब्राह्मण, चेतावनी के रूप में, पार्वती की विकट और विचित्र बरात का चित्र खींचता है कि ये, और ऐसे-ऐसे बरात में आयेंगे। ये सारी वस्तुएँ, हिमाचल की लग्न पत्रिका में लिखायी माँगें बन जाती हैं और वे ही सब बरात के वर्णन में पुनः दुहरायी जाती हैं। इस पुनरुक्ति से, यद्यपि हम इसे अवान्तर प्रसंग और अनावश्यक नही कह सकते, ब्याह काफी विस्तार पा लेता है।
जबकि कई बार ब्याह गाने में ब्राह्मण का इतना-सा कथन ही रहता है –
जबै बिरामन न्यों उठि बोल्यौ
जा दिन कन्या कौ ब्याहु करौगे
बड़े-बड़े कारज आमे
सोने की दछिना दई ऐ बिरामन
कियौ बिदा घर कूँ जइयौ
जब पलना लईऐ झुलाय बेटी
भोज्य वस्तुएँ, अनाजों, जैसे चावल, मिठाई, गहने कपड़ों के नाम, जीवन में धर्म नीति की महत्ता, ‘करमलेख’ की दुर्निवारता एवं लोकाचार इत्यादि ऐसे बिन्दु तन्त्र के विस्तार और संकुचन की संधि रेखाएँ हैं। ब्याहुला गायन के दौरान श्रोता समुदाय की रुचि का रुझआन, गायक के अशुकत्व और प्रतिभा को प्रेरित करता है। इन पक्षों पर गायक का कौशल ही नहीं उसका ऐतिहासिक ज्ञान, चेतना, ग्राम्य और नागरिक अधिवास तथा मानसिकता भी अभिव्यंजित होती है।
राजकन्या गौरा पार्वती से यदि विवाह किया तो कितनी झंझटें हैं, कितनी माँगों की पूर्ति करनी पड़ेगी, दृष्टव्य है, उनका शंकरजी का खींचा चित्र, जिसमें ये अलग-अलग झलकते हैं –
गायन परम्परा से दूरी और नागरिकता की झलक-
...गौरा तो ए राज कुमारी, राज दुलारी
::::
पूरी कचौरी माँगें पार्वती
आलू का रायता माँगे पार्वती
मोतीचूर के लड्डू माँगे पार्वती
कांसे लाऊँ जा बन में ?
- छुट्टननाथ, ग्वालियर
मुगल संस्कृति का प्रभाव
गौरा तो राजन की लड़िकी
रंगमैहलरहिबै कूँ माँगे, नौरंग पंलिगु पोढ़िवे कूँ माँगै
और खिदमति कूँ बाँदी माँगे, सात सहेली बतराइबे कूँ माँगे
कहाँ ते लाऊँगौ जा बन में ?
- पंचमनाथ, मिढ़ाकुर
राजपूत रजवाड़ों की संस्कृति
गौरा तौ राजौ की बेटी
रंगमहल रहने को माँगै
नौरंग पलंक पौड़ि वे माँगै
औरु सेवा को दासी माँगै
कहां ते लाऊँ जा बन में ?

- किशनाथ, भरतपुर
शिव-ब्याह के जन्म से सगाई-प्रस्ताव तक के तन्त्र संयोजन में उपर्युक्त चारों पाठान्तरों में तथ्यात्मक अन्तर केवल एक उपलब्ध हुआ। पार्वती का ब्याह जोगी से होगा, यह भविष्य सुन राजा हिमाचल जब ब्राह्मण को दण्ड देने के लिए रानी से गँड़ासा माँगता है, तो वह बिना कुछ लिये-दिये, नाराज होकर, काशी चला जाता है –
एक करम में ओछो लिखाय लायी
ब्याही जाय काऊ जोगी के

इतनी बात सुनी राजा ने
तनमन ते बुऊ पचरिगयौ
मोई दै रानी मेरौ गुल सबा
जा ब्रह्में दछिना देउँ रानी

इतनी बात सुनी ब्रह्मा ने
ब्रह्मा रूँठि कासी सैहर डिगरि गयौ
यह पंक्ति राया के नत्थीनाथ का पाठान्तर में उपलब्ध है, शेष तीन पाठों में प्राप्त नहीं होती। लेकिन ब्राह्मण की नाराजगी को हम कथाक्रम में किसी बड़े उलट-फेर के रूप में नहीं पाते। अस्तु, इस विचार के बाद मैंने पंचमनाथ का पाठ ही रहने दिया है।
आज शिव-पार्वती विवाह की कथा, लोकवार्ता और शास्त्र-पुराणों मे अखिल भारतीय रूप में प्राप्त है पर वैदिक साहित्य में शिव-विवाह का कोई उल्लेख नहीं आया। यजुर्वेद तैत्तरीय संहीता 1-8-6 तथा वाजसनेयी संहिता 3-,57,63 में रुद्र के साथ अम्बिका का उल्लेख मात्र है। किन्तु वहाँ रुद्र से उसका कोई सम्बन्ध नहीं बताया गया है। कैनोपनिषद में (3-12) देवों को ब्रह्मज्ञान कराने वाली देवी के रूप में ‘उमा’ तथा ‘हेमवती’ नाम आये हैं, किन्तु उनको भई वहाँ शिवपत्नी नहीं कहा गया है। अतः शिवपत्नी के रूप में दक्ष कन्या सती या उमा की कल्पना ही नहीं, हिमाचल पुत्री पार्वती की कल्पना भी, वैदिक साहित्य के पश्चात् की गयी और तभी उनके विवाह की कथाओं का भी सृजन हुआ।
रामायण से पुराणों की रचना के काल तक इन दोनों प्रसंगों का पूर्णतः विकास हो चुका था... सामान्य बातों के अतिरिक्त मूलकथा का लगभग समस्त रूप शिव-सम्बन्धी सभी पुराणों में एक समान मिलता है।5
डॉ. दिनेश ने प्रथम-शिव-विवाह ग्रन्थ ‘पार्वती रुक्मिणीयः’ विद्यामाधव कवि का संस्कृत में रचित माना है। ब्रजभाषा और भक्तिकाल में स्वतंत्र रचना तुलसी का ‘पार्वती मंगल’ और लखपति कवि का ‘शिव-विवाह’ है।6
लोक वार्ता में, प्रादेशिक भाषा और बोलियों में शिव विवाह की कथा गीत, आख्यान एवं गेय मंगल-ब्याहुलों के रूप में प्राप्त होती है।7 मराठी लोक-साहित्य में भी ‘शंकराचं लगीन’ छोटे-छोटे गीतों और विस्तृत गाथा रूप में प्राप्त है।8
लेकिन अभी तक शिव-विवाह की कथा का, गेय गाथाओं और मंगल ब्याहुलों में, कथा में निहित पूर्व विवेचित मूलकथा, अभिप्राय के विकास और पल्लवन की दृष्टि से अध्ययन नहीं हुआ है। लोक वार्ता की दृष्टि से ही नहीं, साहित्य कि दृष्टि से भी, ऐसा अध्ययन, महत्त्वपूर्ण है। कथा में, अभिप्राय ही देश और काल की सीमाएँ लाँघ, विश्व स्तर पर नाम और चरित्र की भिन्नता में, घटना चरित्र और कार्य श्रृंखला की विविध सरणियों में दीख पड़ता है। अभिप्राय (motif) ही किसी कथानक का मूलभूत तत्त्व है, कथाक्रम के सभी रूप-रूपान्तरों में, सभी बोली और भाषाओं में तत्सम्बन्धी कथानक के विविध रूप बनाता है। घटना चरित्र और कार्य श्रृंखला को विकसित करता तथा अनेक मोड़ देता है।
युवक-युवती विवाह के लिए एक-दुसरे के उपयुक्त होने का अभिप्राय, मंगल-ब्याहुलों के साथ, अन्य लोक गाथाओं, महाकाव्यों में भई, कथानक की संयोजना रचता है। मूल अभिप्राय का पल्लवन, वर-वधू-परीक्षा की विविध शर्तों के रूप में होता है। कभी-कभी तो परीक्षा पूर्ति की शर्त विवाह की पूरी परिकल्पना को उभारती है, पूरा ब्याह ही उस पर खड़ा होता है। ‘सीता का मंगल’ में धनुष भंग की शर्त ऐसी ही है। चौका देते समय (घर लीपते वक्त) जब सीता शिवजी का धनुष एक हाथ से उठाकर रख देती है तो जनक चिन्तित हो उठते हैं –
राजा जनक घर क्वारी-सी कन्या।।टेक।।
जबरे राजा महल बिच पहुँचे, रानी उठी अकुलाय
कैसे राजा मन रंजन भये और कैसे भये उदास, राजा0
सिवि कौ धनुस किननु उठायौ जाकौ अरथु बताइ राजा0
सीता चौका दियौ मंदुर में उनई नें धरयो उठाइ राजा0
जा बेटी वरु कौन सौ ब्याहै अकहात ते धनुष दीयौ उठाय

और तव वे उपयुक्तता की कसौटी रूप में धनुष-भंग सीता विवाह की शर्त रखते हैं।
कभी पहेली बुझाना विवाह की शर्त होती है। जैसे ‘जगदे के पँवारे’ में। चौबोला गढ़ की रानी आनबोला, जगदेव के पिता उदियाजीत को और अन्य राजाओं को बन्दी बना लेती है।10
तत्सम्बन्धी आवर्जनाएँ (Tabus) भी कथा के विकास में अपनी भूमिका निभाती हैं और अनेकानेक रूप में कथा तन्तुओं की बुनावट में योग देती हैं। विवाह में आवर्जनाएँ अधिकर विघ्नों के रूप में उपस्थित होती हैं। इनका अतिक्रमण, तप, व्रत, उपासना की कथाओं में तथा जल, जंगल, किले, महल, शस्त्र और राक्षसों से सम्बद्ध, अनेक दुर्वह कार्यों को पूरा करने वाली साहसिक कथाओं के रूप में पल्लवित होता है। अस्तु, यह तो शोध का एक पृथक ही विषय है।
कहना न होगा कि इस केन्द्रीय बिम्ब, मूल कथाभिप्राय (motif) के इर्द-गिर्द महादेव-विवाह के रचना तन्त्र की संरचना और कथाविन्यास अत्यन्त सुगठित है। कथाविन्यास शिल्प में आरम्भ से अंत तक, वर्णन, सम्वाद और घटनवाक्रम में उत्सुकता और नाटकीयता का अच्छा निर्वाह है। कार्यकारण श्रृंखला भी है।
प्रारम्भ में ही पूर्व रंग के रूप में तपस्या करने से पूर्व मौज में आकर महादेव द्वारा गौरा को अपने अंग के मैल से जन्म देने की कथा है। गौरा शिव की सेवा में 12 वर्ष तक खड़ी रहती है। समाधि से जागने पर शिव उनसे वर माँगने को कहते हैं तो गौरी उन्हें ही पतिरूप में माँगती है। शिव ऐसा वर दे नहीं पाते क्योंकि वह पुत्री है। कथानक में यह प्रसंग आवर्जना का पल्लवन है। शिव गौरी से पिता पुत्री के वर्ज्य सम्बन्धों के कारण विवाह करने में असमर्थ हैं, मर्यादा भंग होती है। उधर वर देने का वचन पूरा न करने पर, सेवा का फल न दे पाने पर भी, सत जाता है। अतः दूसरा जन्म धारण करके विवाह के उपयुक्त होने की बात आती है। इस आवर्जना पल्लवन से पार्वती के जन्म की कथा का विकास होता है।
पार्वती मैना के गर्भ से हिमाचल के यहाँ चन्म लेती है। अपनी उपयुक्तता सिद्ध करती हैं। अब पार्वती के नामकरण के बाद ब्याह योग्य होने पर उपयुक्त वर की खोज ही ब्रह्मण की (पुरोहित) सारी भटकन की कथा है। इस जन्म में पार्वती पर्वतराज हिमाचल की बेटी है, राजकुमारी है। सामाजिक दृष्टि से शंकर जो भिखारी जाति के, अज्ञात कुल शील के, वृद्ध और रोगी हैं, किन्तु दिव्य शक्ति सम्पन्न पार्वती के योग्य नहीं। लोक साहित्य में ‘सीता का मंगल’ भी ऐसे ही दशरथ और जनक के सामाजिक वैषम्य का वर्णन करता है –
“जनक ने पाती लिखि दयी धरीए दसरथ के हाथ
हम तो रे भाट भिखारिया और तुम राजा महाराज
हमें तुम्हें कैसे होइगी सजनई ?11

तो यहाँ धनुष टूटता है। लेकिन पार्वती के लिए पूर्वजन्म की वचनबद्धता के कारण वर मात्र शंकर है। नामकरण के वक्त, भविष्य बताते समय, ब्राह्मण यह बता भी देता है। हिमाचल वररूप में जोगी शंकर की पात्रता निरस्त करने के लिए, लगुन में प्राकृतिक शक्तियों और देवी-देवताओं को बरात में लाने की शर्त लिखाता है और निश्चिन्त है कि इस कसौटी पर शंकर उपयुक्त नहीं ठहरेंगे।
ऐसा सामा लिखूँ लगुन में ना सिबजी पै पैदा होगी
ना मेरे ब्याहन आमें
कथा आगे बढ़ती है तो इसी बिन्दु पर। पार्वती को शिव से ही सगाई करने को भेजती है। शिव, ब्राह्मण के द्वारा, पार्वती के प्रेम की दृढ़ता की परीक्षा लेते हैं। एक जोगी भिखारी के साथ रह सकने की उपयुक्तता को, कसौटी पर कसते हैं। जब ब्राह्मण –
बा गौरा सिबजी ज्यों कहि दई ऐ
मैहल तिवारे सिव तेरै नाँय चहिएँ
बन में गुजरि करूँगी, बरूँगी मैं तो
भोली ई नाथै बरूँगी...
गौरा की ओर से भाँग भाखने, कमरी ओढ़ कर अकेली रह लेने की तैयारी बताता है और जब ब्राह्मण ऐसी प्रतिज्ञा करता है –
अरप लौटौ, पूरब लौटौ ब्रह्म लौटि घर नाँय जाइगौ
मैं टीका करिकै ई जाऊँगौ

तो शिवशंकर के मन में आ जाती है। इतनी दृढ़ता देख शिव सगाई करने की अनुमति दे देते हैं। ब्राह्मण चूँकि बिचौलिया था। सगाई करने, वर की स्थिति देखने, घर-द्वार, कुटुम्ब, परिवार की, उपयुक्तता जाँचने आया था। अतः उसे शिवद्वार, जन्मद्वार का दर्शन कराके, अपनी भाँग की तैयारी और लटाओं से गंगा छोड़कर, शिव अपनी शक्ति सामर्थ्य, विद्या और कला का परिचय देते हैं। यह सारी कथा संयोजना, इसी के लिए है, सारे दृश्य विधानों की ध्वनी यही है।
पर फिर भी, राजा हिमाचल, राज्य, नगर और समाज के सम्मुख उपयुक्तता सिद्ध होना शेष रहता है। उसके लिए ही जोगी रूप में मालिन को बाग में डेरा लगाने के लिए जवान करने का प्रसंग है। नगर में चर्चा होती है। गौरा की सहेलियाँ आती हैं बाग में। तब, उनके साथ ठिठोली में, पहले अंगों की विकृति, अवमानना और उपहास के लिए होती है। फिर शिव सबकी विकृतियाँ ठीक करके अपनी कला दर्शाते हैं। नगर में चर्चा फैल जाती है।
सखियों के शिव के कोढ़ी जोगी के विचित्र रूप में आने की बात सुनकर पार्वती बरात और वेश परिवर्तन के लिए विनय करती हैं। अपनी शादी को एक उपमान बनाने की बात जब कहती हैं तो शिव स्पष्ट कहते हैं –
जानै बड़ बड़े बोल लगुन में बोले
मैं भौतु मान मारूँ जाकै
मैं बड़े मान मारूँ जाकै

परदा औट के रूप में बहाई हुई गंगा के उस पार खड़ी पार्वती शिव की महानता और अपने पिता कि तुच्छता बताती है –
जब हाथ जोरि पारवती बोली
तुम तो और समदुर बु ऐ पोखरा
तुम बा तिनियाँ पै च्यों कोपे ?
तुम तो औ परवत बु ऐ पथरियाँ
तुम लीज्यों पार लगाय स्वामी
तो शंकर उन्हें आश्वासन देते हैं –
घर जाहु नारि, नरसिंध रूप मेरौ अब देखौ

और तब फिर सारी प्राकृतिक एवं देव शक्तियों की बारात सज जाती है। बरात देखकर हिमाचल फिर घबराते हैंतो पार्वती ‘अगवानी साधने’ की बात कहती है।
अगवानी के वक्त शिव के स्वरूप और बरात को देख हिमाचल के मुख से निकल जाता है –
“भ्वाँ ठाड़ौ हैमाचल राजा
बुअ जोगी कै रुन्दि मरयौ कै खुन्दि मरयौ ?
न्याँते दाढ़ी बारौ भाजि गयौ, मेरे छतरपती ब्याह आयौ”

तो इसके मन में अभी भी शंका बाकी है। इसने अपनी पुत्री के उपयुक्त मुझे अभी भी नहीं समझा। यह वह जोगी है और वह जोगी कितना सामर्थ्यवान है; इसे अभी भी समझाना होगा। कथा और एक मोड़ लेती है। शंकर क्रोधित हो शुक्र सनीचर को नोंच देते हैं। वे रोने लगते हैं। राजा उन्हें घर भेजता है खाने के लिए तब राजा हैमाचल की ‘भरे पंचों में’ आँखें नीचे होने का प्रसंग है। बरात के लिए तैयार सारा भोजन खाकर भी शुक्र सनीचर भूखे लौटते हैं और महादेव की झोली का टुकड़ा खाकर अफर जाते हैं।
इतने पर भी वहाँ राजा अपनी रानी का दोष समझाता है। महल में लौटकर वस्तुस्थिति ज्ञात होने पर वह महल में, बारूद के ढेर में, आग लगाकर पार्वती के साथ जलकर अपनी मान रक्षा करना चाहता है, किन्तु वह प्रयास भी निष्फल जाता है, बारूद पानी हो जाती है।
निरुपाय हो, जब पार्वती के कहने पर, गले पगड़ी और दाँतों में तृण दबाकर, शंकर के सम्मुख आत्म समर्पण होता है, तभी, शंकरजी की वर रूप में श्रेष्ठता, उपयुक्तता और राजा के राजा होने का, सर्वसम्पन्न, सामर्थ्यवान होने का, गर्व खण्डित होता है। ‘इन्दुर सरीखों’ को कर्ज देने की औकात का मान भंग होता है।
मूल कथाभिप्राय का कथानक के विकास विन्यास में मेरी दृष्टि से यह चरम बिन्दु है। इसी के बाद विवाह होता है। ब्याह के लोकाचारों का संक्षिप्त वर्णन है। ब्याह की जैसे टोन ही बदलजाती है।
‘महादेव का ब्याह’ के उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि समस्त रचना तन्त्र में, कथानक के समस्त घटनाक्रम में मूल अभिप्राय का विकास विन्यास है।
कथासूत्रों को जोड़ने वाले सूत्रधार, पुरोहित, ब्राह्मण और शिव का नाँदिया है। ब्राह्मण विवाह की पूर्वाद्ध की कथा के सूत्र सँभालता है तो नाँदिया उत्तरार्द्ध के। लग्न दे आने के बाद, ब्राह्मण मंच से हट जाता है। नाँदिया, सगाई चढ़ाने के बाद से, विवाह कराने का बीड़ा उठा लेता है। वही प्राग नगरी में जाकर पार्वती के ब्याह की तैयारियों की खबर लाता है, देवसभा में न्यौता देने जाता है, शिवजी की बरात में वही बराती हैं और वही नेगी।
सकलनत्रय और नाट्य सन्धियों की दृष्टि से ‘महादेव ब्याह’ के रचना तन्त्र में, मूलकथाभिप्राय का जैसे सहज, सन्तुलित और कार् कारण श्रृंखलाबद्ध कथा विन्यास है, शिल्प संयोजना है, लोक प्रचलित किसी अन्य मंगल ब्याहुले में यह निपुणता कदाचित ही उपलब्ध हो सके। और भी आश्चर्यप्रद तो यह है कि शिव-विवाह की कथा में शिवजी की विचित्र बरात का और अन्य विघ्न बाधाओं का मूल कारण यह उपर्युक्त मोटिफ कहीं किसी अन्य कृति में उपलब्ध भी नहीं होता। इस सूत्र को किसी ने देखा पकड़ा ही नहीं है।
- सन्दर्भ-
1. कुलदैवत, पृ. 247-248, महाराष्ट्र राज्य लोकसाहित्य समिति प्रकाशन
2. देवनारायण रो बारत, डॉ. महेन्द्र भानावत, भारतीय लोककला मण्डल, उदयपुर
3. मंगल और ब्याहुलों का तन्त्र, इसी पुस्तक में
4. स्मिथ थामसन, मोटिफाइण्डैक्स H300-H499
5. हिन्दी शइवकाव्य का उदभव और विकास, पृ. 19, डॉ. रामगोपाल शर्मा दिनेश, राज प्रकाशन, जयपुर
6. वही, पृ. 77
7. भारतीय साहित्य क.म.मुंशी विद्यापीठ आगरा का मुखपत्र, वर्ष 1956 के अंक
8. कुलदैवत, पृ. 229-238
9. भारतीय साहित्य, वर्ष 2, अंक 2, पृ. 393
10. जगदेव का पँवारा, लेखिका के संग्रह में
11. ‘सीता का मंगल’, सेठ कन्हैयालाल पोद्दार अभिनन्दन ग्रन्थ


श्रीमती मालती शर्मा
ब-8, मधु अपार्टमेंट, 1034/1, माडल कॉलोनी, कैनाल रोड़
पूणे, महाराष्ट्र, 411016


(रचनाकार प्रख्यात लोकवार्ताविद् हैं । बालसाहित्य के क्षेत्र में भी उन्होंने महत्वपूर्ण कार्य किया है । सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ द्वारा पंचम अ.भा.साहित्यमहोत्सव में उन्हें लोक साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए रामचन्द्र देशमुख सम्मान-2004 से अलंकृत किया जा चुका है । संपादक)

1 टिप्पणी:

प्रेमलता पांडे ने कहा…

जो जल जमीं के अंदर चला गया है यहां उसे भी खींचकर साहित्य-पिपासुओं की प्यास बुझाने हेतु प्रस्तुत किया जा रहा है।बधाई।