3/13/2006

एक ग़ज़ल



अभी-अभी
(उदीयमान कवियों का कोना )

यूं ही बेवजह किसी की याद सताए तो कोई क्या करे
याद करते-करते अगर जी भर आए तो कोई क्या करे

दिल को बहलाने के तो कई रास्ते हैं दिन भर में
रात होते ही वो ख्वाबों में चला आए तो कोइ क्या करे

कभी जो सोचता हूँ नहीं टूटुँगा मैं कभी अपने इरादे से
कम्बखत दिल अपने इरादे से मुकर जाए तो कोई क्या करे

समन्दर में तो तैरती हैं लाखों कस्तियाँ ओ मेरे हुज़ूर
अपनी ही कश्ती को किनारा ना मिल पाए तो कोइ क्या करे

मुझको कहते हैं सब गरीब प्यार के नाम पर जाने क्यों
फिर भी दुनियाँ में नाम बदनाम हो जाए तो कोइ क्या करे

राजन (गरीब)
चंड़ीगढ़

1 टिप्पणी:

Devi nangrani ने कहा…

Rajan
Bahut hi pyari surmein sajane jaisi gazal piryi hai
shabdon ka sahara lekar.
Bahut acha likhte ho
wishes
Devi