
खंण्डहर
अठारह वर्षों के अन्तराल के बाद
देखकर इन्हें अहसास हुआ
कितना बुढा़ गई है ज़िन्दगी
खिला करते थे गुलाब कभी यहाँ
मंडराती थी उन पर
रंग-बिरंगी तितलियाँ
गुनगुनाते भौंरे आज भी
आकर लेते हैं धूप आज भी
आकर लेते हैं धूप आँगन में
टूटी खिड़की से चाँदनी
आ धमकती है
आज भी मगर
बुझी-बुझी वीरानी याद दिलाती है
उस आलम की
ढूँढने आ पहुँचे
तलाश रहे हर ओर
बिखरे जज़्बात सिसकती मजबूरियाँ
घायल मन या तड़पता आलम
शायद मिट्टी में दबी
गुम हो चुकी खुशियाँ
फिर से मिल जाएँ वरना
उनकी यादों को सीने से लगाए
लौट जाएँगे
खण्डहरो
ना पुकारों हमें
ज़ख़्म हो गए
फिर से हरे
जी लेंगे किसी भी तरह
0अंजु दुआ जैमिनी
द्वारा- श्री यशपाल गोगिया
डी-7, नवभारत अपार्टमेंट, पश्चिम विहार
नई दिल्ली- 110063
2/28/2006
कविता
भारतीय कविताः असमिया
असमिया कविता की यात्रा
(मूल्याँकन)
आसाम प्रान्त की भाषा असमिया कही जाती है। अठारहवीं शताब्दी के अंतिम चरण और उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में आसाम का इतिहास अत्यन्त शिथिल एवं गतिहीन रहा। घरेलू विद्रोह, बर्मी आक्रमण और अफीम का घातक व्यसन इसके कारण हैं। सन् 1854 में जब समूचे आसाम को अंग्रेजों ने अपने अधिकार में ले लिया तब अपने गौरव के मद में डूबी आसाम की जनता की नींद टूटी। जब होश आए तब तक अंग्रेजी थोपी जा चुकी थी। इस नीति के विरुद्ध पियलि फुकन मलिराम देवान, आदि ने विद्रोह किया जिन्हें फाँसी की सजा दे दी गई। आसाम ने इस प्रकार इस युग में केवल अपनी स्वतंत्रता को ही नहीं खो दिया अपितु भाषिक स्वतंत्रता भी जाती रही। सन् 1836 ई. में आसाम के स्कूलों तथा अदालतों से असमिया भाषा को निष्कासित कर दिया गया और उसके स्थान पर बंगला भाषा का प्रचलन किया गया। पादरी रेवरेन्ड नैथन ब्राउन और ओ.टी. कौटर ने धर्म प्रचार के लिए असमिया भाषा सीखी और असमिया की पहली पुस्तक प्रकाशित की। इसके पूर्व असमिया को बंगला की एक गौणभाषा मानी जाती थी, जिसका कोई साहित्य नहीं था।
कई उठापटक के बाद सन् 1872 ई. में आनन्दराम ढेंकियाल फुकन के प्रयत्नों से असमिया को अपना उचित स्थान प्राप्त हुआ। मसीही धर्म प्रचारकों के माध्यम से असमिया बाषा पनपी और साहित्यिक रूप प्राप्त कर सकी। आधुनिक असमिया साहित्य का इतिहास यह है कि पहले तो धर्म प्रचारकों और आसाम के कुछ लोगों ने असमिया भाषा को उसका उचित स्थान दिलाया और फिर कुछ अधिक जागरुक लोगों ने यह अनुभव किया कि स्वाधीनता छीन जाने और उसके बाद की सामाजिक और आर्थिक दुर्दशा से देश की स्थिति क्या से क्या हो गई है ? पर राष्ट्रीय भावना को परिपक्व रूप में प्रस्फुटित होने में कुछ समय लगा। राजा राममोहन राय के समकालीन श्री आनन्दराम ढेकियाल फुकन ने असमिया लोगों में राष्ट्रीय भावना फूँकी और उनमें जागृति लाई। सन् 1853 में मनीराम दीवान ने आसाम पर अंग्रेजों के अधिकार की विस्तृत आलोचना की। स्व. लक्ष्मीकांत बेजबरुआ को असमिया साहित्य के भारतेन्दु और द्विवेदी के रूप में हम पाते हैं। हेमचन्द्र बरुआ और गुणाभिराम बरुआ आदि ने जो परंपरा स्थापित की, बाद के कवियों-लेखकों ने उसी का विर्वाह किया। गत और विगत शताब्दी के बीच रचना करने वाले कुछ लेखकों में देशभक्ति की यह भावना और भी स्पष्ट रूप से प्रखर और उत्कट रूप में प्रकट हुई। इस प्रकार की रचनाओं में साहित्यिक प्रतिभा न रही हो ऐसा नहीं है। हेमचन्द्र बरुआ के कार्यों को इन्होंने पूरा किया। वस्तुतः एक राष्ट्रीय कवि व युग चेतना के मार्गदर्शक स्व. लक्ष्मीकांत बेजबरुआ के उदय से असमिया साहित्य में संजीवनी शक्ति आ गई, अपितु समग्र भाव जगत में नवीन स्पंदन छा दिया, एक नवीन चेतना का संचार किया। राष्ट्रीय जागरण की यब भावना देशभक्त कमलाकांत भट्टाचार्य के गीतों और लेखों में मुखरित हुई। श्री भट्टाचार्य ने “चिन्तानल” नामक अपनी पुस्तक की भूमिका में लिखा था – “न जाने असमिया कब एक होंगे।” अपनी एक कविता में उन्होंने लिखा है – “आसाम की शिल्प-कृतियों से प्रेरित होकर किसी न किसी दिन लोग पुनः गौरव प्राप्त करेंगे। उस दिन इस महत्वपूर्ण दिख पड़ने वाले प्रस्तर खंड से सैकड़ों मैजिनियों का जन्म होगा। सैकड़ों ‘गैरीबाल्डी’ जन्म लेकर भारत भूमि को आलोकित करेंगे।” इसी काल में ही मातृभूमि के प्रति ममत्व, उनके सम्मान की रक्षा के लिए आत्म बलिदान की प्रेरणा प्रत्येक हृदय में हिल्लोर लेने लगी थी। असमिया काव्य-साहित्य भी इसी युग में राष्ट्रीय कविताओं द्वारा सबसे अधिक समृद्ध हुआ जिसका समारंभ इन्होंने ही किया था और आगे “जोनाकी” साहित्य गोष्ठी द्वारा विकसित हुआ।
“चन्द्रकुमार अग्रवाल (1858-1938ई.) लक्ष्मीकांत बेजबरुआ (1867-1938) और हेमचन्द्र गोस्वामी (1872-1928) इन तीनों महान लेखकों को वर्तमान असमिया साहित्य का निर्माता कहा जाता है। “जोनाकी” (जुगनू) नाम पत्रिका का शुभारंभ इसी मित्रमंडली ने कोलकाता में अध्ययन करते हुए किया था। उसने देशप्रेम की नई लहर से आधुनिक असमिया साहित्य में नवजीवन का संचार किया। स्वदेशप्रेममूलक “वैरागी और वीणा” की तरह बहुत ही उच्च स्तर की है। सौंदर्य की खोज, मानव प्रीति, वेदान्तिक प्रभाव, नूतन समाज का आह्वान और आशावाद चन्द्र कुमार की कविता की विशेषताएं हैं। (डॉ. सत्येन्द्र नाथ शर्मा, असमिया साहित्यर इतिवृत्त)”
प्रारंभिक बीसवीं शताब्दी के सबसे प्रतिभाशाली लेखक बेजबरुआ हैं। उनके जीवन का अधिकांश समय हावड़ा और सम्बलपुर (उड़ीसा) में बीता। किन्तु वे चाहे जहाँ भी रहे हों उनका मन सदा आसाम के पार्वत्य रमणीय प्रदेशों में रमता रहता था। उनकी “वैरागी और वीणा” कविता असमिया में देशप्रेम संबंधी सर्वोत्कृष्ट रचना है। इसके कुछ भाव ये हैं:-
“ओ ! वैरागी,
अपनी वीणा पर
मंद मधुर धुन छेड़,
मेरे हृदय को शांति मिले
तेरे शब्द, मैं नहीं समझ पाता
किंतु तेरी वीणा माधुरी
नस-नस में व्याप्त है मानो
जन्म-जन्मांतर से उसे ही सुनता रहा हूँ,
उस दूर लोक की मादक स्मृति
रह-रह कर जगाता तू
अपनी उस वीणा से
ओ वैरागी !”
उन्होंने कई ऐतिहासिक नाटक भी लिखे हैं, जिनमें से दो हैं – ‘बेलिमार’ (आसाम की स्वतंत्रता का सूर्यास्त) और ‘चक्रध्वजसिंह’ जो रामसिंह की पराजय पर आधारित है। “मेरा देश” नामक उनका एक गीत संग्रह आसाम का राष्ट्रगीत स्वीकारा जा चुका है।
असमिया काव्यों में मधुसूदन के प्रभाव से राष्ट्रीय भावना को बल मिला। अम्बिका गिरिराय चौधरी सर्वतोमुखी प्रतिभा के धनी हैं वे राजनैतिक आन्दोलनकर्त्ता और देशभक्त हैं। उनकी “इन्द्र धनुष” की कुछ पंक्तियों में उन्होंने कहा है – “मैं विद्रोही ! मैं आराधक!” इसमें उन्होंने सामाजिक दुर्गुणों की निन्दा की है। राजनैतिक बंदी के रूप में राय चौधरी ने जेल में राजनैतिक स्फूर्ति पैदा करने वाली अनेक कविताओं की रचना की है। इनमें रौद्र रस का प्राधान्य है। उनकी कविता की आरंभिक पंक्तियां हैं –
“मेरे गीत हर्ष या आल्हाद के नहीं
जिनसे श्रांत भुजाओं में स्फूर्ति आ जाये।
मेरे स्वर अग्नि वीणा के स्वर हैं
जिसकी ज्वाला से शिथिल और
द्रुतगामी दोनों ही में स्फूर्ति का
संचार होता है।”
विनन्द्र चन्द्र बरुआ की रचनाओं में देशप्रेम का बाहुल्य है। ये राष्ट्रीय चेतना के कवि हैं। “शंखध्वनि” और प्रतिध्वनि, “रंगाभुवावीर”, “आगिया ठुठिर वीर” जैसी मनोरम देशात्मबोधक करुण रस से सिक्त कविताएं संग्रहीत है।
शैलधर राजरखोवा ने भी सुन्दर देशप्रेम प्रेरक रचनाएं की है।
सूर्य कुमार भुइयाँ की “आपोनसुर” कविता एक उल्लेखनीय आव्हान-रचना (ओड़) है, जिसमें प्रेम का गुणगान किया गयाहै। उनकी “टिपामर डेका”, “असमगौरव” जैसी देशप्रेममूलक विवरणात्मक कविताओं ने अत्यन्त ख्याति पायी है।
डिम्बेश्वर मेओम की रचनायें वर्णनात्मक हैं। “इन्द्रधनुष”, “शापमुक्ता”, “स्वर्गपुरी”, “मोरगाँव”, “बुरजी लेखक” जैसी उनकी उच्च कोटि की देशप्रेम मूलक कविताएं हैं।
1942 ई. के आन्दोलन के पश्चात नवयुवक समाजवाद की ओर झुके और मार्क्सवादी सिद्धांतों की ओर आकृष्ट हुए। उनके दृष्टिकोण में स्पष्ट परिवर्तन आया। आधुनिक असमिया साहित्य में जो राष्ट्रवादी चेतना आई थी, उसके कारण समय-समय पर दलित लोगों की आवाज मुखर हो उठती थी। अब उतनी भाव-प्रवणता नहीं रह गई। 1946 में आधुनिक असमिया कविता का जो काव्य संग्रह निकला उसमें तरुण लेखकों ने पूंजीवादी शोषण और जाति भेद के विरुद्ध आवाज उठाई और परिस्थितियों को बदलने का बीड़ा उठाया। ज्योति प्रसाद अग्रवाल की रचनाओं से प्रकट यह होता है कि किस प्रकार एक देशभक्त कवि देशभक्ति की उमंगों को छोड़ स्वयं सेनानी बन गया। उनके बाद के गीत क्रांतिमूलक हैं। नई कविता का स्वर अटूट आत्मविश्वास और जीवन संघर्ष से मोर्चा लेने के उत्साह का स्वर है। केशव महन्त की कविता इस प्रकार है –
“मुत्यु पर भी विजय प्राप्त करने वाले अमर वीर
जिनके नाम पर नये युग के नये इतिहास रचे जाते हैं,
कभी मरते नहीं।
आज दिन भी जीवित हैं,
युग-युगान्तर में मृत्यु पर विजय प्राप्त करते हुए,
जीवन-ज्योति को उन्होंने जलाये रखा है।”
हितेश्वर वरबरुआ की “मुख्य गामारु” में यशोगान एवं राष्ट्रीयता का उदघोष मुखरित हुआ है। इनके काव्य राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत होने के कारण अत्यन्त प्रभावोत्पादक है।
नीलमणि फुकन का अंतिम ग्रंथ “शतधारा” है, जिसमें गांधी जी और विनोबा बावे से प्रभावित कवितायें हैं।
दंडिनाथ कलिता के “असम-संध्या” काव्य में असम की स्वतंत्रता-रवि के डूबते क्षण का मार्मिक वर्णन है अर्थात “आहोम” के अंतिम राजा चन्द्रकांत सिंह को लेकर ही यह काव्य रचा गया है।
पदमधर चलिहा ने सन् 1921 में “स्वराज्य संगीत” कविता लिखी जो बड़े ही आदर के साथ लोगों के मुंह से गाई गई।
लक्ष्मीनाथ फुकन का “ब्रह्मपुत्र के प्रति” देशप्रेम मूलक कथा काव्य है।
कवयित्री नलिनीबाला देवी की “परशमणि” जैसी राष्ट्रीय कविताओं द्वारा कवि के देशप्रेम की झलक भी स्पष्ट होती है।
अतुलचन्द्र हजारिका की “पांचजन्य” कृति में कवि की राष्ट्रीय चेतना उदघोषित हुई है।
प्रसन्न लाल चौधरी की कविताओं मे स्वदेश प्रीति की उद्दाम कामना है। “इनका विद्रोह यौवन का विद्रोह है, कंकाल सदृश किसान का विद्रोह है।” (डॉ. निओम)
असम के लोकप्रिय नेता स्व. तरुणराम फुकन के आइमोर असमे कविवर नवीनचन्द्र बरदलै के “श्याम असम आइ धुनिया”, “डेका गामरुर दल” जैसे अत्यन्त प्रभावोत्पादक देशप्रेम मूलक गीत हैं।
गणेश ने उच्चस्तर की कई कविताओं की भी रचना की थी। देवकांत बरुआ की कविताओं का प्रारंभ बन्धनहीन नग्न आकांक्षा से हुआ और अन्त जड़ संस्कारों से मुक्ति की उदग्र आकांक्षा के साथ। इसी में ही अतीत गौरव और राष्ट्रीय चेतना का तूर्यनाद भी सुनाई पड़ता है। तिरस्कृत प्रेम विद्रोह बाद में देश-मातृका की सेवा में लगकर पूर्णता प्राप्त करता है और “लांचित फुकन” जैसी कविता के द्वारा उस समय के जनचित्त को प्रभावित करता है।
इसी तरह असमिया कविता में स्वाधीनता आन्दोलन की तीव्रता है। भारतीय राजनैतिक रंगमच पर गांधीजी के आविर्भाव से छुआछूत का त्याग, वर्ण-भेद, दूरीकरण की शिक्षा का प्रचलन, आर्थिक समता का स्थापन, अतीत गौरवगान, गांधी दर्शन आदि अन्तः स्वर मुखरित होते हैं।
डॉ. अर्जुन शतपथी
संपर्क, आकाशवाणी मार्ग
जगदा, राउरकेला, उड़ीसा
(रचनाकार मूलतः उड़ियाभाषी अनुवादक एवं हिन्दी के वरिष्ठ रचनाकार हैं । उच्चशिक्षा विभाग से सेवानिवृत्ति के उपरान्त साहित्य साधना में संलग्न हैं । उन्हें सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ द्वारा 12-13 फरवरी 2006 को आयोजित एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्यक्रम में छ.ग. के राज्यपाल श्री के.एम.सेठ ने अनुवादक सम्मान-2004 से अलंकृत किया है । संपादक )
तलाश जारी है
अभी कल की ही बात है, दो दिन की ताबड़-तोड़ तलाश के बाद मेरा पर्स मिल गया, बस वह तलाश निपटी ही थी कि अब भ-हार्न की तलाश शुरू हो गई, जिसे मैंने टेबल पर रख दिया था, पर न जाने कहाँ खो गया। ढूँढे जा रहा हूँ, मुझे विश्वास है कि वह कहीं गया नहीं, यहीं आसपास होगा, पर भगवान की तरह मिल नहीं रहा और मेरी तलाथ जारी है। ऐसे ही हम सब लोग, अक्सर कुछ न कुछ ढूँढते ही रहते हैं और न मिलने से चिन्तित परेशान होते रहते हैं। यह तलाश हमारा पीछा ही नहीं छोड़ती।
इसके लिये कभी हम अपने भुलक्कड़पन को या कभी स्मरण शक्ति को अथवा धीरे-धीरे आते जा रहे बुढ़ापे को कोसते रहते हैं। पर असलियत यह है कि इसका बुढ़ापे से कोई संबंध नहीं। बाल-वृद्ध, नर-नारी सभी अपनी-अपनी तरह से अपने लिये किसी न किसी चीज के अथवा व्यक्ति की तलाश में जुटे रहते हैं। सबका वह भगवान रोज कोई न कोई ऐसी चीज ढूँढ ही लेता है, जिसे हम चाहते और ढूँढते रहते हैं। ऐसा करते-करते जब सांसारिक चीजों को ढूँढने से हमारा मन ऊबने लगता है तो फिर भगवान को ढूँढने व उसे पाने में हम अपना मन लगाते रहते हैं। बस कुछ ऐसे ही जीवन भर हमारी तलाश जारी रहती है।
इस तलाश के जाल में मैं अकेला नहीं हूँ। जी का जंजाल बनी इस तलाश में लगभग सभी फँसे हैं। हर जीवित प्राणी को किसी किसी की तलाश है। यह तलाश मरने के बाद बन्द हो जाती हो इसका मुझे पक्का ज्ञान तो नहीं पर कभी-कभी लगता है कि मृत्यु उपरान्त स्वर्ग या नरक पाने अथवा वहाँ की वस्तुओं / सुविधाओं की तलाश फिर जारी रहती होगी। अगर आप किसी तरह हिसाब लगा सकें तो पता चलेगा कि वह समय जिसमें हमने कोई तलाश नहीं की, बहुत थोड़ा सा ही होगा। अगर हम धनवान नहीं, एक साधारण आदमी हैं, तो हमें थोड़ा अमीर बनने की तलाश रहती है। अगर कुछ थोड़ा कमा लिया तो फिर और ज़्यादा कमाने व और अमीर बनने की तलाश शुरू हो जाती है। अमीरी की भूख तो कभी शान्त होती ही नहीं। अगर करोड़पति हो गये तो इतने अरबपति दिखने लगते हैं कि उनकी ओर ताकते-ताकते वैसा बनने के तरीकों की तलाश शुरू हो जाती है। एक बच्चा है तो उसे तलाश है कुछ पसन्दीदा खाने-पीने या खिलौनों की या माँ-बाप रिश्तेदारों के प्यार और दुलार की। थोड़ा बड़ा हुआ कि तलाश शुरू हो गई मित्रों के सहयोग व आदर की। विद्यार्थी है तो उसे तलाश है अच्छे गुरू की, अच्छे स्कूल कॉलेज की, परीक्षाएँ अच्छे नंबर से पास करने की, जरा और बड़े हुए तो तलाश है अच्छी नौकरी की, पदोन्नति की, अच्छी पदस्थापना की, सुन्दर बीवी बच्चों की, अच्छे पारिवारिक जीवन की। तलाशों का अन्तहीन सिससिला लगातार जारी है। दुकानदार को तलाश है, अच्छे मुनाफा देकर खरीदारी करने वाले ग्राहक की, शिक्षक को तलाश है योग्य विद्यार्थी की, वकील को तलाश है मोटी फीस देने वाले मुवक्किल की, पुलिस को बदमाश की, जज को अपराधी की, डॉक्टर को मरीज की, पति को पत्नी की, गुरू को चेलों की आदि-आदि।
मुझे तो इसमें उस चतुर चितेरे की कुछ चंचल चाल सी लगती है जो उसने सारी चीजों को हमारे आसपास ही संजोकर रखा है और मानव की तथा सृष्टि की संरचना कुछ इस प्रकार की है कि हम सब हमेशा कुछ न कुछ तलाशते रहते हैं तो कुछ मिल जाता है – जिन खोजा तिन पाइयाँ और कुछ देर के लिये हम खुश व सुखी हो लेते हैं और जल्दी ही फिर किसी नई तलाश में अपना मन लगाकर अपने लिये कुछ नई चिन्ताओं और परेशानियों को बटोर लेते हैं। इस तलाशने, पाने और न पाने के बीच सुखी व दुखी होते सारा जीवन निकल जाता है।
कहा जाता है जल ही जीवन है। पर मेरा मत है कि जल की भाँति जीवन की सक्रियता, चंचलता, व्यस्तता का प्रमुख आधार यह सतत् चलने वाली, छोटे-छोटे टुकड़ों से एक लम्बी कड़ी बनी तलाश ही है। कभी इसकी, तो कभी उसकी। कभी मीठी, कभी नमकीन। नमकीन के बाद ही मीठा अच्छा लगता है। मीठा-मीठा सा लगे इसीलिये नमकीन बनाया। तलाश का अन्त प्राप्ति में हो तो उसका मीठा अहसास कराने के लिये बीच-बीच में असफलताओं, देरी के नमकीन को रचा। हर इन्सान अच्छे की तलाश में अपना सारा जीवन लगा देता है। कई बार तो लोग यह नहीं जानते कि वह तलाश क्या कर रहे हैं और उसे न पाने के कारण दुखी होते रहते हैं। कई मर्तबा अच्छे या बुरे की सही पहचान न कर पाने से लोग जो तलाश किया उसे पाकर भी दुखी हो जाते हैं। अच्छे की तलाश में चक्कर-घिरनी सा घूमता इन्सान सारा जीवन बीता देता है। इन्सान की तरह भगवान भी क्या अच्छों को न तलाशता होगा ? वर्तमान में चल रहे कलियुग में असत्य का, झूठ का, अनीति का, भ्रष्टाचार का, अपराधों और पापों का, बड़ों के अनादर व अपमान का, गुणीजनों के निरादर का, चालू धोखेबाजों के आदर और सम्मान का, श्रद्धालु जनों की उपेक्षा का, छली कपटियों की ऊँची उड़ान का युग बड़ी शान से चल रहा है। झूठों-दगाबाजों का बोलबाला है, सच्चे का मूँह काला है। इस कलियुग को सतयुग में बदलने के लिए उस सर्वनियन्ता भगवान को भी तो भ्रष्टाचार को सदाचार बना देने वाले पथभ्रष्ट मानव को बदलने के लिये, अच्छो की तलाश होगी। उसे भी तो अपने गोपनीय संगठन से सही जानकारी प्राप्त कर अच्छों की तलाश कर उन्हें प्रोत्साहित व प्रेरित कर उन्हें पृथ्वी स्वर्ग, नरक जैसे लोकों के महत्वपूर्ण पदों पर बिठाना होगा। इसीलिये कई बार वह अच्छे-अच्छे युवाओं को भी जल्दी बुलावा भेज देता है। भगवान की लीला अपरम्पार है। हम तुच्छ प्राणी उसे समझ ही कहाँ पाते हैं ?
समग्र विचार से लगता है कि जब तक तलाश जारी रहेगी तो चिन्ता व परेशानी बनी रहेगी। और तलाश पूरी होने पर ही चैन व सुख मिलेगा। यानी तलाश है तो चिन्ता है, दुख है। तलाश बंद हुई कि चैन व सुख आया। तो इस तलाश से छुटकारा कैसे मिले ? सिर चकराया और एक सस्ता सा हल सामने आया। यदि हम मानवगण, जो हमारे पास है उसमें संतोष करना शुरू कर दें, तो तलाश के चक्र से बचकर आनन्द पा सकते हैं। हमारे पूर्वजों, सन्तों, मुनियों, ऋषियों ने इसीलिये कहा भी है ‘संतोषी सदा सुखी’। सन्तोष ही हमारे सुख का मजबूत आधार है। निरर्थक तलाश छोड़ो और जो कुछ है उसमें सन्तोष कर भगवान का धन्यवाद करो। पर इस सन्तोष का अभिप्राय या पर्याय अकर्म नहीं हो सकता। इसी समस्या का निदान भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद् गीता के द्वितीय अध्याय में अपने जग-प्रसिद्ध शब्दों – “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” अर्थात् “कर्म करो, फल की चिन्ता मत करो” में दिया है। यह फल की तलाश ही हमारे दुखों का कारण है। उसे भगवान पर छोड़ो। उसकी शरण में जाओ। पर वाह री तलाश। तेरे रूप अनेक, चेहरे अनेक। कर्मणा गहनों गति। हमारी तलाश सदा की तरह अभी भी जारी है।
देव प्रकाश खन्ना
जानकी एन्कलेव, चूनाभट्टी, कोलार रोड़
भोपाल, मध्यप्रदेश- 462016
(श्री खन्ना मध्यप्रदेश के सेवानिवृत पुलिस महानिदेशक हैं । वर्तमान में त्रैमासिक देवभारती के संपादक हैं । सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ द्वारा पंचम अ.भा.साहित्यमहोत्सव में उन्हें भाषा सेवा के लिए राजकुमारी पटनायक सम्मान-2004 से अलंकृत किया जा चुका है । संपादक)
लोककाव्य

महादेव-ब्याह का रचना तंत्र
“महादेव का ब्याह” लोक गाथा है। कथात्मकता, गेयता और अनुष्ठानिकता, परम्परा से प्राप्त गाथा (तन्त्र) के तीनों आवश्यक तत्त्वों का इसमें समावेश है। इसमें शिव पार्वती विवाह की कथा है। नाथपन्थी गायक जोगी इसे विशेष वाद्यों पर भक्त की मनौती और उद्देश्य पूर्ति के लिए गाते हैं। ‘महादेव ब्याह’ शिवरात्रि, चतुर्दशी या सोमवार को ही गाया जा सकता है और रात्रि के प्रहरों में ही यह गाया जा सकता है। सोमवार के दिन के प्रमाण में उपलब्ध हुआ है मराठी लोकगीत –
“गिजा बाई चं लगीन लागलं दिस होता सोमवार
लंगीन झालं साडं झालं वेडा अवतार”1
अर्थात् गिरजा का विवाह हुआ उस दिन सोमवार का दिन था। ‘शंकरा चं लगीन’ नाम से उपलब्ध इस गीत में शिवजी की बरात और साली सलहजों के मनोरंजन का ‘महादेव ब्याह’ से मिलता-जुलता वर्णन है।
गाथा के तीनों आवश्यक तत्त्वों से संयुक्त होने पर भी ‘महादेव-विवाह’ रचना तन्त्र ब्रज की अन्य लोक गाथाओं ‘जगदेव का पँवारा’, ‘जाहरपीर और गुरुगुग्गा’ ठोला और आल्हा या राजस्थान की ‘भारत’ (भारत नवरात्रों में गाये जाते हैं और ये भी शैव शाक्त परम्परा में हैं) नामक गाथाओं जैसा अनेकायामी कथाभिप्रायों से युक्त नहीं है। जटिल नहीं है। राजस्थान का ‘देवनारायण रो भारत’2 तो कथाभिप्रायों (motif) का सागर ही है। चन्दबरदायी कृत ‘पृथ्वीराज रासो’ और जायसी के ‘पदमावत’ को छोड़कर इतने कथाभिप्राय और कथान रुढ़ियों का समावेश अन्य किसी महाकाव्य और लोकगाथा में प्राप्य नहीं। यहाँ तक कि ‘सात खण्ड रामायण तो चौदह खण्ड लोरिकायन’ कहलाते अहीरों के जातीय काव्य ‘चनैनी’ या ‘लोरिकायन’ में भी नहीं।
लोकवार्ता में किसी भी लोक गाथा के रचना तन्त्र में कथा अनुष्ठानिक तत्त्व में ग्रथित अभिप्राय (motif) ही उसका आधार बीज होता है। जिसे मैंने रचनातन्त्र का केद्रीय बिम्ब3 कहा है। कथा, कहानी, गाथा में यही वह तत्त्व है जो परम्परा के प्रवाह में सनातन बने रहने की शक्ति रखता है। इसी में वह क्षमता है जो किसी भी जातीय स्मृति को संग्रथित रख सकती है। यह हमारा कल या आधुनिक शब्दावली में कहूँ तो आधुनिकता है। रचनातन्त्र का शैलीगत शिल्प-विन्यास हमारा वर्तमान और आज होता है।यह मनोवैज्ञानिक, धार्मिक और सामाजिक धरातलों पर परिवर्तनशील है।
अभिप्राय की दृष्टि से महादेव के ब्याह का रचनातन्त्र इकहरा है। यह मंगल गाथा ‘जगदेव का पँवारा’ या आल्हा के सदृश्य घटना प्रधान न होकर कथा एवं वर्णन प्रधान है। इसमें आनुसंगिक कथा प्रसंगों की योजना भी नहीं है। इसका मूल अभिप्राय या केन्द्रीय बिम्ब वर-वधू के रूप में शिव पार्वती की उपयुक्तता है। यह मोटिफ लोकवार्ता में अत्यन्त व्यापक और बहुआयामी कथाभिप्राय4 है। यद्यपि ब्याह का शिल्पविन्यास लचीला और परिवर्तनशील है पर केन्द्रीय बिम्ब से उसके सूत्र अच्छी तरह से जुड़े हैं । वैसे भी लोक गाथाओं, विशेषतः मंगल गाथाओं में परम्परा के प्रति अनुष्ठानिक आस्था और भय, मूल कथाक्रम में परिवर्तन के सुरक्षा कवच हो रहते हैं। गायकों का आशुकवित्व, प्रतिभा का योगदान, श्रोताओं की इच्छा, सराहना भी उसमें परिवर्तन नहीं कर पाते।
फिर भी, गुरु शिष्य परम्परा होने पर भी, मौखिक होने के कारण गाथाएँ भारतभर में व्याप्त हैं। एक ही गाथा का शिल्प-विन्यास की दृष्टि से अन्तर लिये होना स्वाभाविक है। अतः लम्बी-लम्बी गेय गाथाओं के किसी एक और सर्वसम्मत पाठ का निर्धारण कदाचित ही सम्भव हो। एक और भी पक्ष, यदि ऐसा कोई प्रयास किया भी गया तो लोकगाथा जड़ हो जायेगी। उसमें विविध अंचलों के रंग और सुगन्धें न रहेंगी। गायकों का मौलिक योगदान भी पकड़ में न आ सकेगा और मूल कथाभिप्राय के विकास को भी नहीं समझा जा सकेगा। जबकि वर्तमान स्थिति, शोध और अध्ययन के अधिक अवसर और मूल तक पहुँचने के अधिक रास्ते रखती है।
प्रारम्भ में मैंने उपर्युक्त दृष्टि से प्रयास किया। कुरु प्रदेश और बुन्देलखण्ड के शिव ब्याहुलों की बानगी ली। ब्रज के मुथुरा-आगरा जिलों के चार गाँवों के गायकों से, गौरी जन्म से सगाई-प्रस्ताव तक का अंश, अलग-अलग पाठों में लिपिबद्ध किया। तुलना के उपरान्त ज्ञात हुआ कि हर गाँव और मण्डली के गायन में कथाक्रम वहीं है, तथ्य भई वहीं है, पंक्ति में कहीं कोई शब्द अलग पड़ जाता है या एकाध व्याख्यापरक पंक्ति जुड़ जाती है। छूट भी जाती है। यहाँ अवलोकनीय है – गौरी के शंकर से वचन पाने के बाद अन्तर्ध्यान होने का अंश –
जब बाई सिला पै पैदा कीन्ही
बाई सिला भसमंत करी
उड़यौ हंस काया कुम्हिलाइ गयी
(जब) है मंचल धर सुरतिधरी
- जोगी नत्थी नाथ, राया
अब बाई सिला पै पैदा कीन्ही
बाई सिला ना पैदा भयी
अब हैमाचल धर सुरतिधरी
- जोगी सूखानाथ, अछनेरा
जब बाई सिला पै पैदा कीन्ही
बाई सिला भसमंत करी
उड़यौ हंस काया कुम्हिलानी
पड़ी रही माटी ढेरी
जब हैंमंचल घर सुरतिधरी
- जोगी पंचमनाथ, मिढ़ाकुर
जब बाई सिला पै पैदा कीन्ही
बाई सिला भसमंत करी
उटिगिया पंछी बोलनहारा
मिल गयी माटी में माटी
जब हैमांचल की सुरतिधरी
- जोगी मुन्नानाथ, गढ़ी गोहनपुर
लेकिन रात्रि जागरणों में भक्त जिजमान की इच्छानुसार या वक्त देखकर, गायकों द्वारा ब्याह के विवरणात्मक या व्याख्यापरक अंशों का विस्तार और संकुचन प्राप्त होता है। ब्याह में कुछ कुछ प्रसंग और वर्ण्य-विषय हैं। पार्वती के नामकरण प्रसंग में चारों वेदों के पन्नों के बाँचे का उल्लेख कुछ गायक करते हैं, कुछ नहीं करते। नामकरण में नाम बताते वक्त, नामों की संख्या, घटा-बढ़ा देते हैं किन्तु पार्वती का भविष्य सब, एक ही बताते हैं जोगी से ब्याह होना।
इसी क्रम में, जब बेटी के जोगी से ब्याह की बात पर हिमाचल क्रोधित होकर ब्राह्मण को दण्ड देने को तत्पर होता है और रानी मैनादे, ब्रह्महत्या से कुल नाश की बात कर, ब्रह्मण को दक्षिणा दिला बिदा कराती है तब चलते वक्त ब्राह्मण, चेतावनी के रूप में, पार्वती की विकट और विचित्र बरात का चित्र खींचता है कि ये, और ऐसे-ऐसे बरात में आयेंगे। ये सारी वस्तुएँ, हिमाचल की लग्न पत्रिका में लिखायी माँगें बन जाती हैं और वे ही सब बरात के वर्णन में पुनः दुहरायी जाती हैं। इस पुनरुक्ति से, यद्यपि हम इसे अवान्तर प्रसंग और अनावश्यक नही कह सकते, ब्याह काफी विस्तार पा लेता है।
जबकि कई बार ब्याह गाने में ब्राह्मण का इतना-सा कथन ही रहता है –
जबै बिरामन न्यों उठि बोल्यौ
जा दिन कन्या कौ ब्याहु करौगे
बड़े-बड़े कारज आमे
सोने की दछिना दई ऐ बिरामन
कियौ बिदा घर कूँ जइयौ
जब पलना लईऐ झुलाय बेटी
भोज्य वस्तुएँ, अनाजों, जैसे चावल, मि